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Saturday, 5 September 2026

नाट्यकलाकार रमेशचंद्र जीक जुबानी नाटकक रपटि - बड़ मुश्किल छै


काल्हि (शुक्र दिन, 04 सितंबर, 2026) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी छल आ ताहिपर भदवरिया अपन विकराल रूप सेहो देखा रहल छल। एहेन स्थितिमे लोककें प्रेक्षागृह धरि घीचिकें आनब ठीके बड़ मोसकिल छल। मुदा, एहि मोसकिल सन काजकें आसान बनओलनि श्री रौशन झा जी। हम बात कऽ रहल छी नई दिल्लीक मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटरमे सायं साढ़े छओ बजेसँ मंचित होमय वला मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर। नाटकक प्रति (करबाक नहि, मात्र देखबाक आ कहिओ काल खेलयबाक रुचि नेनपनसँ रहल अछि, तैं, फेसबुकपर भेटल हकारकें स्वीकारैत हमहूँ ससमय श्री राम सेंटरक प्रेक्षागृहमे पहुँचि गेलहुँ। प्रेक्षागृहमे प्रवेशोपरांत देखल जे सामने वला सीट सभपर एक टा दुपनियाँ बुकलेट राखल अछि। भेल जे ई सीट सभ आरक्षित ने हो तैं, पाछू वला सीट दिस बढ़लहुँ तँ देखल जे हमरासँ पहिनहि ई बुकलेट ओतहु विराजमान अछि। पछाति बुझबामे आयल जे उक्त बुकलेट प्रत्येक सीटपर दर्शक सभक अवलोकन हेतु राखल गेल अछि। ई देखि नीक लागल। एकर लाभ ई भेल जे नाटक संबंधी जानकारी लेल किनको तंग नहि करय पड़ल। सभ टा जानकारी चारि पृष्ठक ई दुपनियाँ बुकलेटमे समेटल छल। बुकलेटक पहिल पृष्ठपर एक टा क्यूआर कोड सेहो अंकित छल आ लिखल छल जे एहि कोड केर माध्यमसँ आर्थिक सहयोग कएल जा सकैछ। 

अखन पूर्वनिर्धारित समयानुसार नाटकक मंचन होयबामे किछु मिनट शेष छल। एहि बीच श्री रौशन जी उद्घोषना केलनि जे समयक विकटता देखैत नाटकक मंचन सायं सात बजेसँ होयत कारण, बहुत गोटे ट्रैफिक जाममे फँसल छथि। एहि समयक सदुपयोग किछु परिचित लोकसभसँ भेंट-घांटमे कएल। आब समय लगभग पौने सात बाजि रहल छल। एकबेर पुनः रौशन जी सभसँ मुखातिब होइत सूचना देलनि जे उक्त नाटकक अवधि जे पहिने एक घंटा दस मिनट छल, आब बढ़िकऽ दू घंटा बीस मिनट भऽ गेल अछि। हुनका द्वारा ई सूचित करब जे उक्त नाटक एहिसँ पहिने भारतक अन्यान्य शहर सभमे दर्जन भरिसँ बेसी बेर मंचित भऽ चुकल अछि, हमर उत्कंठाकें बढ़बय वला छल। हम मोने-मोन खूब प्रसन्न भेलहुँ जे भने हम विस्तृत नाटकक मंचनक साक्षी बनब। 


आब नाटकक मंचन आरंभ होमय वला छल, मुदा, ताहिसँ पहिने हालहिमे दिवंगत स्व. पं. कौशल झा जीक स्मृतिमे एक मिनट केर मौन राखि हुनका श्रद्धांजलि देबाक आह्वान कएल गेल। तदुपरांत, प्रेक्षागृहमे उपस्थित सभ गोटे ठाढ़भऽ दिवंगत आत्माक प्रति एक मिनट केर मौन राखि हुनका प्रति अपन श्रद्धांजलि अर्पित केलनि। एकबेर फेर पं. कौशल जीक संग बितायल किछु अविस्मरणीय पल जीवंत भऽ उठल आ आँखि डबाडबा गेल। जगत जननी जानकी हुनका अपन शरणागति प्रदान करथि !

ठीक छओ बाजिकऽ पचास मिनटपर चिरप्रतीक्षित मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर मंचन आरंभ भेल। मंचपर बरियातीक दुआरि लगबाक दृश्य उपस्थित छल आ संगहि डीजे पर भोजपुरी गीतक बोलपर थिरकैत धिया-पुता, युवा आ कनियाँ-बहुरिया। कहबाक प्रयोजन नहि जे डीजे पर कोन तरहक गीत बाजि रहल छल। एतय नाटकक मूल विषय बूझब आवश्यक अछि। नाटक आधारित अछि मिथिला क्षेत्रमे व्याप्त पलायन आओर मिथिलासँ बाहर भेल मैथिलक विवाह केर बाद उत्पन्न नाना तरहक विसंगति सभपर। नाटकक नायक समुन जे मैथिल छथि आ गामसँ पलायनक पश्चात दिल्लीमे रहैत छथि, हुनक विवाह (जेकि प्रेम-विवाह थिक), मिथिला क्षेत्रसँ बाहर होइत अछि। कन्यागतक ओहिठाम विधि-व्यवहारक अंतर एहि विसंगति दिस पहिलुके दृश्यसँ दृष्टिगोचर होमय लगैत अछि। खैर जे से, जेना-तेना मान-मनौव्वलक बाद विवाह संपन्न होइछ आ पहिल दृश्यक पटाक्षेप होइत अछि।

तदुपरांत, नगहर भरबाक मनोहारी दृश्य आ दुरागमनक पश्चात नवकनियाँ द्वारा सासुरमे निमाहल जाय वला नाना तरहक विधि-व्यवहार आ ताहिमे होमयवला विसंगतिक जीवंत मंचन, दर्शक-दीर्घामे उपस्थित समस्त दर्शककें गुदगुदा रहल छल। नहुँ-नहुँ नाटक अपन गति पकड़ैत अछि। आगूक दृश्य सभमे देखाओल जाइत अछि जे कोना एक टा परदेसी परिस्थितिवश गाममे रहय वला अपन माय-बापसँ दूर होइत चलि जाइत अछि। परिस्थितिक भयावहता तखन आओर झकझोरि दैत अछि जखन देखबामे अबैत अछि जे कोना एक टा लायक बेटा चाहिओकऽ माय-बापकें मुइलाक पछाति मुखाग्नि धरि नहि दऽ पबैत अछि। नाटकक संपूर्ण व्याख्या करब तँ संभव नहि, मुदा, एतबा कहल जा सकैछ जे ई पलायनक बाद समाजमे आएल नाना तरहक विसंगति दिस जोरदार ढ़ंगसँ सभकें आकृष्ट अवश्य करैत अछि।

आब अबैत छी नाटकक कलाकार दिस। हमरा तँ सभ कलाकारक अभिनय उत्कृष्ट लागल। खाहे नाटकक नायक, सुमन केर भूमिकामे श्री विजय झा होथि वा नायिका, गायत्रीक भूमिकामे सुश्री रचना दास। को बड़-छोट कहत अपराधू सन स्थिति अछि। दुनू गोटे अपन अभिनय-कौशलसँ बेस प्रभावित केलनि। नायकक माय, काकी केर कथे कोन। काकी केर भूमिकामे आदरणीया नीरा झा जीक अभिनय-कुशलताक वर्णन करब हमर बूतासँ बाहरक बात अछि। बुकलेटसँ ई जनतब भेटल जे नीरा जी दिल्लीमे सक्रिय मैथिल महिला कलाकारमे सभसँ बेसी अनुभवी छथि आ अखनि धरि सयसँ बेसी मैथिली नाटक आ फिल्ममे अपन अभिनयक छाप छोड़ि चुकल छथि आ से देखबोमे आयल। हुनक अभिनय वर्णनातीत अछि, देखनहि बनय। 

हँ, एतबा अवश्य कहब जे भरि नाटकमे हमर आँखि दू बेर नोरा गेल आ से ई दुनू माय-बेटा दुआरे। गामक बहिनपा सभक उतरा-चौल, उकटा-पैंची आ कनफुसकीकें मंचपर जीवंत केलनि तीन टा स्त्रीक भूमिका निमाहनारि मिथिलाक तीन टा धिया सुश्री नेहा झा, आकांक्षा झा आ कल्पना। हिनका सभक त्रयी, दर्शकसभकें नाटकमे परिस्थितिजन्य उत्पन्न भेल अवसादसँ नहि मात्र निकालबामे सफल भेल, अपितु, सभकें ठहक्का लगबै लेल विवश कऽ देलक। हिनका सभक अभिनय-कौशल देखि ई कहल जा सकैछ जे ई सभ आबय वला समयमे अभिनयक क्षेत्रमे अपन एक टा अलग आ महत्वपूर्ण प्रतिमान गढ़बामे अवश्य सफल हेतीह। 

नायकक पिता, मनोज बाबूक भूमिकाकें जीवंत केलनि भाई हेमंत झा जी। साहित्यिक चौपाड़िसँ लऽकऽ मैथिली साहित्य महासभा (मैसाम) धरिक हिनक यात्राक साक्षी रहितहुँ ई कहाँ बूझल छल जे ई एतेक मांजल कलाकार छथि। हिनक ई रूप हमरा अचरजसँ भरि देलक ताहिमे कोनो संशय नहि। सहनायक, रोहितक भूमिकाकें जतेक सहजतासँ श्री सत्यम काश्यप जी मंचपर जीलथि ओ हुनक सात वर्षक रंगकर्म आ सत्तरिसँ अधिक स्टेज शोकें परिलक्षित कऽ रहल छल। नायिकासँ भैंसुरक रूपमे हिनक लजेनाई, दर्शक-दीर्घाकें लहालोट करैत रहल। भूमिका छोट होइतहुँ अपन अभिनय-कौशलसँ दर्शककें कोना अपना दिस आकृष्ट कएल जाय, ई श्री पंकज मिश्र जीसँ सीखल जा सकैछ। सेल्समैनक छोट सन मुदा प्रभावी पात्रकें अपन ग्रामीण रंगमंचक अनुभवसँ जीवंत कए दर्शक सभक थोपड़ीकें खूब हंसोथलनि श्री पंकज मिश्र जी। आदरणीय विद्यानंद ठाकुर जीकें नायिकाक पिताक रूपमे देखब एक टा सुखद अनुभूति छल। ओ रामलीलामे नाना तरहक भूमिकाकें निमाहि चुकल छथि से जनतब हुनकहि द्वारा नाटकक मध्यांतरमे भेटल। ई तँ भेल नाटकक मुख्य पात्रक संक्षिप्त परिचय जे हम अपन अनुभव आ अल्पज्ञानसँ आहाँ सभक समक्ष रखलहुँ। 

ई समस्त परिचय देब ताधरि नहि पूर्ण होयत जाधरि एहि नाटकक सूत्रधारक भूमिका सहित संपूर्ण नाटकपर अपन अमिट छाप छोड़िनिहार हरफनमौला कलाकार श्री अजित झा जीक चर्च नहि होयत। अहा! की प्रतिभा छनि, अप्रतिम! ई दिल्लीक रंगमंचक खास चेहरा छथि जे अपन निर्देशनसँ भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालयक अधीन संस्था, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी) द्वारा आयोजित विश्वप्रसिद्ध नाट्यमहोत्सव, भारत रंग महोत्सव (भारंगम) मे अपन झंडा गाड़ि, कुशल नाट्य-निर्देशकक रूपमे स्थापित भऽ चुकल छथि। हिनक अभिनयकें प्रत्यक्षतः अनुभव करब कम रोमांचकारी नहि छल। असगरे कोना नाटककें आगू बढ़ाओल जा सकैछ, ई हिनक अभिनय-कौशल देखि बूझल जा सकैछ। कुल मिलाकऽ हम ई कहि सकैत छी जे काल्हुक समय हमरा लेल अत्यंत फलदायी रहल। एक टा नीक नाटकक संग कतोक हित-अपेक्षित सभसँ प्रत्यक्ष दर्शनक लाभ भेटल। किछु नव लोक सभसँ सेहो परिचिति भेल। नाटकक सफल मंचन हेतु रौशन जी समेत समस्त कलाकार, खाहे ओ मंचपर अपन अभिनयक जादू देखाबय वला होथि वा नेपथ्यमे रहि एहि आयोजनकें संपूर्णता प्रदान केनिहार/केनिहारि होथि - सभकें खूब रास बधाई आ अशेष शुभकामना ! 

नाटकक मार्फत किछु बात जे पहिने हम सोचलहुँ जे नहि रखबाक चाही, मुदा, अंततोगत्वा एहि निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ जे अगबे मधुर परसब उचित नहि, किछु नोनगर आ चहटगर सेहो हेबाक चाही । एक टा आम दर्शकक रूपमे एहि नाटककें हम कोन रूपें देखल, तकर सबल पक्ष तँ अपने सभक समक्ष राखि चुकलहुँ। आब, एकर कमजोर पक्षकें, जाहि पर हमर नजरि पड़ल, ओ एहि उद्देश्य आ आशासँ राखि रहल छी जे जौं उचित बुझना जेतनि तँ भविष्यमे उक्त नाटकक मंचन काल निर्देशक महोदय एहि कमीकें दूर करबाक प्रयास करता। नाटकक आरंभसँ पहिने रौशन जी कहलनि जे ई नाटक पूर्वमे एक घंटा दस मिनट केर छल जकरा बढ़ाकए दू घंटा बीस मिनट कएल गेल अछि। 

शुरूमे हम आशान्वित रही जे किछु नव विषयवस्तु जोड़ल गेल हेतैक, मुदा, नाटकक समापनक पश्चात ई कहबामे हमरा कोनो असौकर्य नहि अछि जे नाटककें अनावश्यक रूपें नमारल गेल अछि। कम अवधिमे कसगर कथानक राखि ओकर प्रभावी प्रस्तुति बेसी आवश्यक, नहि कि एकहि संदेशकें अलग-अलग ढ़ंगसँ कहब। एहिसँ हमरा सन अबूझ दर्शक खौंझा जायत । दोसर कमी छल सूत्रधारक सहीसँ उपयोग नहि करब। एहेन मांजल कलाकारकें नाटकक अव्यवस्थित तारतम्यता असहज करैत छै। सूत्रधार द्वारा घटनाक्रमक विवरण आगू-पाछू करब असहज करय वला छल। तेसर कमी संवादक असंगत (Contradictory) होयब रहल। जखन नायक, सुमन आ सहनायक रोहितकें पहिलबेर भेंट होइत छैक तँ रोहित द्वारा पहिने कहल जाइत छैक जे ओ असगरे रहैत अछि दिल्लीमे, मुदा, किछुए कालक बाद ओही दृश्यमे ओकर कथनसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ओकर कनियाँ सेहो दिल्लियेमे रहैत छै। एहि तरहक असंगतिसँ बचब जरूरी। 

अंतमे, सभसँ पैघ असंगति नाटकक मूल विषय लऽकऽ अभरल हमरा। मूल विषयानुसार लोककें अपनहि क्षेत्रमे विवाह-दान करबाक चाही नहि तँ आन क्षेत्रक कनियाँ भेने नाना तरहक विसंगतिक सामना करय पड़ैत छै, यथा- ओ घर-दुआरि, सर-समाज आ माय-बापसँ दूर कए दैत छै। मुदा, जखन रोहित द्वारा सुमनक मार्फत गाममे अपन माय लेल कंबल पठयबाक आग्रह कएल जाइत अछि तँ ओ कहैत अछि जे ई बात हमर कनियाँ ने बूझय। एतय ई बात ध्यातव्य जे रोहितक विवाह अपनहि क्षेत्रमे भेल छै। जखन कि नाटकमे ई देखबामे सेहो आयल जे सुमन केर पत्नी द्वारा सुमनकें कहियो अपन माय-बापक सहायता लेल मना नहि कएल गेल छल। आब ई कहू जे रोहित द्वारा ई कहब जे कंबल पठयबाक बात ओकर पत्नी नहि बूझय, की नाटकक मूल विषयक विपरीत नहि जाइत अछि? 

कहबाक तात्पर्य जे व्यवहार कुशलतामे तँ रोहितक कनियाँसँ बेसी नीक सुमन केर कनिया साबित भेलीह। तखन नाटकक मूल विषयमे सँ एक विषयकें उक्त नाटकक एकटा पात्र द्वारा कमजोर करब भेल की नहि?  नाटकक तकनीकी पक्षक विषयमे हमरा कोनो ज्ञान नहि अछि, तैं ओहि मादे किछु नहि कहि सकब। मुदा, एक टा बात आओर अखरल ओ छल - एक टा दृश्यमे तीनू स्त्री द्वारा आपसी संवाद कालक आपसी दूरी... उक्त दूरी कोरोना कालकें मोन पाड़ि रहल छल। 

आशा अछि हमर ई नीक-बेजाय अनुभव अपने लोकनिकें नीक लागत। - रमेश चंद्र झा

Saturday, 1 August 2026

प्रशांत किशोर, बांकीपुर और मिथिलावाद के लड़के


मैं इस विषय पर लिखते बचता रहा हूँ. हालांकि मैं स्वयं को इतना बड़ा भी नहीं मानता कि लिखकर कोई क्रांति ला दूँ किन्तु भिन्न कारणों से यह मामला बहुत सेंसिटिव रहा है मेरे लिए. विचारधारा, अपने लोग इधर, अपने लोग उधर, मिथिलावाद वाले इनके साथ, मिथिलावाद वाले कांग्रेस के साथ, बिहार का अभिशाप, बिहार भाजपा का नकारा नेतृत्व, प्रशांत से उम्मीद, प्रशांत का ट्रैक रिकॉर्ड आदि आदि वजहें रहीं जहाँ चुप रहना बेहतर समझा मैंने. अब चुकी चुनाव समाप्त हो गया है, संभवतः इसपर अपने विचार रखकर किसी टकराहट और दुराव को आमंत्रण ना मिले... और फिर अभी चुनाव परिणाम भी आना बाँकी है, सो लिखने का यही समय चुना मैंने.

पहले प्रशांत से आरम्भ करता हूँ. प्रशांत किशोर भाजपा और अमित शाह के साथ अपनी जोड़ी के रूप में जाने गए और फिर उसी अमित शाह से दुराव की वजह से उनसे अलग भी हुए. एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत ने साम-दाम-दंड भेद के उपयोग को उसके चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया. सफल भी हुए. समय के साथ पैतरे बदलते रहना, कहाँ जातीय कार्ड खेलना है, कहाँ धार्मिक, कहाँ विकास की बात नहीं करनी है, कहाँ किस व्यक्ति से क्या प्रभाव पड़ेगा, कहाँ किसको शांत करना है, कहाँ किसको मिलाना है, कहाँ किसे धमकाना है.... डेटा एनालिसिस और उसके ऊपर कार्य योजना - इन सबके उपयोग को प्रशांत ने प्रोफेशनल रूप दिया. हालांकि बदलते समय में उन्होंने इन सबसे ऊपर पैसे को पाया और फलस्वरूप दक्षिण के राज्य सह ममता बनर्जी के लिए पैसे के ट्रांजेक्शन को ''देखना'' मात्र उन्हें सफलता दे गया.

इतना सब होकर भी प्रशान्त पिछड़ क्यों गए ?

दरअसल एक एम्प्लोयी और एक मालिक के बीच का मौलिक अंतर नहीं जानते प्रशांत. एक एम्प्लोयी होकर आप बेहतर कार्ययोजना बना कर अपने मालिक को सफल बना सकते हैं, किंतु इस सफल होने में मालिक को मालिक सा बनना होता है. पब्लिक लाइफ में उसे ईर्ष्या, द्वेष और दम्भ से बचना होता है. उसे बर्दाश्त करना होता है, एप्रोच को बहुत होलिस्टिक (संपूर्णता वाला) बनाना होता है. आप ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि जो भी मालिक ऐसे नहीं हुए उनके लिए प्रशांत कुछ नहीं कर पाये.

इसे थोड़ा बेहतर रूप से समझते हैं. एक मालिक राहुल गांधी को देखें. उनके एप्रोच को देखें - "अमित शाह काँप रहा है, मोदी आँख नहीं मिला पा रहा.... मैं दुनियाँ हिला दूँगा" - आदि आदि जैसा दंभ उन्हें प्रशान्त जैसे दसियों एम्प्लोयी भी सफल नहीं कर सकते. अफ़सोस, प्रशांत स्वयं ऐसे मालिक नहीं बन पाये. हर जगह मीडिया के सामने आकर अपना दंभ दिखाना - "कौन बोलेगा सामने मेरे, किसकी इतनी हिम्मत है, तुम क्या उखाड़ लोगे मेरा, सब चोर और हत्यारे हैं"- आदि आदि कहना उन्हें ग़लत मालिक बनाता रहा. मीडिया के सामने आपकी यही बात आपका कोई एम्प्लोयी कह सकता था, अफ़सोस, आप मीडिया में आकर बाहें चढ़ाते रहे और कम से कम बिहार जैसे राज्य में जहाँ राजनैतिक समझ में लोग काफ़ी अनुभवी हैं वहाँ इन सब करतबों से आपकी स्वीकार्यता कभी नहीं होती. बिहार में मीडिया मैनेजमेंट और बड़बोलापन चुनाव में सफलता नहीं देता. आपने यही सब विधानसभा चुनाव में भी किया और अभी बांकीपुर में भी कर रहे... आपने जिसपर सबसे अधिक दोषारोपण किया वो अयोग्य होकर भी मुख्यमंत्री बना है.... ध्यान दें, मालिक बनें पहले !

बांकीपुर में क्या होगा ?

ना तो मैं चुनाव विशेषज्ञ रहा हूँ और ना ही बांकीपुर से अधिक कनेक्शन रहा है मेरा किंतु प्रशांत ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है इसमें कोई दो मत नहीं. यहाँ और एक बात जो सत्य है वो ये कि भाजपा ने चुनाव जीतने को आज से 25-30 साल पहले के कांग्रेस की याद दिला दी. उन्होंने एक भी निम्न स्तरीय पैंतरा छोड़ा नहीं यहाँ. सत्ता में रहकर चुनाव जीतने के हर एक हथकंडे अपनाये उन्होंने. स्टार प्रचारकों को झोंकना, पैसे का उपयोग, प्रतिद्वंदी को धमकाना, बूथ पर कब्जा समेत प्रशासनिक मदद... सब आज़माया है भाजपा ने. हालांकि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट को देखते हुए ये उनके नाक की लड़ाई भी थी. परिणाम के तौर पर मुझे लगता है कि पूर्व परिणामों की अपेक्षा काफ़ी कम अंतर से भाजपा जीत जाएगी....

हाँ, यहाँ प्रशांत कमाल भी कर सकते हैं किंतु इस कमाल करे की राह में राजद द्वारा भाजपा को किया अपरोक्ष मदद सबसे बड़ा माइलस्टोन होगा. जिसे यह लगता है कि बिहार में राजद भाजपा को मदद नहीं कर रही, बेहतर है वो लोग बिहार की राजनीति में अपना अपरिपक्व नाक ना घुसायें.

मिथिलावाद के लड़के !

MSU के संस्थापक सदस्य अनूप और MSU की स्वीकार्यता को मिथिला से बाहर वृहत आकार देने वाले आदित्य प्रशांत किशोर से ना केवल जुड़े हैं बल्कि बांकीपुर चुनाव में उन्होंने अकेले दम पर आरएसएस सह भाजपा के संगठन को बड़ी चुनौती भी दी है. इस विषय में संक्षेप में कहूँ तो इन दोनों ने अपने मालिक प्रशांत के लिए श्रेष्ठ एम्प्लोयी का रोल भलीभाँति निभाया है.

यहाँ इन दोनों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह है कि इन दोनों के ऊपर 'जय-मिथिला' छोड़कर 'जय-बिहार' करने का आरोप लगा है. और तो और यह आरोप भी उनके ही पुराने साथियों ने सबसे अधिक मुखरता से लगाया है. 'मौके की तलाश में रहना, समय आने पर काटना, संग-साथ को भुलाकर स्वयं का दामन साफ़ दिखा दूसरे का मलीन करना' - मिथिला के सांस्कृतिक परम्पराओं में से एक रहा है. ऐसे में मेरे लिए यह एक दु;खद अनुभव वाला पल रहा जब पुराने साथियों ने इनके ऊपर दोषारोपण किया.

कई ऐसे लड़के हैं जिनकी पहचान में अनूप का हाथ है. कई ऐसे लड़के हैं जो कांग्रेस, राजद, आप आदि दलों के दफ़्तर में जाते आते रहे हैं. कई ऐसे लड़के हैं जो पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा-जदयू संगठन से नगदी पाकर उनके समर्थन में लगे रहे, ठीकेदारी पाते रहे, MSU को इस्तेमाल कर अपना बिजनेस प्लान करते रहे... कुछ छुपा नहीं है.

सबको अपनी राजनीति करनी है. सब मौके की तलाश में हैं, सबको बेहतर अवसर चाहिए और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं. सबको अपनी बेहतरी, तरक्की, कमाई का हक है. हाँ, ऐसा करने के क्रम में अपने ही साथियों का विरोध करना मुझे मिथिलावाद को कमजोर करने सा लगा. चुप रहा जा सकता था, सामने आने से बचा जा सकता था...

अंत में
बिहार की जय हो.
मिथिला को एकजुटता मिले.

Tuesday, 2 June 2026

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : चन्द्रमणि झा

वर्तमान भारतीय राजनीति मेँ नरेंद्र मोदी एहन व्यक्तित्वक रूप मेँ स्थापित छथि जिनकर पक्ष आ विपक्ष दुनूमेँ तीव्र मतभेद देखबाक लेल भेटैत अछि। एहन समय मेँ The Leader Narendra D. Modi जेकाँ पुस्तक मात्र एक व्यक्तिक जीवनी बनिकऽ नहि रहि जाइत अछि, बल्कि समकालीन भारतक राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक यात्राक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सेहो बनि जाइत अछि। एहि पुस्तकमेँ नरेंद्र मोदीक नेतृत्व, कार्यशैली आ राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोणकेँ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करबाक प्रयास कएल गेल अछि।

एहि पुस्तकक लेखक आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगतक प्रतिष्ठित गीतकार आ सांस्कृतिक चेतनाक सशक्त हस्ताक्षर छथि। हुनकर साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तकक प्रत्येक अध्यायमेँ स्पष्ट रूपसँ देखाइत अछि। लेखक तथ्य आ घटनाकेँ केवल सूचनात्मक रूपमेँ नहि रखने छथि, बल्कि तकरा भावात्मक आ प्रेरणादायक स्वर सेहो देने छथि। एहि कारणेँ पुस्तक राजनीतिक विश्लेषणक संग-संग साहित्यिक पठनीयता सेहो बनौने रखैत अछि।

पुस्तकक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्वकेँ केवल राजनीतिक उपलब्धिसभ धरि सीमित नहि रखने छथि, बल्कि हुनकर संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता आ जनसंपर्क कौशलकेँ सेहो रेखांकित केने छथि। एक सामान्य पृष्ठभूमिसँ निकलि देशक सर्वोच्च राजनीतिक पद धरि पहुँचबाक यात्राकेँ लेखक प्रेरणादायक आख्यानक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि।

भाषाक दृष्टिसँ पुस्तक सरल आ प्रवाहपूर्ण अछि। घटनासभक क्रमबद्ध विन्यास आ सहज प्रस्तुति एकरा सामान्य पाठकसँ लऽ कऽ राजनीति आ समाजशास्त्रक अध्येतासभ धरि लेल उपयोगी बनबैत अछि। यद्यपि, एक समीक्षकक रूपमेँ ई कहब उचित होयत जे पुस्तकमेँ मोदीजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक सकारात्मक पक्षकेँ अपेक्षाकृत बेसी स्थान भेटल अछि। यदि आलोचनात्मक विमर्श आ वैकल्पिक दृष्टिकोणकेँ सेहो किछु बेसी विस्तार देल जाइत तँ पुस्तकक विश्लेषणात्मक पक्ष आरो सुदृढ़ भऽ सकैत छल। तथापि लेखकक उद्देश्य स्पष्ट रूपसँ नेतृत्व आ प्रेरणाक आयामकेँ रेखांकित करब रहल अछि, आ ओ एहि उद्देश्य मेँ सफल देखाइत छथि।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi  केवल एक राजनीतिक जीवनी नहि, बल्कि नेतृत्व, संकल्प आ राष्ट्रसेवाक विचारकेँ बुझबाक एक गंभीर प्रयास अछि। आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा अपन साहित्यिक दृष्टि आ संवेदनशील अभिव्यक्तिक माध्यमसँ एहि पुस्तककेँ विशिष्ट बना देने छथि। ई पुस्तक विशेष रूपसँ ओहि पाठकसभक लेल उपयोगी अछि जे नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व, हुनकर नेतृत्व-मॉडल आ समकालीन भारतक राजनीतिक यात्राकेँ निकटसँ बुझय चाहैत छथि।

एक पाठकक रूपमेँ सर्वप्रथम तँ हम The Leader Narendra D. Modi केर लिखल जाएबाकेँ लऽ आलोचना करय चाहब। हमर ई आलोचना पुस्तकक विषय-वस्तु वा निष्कर्षकेँ लऽ नहि, बल्कि एकर अस्तित्वकेँ लऽ अछि। आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ई पुस्तक लिखलाहे किएक?

हमर बुझाइत अछि जे नरेंद्र मोदी पर लिखबाक लेल किछु न्यूनतम "अर्हता" होयबाक चाही। जेना - 

  • या तँ लेखक स्वयं संघ-परिवारसँ जुड़ल होथि।

  • या फेर ओ मोदीजीक गृहप्रदेशक होथि।

  • या हुनकर संग कोनो संस्थामेँ कार्य कएने होथि।

  • अथवा पेशासँ पत्रकार होथि, जे वर्षौंसँ हुनकर राजनीतिक जीवनक अध्ययन कएने होथि।

एतय किछु लोक ईहो मानि सकैत छथि जे एहन पुस्तक लिखबाक पाछाँ कोनो राजनीतिक महत्वाकांक्षा वा लाभक संभावना होयबाक चाही। मुदा विडम्बना ई अछि जे चंद्रमणि झा जी एहि तथाकथित अर्हतासभमेँ सँ कोनो अर्हता नहि रखैत छथि।

ओ न तँ राजनीतिक कार्यकर्ता छथि, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ताक गलियारामेँ नियमित रूपसँ विचरण करनिहार, आ नहिए कोनो राजनीतिक लाभक आकांक्षी। ओ मूलतः साहित्यक आदमी छथि—गीतक आदमी, संवेदनाक आदमी, भाषा आ संस्कृतिक आदमी। एहन स्थितिमेँ हुनकर नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखब ओहि लोकसभक लेल आश्चर्यक विषय भऽ सकैत अछि जे साहित्य आ राजनीति बीच कठोर दीवार ठाढ़ कऽ कऽ देखैत छथि।

मुदा हमर शिकायत एतय समाप्त नहि होइत अछि। एक मैथिल हृदयक शिकायत तँ एहि सँ पैघ अछि। यदि चंद्रमणि झा जी केँ ई पुस्तक लिखबे करबाक छल, तँ कम-सँ-कम एकरा मैथिलीमेँ लिखितथि। जे व्यक्ति अपन सम्पूर्ण जीवन मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवामेँ समर्पित कएने छथि, हुनका सँ ई स्वाभाविक अपेक्षा रहैत अछि जे अपन महत्वपूर्ण कृतिसभ लेल मातृभाषाकेँ प्राथमिकता देतीह। The Leader Narendra D. Modi केर अंग्रेजीमेँ प्रकाशित होयब व्यापक पाठक-वर्ग धरि पहुँचबाक दृष्टिसँ उचित भऽ सकैत अछि, मुदा एक मैथिली प्रेमीक मनमेँ ई प्रश्न अनायास उठैत अछि जे की ई पुस्तक मैथिलीमेँ नहि आबि सकैत छल?

तथापि जखन हम पुस्तक पढ़ब आरम्भ करैत छी तँ धीरे-धीरे ई शिकायत कम होमऽ लगैत अछि। तखन बुझाइत अछि जे लेखकक वास्तविक अर्हता न राजनीतिक निकटता अछि, न वैचारिक प्रतिबद्धता आ नहिए कोनो व्यक्तिगत स्वार्थ। हुनकर सभसँ पैघ अर्हता अछि—एक सजग साहित्यकारक दृष्टि, जे अपन समयक प्रभावशाली व्यक्तित्व आ घटनाकेँ बुझबाक तथा ओकरा शब्द देबाक साहस रखैत अछि। सम्भवतः ईहे अर्हता हुनका एहि पुस्तकक रचनाक लेल प्रेरित कएने अछि।

आब पुस्तकक विषय-वस्तु पर अबैत छी। क्राउन पब्लिकेशन, छत्तीसगढ़सँ प्रकाशित ई 278 पृष्ठक पुस्तक वास्तवमेँ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। यद्यपि पुस्तकक सामग्री आ लेखकक परिश्रम एकरा संग्रहणीय बनबैत अछि, तथापि हमर मानब अछि जे एहन महत्वपूर्ण कृतिकेँ हार्डबाउंड संस्करण आ आरो आकर्षक आवरणक संग प्रस्तुत कएल जाइत तँ एकर गरिमा आरो बढ़ि जाइत।

पुस्तकक सभसँ पैघ विशेषता एकर व्यापक फलक अछि। कुल 77 आलेखक माध्यमसँ लेखक नरेंद्र मोदीक जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि आ सामाजिक सरोकार सहित लगभग सभ महत्वपूर्ण पक्षकेँ समेटबाक प्रयास केने छथि। ई कार्य निश्चयहि श्रमसाध्य आ सराहनीय अछि।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तक उपलब्ध अछि, मुदा अधिकांश पुस्तक या तँ जीवनी धरि सीमित रहि जाइत अछि अथवा कोनो एक विशेष पक्ष पर केन्द्रित रहैत अछि। चंद्रमणि झा जीक ई कृति एहि अर्थमेँ अलग देखाइत अछि जे एहि मेँ विविध स्रोत, प्रसंग आ दृष्टिकोणकेँ एकहि स्थान पर संकलित करबाक प्रयास भेल अछि। पाठककेँ मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ सम्बन्धित अनेक एहन सूचना एकत्र भेटैत अछि जाहि लेल अन्यथा अनेक पुस्तक आ स्रोतक सहारा लेबाक आवश्यकता पड़ित।

77 स्वतंत्र आलेख होयबाक बावजूद पुस्तक कतौ बिखरल नहि लगैत अछि। प्रत्येक आलेख एक पैघ व्यक्तित्व-चित्रक अंश बनिकऽ सामने अबैत अछि। पाठक चाहे कोनो अध्यायसँ पढ़ब शुरू करथि, अंततः हुनका नरेंद्र मोदीक जीवन आ नेतृत्वक एक समग्र तस्वीर भेटैत अछि।

लेखकक दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक आ प्रेरणात्मक अछि। ओ मोदीकेँ मात्र राजनेताक रूपमेँ नहि, बल्कि एहन नेताक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य पृष्ठभूमिसँ उठि असाधारण उपलब्धि प्राप्त केने छथि। एहि कारण कतेको स्थान पर पुस्तक जीवनीसँ बेसी प्रेरक साहित्यक रूप धारण कऽ लैत अछि।

एक पाठकक रूपमेँ पुस्तक पढ़ैत समय ई अनुभव अवश्य होइत अछि जे भाषाकेँ आरो रोचक, संवादधर्मी आ प्रवाहयुक्त बनाओल जा सकैत छल। कतेको स्थान पर भाषा अत्यधिक अकादमिक आ विवरणप्रधान भऽ जाइत अछि, जाहिसँ सामान्य पाठककेँ किछु अध्याय बोझिल वा नीरस प्रतीत भऽ सकैत अछि। मुदा एहि पक्षकेँ पुस्तकक सीमा होयबाक संग-संग एकर विशेषता सेहो मानल जा सकैत अछि। लेखक रोचकताक अपेक्षा प्रामाणिकता आ सूचना-संपन्नताकेँ बेसी महत्व देने छथि। एहि कारण पुस्तक भावनात्मक आख्यानक अपेक्षा एक संदर्भग्रंथ आ दस्तावेजक स्वरूप ग्रहण करैत अछि।

यदि कोनो पाठक केवल साहित्यिक आनन्दक लेल एहि पुस्तककेँ पढ़य चाहैत छथि तँ सम्भव अछि जे हुनका किछु निराशा हो। मुदा यदि हुनकर रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्व अथवा एहि विषय पर गंभीर अध्ययन आ शोधमेँ अछि, तँ ई पुस्तक निश्चयहि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होयत।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेताक जीवनी नहि, बल्कि एहन राजनीतिक व्यक्तित्वकेँ बुझबाक प्रयास अछि जाहि इक्कीसम शताब्दीक भारतक दिशा आ विमर्शकेँ गहराईसँ प्रभावित केने अछि। विषयक व्यापकता, सामग्रीक समृद्धि आ दस्तावेजी महत्वक कारण ई कृति विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि।

पुस्तकक एक आन महत्वपूर्ण उपलब्धि एकर सहज उपलब्धता अछि। प्रसन्नताक विषय ई अछि जे ई पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल आ गूगल बुक्स जेकाँ प्रमुख मंचसभ पर उपलब्ध अछि। दुर्भाग्यवश मैथिलीक अधिकांश लेखक आ प्रकाशक अपन पुस्तकक वितरण आ विपणन एहि स्तर धरि नहि पहुँचा पबैत छथि। एहि दृष्टिसँ सेहो ई पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।

एक मैथिल पाठकक रूपमेँ, आ विशेष रूपसँ लेखकक साहित्यिक अवदानसँ परिचित होयबाक कारण, एहि पुस्तककेँ देखिकऽ हमरा स्वाभाविक गर्वक अनुभूति होइत अछि। मैथिली गीत-साहित्यक शिखर पुरुषसभमेँ गिनल जाएबला आदरणीय चंद्रमणि झा जीक राष्ट्रीय स्तरक विषय पर अंग्रेजीमेँ एहन व्यापक आ सुव्यवस्थित पुस्तक प्रस्तुत करब केवल हुनकर व्यक्तिगत उपलब्धि नहि, बल्कि सम्पूर्ण मैथिली समाज आ साहित्य-जगतक लेल गौरवक विषय अछि।

अंतमेँ आदरणीय चंद्रमणि झा जीकेँ एहि महत्वपूर्ण कृतिक लेल हमर हार्दिक शुभकामना। हमर कामना अछि जे ई पुस्तक देश-विदेशक अधिकाधिक पाठक धरि पहुँचे, पढ़ल जाए, चर्चित होउ आ अपन उद्देश्यक सार्थकता सिद्ध करय। संगहि, ई कृति मैथिली समाजकेँ सेहो प्रेरित करय जे ओकर साहित्यिक प्रतिभासभ क्षेत्रीय सीमासँ बाहर निकलि राष्ट्रीय आ वैश्विक स्तर पर अपन सशक्त पहचान स्थापित करय।


प्रवीण कुमार

पाठकों के लिए बोनस
695 रूपा के पुस्तक एखन अमेजन पर 521 रूपा में उपलब्ध अहि. पुस्तक प्राप्ति लेल लिंक

Saturday, 27 December 2025

मिथिला मैथिली पर पाँच बातें

परसों शाम किसी कार्य में लगा था जो लगभग मध्यरात्रि में जाकर समाप्त हुआ। संबंधित दो व्यक्ति को मैसेज किया की इसपर बात हो, स्वाभाविक रूप से वो सो चुके थे। मैंने सुबह तक़रीबन चार बजे उन्हें फिर से मैसेज किया, माय बैड लक की वो बेचारे मेरी तरह अनिद्रा के शिकार नहीं थे, सो रहे थे। फिर मैं भी रूटीन काम की तैयारी में लग गया। 

दरअसल मैंने एक आर्टिकल लिखा था जिसे किसी पुस्तक में छपना था। पुस्तक मैथिली और अंग्रेजी में थी सो मुझे मैथिली में लिखने को कहा गया था। तथ्यात्मक दृष्टिकोण से सहमति के लिए अपना हिंदी लिखा हुआ ही पहले भेज दिया मैंने। इस उम्मीद से की यदि ये ठीक कहा समझा गया तो इसका मैथिली अनुवाद कर दूँगा मैं। 

सुबह तक़रीबन ०९ बजे के क़रीब एक महोदय का फ़ोन आया। उन्होंने कहा - “अरे ये तो ग़ज़ब लिखा आपने, मस्त है ये। न मसाला कम ना ज़्यादा। बिल्कुल बैलेंस्ड किंतु असरदार। मैं आग्रह करूँगा कि आप इसे हिंदी में ही रहने दें। मैथिली करके इसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी।” - मैंने पहले तो सवाल किया की क्या मैथिली भाषा को असरदार नहीं मानते आप ? … और फिर मजाक में उनसे ये भी कहा - “आप क्यों चाहेंगे कि मैथिली में लिखूँ और नाम हो मेरा…” 

इस पर भाई संजीदा हो गए। बोले - “कई वर्षों से वार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ। भरसक पढ़ता भी हूँ मैथिली किताबें, कवि गोष्ठी और विद्यापति नाइट्स वग़ैरा में भी जाता हूँ, मुझे पता है मैथिली भाषा की औक़ात। खासकर तब जबकि आप सोशल मीडिया से हट कर किसी पुस्तक में लिखो। आप अकादमीक भाषा लिखो।” 

मैं गंभीर होकर सुनने लगा उनको और भाई बोलते रहे - “आप जब हिंदी लिखते हो तो आप उसमें अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, मैथिली, भोजपुरी… सबका समावेश करते हो। इससे लोक भाषा बनती है, लोकप्रिय शब्दों से लोग कनेक्ट करते हैं, आप मैथिली में ऐसा करके देखो ना, झंडाबरदार आपको भाषा, व्याकरण से लेकर विद्यापति तक की मार से आपका थोबड़ा सूजा देंगे…” - मैंने दफ्तर की बात कहके भाई को कहा - “देखिए ब्रो, थोबड़ा तो वैसे भी सूजेगा मेरा जब मैथिली किताब में हिंदी आलेख होगा… आप देख लीजिए कैसे सुजाना है।” 

दूसरी घटना - जैसा की मैं यूँ ही #अलरबलर लिखता हूँ, एक पोस्ट लिख दिया जिसमें लोगों के द्वारा साल भर में पुस्तक पढ़ने की बात पूछी थी। जवाब देने वाले सभी मैथिल लोग थे और आप जाकर उस पोस्ट पर देख लीजिए की उनके द्वारा पढ़े किताबों की लिस्ट में से एक-दो किताब को छोड़कर बांकी सभी पचास के करीब किताबें या तो हिंदी की हैं या फिर अंग्रेजी की। अब आप देख समझ लीजिए की मैथिल मैथिली को कितना पढ़ रहा है। कुछ ऐसे लोग जो मैथिली भाषा साहित्य के झंडाबरदार बने हैं और खुद की बादशाहत क़ायम रखना चाहते हैं उनको यह सब नहीं दिखता है, वो आँख बंद करके सब कुछ हरा-हरा देखते हैं। यदि आपने नया प्रयोग किया तो वो अपनी झूठी शान क़ायम रखने के दवाब में आपका थोबड़ा सूजा देंगे… 

तीसरी बात - अभी पटना की मैथिली अकादमी बंद कर दी गई। मेरे जैसे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कूथ-पाद कर अपनी जिम्मेवारी की इतिश्री कर ली। हालांकि इससे फैले बदबू पर कुछेक संस्थाओं ने जहाँ अब धरना करने का विचार किया है वहीं कुछ लोग सरकार द्वारा सभी भाषा के अकादमी का पुनर्गठन होने की बात कर रहे हैं। अब जबकि सरकार ने अकादमियों के पुनर्गठन की घोषणा कुछेक साल पहले ही की थी और अकादमी के बंदी पर सबसे कारगर कार्य हाई कोर्ट में सरकार के ख़िलाफ़ याचिका देने का या फिर किसी सरकारी आदमी को काला झंडा आदि दिखाने का होता…. मैथिलों के इन नौटंकियों को देखकर दया आती है मुझे। 

तक़रीबन पंद्रह-बीस साल पहले कार्यस्थल पर एक मित्र ने मुझे एक कविता सुनाई थी - “काम से डरो नहीं, काम को करो नहीं… काम का फ़िक्र करो या ना करो, फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करो…” यही हाल पटना के मैथिल संस्थाओं की है। उन्हें समाज को विरोध करते भी दिखना है और सरकार अनुदानित संस्था के पद पर कायम भी रहना है…” बेचारे !

चौथी बात - जैसा की मैं पहले कह चुका हूँ, विद्यापति जी को जाड़ा नहीं लगता सो जाड़े के मौसम में जहाँ तहाँ विद्यापति नाइट्स का आयोजन होता है। हालाँकि अब लोग नाम बदल बदल आयोजन कर रहे हैं किंतु नौटंकी वही है। मंच, पाग-डोपटा, बेमतलब के विषयों पर संगोष्ठी, फोटो सेशन… बस। किसी भी ऐसे आयोजन में आपने देखा की सरकाआर के ख़िलाफ़ या अकादमी के समर्थन में कोई एक शब्द बोल दे, कोई सेशन / सत्र इसके ख़िलाफ़ योजना बनाने को ह रख दें… नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि उनका मुख्य अतिथि ही उस सरकार से संबद्ध होता है जिसने अकादमी बंद किया है। 

आपके लिट फेस्ट या फिर अन्यान्य महोत्सवों की चर्चाओं में अनेक एक्शन पॉइंट बनते हैं। कभी किस को उसपर दुबारा बात करते, फॉलो अप लेते देखा आपने ? क्या नफा हुआ है सिवाय लोगों के मिलने जुलने, ब्यूटी पार्लर और कुर्ता बंडी पर खर्च करने के ? 

पाँचवी बात - आज फिर से ललित झा अपने चैनल मिथिला मिरर को लेकर मैथिल भाइयों को इमोशनल करते हुए कह रहे हैं - “मुझे मत बचाइए… आप तय करिए कि मैथिली के लिए कम करते मिथिला मिहिर को बचाना है या नहीं…?” - मैंने उनके लाइव सत्र में कमेंट किया भी की मुझे मिथिला मिरर से कोई मतलब नहीं, हाँ, ललित झा से मतलब है सो आपको कोई मदद चाहिए तो कहें, हम करेंगे। दरअसल सच यही है, आपके मैथिली से कोई लेना देना नहीं है मिथिला को, और यह बात मैंने अनुज ललित को संभवत: पाँच-छह साल पहले कही थी। हिंदी में काम करने को कहा था… अपना कैरीअर संवारने को कहा था…मैथिल और मिथिला ना तो रोटी देता है और नहीं ही मैथिली भाषा साहित्य को इन लोगों ने समृद्ध होने दिया कि इसमें व्यावसायिकता आए… मान लो इस बात को ! 

तो भाइयों शुरू हो जायें… टोटके करें मुझ पर… बाण चलायें मुझ पर…ज्ञान वर्षा करें मुझे पर, वो ज्ञान जिसको लेकर आप कुछ उखाड़ नहीं पा रहे। मेरा क्या हैं, इतना झेल चुका हूँ, थोड़ा और झेल लूँगा…

#मिथिला #मैथिली


Sunday, 21 December 2025

एलियट साहब - मद्रास और दरभंगा

अभी पिछले दिनों जब मद्रास में था तो ड्राइवर ने कहा - “ये एलियट बीच है सार (सर)” - उस वक्त मानसिक व्यस्तता की वजह से मैंने ध्यान नहीं दिया। आजकल अनिंद्रा से पीड़ित हूँ सो सुबह तीन बजे इस Edward Francis Elliot जी की पड़ताल करने लगा। वो उन्नीसवीं सदी में पहले चीफ मजिस्ट्रेट और फिर बाद में सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस रह चुके थे मद्रास के। उनके पिता श्री ह्यू एलियट साहब १८१४ से १८२० के दौरान गवर्नर भी रह चुके थे मद्रास के।

अपने एलियट साहब अमीरज़ादे थे, पढ़े लिखे और बड़े आदमी भी। उनकी एक प्रेमिका हुई Isabella Napier जो संयोगवश Johnstone Napier की पत्नी भी थीं। करीब १९३० के वक्त यह हाई प्रोफाइल प्रेम प्रसंग बहुचर्चित रहा और अपने एलियट साहब ने इसाबेला के साथ विवाह करके इतिहास रच दिया। कहते हैं यह बीच उन्होंने इसाबेला के लिए बनवाया था।

जैसा की लोगों का आरोप है मैं हर बात में मिथिला और दरभंगा को खींच लाता हूँ, मेरा इलेक्ट्रॉनिक संजाल भी मुझ सा ही हो चुका है। इस पड़ताल के क्रम में मुझे एक दूसरे एलियट साहब का पता चला जो मिथिला अर्थात् दरभंगा से जुड़े हैं।

ये Elliot Macnotton साहब उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी हुए। इलियट साहब एक अच्छे प्रशासक, शिक्षाविद और मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते थे, लाजिमी है ब्रिटिश साम्राज्य के करीबी भी रहे।

उसी काल खंड में दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत उनके उत्तराधिकारी बने श्रीमान लक्ष्मेश्वर सिंह। चूँकि लक्ष्मेश्वर सिंह जी उस वक्त अल्पवयस्क थे, उस वक्त के क़ानून के मुताबिक़ उनकी राजसत्ता कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स के अधीन कर दी गई। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत एक यूरोपीय संरक्षक और शिक्षक की नियुक्ति की जाती थी, संयोगवश इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए एलियट मैकनॉटन को चुना गया।

संरक्षक और शिक्षक के रूप में एलियट मैकनॉटन का प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक रहा। वे युवराज के निकट रहते थे और उनकी शिक्षा, अनुशासन तथा नैतिक विकास की देखरेख भी करते थे। उनका दायित्व केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि एक भावी शासक के व्यक्तित्व निर्माण तक विस्तृत था। लक्ष्मेश्वर सिंह को जहाँ अंग्रेज़ी शिक्षा, विधि, अर्थशास्त्र और आधुनिक प्रशासन की समझ दी गई वहीं उनके अंदर सार्वजनिक दायित्व और उत्तरदायी शासन की भावना भी विकसित की गई।

एलियट मैकनॉटन को अन्य औपनिवेशिक शिक्षकों से अलग करने वाली बात यह थी कि वे स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान रखते थे। एक अंग्रेजी प्रशासक के अधिकारी होने के बावजूद कभी भी उन्होंने मैथिली परंपराओं या संस्कृत अध्ययन को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। उनके समय में पारंपरिक विद्वानों को युवराज को शिक्षा देने की अनुमति दी गई और पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ देशज परंपराओं को भी संरक्षित रखा गया।

आधुनिक ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता के इस संतुलन ने लक्ष्मेश्वर सिंह के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। इस शिक्षण और मार्गदर्शन का प्रभाव तब स्पष्ट हुआ जब महाराजा ने दरभंगा राज का दायित्व संभाला। लक्ष्मेश्वर सिंह अपने समय के सबसे प्रगतिशील ज़मींदारों में गिने जाने लगे। वे अपनी उदार दानशीलता, शिक्षा के प्रति समर्थन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अकाल राहत और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण के लिए व्यापक रूप से सम्मानित हुए। इतिहासकार मानते हैं कि उनकी सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण उनके निर्माणकाल में एलियट मैकनॉटन के सान्निध्य का ही परिणाम था।

सो ये थे एलियट साहब !

(तस्वीर एलियट इसाबेला बीच की है।)

Sunday, 24 August 2025

साहित्य और राज्य से इतर मिथिला


मिथिला के इतिहास के नाम पर अधिकांशतः साहित्य विवेचना ही देखी है। चूँकि मैंने कोई किताब नहीं लिखी, और न ही टीवी में आता हूँ, साहित्य से इतर मिथिला का संक्षित इतिहास लिखने की धृष्टता करते डर रहा हूँ। चीज़ें शायद विस्तार से भले न मिलें, क़रीने से भी न मिले किंतु जो हैं वो सच्ची हैं इसकी गारंटी लेता हूँ।

मिथिला की गाँव वापसी

सन १८१२ में पटना की जनसंख्याँ तक़रीबन ३ लाख थी और कलकत्ता की १.७५ लाख. १८७१ में पटना १.६ लाख और कोलकाता ४.५ लाख. पटना की तरह यही हाल भागलपुर और पुरनियाँ का भी रहा. कारण दो थे. इस दौरान अंग्रेजों की मदद से कलकत्ता में फला फुला उद्योग और बिहार/ मिथिला इलाके में देशी उद्योग के विनाश से लोगों का शहर से गाँव की ओर पलायन. मिस्टर बुकानन ने अपने सर्वे में १९ वीं सदी के बड़े हिस्से तक इस पलायन की पुष्टि की है. अंग्रेजी शासन की दोहन निति के कारण शहर के उद्योग धंधे नष्ट होते गए और लोग गाँव में वापस आते गए.

इसका परिणाम गाँव के घरेलु उद्योग और कृषि क्षेत्र में उन्नति लेकर आया. दुष्परिणाम सिर्फ इतना की गाँव में काम कम और लोग ज्यादा हो गए. इस क्रम में अति तब हुई जब अंग्रेजों ने गाँव की जमीन का दोहन भी आरम्भ किया... १८५७ की क्रांति में सरकार के खिलाफ ज्यादा लोगों का जुटना संभवतः इसी करण हुआ. लोग शहर में मारे गए और गाँव में भी शुकुन से न रह पाए तो विरोध लाजिमी था. ऊपर से कुछ स्थानीय लोगों द्वारा अंग्रेजों की चमचई...

इसको लिखने का कारण सिर्फ इतना की मुझे इसी प्रकार की घुटन आज के हिन्दुस्तान में दिखती है. मुझे लगता है की लोग गाँव वापस जायेंगे... गाँव छोटे उद्योग धंधों, शिक्षा और व्यापार का केंद्र बनेगा... सरकारें जलेंगी...

दलान

उद्योग व् पलायन

अक्सर लोगों से सुनता हूँ, बिहार और मिथिला का खस्ता हाल है... लोग खतरनाक तरीके से पलायन कर रहे हैं... ब्ला ब्ला ब्ला. जरा अन्दर घुसिए तो पता चलता है की मिथिला से पलायन का इतिहास हजारों वर्ष पुराना रहा है. विद्वान, व्यापारी, मजदुर... सब बेहतर पारितोषिक के लिए बाहर जाते रहे. इतिहासकारों ने इस बात का सबुत ८०० वीं ईस्वी से बताया है.

जूट, नील और साल्ट-पिटर के नजदीकी उत्पादन क्षेत्रों (फारबिसगंज, किशनगंज दलसिंहसराय आदि) में मजदूरी के अलावा लोग मोटिया या तिहाडी मजदूरी करने नेपाल, मोरंग, सिल्लिगुड़ी और कलकत्ता भी जाते रहे हैं. श्री जे सी झा ने अपनी किताब Migration and Achievements of Maithil Pandits में लिखा है - मैथिल पंडित बेहतर अर्थ लाभ के लिए देश के अन्य क्षेत्रों में जाते रहे हैं.

हालाँकि तब और अब के इस पलायन में फर्क है. तब लोग मूलतः वापसी में अपने साथ कृषि की नई तकनीक सीख कर, स्वस्थ जीवन जीने के गुर सीखकर, घरेलु उद्योग लगाने की नई तकनीक सीख कर आते थे. जबकि अब हम छोटे कपडे, कान फाडू पंजाबी संगीत, प्रेम त्रिकोण और धोखेबाजी की नई तकनीक ज्यादा सीखते हैं.

इस दौर में एक वक़्त मिथिला क्षेत्र में उद्योग फला-फुला भी. अठारहवीं और उन्नीसवी शताब्दी में मिथिला के अलग अलग शहरों में विभिन्न उद्योग लगे. मधुबनी में मलमल, दुलालगंज व् पुरनियाँ में सस्ते कपड़ों का तो किशनगंज में कागज का उद्योग चला. दरभंगा, खगडिया, किशनगंज आदि ईलाका पीतल व् कांसे के बर्तनों के लिए जाना जाता था... भागलपुर सिल्क, डोरिया, चारखाना के लिए और मुंगेर घोड़े के नाल, स्टोव, जूते के लिए प्रसिद्ध था.

इन सबमे आश्चर्यजनक तरीके से पुरनियाँ तब भी काफी आगे था. कहते हैं पुरनियाँ का सिंदूर उत्पादन व् निर्यात तथा टेंट हाउस के सामान बनाने का काम विख्यात था. मेरे शहर दरभंगा के लोगों को बुरा न लगे इसलिए बताता चलूँ की दरभंगा शहर उस वक़्त हाथी दांत से बने सामानों का प्रमुख उत्पादन केंद्र था.


मिथिला में स्त्री

जितना पुराना इतिहास पुरुषों द्वारा मिथिला छोड़ने का रहा है ठीक उतना ही अकेली रहने वाली स्त्रियों के शोषण (विभिन्न स्तरों पर) का भी रहा. मैथिल समाज का छुपा हुआ किन्तु सत्य पक्ष है की स्त्रियाँ सताई जाती रही... परदे के पीछे यौन प्रताड़ना... लांछन... दोषारोपण... आदि करते हुए मैथिल समाज खुद को कलमुंहा साबित करता आया है.

इसका एक सकारात्मक पक्ष भी था. क्षेत्र में मैथिल स्त्रियों में शिक्षा का स्तर बढ़ा और वो स्वाबलंबी बनी. बिहार के औसतन ६% के सामने पूसा में स्त्री शिक्षा का दर १३%, सोनबरसा में ६%, मनिहारी में ९% थी. (जिन्हें % कम लग रहा है उनके लिए – १९९०-२००१ में यह दर २८% था)

स्वाभाविक रूप से गाँव की सत्ता स्त्रियों के हाथ में आ गई थी ऐसे में. गाँव की महिलाएं घरेलु उद्योग, पशु पालन आदि में आगे दिखने लगी थी. संभवतः गांधी का चरखा आन्दोलन इसी वजह से मिथिला के घर घर में पहुँच पाया.

समय के साथ साथ मैथिल स्त्रियों की दुनियां थोड़ी स्वप्निल बनाई गई जब दूर देश के सन्देश उसके पास भौतिक और काल्पनिक तरीके से पहुँचने लगे. इस रंग में भी भंग तब पड़ा जब पुरुष अपने साथ बीमारियाँ भी साथ लाने लगे.


मिथिला में जातियां

यहाँ हिन्दू परंपरा अपने प्रखरतम रूप में सभी जटिलताओं के साथ सदा विद्यमान रहीं. अलग जातियों के अलग अलग देवता और अलग गहबर होते थे. जातियों के देवताओं के नाम रोचक थे.

श्याम सिंह डोम जाति के, अमर सिंह हलवाई व् धोबियों के, गनिनाथ-गोविन्द हलवाइयों के सलहेस दुसाधों के दुलरा दयाल/ जय सिंह मल्लाहों के, विहुला तेली जाती के, दिनाभद्री मुसहरों के तो लालवन बाबा चमारों के देवता थे.

स्वाभाविक तौर पर सामाजिक कुरीतियाँ, अधविश्वास और धारणाएं ज्यादा थीं. तमाम् विरोधी उदाहरण के बावजूद ब्राम्हण, राजपूत या लाला विपदा में दुसाध, मुसहर के गहबर में जाते थे. जातियों के हिसाब से कार्य बंटे थे जो उत्तरोत्तर कम होते गए.

मिथिलांचल के कई इलाकों में मुसलमानों द्वारा मनाये जाने वाले ताजिये में हिन्दुओं का शामिल होना और हिन्दुओं के त्योहारों में मुस्लिमों के साथ होने के उदहारण भी हैं. कालांतर में हम समझदार होते गए और विषमतायें उग्र रूप धारण करने लगी.


ऐसे में यह स्पष्ट है कि हमें हमारे सीमित सोच से इतर मिथिला को बृहत् तौर पर देखे जाने की आवश्यकता है। मिथिला मात्र विद्यापति विद्यापति समारोह और प्रणाम मिथिलावासी और हमर मिथिला महान तक सीमित नहीं है। 

Saturday, 16 August 2025

"न त्वत्समश्चाभ्यधिकश्च् दृश्यते" - खट्टर काका के संस्मरण


मैथिली साहित्यक क्षितिज पर जाज्वल्यमान नक्षत्र सन अहर्निश प्रदीप्त सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाकार प्रो.हरिमोहन झाक जन्म १८ सितम्बर १९०८ केँ वैशाली जिलाक कुमर बाजितपुर गाम मे भेल रहनि। हिंदी आ मैथिलीक लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार जनार्दन झा जनसीदनक तेसर संतान प्रो. झा केँ संस्कार मे पांडित्य आ साहित्य परिवार सँ उपहार मे भेटलनि। बाल्यकालहि सँ 'ननकिङबू' केँ पिताक सानिध्य मे साहित्यक गहन बोध होएब आरंभ भए गेल रहनि आ खेलौनाक स्थान पर ओ शब्दालङ्कार सँ खेलाए लागल रहथि। कहबी अछि जे पिता-पुत्रक संवाद सेहो सानुप्रास पद्य मे होइत रहनि। 

प्रो. झा नियमित शिक्षा सँ दूर रहि पिताक साहचर्य मे विद्योपार्जन करैत रहलाह आ पंद्रह बरख धरि हिनक नामाकरण कोनो विद्यालय मे नहि कराओल गेल। पिताक संसर्ग मे रहैत 'ननकिङबू' पूर्ण मनोयोग सँ साहित्यिक अवगाहन करैत रहलाक आ 'अपूर्णे पंचमेवर्षे वर्णयामि जगत्रयम' चरित्रार्थ करए लगलाह । विद्यालाय मे नामांकनक समय संस्कृत मे धाराप्रवाह वक्तृता सँ अचंभित गुरुजन समाज हिनक विशिष्ट प्रतिभाक आदर कएलनि आ हिनक नामाकरण सोझे मैट्रिक मे कराओल गेल आ १९२५ मे पटना विश्वविद्यालय सँ ई प्रथम श्रेणी मे मैट्रिकक परीक्षा उतीर्ण कएलनि। १९२७ मे इंटरमिडियटक परीक्षा मे तेजस्वी छात्र हरिमोहन बिहार आ उड़ीसा मे संयुक्त रूप सँ सर्वोच्च्य स्थान प्राप्त कएलनि । १९३२ मे दर्शनशास्त्र सँ स्नातक मे सर्वोच्च स्थान प्राप्त कए स्वर्ण पदक सँ विभूषित भेलाह आ १९४८ मे पटना कॉलेज मे प्राध्यापक नियुक्त भेलाह से आगाँ पटना विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष पद केँ सेहो सुशोभित केलाह ।

बाल्यकालहि सँ साहित्यिक परिवेश भेटैत रहबाक कारणेँ साहित्य मे हिनक विशेष अभिरुचि स्वभावहि भए गेल रहनि। पिता जनार्दन झा जनसीदनक बहुतो काव्यक पहिल श्रोता प्रो. झा भेल करथि। एहि क्रम मे अपने सेहो पद्य रचब आरम्भ कए देने छलाह। पिताक संग भ्रमण मे रहबाक कारण सँ हिनका विभिन्न साहित्यिक विद्वान् ओ पंडित लोकनिक सानिध्य भेटैत रहलनि। जखन पित्तिक देख-रेख मे नियमित छात्रजीवन आरंभ कएलनि तँ हिनक 'पोएट्रिक' स्थान 'ज्योमेट्री' लए लेलक। बहुमुखी प्रतिभाक संपन्न प्रो. झा सदिखन अपन अध्यापक लोकनिक प्रिय पात्र बनल रहलाह आ नियमित अध्ययनक संग साहित्य सेहो पढ़िते रहलाह। ओना तँ साहित्यिक संसर्ग हिनका सबदिना भेटैत रहलनि मुदा प्रो. झा जखन लहेरियासराय पुस्तक भंडार मे रहब आरम्भ कएलनि तखन आचर्य रामलोचन शरणक रूप मे हिनका एकगोट आदर्श साहित्यिक गुरु भेटि गेलनि। एहिठाम सँ ओ साहित्यिक क्षेत्र मे मुखर भए प्रवेश कएलनि। 

पुस्तक भंडार ताहि समय मे महत्वपूर्ण साहित्यिक केंद्र केँ रूप मे स्थापित भए गेल छल जाहि ठाम ओहि समयक अधिकांश विद्वतजनक आन- जान होइत रहैत छल। प्रतिदिन संध्या काल मे विभिन्न साहित्यिक पक्ष पर एहिठाम परिचर्चा होइत छल। एकर खूब अनुकूल प्रभाव प्रो. झाक साहित्यिक जीवन पड़ भेलनि आ हुनक साहित्यिक विकासक श्रीवृद्धि होबए लगलनि आ हिनक आरंभिक रचना सभ मैथिलीक पत्रिका 'मिथिला' मे प्रकाशित होइत रहलनि। मैथिलीक सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास 'कन्यादान' एही पत्रिका मे पहिलुक बेर क्रमशः छपैत रहल। एही समय मे हिनक किछु छात्रोपयोगी पोथी सभ सेहो प्रकशित भेलनि यथा 'तीस दिन मे संस्कृत' ,'तीस दिन मे अंग्रेजी' आदि। ई पोथी सभ अपन रोचक शैली आ तथ्यक सहजताक कारण सँ छात्र लोकनिक बीच बहुत प्रसिद्ध भेल छल।

हरिमोहन झा जाहि समय मे रचना करैत छलाह से साहित्यिक आ सामाजिक उत्थान आ जनजागरणक समय रहैक । लोकक परिपेक्ष आ सरोकार मे परिवर्तन होएब आरम्भ भए गेल छलैक। एहि प्रभाव सँ समुच्चा विश्व एकटा नव वैचारिक परिवेश मे प्रविष्ट कए रहल छल। वैश्विक प्रभाव सँ भारत मे सेहो एकाधिक रूप मे परिवर्तन दृष्टिगोचर भए रहल छलैक । एहि परिवर्तनकारी समयक प्रभाव मे हिनक लेखनी मे समकालीन समाज मे पसरल धार्मिक रूढ़ीपंथ केर वर्णन प्रखरतम रूप मे भेटैत अछि। एहि समय मे सामान्यतः दूगोट विचारधारा मुख्य रूपेँ सक्रीय छलैक । एकटा वर्ग पाश्यात आदर्श केँ अपनबैत अपन समाज केँ पुनर्गठित आ चेतना सम्पन्न करबाक आग्रही छल तँ दोसर दिस किछु लोक अपन गौरवमय अतीत सँ सकारात्मक तत्व सबकेँ लए ताहि प्रवाभ केँ समेटैत समाज केँ पुनर्गठित आ चेतना सम्पन्न बनेबाक आग्रही छल। मिथिला पर एहि पुनरोत्थान प्रवित्ति केँ विशेष प्रभाव पड़लै। दोसर वर्ग जे पहिलुक स्थापित व्यवहारक सीमा मे रहैत सुधार चाहैत छलाह तिनकर सीमा के तोरैत हरिमोहन झा धर्मसातर पर प्रहारक रुख अपनौलनी। 

हुनक साहित्य में बुद्धिवाद और तर्कवाद केर सर्वोपरि स्थान भेटैत अछि आ हुनक धारणा रहैन जे तर्क नहि कए सकैत अछि से मूर्ख अछि। हिनक रचना मे एक दिस बौद्धक दुख:वाद केर प्रभाव तँ दोसर दिस चार्वाक केर दर्शनक प्रभाव भेटैत अछि। हिनकर लेखनी मे वर्ण व्यवस्थाक निंदा,दलित विमर्शक पक्ष,सामंती शोषणक विरोध आदि बड़ कम भेटैत अछि,तें हिनका मार्क्सवादी किंवा जनवादी तँ नहि मानवतावादी कहब बेसी युक्तसङ्गत होएत आ से हिनक रचना कन्याक जीवन आ पांच पात्र मे देखल जा सकैत अछि। ई धार्मिक पाखंड केँ अपन लेखनीक जड़ि बनौलनि आ किंसाइत एहि केँ सभक बीज मानि साबित करबाक यत्न कएलनि जे नाक एम्हर सँ छुबु वा उम्हर सँ बात एक्कहि।

अपन रचना काल मे प्रो. झा करीब दू दर्जन पोथीक रचना कएलनि। ई मूलतः गद्यकार छलाह। हिनकर लिखल मैथिली कृति मे विशेषतः उपन्यास आओर कथा अछि । यद्यपि पंडित झाक कविता सेहो ओतबे मनलग्गू आ प्रभावकारी होइत छल। कविता सभ मे व्यंग केर माध्यम सँ सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार करैत हिनक कविता ढाला झा ,बुचकुन बाबू, पंडित आ मेम आदि सभ एखनहुँ प्रासंगिक अछि । हिनका द्वारा लिखल गेल उपन्यास सभ मे कन्यादान आ द्विरागमन सबसँ बेसी प्रसिद्ध अछि। बस्तुतः ई एके उपन्यासक दू भाग कहल जएबाक चाही । कथा संग्रह सभ मे प्रणम्य देवता,चर्चरी आ रंगशाला प्रमुख अछि । एकर अतिरिक्त हिनक आत्मकथा 'जीवन यात्रा' जे साहित्य अकादमी सँ छपल आ एहि पोथी पर पंडित झाकेँ मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेलनि। हिनक रचना सभ 'हरिमोहन झा रचनावली' नाम सँ सेहो प्रकाशित भेल अछि। हिनक सर्वश्रेष्ट कृति भेलनि 'खट्टर काकाक' तरंग' जकर अनुवाद कतेको भाषा मे भेल। प्रो. झा दर्शनशास्त्रक उद्भट विद्वान छलाह। एहि विषय मे हिनक सेहो किछु महत्वपूर्ण पोथी आ अनुदित पोथी सभ अछि। जाहि मे न्याय दर्शन(१९४०), निगम तर्कशास्त्र (१९५२),वैशेषिक दर्शन (१९४३),भारतीय दर्शन (अनुवाद १९५३) आ ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी । एहि सभ मे हिनकर शोध ग्रंथ - “ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी” सर्वाधिक प्रसिद्ध अछि। हिनक किछु रचना संस्कृत मे सेहो भेटैत अछि जाहि मे 'संस्कृत इन थर्टी डेज ' आ 'संस्कृत अनुवाद चंद्रिका' छात्रोपयोगी आ प्रसिद्ध अछि। एकर अतिरिक्त प्रो झा कतिपय पोथी/पत्रिकाक सम्पादन कएल जाहि मे 'जयंती स्मारक प्रमुख अछि।

प्रो.झा द्वारा लिखल कथा आ ताहि मे वर्णित पात्र लोकक स्मृति मे सहजहि घर करैत अछि आ किछु पात्र तँ एतेक प्रचलित भेल जकर उदहारण एखनहुँ लोकव्यवहार मे अकानल जा सकैत अछि। चाहे तितिर दाई होथि वा खटर काका। के एहन मैथिलीक पाठक हेताह जे एहि पात्र सँ अवगत नहि हेताह। वस्तुतः प्रो झा केँ अपन भाषा पर ततेक मजगूत पकड़ छनि जे अपन शब्द विन्यास सँ कथानक केँ नचबैत लोकक स्मृति मे अपन विशिष्ट स्थान बनबैत अछि। अपन कथा सभ मे क्लिष्ट संस्कृतक शब्द सभक परित्याग करैत लोक मे प्रचलित शब्द आ फकड़ा आदिक प्रयोग करैत रचना सभ केँ जनसामान्यक लगीच अनैत अछि। गामक ठेंठ शब्द आ गमैया परिवेशक वर्णन करैत सामाजिक कुरुति पर व्यंगक माध्यमे अपन भाषाक निजताक पूर्ण व्यवहार करैत अमर रचना सभ करैत रहलाह। रचना सभ पढ़ैत काल वर्णित घटनाक्रम सद्य: घटित आ वास्तविक प्रतिक होइत अछि। पढ़ैत काल कखन हँसी छुटत आ कखन आँखि नोरायत ई अटकर कठिन भए जाइत अछि। 
हिनक रचना सभ मे परिवर्तनक स्वर उठैत अछि। नव परिवेशक झाँकी प्रस्तुत करैत अछि। पाठक केँ उचित -अनुचित सँ अवगत करबैत ओकरा अपन स्वत्व केँ चिन्हबाक मादे प्रेरित करैत अछि। ग्रामसेविका,मर्यादाक भंग ,ग्रेजुएट पुतौह एहने भूमिका मे लिखल कथा सभ अछि जे एकटा परिवर्तित समाज आ ताहि मे स्त्रीक भूमिका केँ सोंझा अनैत अछि। सामाजिक रूढ़ता पर प्रहार करैत कथा कन्याक जीवन , परिवारिक सामंजस्य आ मध्यम वर्गीय परिवारक सुच्चा चित्रण करैत कथा पंच पत्र आ मिथिलाक व्यवहार सँ परिचित करबैत कथा तिरहुताम सन अनेको कथा सभ अपन संवाद शैली आ कथ्य केर लेल विश्व साहित्यक कोनो भाषा केँ समक्ष ठाढ़ होएबाक सामर्थ्य रखैत अछि।

प्रो.झाक पत्र लिखबाक शैली सेहो विलक्षण रहनि। पिता,अग्रज,माए,पुत्र आ पत्नी सँ नियमित पत्राचार होइत छलनि।आगाँ साहित्यिक पत्राचार सेहो खूब होबए लगलनि। एहि पत्र सभ मे एकदिस प्रो.झाक व्यक्तिगत जिनगी केँ बहुत लगीच सँ देखल जाए सकैत अछि तँ दोसर दिस समकालीन परिदृश्य आ परिस्थितिक केँ सेहो फरीछ अवलोकन होइत अछि। आत्मीय भाषा शैली आ लेखनी मे निहित आपकता सहजहि आकर्षित करैत अछि। हिनक एहि विधाक विलक्षणता दू गोट कथा मे खूब प्रमुखता सँ उजागर भेल अछि। पहिल कथा अछि पाँच पत्र आ दोसर अछि दरोगाजीक मोंछ। पाँच पत्र कथा मे पांच गोट छोट -छोट पत्रक सङ्कलन अछि आ विशेषता ई जे पांचो पत्र विभिन्न मनोभावक मे एकटा समयांतरक संग लिखल गेल अछि। कथाक स्वरुप एकदम छोट अछि मुदा जँ भाव पक्षक विस्तार करी तँ एकटा सम्पूर्ण महाकाव्य बनि सोझाँ अबैत अछि। अभिव्यंजनाक शैली मे लिखल ई कथा अपन विशिष्ट शैलीक कारणे मैथिली साहित्य मे पृथक स्थान रखैत अछि। एहि मे निहित यथार्थक बोध ,करुणा ,सम्बन्धक गरिमा ओ आत्मीयता ,वैवाहिक जीवन आ पारिवारिक स्थिति एकहि संह मुखर भए पाठकक सोझाँ अबैत अछि। दोसर कथा अछि दरोग़ाजिक मोंछ। एहि मे संशय आ द्वन्द केर चित्रण भेल अछि जकर जड़ि मे रहैत अछि एकगोट अधटुकड़ी पत्र। ई कथा अपन रोचक सस्पेंश आ विलक्षण शिल्पक एकगोट माइलस्टोन ठाढ़ करैत अछि। प्रो.झाक केँ डायरी लिखब सेहो खूब रुचैत रहनि। प्रतिदिन किछु ने किछु लिखथि। अपन विचार सभकेँ 'My Stray Thoughts' शीर्षक सँ नोटबुक मे लिखल करथि। एहिसभ विधा मे लिखल रचना सभ संकलन आ प्रकाशनक माँग करैत अछि जाहि सँ पाठक अपन लोकप्रिय साहित्यकार केँ आओर लगीच सँ जानि सकताह।

हरिमोहन झाक गद्य सँ हमरा लोकनि खूब नीक सँ परिचित छी। एहन विरले मैथिली साहित्यानुरागी होएताह जे हिनक कथा सँ परिचय नहि हेतनि। गद्यक तुलना मे हिनक पद्य सँ पाठकक परिचय कम भेल अछि। हिनक गद्य ततेक लोकप्रिय भेलनि जे एहि आलोक मे हिनक पद्य हराएल सन लगैत अछि। बाद मे हरिमोहन झा रचनावली भाग ‍१ सँ ४ धरि प्रकाशित भेल आ रचनावलीक चारिम भाग मे हुनक ओ कविता सभ संकलित कएल गेल जे प्रणम्य देवता ओ खट्टर ककाक तरंग नामक पोथीमे नहि आएल छल। हरिमोहन झा समय-समय पर कविता सेहो लिखैत रहलाह जे विभिन्न समकालीन पत्र - पत्रिका सभ मे प्रकाशित होइत रहल। 

मिथिला मे व्याप्त आडम्बर, अर्थाभाव, परिवर्तित होइत समय आदि विभिन्न विषय पर लिखल हिनक कविता सभ अपन विलक्षण शिल्प आ अद्भभुत शैलीक हेतु सर्वथा पठनीय आ चिंतनीय अछि। हरिमोहन झाक कविता सभ सेहो हुनक कथे जकाँ हास्य-व्यंग सँ ओतप्रोत अछि। एहि व्यंगक ई विशेषता अछि जे ई अपन साहित्यिक गरिमाक निर्वहण करैत एकटा नव दृष्टिकोण पाठकक सोझाँ अनैत अछि। स्थापित चलन ओ कोनहुना ढोआ रहल परिपाटीक विरोध जखन एहि विधाक संग पद्य मे अबैत अछि तँ मनलग्गू होएबाक संगहि एकटा गंभीर विमर्श ठाढ़ करैत अछि जाहि मे समकालीन परिस्थितिक संग आँखि मिलेबाक खगता अभरैत अछि। प्रो.झाक कविता कतेको कवि सम्मलेन आ कवि गोष्ठीक आकर्षण रहल अछि।

प्रो झाक जीवन एकटा स्फुट किंवदंती सँ कम नहि कहल जाए सकैत अछि। प्रो.झा सँ संबंधित बहुतो संस्मरण सभ भेटैत अछि। एहि संस्मरण सभ मे हुनकर व्यक्तित्वक विलक्षणता ,आशु प्रतिभा, नामक धाख,साहित्यिक ओजन ,लिखबाक सनक आ अधीत विद्वताक परिचय भेटैत अछि। हिनक सद्यः स्फूर्त कविताक विषय मे एकगोट प्रचलित संस्मरण एहि प्रकार सँ अछि। जखन ई बीस बरखक रहथि तखन भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेनक अधिवेशन ( मुज्जफ्फारपुर) हरिऔधजीक अध्यक्षता मे भेल रहैक आ मंच पर रामधारी सिंह दिनकर,गोपाल सिंह नेपाली,राम वृक्ष बेनीपुरी सन उद्भट विद्वान सभ उपस्थित रहथिन। एहि बीच एकटा ठेंठ भोजपुरिया कवि मंच पर आबि तिरहुतिया केँ बनबए लगलाह आ कविता पाठ करैत कहला : "अइली अइसन तिरहुत देस/मउगा अदमी उजबुज भेस// मन लायक भोजन न पैली,चुडा दही फेंट कर खैली। एकर उतारा मे प्रो. झा अपन कविता मे कहलखिन -"भोजपुरिया सब केहन कठोर ,पुछैथ तसलबा तोर की मोर// सतुआ के मुठरा जे सानथि,चुडा दहिक मर्म की जानथि। सभा भवन करतल ध्वनि सँ गूँज उठल,हरिऔध जी माला पहिरौलखिन,बेनीपुरी जी बजला बचबा खूब सुनाओल,थएथए भ गेल ,आ भोजपुरिया कवि भरि पाँज कए धए कहलखिन आब तिरहुतक लोहा मानि गेलहुँ। ` 

एहने एकटा आओर संस्मरण अछि। एक बेर आकाशवाणी मे प्रतिभागीक चयन करबाक लेल हिनका जज चुनल गेल रहनि। एकटा गायक ऑडिशन मे समदाउन उठओलक "बड़ रे जतन सँ सिया दाए कें पाललहुँ , सेहो रघुबर लेने जाय।" से तेना खिसिया कए गौलकैक जे बुझाए सियाजीक पोसबाक खरचा माँगि रहल हो। जखन हरिमोहन झाकें पूछल गेलनि जे समदाउन केहन लागल तँ ओ अपन उत्तर मे कहलखिन जे हिनक विधा सँ सम हटा दियौ, ई दाउने टा कए रहल छथि।

मैथिली साहित्य मे विद्यापतिक बाद सबसँ लोकप्रिय जँ कोनो साहित्यकार भेलाह तँ से थिकाह हरिमोहन झा। हिनका द्वारा बनाओल साहित्यिक पात्र सभ आमलोकक बीच खूब प्रचलित भेल। जिनका साहित्यिक रूचि नहिओ रहनि सेहो लोकनि एहि पात्र सभसँ परिचित छलाह आ सामाजिक विभिन्न पक्ष केँ एहि पात्र सभक माध्यम सँ बूझैत छलाह। कोनो साहित्यकारक सभ सँ पैघ उपलब्धि ई होइत छैक जे ओकर रचनाक प्रभाव सँ किछु सकारात्मक परिवेशक निर्माण समाज मे होइ आ ई उपलब्धि तखन आओर विशिष्ट भए जाइत छैक जखन रचनाकार केँ प्रत्यक्ष रूप सँ ई दृष्टिगोचर होइत छैक। प्रो. झाक साहित्यक लोक पड़ अकल्पनीय प्रभाव पड़लैक। कन्यादान पढ़लाक उपरान्त बहुतो युवक लोकनि अपन विवाह मे टाका नहि लेलनि। गामक कतेको कन्या लोकनि बुच्चीदाइ सँ प्रभावित भए आधुनिक शिक्षा लेबाक लेल अग्रसर भेलीह। जाहि अभिजात्य वर्गक किछु लोक हिनक विरोध करैत छल ,हिनक साहित्य केँ अश्लील कहैत छल ताही वर्गक बहुतो माए लोकनि अपन कन्याक विवाह मे 'कन्यादान' पोथी साँठए लगलीह। एहन कहबी अछि जे अभिजात्य पंडित वर्ग प्रो. झाक साहित्यक दिन मे खिधांस करैत छलाह ओ लोकनि राति मे लालटेन मे हिनक साहित्य पढ़ैत छलाह। प्रो. झा मिथिला मे व्याप्त आडम्बर,स्त्री शिक्षाक प्रति उदासीनता, कन्या विवाह आ बहु विवाह सन स्थापित कुरीति आ जाति-धर्मक विभेद मे ओझराएल समाजक विभिन्न आयाम केँ अपन साहित्य मे उजागर करैत,अपन तर्क सँ ओकरा खंडित करैत, ताहि सँ होबए बाला हानि केँ उजागर करैत सहज भाषा आ मनलग्गू संवाद शैली मे पाठक धरि आनि एकदिस सूतल समाज मे चेतनाक विस्तार कएलनि आ दोसर दिस मैथिली कथा साहित्य केँ मजबूती दैत स्थापित सेहो कएलनि।

जहिना विद्यापति मैथिली पद्य केँ स्थापित कएलाह आ एकरा आमलोक धरि पहुँचा साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान कएलनि तहिना हरिमोहन झा मैथिली गद्य केँ एकटा नव आयाम दैत बेस पठनीय बनओलनि आ मैथिली गद्यक विद्यापति कहेबाक अवसर पओलनि। मैथिलीक श्रीवृद्धिक लेल आजीवन साकांक्ष रहल प्रो. झा द्वारा लिखल उपन्यास 'कन्यादान' पर पहिल मैथिली सिनेमा सेहो बनल। एखनधरि मैथिली मे सबसँ बेसी पढ़ल जाए बला लेखकक गौरव सेहो हिनकहि प्राप्त छनि। हिनक बहुत रास पोथी आब अनुपलब्ध भए रहल अछि आ एहि पोथी सभक मात्र फोटोकॉपी उपलब्ध भए पबैत अछि। एहि मादे विशेष पहल करबाक खगता अछि। मैथिलि भाषा केँ स्थापित करबा मे, लोकप्रिय बनएबा मे, एकर एकगोट बजार विकसित करबा मे हिनक योगदान अभूतपूर्व छनि । ई काव्य शास्त्र विनोदेना बला उक्ति केँ पूर्णतः सत्यापित करैत काव्य, शास्त्र आ विनोद तीनू पर सामान अधिपत्य रखैत अपन रचना सभ मे दिगंत धरि जिबैत २३ फ़रवरी १९८४ केँ देहातीत भेलाह। जिनकर एक कान मे सदति वेदक ऋचा गुंजायमान होइत रहलनि आ दोसर कान मे फ्रायड किंवा चार्वाकक सूक्ति समाहित रहनि, जे विनोद मे खट्टर कका रहथि आ दर्शन मे विकट पाहून, जिनका पर कन्यादान दायित्व रहनि आ तकर जे द्विरागमन धरि निर्वाह कएलनि,मैथिली साहित्यक एहि पितृ पुरुषक आयाम केँ प्रणाम।

सन्दर्भ :
१.देसिल बयना –हरिमोहन झा विशेषांक
२.अंतिका – हरिमोहन झा विशेषांक
३. हरिमोहन झा रचनावली
४. जीवन यात्रा
५ . बिछल कथा

विकास वत्सनाभ

आरएसएस आ स्वतंत्रता संग्राम - संक्षिप्त विवरण


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना 1925 मे डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर मे भेल छल। संगठनक मुख्य उद्देश्य हिंदू सभके एकजुट करबाक आ समाजक नैतिक मूल्य सभके सुदृढ़ करबाक छल। ध्यान देबऽ जोग बात ई जे स्व. हेडगेवार स्वयं पहिले कांग्रेस-नेतृत्व वाला राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोगी छलाह आ ओ लोकमान्य तिलकक विचार सँ बेसी प्रभावित छलाह। विद्यार्थी जीवन मे ओ ब्रिटिश शासनक खिलाफ बहुत आंदोलन मे भाग लेने छलाह जाहि में असहयोग आंदोलन (1920–22) सेहो शामिल अछि।

संघ केँ लय विरोधी इतिहासकार सभक दृष्टिकोण अलग छल। बहुतों इतिहासकार मानैत छथि जे स्थापनाक बाद आरएसएस सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) अथवा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) सन नमहर आंदोलन मे भाग नहि लेने छल। हुनक सबहुक मतानुसार ताहि समय संगठन राजनीतिक टकरावक बजाय सामाजिक कार्य, अनुशासन आ वैचारिक प्रशिक्षण पर बेसी ध्यान देने छल। 1930–40 दशकक ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टक मुताबिक़ आरएसएस केँ राजनीतिक रूप सँ ब्रिटिश शासनक लेल खतरा नहि मानल गेल छल। बल्कि संगठन समाज सुधार, भविष्यक भारत आ हिंदू एकजुटता के लय के बेसी मुखर छल। 

अहि सभ में पूर्वोत्तर राज्य आ पटना में व्याप्त देह व्यापार रोकब आ तखन के पाकिस्तान में स्त्री सब के सुदृढ़ आ एकजुट करब आरएसएस महिला विंग के प्रमुख काज छल। 

आरएसएस समर्थक आ ओहि सँ जुड़ल इतिहासकार मानैत छथि जे संगठन अप्रत्यक्ष रूप सँ स्वतंत्रता संग्राम में अपन योगदान देने छल। संघ सामाजिक अनुशासन, एकता आ राष्ट्रीय गौरवक भावना जागृत करब, जकरा ओ औपनिवेशिक शासनक खिलाफ दीर्घकालीन तैयारीक हिस्सा मानैत छलाह- अहि दिशा में प्रयासरत छलाह। अहि वर्ग के इतिहासकार लोकनि हेडगेवारक स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत योगदान आ किछु स्वयंसेवक द्वारा क्रांतिकारी गतिविधि सह स्वतंत्रता संग्राम संगठन में शामिल हेबाक बात सेहो कहैत छथि।

सारांश ई जे प्रत्यक्ष सशस्त्र वा जन-राजनीतिक संघर्ष में आरएसएसक भूमिका सीमित रहल मुदा अप्रत्यक्ष योगदानक तौर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सामाजिक एकता आ नैतिक दृष्टि सँ समाजक तैयारी द्वारा राष्ट्र-निर्माण में संघ के भूमिका मुखर आ अग्रणी रहल।

Tuesday, 29 July 2025

बिहार की बाढ़ : कितनी ईमानदारी

बात 2018-19 सत्र की है। बिहार (असल में मगध) के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने विधान सभा में बिहार के वर्तमान बाढ़ के ऊपर काफी लंबा चौड़ा और उत्तेजक भाषण दिया। इससे पहले सिंचाई और जल संसाधन मंत्री संजय कुमार झा जी ने भी विधान भवन में बाढ़ सुरक्षा पर बड़ी बड़ी बातें की थीं। वो वर्तमान में तटबंधों के सुरक्षित होने और आगे बाढ़ नियंत्रण हेतु बड़ी बड़ी आगामी योजनाओं के बारे में बता रहे थे। हालांकि आर जे डी के एक विधायक ने उनसे सारी रिपोर्ट झूठी होने की बात कही, किन्तु मंत्री जी ने एक सिरे से उनको नकार दिया।

यदि तथ्यों को देखें तो कुल मिलाकर नीतीश कुमार जी ने विधान सभा में भ्रामक और अर्ध सत्य बातें की थी और फिर बाद में उनके मंत्री जी ने भी सायं काल तक इस झूठ के पुलिंदे को जारी रखा था उस वक़्त।


मंत्रालय और मुख्यमंत्री दोनों बिहार में बाढ़ के इतिहास और नेपाल में अतिवृष्टि को बाढ़ का कारण बताते रहे। मंत्री जी को आजादी से पहले और फिर 1947, 1951, 1991, 2004 और 2011 कि बातें याद थी। उन्हें जो बात या तो नहीं याद थी या फिर उन्होंने जिस बात का जिक्र जानबूझकर नहीं किया वो बात थी राष्ट्रीय आपदा विभाग द्वारा लगभग 5 साल लगाकर तैयार की गई रिपोर्ट। 

ख़ैर, तो थोड़े दिनों बाद हालात ये होता है कि बिहार के कई इलाके बांध टूटने से गांव में घुस आये पानी से तबाह हो जाता है, NDRF मुस्तैद होता है किन्तु उनकी संख्यां और आवश्यक नाव आदि काफी कम मात्रा में मौजूद होती है। अधिकतर स्थानों पर सरकारी तंत्र राहत के नाम पर झूठ और दिखावा अधिक कर रहा होता है और अधिकतर अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंगता है। 

इन सब बातों के बावजूद मेरी समझ से संजय झा जी को कम से कम साल 2019 के बाढ़ का दोषी नहीं कहना चाहिए हमें। हालांकि उनके भूतकाल की वजह से उनकी नियति और किस्मत ऐसी है कि उनका हर एक काम विवादित और निंदनीय हो ही जाता है। संजय झा जी दोषी हैं किंतु बाढ़ की तैयारी और उससे निबटने के दोषपूर्ण तरीके के लिए नहीं बल्कि बिना सारी बात जाने, पूर्वग्रह में बड़ी बड़ी बातें और वादे करने के। 

आगे बढ़ने से पहले जान लें कि मंत्री जी की यह बात बिलकुल सच है कि २०१९ की बाढ़ का पानी 2004 से अधिक था। किन्तु इन्हीं सरकारों द्वारा अधिक संख्यां में निर्मित सड़क पुलों की वजह से एक दो जगह छोड़कर यह अधिक जगह नहीं ठहरा। यही वजह भी है कि अभी तक हुआ नुकसान 2004 की अपेक्षा में काफ़ी कम है। 

अब बात राष्ट्रीय आपदा विभाग के रिपोर्ट और केंद्र सह राज्य सरकार को बढ़ नियंत्रण की अनुशंसा की - बात 2007 की है, राज्य में जेडीयु और भाजपा की सरकार के आरक्षित मुख्यमंत्री थे श्री नीतीश कुमार जी। उस साल भी राज्य में बाढ़ की समस्या विकराल थी। जैसे तैसे बुरा समय कटा और कुछ भले लोगों की वजह से देश के गृहराज्य मंत्री ने बिहार की बाढ़ पर विस्तृत अध्ययन और समाधान के लिए NIDM (National Institute of Disaster Management) को आदेश जारी किया। 

प्रोफेसर संतोष कुमार, अरुण सहदेव और सुषमा गुलेरिया की एक कमिटी बनी जिन्होंने अपनी रिपोर्ट 2013 को केंद्र और राज्य सरकार को सौंपी। पूरी रिपोर्ट विस्तृत शोध से भरी और काफी लंबी है किन्तु इसकी अनुसंशा कमाल की, सच के काफी करीब और मेहनत से लिखी गयी है। 

मेरी समझ में किसी भी सरकार या मंत्रालय को अलग से बाढ़ नियंत्रण पर शोध पर समय व पैसा नहीं फूंकना चाहिए। जो भी लोग ऐसा कहते हैं कि हम ऐसा करेंगे या वैसा करेंगे उनको पहले कम से कम एक बार यह रिपोर्ट अवश्य पढनी चाहिए। इसे पढ़कर आपको समझ आएगा कि दरसल कुछ नहीं करना है किसी को, सब किया हुआ है और सिर्फ इम्पलीमेंट करना है। सारे जरूरी एहतियात और क़दम इस रिपोर्ट में मौजूद है, बस आवश्यकता है तो दृढ़ इच्छा शक्ति वाली सरकार और मंत्री की। 

इस रिपोर्ट में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण हमसे सटे नेपाल की ऊंचाई और वहां से बहने वाला पानी बताया गया है और नियंत्रण के लिए मुख्य रूप से ये उपाय बताए हैं: 

- ऊंचाई वाले डैम का निर्माण (रिपोर्ट में इसके स्थान भी बताए गए हैं)
- डैम पर हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी का निर्माण,
- पानी के बहाव की मुख्यधारा से सिंचाई के नहरों का निर्माण,
- नदियों के रास्ते में किनारों पर वृक्षारोपण,
- तटबंधों का निर्माण, (1954 की रिपोर्ट के हिसाब समुचित तटबंध नहीं हैं)
- जल पथ में ऊँचे हाइवे जैसे अवरोधक रोकना,
- ऊंचाई वाले इलाके पर रिहायशी स्थान बनाना,
- नदियों के पेट से गाद की सफाई,
- अधिक प्रभावी क्षेत्र में कंप रोधी मकान बनाना,
- बाढ़ की स्थिति में बचने को शेल्टर का निर्माण और
- नाले व पोखरों की साफ सफाई. 

आगे यह रिपोर्ट बाढ़ आ जाने की स्थिति में उससे निबटने के उपाय भी बताती है। ऐसे में यदि हमारा सिंचाई मंत्रालय और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जो की अब मात्र मगध के मुख्यमंत्री माने जाते हैं, सचमुच इस क्षेत्र में बाढ़ नियंत्रण को लेकर चिंतित है तो बजाय बड़ी बड़ी बात करने के और बाढ़ नियंत्रण के नाम पर करोड़ों फूँकने के पहले शांत मन से इस रिपोर्ट को पढ़ें और धीरे-धीरे ही सही, एक एक कदम उठाएँ... अन्यथा तो पचासियों साल से इस क्षेत्र में बाढ़ राहत और बाँध में चेपी साटने के नाम पर हजारों करोड़ की लूट होती ही आ रही है... आप आगे भी लहरिया लूटते रहिए।

Monday, 7 July 2025

मुखिया चुनाव - रमौली पंचायत - प्रवीण कुमार झा

मेरे जन्मस्थान में पंचायत चुनाव है। मेरा 'बेलौन' गाँव रमौली पंचायत में पड़ता है। रमौली, बेलौन और किशनपुर (नवादा) के कुल चार उम्मीदवार चुनाव में खड़े हैं जिसमें से एक उम्मीदवार मेरा भाई मनीष झा भी है।

चार उम्मीदवारों में से एक किशनपुर से उगन झा, निवर्तमान मुखिया हैं जिन्हें दो पद के लाभ में दोषी करार कर पदच्युत कर दिया गया। दूसरे उम्मीदवार रमौली निवासी और पूर्व मुखिया कुमुद मिश्रा हैं जो स्वयं चुनाव आयोग के द्वारा चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित हैं, सो उन्होंने अपनी आदरणीया माता जी को उम्मीदवार बनाया है। तीसरे उम्मीदवार रमौली से ही रौशन झा हैं जो पेशे से वकील हैं किन्तु क्षेत्र में कुछ करने से अधिक सबकी शिकायत करने और काम रोकने को लेकर अधिक चर्चित हैं।

वोट की संख्या के हिसाब से रमौली यदि एकजुट हो जाए तो किसी भी उम्मीदवार के लिए कोई चांस नहीं, किन्तु हमारा पंचायत जागरूक और समझदार लोगों का पंचायत है और इसका ही उदाहरण पेश करते हुए सबसे कम वोट वाले किशनपुर क्षेत्र से उगन झा विजयी हुए थे पिछले मुखिया चुनाव में।

मेरा परिवार तकरीबन चार पुश्तों से इलाके भर में समाज सेवा और लोकन्याय के लिए जाना जाता है। आज के चर्चित नेता रविशंकर प्रसाद जब वकालत सीखने के क्रम में स्व. ताराकांत झा जी के यहाँ रहते तो उन्होंने हमारा केस हाई कोर्ट में लड़ा था। मुझे याद है जब लैंड लाइन पर रविशंकर प्रसाद जी ने मुझे कहा था - चाचा जी को कह दीजिए वो जीत गए, वही मुखिया थे और वही रहेंगे।

परिवार में मेरे पिता और अब स्व. चाचा जी के "अतुल्य" रिश्ते का उदाहरण लोग आज कि मतलबी दुनिया में दूर दूर तक देते हैं। उन्हीं चाचा जी के लड़के मनीष के साथ मैं उसी भाई की तरह का संबंध रखने के प्रयास में हूँ। मनीष कमियों से पड़े नहीं है और यह मुझसे अधिक कोई नहीं जानता। वो लोग भी नहीं जो लोग मुझे फोन कर उसके किस्से बताते हैं और यह भी कहते हैं कि उन्हें पता है इसीलिए मनीष के लिए मैंने कोई प्रचार नहीं किया।

ऐसे सभी भाइयों से मात्र इतना कहूँगा की वो मनीष है जो चौबीस घंटे समाज सेवा को तैयार रहता है, अपने काम के लिए लड़ने वाला आदमी है, इलाके में किसी से भी अधिक पहुँच रखने वाला है, समाज के हर एक वर्ग और पंचायत के सभी गाँव में हर एक परिवार से जुड़ा है, उस तक किसी की भी पहुँच आसान है, वो किसी को झूठा आश्वासन नहीं देता, नकारात्मक राजनीति नहीं करता और ना ही नशेड़ी है... अंत में मैं उसका अभिभावक हूँ जो उसे समाज सेवा में कहीं भी पथभ्रष्ट होने नही देगा।

मनीष ने चुनाव में बहुत जमीनी और प्रौढ़ मुद्दे चुने हैं हैं जिसमें किसान चौपाल, पुस्तकालय, मवेशी सुरक्षा और सड़कों पर जल जमाव प्रमुख हैं। आगे जल और बिजली संबंधी समस्याओं के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी करने की योजना भी है उसकी।


संप्रति मात्र चौदह महीने के इस कार्यकाल हेतु आप सभी पंचायत वासियों द्वारा मनीष झा को वोट कर पंचायत का मुखिया चुनने का आग्रह रहेगा। चुनाव 9 जुलाई को है और उसका चुनाव चिन्ह EVM क्रमांक दो पर है - ढोलक छाप !