Wednesday, 7 October 2026

साल भर में बाबूजी सा होने की राह पर...


अभी 9 अक्टूबर को बाबूजी को गए साल भर हो जाएगा. बीते कुछ महीनों में काफ़ी कुछ नया अनुभव कर रहा हूँ अपने अंदर. हालाँकि अब भी कई मौकों पर अचानक से मन में आता है - "बाबूजी को फ़ोन करके ये कहूँगा" - फिर जब ध्यान आता है कि नहीं, वो तो हैं नहीं अब... मेरा कोई नहीं है अब... या फिर दुनियाँ में कौन है जिसको कहूँ - ये सब ध्यान कर कई बार सर झन्ना सा जाता है, डर का अनुभव होता है अचानक कुछ पलों के लिए… सब रुक सा जाता है मेरे सामने. वो तो भला हो मेरे कर्तव्यबोध और मेरी जिम्मेवारियों का जो मुझे इस पल से निकाल कर मुझे वर्तमान में ला पटकती हैं. 


मुझे लगता है ये हर जगह और समाज में होता होगा जब आप व्यक्ति के साथ रहते उसका महत्व नहीं समझते. उस वक़्त उनकी कहीं बातों का सामान्यीकरण करते हुए सब औसत सा मान लेते हैं हमलोग. संभवतः यह एक मानवीय गुण है और इस बात का सबूत भी कि हम सब ईश्वर नहीं. …और बाद में जब हम उस व्यक्ति को खो देते हैं तो उनकी कहीं वही बातें असामान्य, व्यावहारिक और अमूल्य सिद्ध होने लगती हैं हमारे सामने. 


बाबूजी जब कहते की - “आदमी को अभिव्यक्ति से अधिक मनन करना चाहिए” - तो उस वक़्त हम इस बात का महत्व नहीं समझते थे. अब अचानक से ऐसा अनुभव हो रहा कि इस मनन के प्रयास में मैं निर्णय लेने में थोड़ी देरी करने लगा हूँ. मैं बोलते बोलते चुप हो जा रहा हूँ. हालाँकि मेरे इस बदलाव से मेरे आस पास के लोग नाराज और फ्रस्ट्रेटेड होने लगे हैं किंतु मैं उनकी परवाह किए बग़ैर चीज़ों को नापने जोखने में लगा होता हूँ. …और इस क्रम में जब मैं निर्णय लेने की स्थिति में होता हूँ तो मैं अकेला होता हूँ और सामने वाला मेरे पास नहीं होता. सम्भवतः वो मुझे बीमार समझ कर आगे निकल जाता है. ऐसे में कई बार मेरा अंतर्मन कहता है कि मैं इन्हें कह दूँ - “मैं मेरे पिता के बारे में ऐसा सोचने का अपराध कर चुका हूँ…मत दुहराओ ना...” - नहीं बता पाता हूँ.


निर्णय की बात पर बाबूजी की कही एक और बात याद आई जब वो कहते - “कोई भी कर्म करते या फिर महत्वपूर्ण निर्णय लेते हमें एक बार अपने कुल, ख़ानदान और ग्राम देवता को अवश्य याद करना चाहिए. ऐसा करते आप अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं और आपका यह जुड़ाव आपको अपने सामाजिक दायरे में बाँधे रखने का काम करते है जो अंततः आपके निर्णय और कर्म को ऊँचाई देने में मददगार होते हैं. 


मेरे और बाबूजी के बीच कई बार ऐसे कॉन्फ्लिक्ट हुए जब मैंने उन्हें कहा होगा की बाबूजी आपको ऐसा नहीं, बल्कि ऐसा करना चाहिए. ऐसे समय में वो कुछ जवाब नहीं देते बस अपना काम करते जाते. बीते कुछ महीनों में कई बार ऐसा हुआ जब ऐसी परिस्थितियां बनी की मैंने वही किया जिसके लिए कभी बाबूजी को मना किया था और ऐसा करते वो सब जवाब जो उन्होंने उस वक़्त नहीं दिए, चुपचाप मिलते रहे मुझे. 


मेरी इन बदलती आदतों की सबसे नज़दीकी विश्लेषक और भुक्तभोगी मेरी पत्नी रही हैं. बीते दिनों उनके मुख से कई बार सुन चुका हूँ - “बाबूजी वाली आदतें आ गई हैं तुममें” - और अपनी पत्नी के ऐसा कहने पर मैं जवाब नहीं देता बल्कि मनन करने लगता हूँ अब. मनन करते मुझे कई बार यह अनुभव होता है कि मेरे चेहरे का भाव ठीक बाबूजी सा हो गया है. मेरी भंगिमायें बाबूजी की कॉपी कर रही हैं. मैं उनकी तरह खड़ा या बैठा हूँ. मेरा फेसिअल एक्सप्रेशन उनके ही जैसा होकर रुका हुआ है. कई बार बंद आँखों के साथ झूलते अपने अंगूठों को पकड़ते याद आता है कि ऐसा तो बाबूजी करते थे.


मैं पहले से रेस्टलेस रहा हूँ. बाबूजी रेस्टलेस तो नहीं थे किंतु वो स्थिर नहीं हुए कभी. सदा गतियमान, चलते हुए और एक स्टेट को मेंटेन नहीं करने वाले रहे. मैं और मेरे साथ मेरी पत्नी भी अब ये महसूस कर रही हैं कि मैं भी वैसा हो गया हूँ. मुझे रुकना बेचैन करता है. उनकी ही तरह मुझे आराम चुभता है और ख़ुद को परेशान करने के नए बहाने ढूँढने लगता है मेरा मन. मुझे लगता है कि ये सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी जिम्मेवारी है, मैं ही सब कंट्रोल करूँ, दुनियाँ में जो हो मेरे हिसाब से हो, मुझे बता कर हो… मैं ही सबके बुरे को अच्छा करने की जिम्मेवारी लूँ और तो और, ऐसा करते सब मेरी तरह ही बेचैन भी रहें. यहाँ “बेचैन” बेहतर मैथिली का शब्द “चैंक" में रहना बेहतर है शायद जो मैं अक्सर पत्नी से कहता हूँ - “अहाँ के चैंक नै रहय या या कोनो बातक”


बाबूजी समय के पाबंद थे। इतने अधिक पाबंद की कई बार नियत समय पर स्टाफ के नहीं पहुँचने पर अकेले ही ऑप्टिकल फाइबर फाल्ट करेक्शन को निकल लेते. मैं इसपर कुछ कहूँ इससे बेहतर कोई मेरी इस आदत के बारे में मेरी पत्नी से पूछ ले की वो कितना झेलती है मेरी इस आदत की वजह से. मैं कम पढ़ा आदमी हूँ. बाबूजी की तरह तेज तर्रार तो दूर, इंजीनियर भी नहीं हो सका. लोग कहते हैं मैं सफल हूँ जिसे अपने पिता के क़द के हिसाब से नकारता हूँ मैं. किंतु हाँ, जीवन में आज तक जो कुछ भी अर्जित किया वो उनके ही दिए दो मंत्र 'अनुशासन' और 'ईमानदारी' से पाया. हालाँकि मेरे कार्यस्थल के साथी सह मेरे परिवार के लोग इससे परेशान होते हैं किंतु मैं आमरण इसपर क़ायम रहना चाहता हूँ.


मेरे पिता अपनी उँगलियों पर अक्सर कुछ गिनती सा करते रहते. मैंने एकबार पूछकर स्पष्ट किया - वो मनन करते, कोई प्लानिंग करते या फिर जाप करते ऐसा करते - पिछले कुछ हफ़्तों में श्रेया ने कई बार मुझे बताया की मैं भी ऐसा करने लगा हूँ... कई बार तो ऐसा करते मैं ख़ुद अपने हाथ को रोकने लगता हूँ कि अरे ये तो पिताजी की तरह कर रहा हूँ मैं. मैं अक्सर श्रेया के दरवाज़े को नॉक कर उससे पूछता रहता हूँ - “कैसी हो, क्या कर रही हो, ख़ुश हो ना” - और ऐसा करते वो मुझे याद दिलाती है कि पापा आपको याद है बाबा भी ऐसा ही करते थे ? बाबूजी हर थोड़ी देर पर बच्चों को पूछते. सब बच्चे जो उस वक़्त इससे परेशान होते आज बाबूजी को याद करते उनकी आँखों में आँसू देखता हूँ मैं... श्रेया और बाबूजी को लेकर मैं वो बात कभी नहीं भूल पाऊँगा जब फ्लाइट में उसे चुप करवाने को सारी एयर होस्टेस लगी रहीं... श्रेया रोती रही - बाबाs


आगे की प्लानिंग अनवरत जारी रखने के क्रम में सोचते हुए मैं अक्सर कई स्टेप आगे निकल जाता हूँ. बाबूजी ने इसे शतरंज के खेल के हिसाब से बताया था कि जीतता वही है जो आगे की चाल सोच पाता है. हालांकि ऐसा करते मेरा मेरे करीबियों से तब विवाद होता है जब मैं दो-चार स्टेप आगे को देखकर अपना निर्णय सुनाता हूँ और लोग इसे सीरियसली ना लेते हुए मुझे पागल तक समझते हैं. मुझे कई बार ऐसा अनुभव होता है कि लोग परवाह नहीं करते मेरे ऐसा कहने करने का. यही वो पल होता है जब मैं फ्रस्ट्रेटेड होकर गुस्सा करते अपना आपा खो कर बाबूजी के सामने ख़ुद को बौना साबित कर देता हूँ... मेरे हिस्से का धैर्य भी आपमें ही क्यों था बाबूजी ? 


बाबूजी कहते - "मर्द वही है जो दर्द पी सके, जिसमें धैर्य हो, जो अपनी प्रतिक्रिया को होल्ड कर सके, जो जिसका एप्रोच सबों के लिए एक समान हो, जो समग्रता में सोचे और जो दु:ख-सुख दोनों ही घड़ियों में एकसमान व्यवहार करे" - मैं ऐसा कभी नहीं हो सकता लेकिन मुझे लगता है मैं प्रयासरत हूँ. हालाँकि ऐसा करते मैंने बाबूजी को अपना बहुत कुछ गँवाते देखा है किंतु संभवतः वो जहाँ हैं वहाँ से ही शनैः शनैः मुझे ऐसा करने की शक्ति दे रहे हैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ मैं... इस क्रम में प्रतिदिन सुबह उठते और सोने से पहले “त्यागने” और “हर परिस्थिति में समभाव” बनाए। रहने के अभ्यास पर हूँ मैं इन दिनों. 


एक और आदत जो बाबूजी की देन होती जा रही है वो है उनका कम बोलना और यह मान लेना की परिस्थिति और उनका भाव देख लोग उनके मन की बात बिना कहे ही समझ लें... यह बहुत खतरनाक है किंतु इस खतरनाक होने का प्रतिशत दिनानुदिन बढ़ रहा है मेरे अंदर ऐसा महसूस कर रहा हूँ मैं...


कार्यस्थल पर मेरा अनुभव बाबूजी से अलग रहा है. अपने जीवन में उनसे अधिक दुनियाँ देख ली ऐसा तो नहीं कहूँगा किंतु उनसे अधिक झेला हूँ यह सत्य भी झुठला नहीं सकता मैं. हाँ, इसकी अलग अलग कई वजहें हैं किंतु निर्विवाद रूप से अपने बाबूजी सा पिता खोना सबसे बड़ी वजह है. यहाँ अफ़सोस ये कि इतना अधिक झेल कर भी अब तक उनके जैसा भाई, पति और अभिभावक नहीं बन पाया हूँ फिर सामाजिक जिम्मेवारियों की तो बात ही बेमानी है. आशा है बाबूजी मेरे प्रयासों को संबल देते रहेंगे. जहाँ हैं वहीं से मुझ पर वैसा ही भरोसा क़ायम रखेंगे जैसा भरोसा अपने होने पर वो किसी भी परिस्थिति में जताते हुए कहते - “अरे कोनो चिंता कs बात नै छै, प्रवीण के कहि दय छी हम सबटा ठीक भs जेतैक !” 






Saturday, 5 September 2026

नाट्यकलाकार रमेशचंद्र जीक जुबानी नाटकक रपटि - बड़ मुश्किल छै


काल्हि (शुक्र दिन, 04 सितंबर, 2026) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी छल आ ताहिपर भदवरिया अपन विकराल रूप सेहो देखा रहल छल। एहेन स्थितिमे लोककें प्रेक्षागृह धरि घीचिकें आनब ठीके बड़ मोसकिल छल। मुदा, एहि मोसकिल सन काजकें आसान बनओलनि श्री रौशन झा जी। हम बात कऽ रहल छी नई दिल्लीक मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटरमे सायं साढ़े छओ बजेसँ मंचित होमय वला मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर। नाटकक प्रति (करबाक नहि, मात्र देखबाक आ कहिओ काल खेलयबाक रुचि नेनपनसँ रहल अछि, तैं, फेसबुकपर भेटल हकारकें स्वीकारैत हमहूँ ससमय श्री राम सेंटरक प्रेक्षागृहमे पहुँचि गेलहुँ। प्रेक्षागृहमे प्रवेशोपरांत देखल जे सामने वला सीट सभपर एक टा दुपनियाँ बुकलेट राखल अछि। भेल जे ई सीट सभ आरक्षित ने हो तैं, पाछू वला सीट दिस बढ़लहुँ तँ देखल जे हमरासँ पहिनहि ई बुकलेट ओतहु विराजमान अछि। पछाति बुझबामे आयल जे उक्त बुकलेट प्रत्येक सीटपर दर्शक सभक अवलोकन हेतु राखल गेल अछि। ई देखि नीक लागल। एकर लाभ ई भेल जे नाटक संबंधी जानकारी लेल किनको तंग नहि करय पड़ल। सभ टा जानकारी चारि पृष्ठक ई दुपनियाँ बुकलेटमे समेटल छल। बुकलेटक पहिल पृष्ठपर एक टा क्यूआर कोड सेहो अंकित छल आ लिखल छल जे एहि कोड केर माध्यमसँ आर्थिक सहयोग कएल जा सकैछ। 

अखन पूर्वनिर्धारित समयानुसार नाटकक मंचन होयबामे किछु मिनट शेष छल। एहि बीच श्री रौशन जी उद्घोषना केलनि जे समयक विकटता देखैत नाटकक मंचन सायं सात बजेसँ होयत कारण, बहुत गोटे ट्रैफिक जाममे फँसल छथि। एहि समयक सदुपयोग किछु परिचित लोकसभसँ भेंट-घांटमे कएल। आब समय लगभग पौने सात बाजि रहल छल। एकबेर पुनः रौशन जी सभसँ मुखातिब होइत सूचना देलनि जे उक्त नाटकक अवधि जे पहिने एक घंटा दस मिनट छल, आब बढ़िकऽ दू घंटा बीस मिनट भऽ गेल अछि। हुनका द्वारा ई सूचित करब जे उक्त नाटक एहिसँ पहिने भारतक अन्यान्य शहर सभमे दर्जन भरिसँ बेसी बेर मंचित भऽ चुकल अछि, हमर उत्कंठाकें बढ़बय वला छल। हम मोने-मोन खूब प्रसन्न भेलहुँ जे भने हम विस्तृत नाटकक मंचनक साक्षी बनब। 


आब नाटकक मंचन आरंभ होमय वला छल, मुदा, ताहिसँ पहिने हालहिमे दिवंगत स्व. पं. कौशल झा जीक स्मृतिमे एक मिनट केर मौन राखि हुनका श्रद्धांजलि देबाक आह्वान कएल गेल। तदुपरांत, प्रेक्षागृहमे उपस्थित सभ गोटे ठाढ़भऽ दिवंगत आत्माक प्रति एक मिनट केर मौन राखि हुनका प्रति अपन श्रद्धांजलि अर्पित केलनि। एकबेर फेर पं. कौशल जीक संग बितायल किछु अविस्मरणीय पल जीवंत भऽ उठल आ आँखि डबाडबा गेल। जगत जननी जानकी हुनका अपन शरणागति प्रदान करथि !

ठीक छओ बाजिकऽ पचास मिनटपर चिरप्रतीक्षित मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर मंचन आरंभ भेल। मंचपर बरियातीक दुआरि लगबाक दृश्य उपस्थित छल आ संगहि डीजे पर भोजपुरी गीतक बोलपर थिरकैत धिया-पुता, युवा आ कनियाँ-बहुरिया। कहबाक प्रयोजन नहि जे डीजे पर कोन तरहक गीत बाजि रहल छल। एतय नाटकक मूल विषय बूझब आवश्यक अछि। नाटक आधारित अछि मिथिला क्षेत्रमे व्याप्त पलायन आओर मिथिलासँ बाहर भेल मैथिलक विवाह केर बाद उत्पन्न नाना तरहक विसंगति सभपर। नाटकक नायक समुन जे मैथिल छथि आ गामसँ पलायनक पश्चात दिल्लीमे रहैत छथि, हुनक विवाह (जेकि प्रेम-विवाह थिक), मिथिला क्षेत्रसँ बाहर होइत अछि। कन्यागतक ओहिठाम विधि-व्यवहारक अंतर एहि विसंगति दिस पहिलुके दृश्यसँ दृष्टिगोचर होमय लगैत अछि। खैर जे से, जेना-तेना मान-मनौव्वलक बाद विवाह संपन्न होइछ आ पहिल दृश्यक पटाक्षेप होइत अछि।

तदुपरांत, नगहर भरबाक मनोहारी दृश्य आ दुरागमनक पश्चात नवकनियाँ द्वारा सासुरमे निमाहल जाय वला नाना तरहक विधि-व्यवहार आ ताहिमे होमयवला विसंगतिक जीवंत मंचन, दर्शक-दीर्घामे उपस्थित समस्त दर्शककें गुदगुदा रहल छल। नहुँ-नहुँ नाटक अपन गति पकड़ैत अछि। आगूक दृश्य सभमे देखाओल जाइत अछि जे कोना एक टा परदेसी परिस्थितिवश गाममे रहय वला अपन माय-बापसँ दूर होइत चलि जाइत अछि। परिस्थितिक भयावहता तखन आओर झकझोरि दैत अछि जखन देखबामे अबैत अछि जे कोना एक टा लायक बेटा चाहिओकऽ माय-बापकें मुइलाक पछाति मुखाग्नि धरि नहि दऽ पबैत अछि। नाटकक संपूर्ण व्याख्या करब तँ संभव नहि, मुदा, एतबा कहल जा सकैछ जे ई पलायनक बाद समाजमे आएल नाना तरहक विसंगति दिस जोरदार ढ़ंगसँ सभकें आकृष्ट अवश्य करैत अछि।

आब अबैत छी नाटकक कलाकार दिस। हमरा तँ सभ कलाकारक अभिनय उत्कृष्ट लागल। खाहे नाटकक नायक, सुमन केर भूमिकामे श्री विजय झा होथि वा नायिका, गायत्रीक भूमिकामे सुश्री रचना दास। को बड़-छोट कहत अपराधू सन स्थिति अछि। दुनू गोटे अपन अभिनय-कौशलसँ बेस प्रभावित केलनि। नायकक माय, काकी केर कथे कोन। काकी केर भूमिकामे आदरणीया नीरा झा जीक अभिनय-कुशलताक वर्णन करब हमर बूतासँ बाहरक बात अछि। बुकलेटसँ ई जनतब भेटल जे नीरा जी दिल्लीमे सक्रिय मैथिल महिला कलाकारमे सभसँ बेसी अनुभवी छथि आ अखनि धरि सयसँ बेसी मैथिली नाटक आ फिल्ममे अपन अभिनयक छाप छोड़ि चुकल छथि आ से देखबोमे आयल। हुनक अभिनय वर्णनातीत अछि, देखनहि बनय। 

हँ, एतबा अवश्य कहब जे भरि नाटकमे हमर आँखि दू बेर नोरा गेल आ से ई दुनू माय-बेटा दुआरे। गामक बहिनपा सभक उतरा-चौल, उकटा-पैंची आ कनफुसकीकें मंचपर जीवंत केलनि तीन टा स्त्रीक भूमिका निमाहनारि मिथिलाक तीन टा धिया सुश्री नेहा झा, आकांक्षा झा आ कल्पना। हिनका सभक त्रयी, दर्शकसभकें नाटकमे परिस्थितिजन्य उत्पन्न भेल अवसादसँ नहि मात्र निकालबामे सफल भेल, अपितु, सभकें ठहक्का लगबै लेल विवश कऽ देलक। हिनका सभक अभिनय-कौशल देखि ई कहल जा सकैछ जे ई सभ आबय वला समयमे अभिनयक क्षेत्रमे अपन एक टा अलग आ महत्वपूर्ण प्रतिमान गढ़बामे अवश्य सफल हेतीह। 

नायकक पिता, मनोज बाबूक भूमिकाकें जीवंत केलनि भाई हेमंत झा जी। साहित्यिक चौपाड़िसँ लऽकऽ मैथिली साहित्य महासभा (मैसाम) धरिक हिनक यात्राक साक्षी रहितहुँ ई कहाँ बूझल छल जे ई एतेक मांजल कलाकार छथि। हिनक ई रूप हमरा अचरजसँ भरि देलक ताहिमे कोनो संशय नहि। सहनायक, रोहितक भूमिकाकें जतेक सहजतासँ श्री सत्यम काश्यप जी मंचपर जीलथि ओ हुनक सात वर्षक रंगकर्म आ सत्तरिसँ अधिक स्टेज शोकें परिलक्षित कऽ रहल छल। नायिकासँ भैंसुरक रूपमे हिनक लजेनाई, दर्शक-दीर्घाकें लहालोट करैत रहल। भूमिका छोट होइतहुँ अपन अभिनय-कौशलसँ दर्शककें कोना अपना दिस आकृष्ट कएल जाय, ई श्री पंकज मिश्र जीसँ सीखल जा सकैछ। सेल्समैनक छोट सन मुदा प्रभावी पात्रकें अपन ग्रामीण रंगमंचक अनुभवसँ जीवंत कए दर्शक सभक थोपड़ीकें खूब हंसोथलनि श्री पंकज मिश्र जी। आदरणीय विद्यानंद ठाकुर जीकें नायिकाक पिताक रूपमे देखब एक टा सुखद अनुभूति छल। ओ रामलीलामे नाना तरहक भूमिकाकें निमाहि चुकल छथि से जनतब हुनकहि द्वारा नाटकक मध्यांतरमे भेटल। ई तँ भेल नाटकक मुख्य पात्रक संक्षिप्त परिचय जे हम अपन अनुभव आ अल्पज्ञानसँ आहाँ सभक समक्ष रखलहुँ। 

ई समस्त परिचय देब ताधरि नहि पूर्ण होयत जाधरि एहि नाटकक सूत्रधारक भूमिका सहित संपूर्ण नाटकपर अपन अमिट छाप छोड़िनिहार हरफनमौला कलाकार श्री अजित झा जीक चर्च नहि होयत। अहा! की प्रतिभा छनि, अप्रतिम! ई दिल्लीक रंगमंचक खास चेहरा छथि जे अपन निर्देशनसँ भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालयक अधीन संस्था, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी) द्वारा आयोजित विश्वप्रसिद्ध नाट्यमहोत्सव, भारत रंग महोत्सव (भारंगम) मे अपन झंडा गाड़ि, कुशल नाट्य-निर्देशकक रूपमे स्थापित भऽ चुकल छथि। हिनक अभिनयकें प्रत्यक्षतः अनुभव करब कम रोमांचकारी नहि छल। असगरे कोना नाटककें आगू बढ़ाओल जा सकैछ, ई हिनक अभिनय-कौशल देखि बूझल जा सकैछ। कुल मिलाकऽ हम ई कहि सकैत छी जे काल्हुक समय हमरा लेल अत्यंत फलदायी रहल। एक टा नीक नाटकक संग कतोक हित-अपेक्षित सभसँ प्रत्यक्ष दर्शनक लाभ भेटल। किछु नव लोक सभसँ सेहो परिचिति भेल। नाटकक सफल मंचन हेतु रौशन जी समेत समस्त कलाकार, खाहे ओ मंचपर अपन अभिनयक जादू देखाबय वला होथि वा नेपथ्यमे रहि एहि आयोजनकें संपूर्णता प्रदान केनिहार/केनिहारि होथि - सभकें खूब रास बधाई आ अशेष शुभकामना ! 

नाटकक मार्फत किछु बात जे पहिने हम सोचलहुँ जे नहि रखबाक चाही, मुदा, अंततोगत्वा एहि निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ जे अगबे मधुर परसब उचित नहि, किछु नोनगर आ चहटगर सेहो हेबाक चाही । एक टा आम दर्शकक रूपमे एहि नाटककें हम कोन रूपें देखल, तकर सबल पक्ष तँ अपने सभक समक्ष राखि चुकलहुँ। आब, एकर कमजोर पक्षकें, जाहि पर हमर नजरि पड़ल, ओ एहि उद्देश्य आ आशासँ राखि रहल छी जे जौं उचित बुझना जेतनि तँ भविष्यमे उक्त नाटकक मंचन काल निर्देशक महोदय एहि कमीकें दूर करबाक प्रयास करता। नाटकक आरंभसँ पहिने रौशन जी कहलनि जे ई नाटक पूर्वमे एक घंटा दस मिनट केर छल जकरा बढ़ाकए दू घंटा बीस मिनट कएल गेल अछि। 

शुरूमे हम आशान्वित रही जे किछु नव विषयवस्तु जोड़ल गेल हेतैक, मुदा, नाटकक समापनक पश्चात ई कहबामे हमरा कोनो असौकर्य नहि अछि जे नाटककें अनावश्यक रूपें नमारल गेल अछि। कम अवधिमे कसगर कथानक राखि ओकर प्रभावी प्रस्तुति बेसी आवश्यक, नहि कि एकहि संदेशकें अलग-अलग ढ़ंगसँ कहब। एहिसँ हमरा सन अबूझ दर्शक खौंझा जायत । दोसर कमी छल सूत्रधारक सहीसँ उपयोग नहि करब। एहेन मांजल कलाकारकें नाटकक अव्यवस्थित तारतम्यता असहज करैत छै। सूत्रधार द्वारा घटनाक्रमक विवरण आगू-पाछू करब असहज करय वला छल। तेसर कमी संवादक असंगत (Contradictory) होयब रहल। जखन नायक, सुमन आ सहनायक रोहितकें पहिलबेर भेंट होइत छैक तँ रोहित द्वारा पहिने कहल जाइत छैक जे ओ असगरे रहैत अछि दिल्लीमे, मुदा, किछुए कालक बाद ओही दृश्यमे ओकर कथनसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ओकर कनियाँ सेहो दिल्लियेमे रहैत छै। एहि तरहक असंगतिसँ बचब जरूरी। 

अंतमे, सभसँ पैघ असंगति नाटकक मूल विषय लऽकऽ अभरल हमरा। मूल विषयानुसार लोककें अपनहि क्षेत्रमे विवाह-दान करबाक चाही नहि तँ आन क्षेत्रक कनियाँ भेने नाना तरहक विसंगतिक सामना करय पड़ैत छै, यथा- ओ घर-दुआरि, सर-समाज आ माय-बापसँ दूर कए दैत छै। मुदा, जखन रोहित द्वारा सुमनक मार्फत गाममे अपन माय लेल कंबल पठयबाक आग्रह कएल जाइत अछि तँ ओ कहैत अछि जे ई बात हमर कनियाँ ने बूझय। एतय ई बात ध्यातव्य जे रोहितक विवाह अपनहि क्षेत्रमे भेल छै। जखन कि नाटकमे ई देखबामे सेहो आयल जे सुमन केर पत्नी द्वारा सुमनकें कहियो अपन माय-बापक सहायता लेल मना नहि कएल गेल छल। आब ई कहू जे रोहित द्वारा ई कहब जे कंबल पठयबाक बात ओकर पत्नी नहि बूझय, की नाटकक मूल विषयक विपरीत नहि जाइत अछि? 

कहबाक तात्पर्य जे व्यवहार कुशलतामे तँ रोहितक कनियाँसँ बेसी नीक सुमन केर कनिया साबित भेलीह। तखन नाटकक मूल विषयमे सँ एक विषयकें उक्त नाटकक एकटा पात्र द्वारा कमजोर करब भेल की नहि?  नाटकक तकनीकी पक्षक विषयमे हमरा कोनो ज्ञान नहि अछि, तैं ओहि मादे किछु नहि कहि सकब। मुदा, एक टा बात आओर अखरल ओ छल - एक टा दृश्यमे तीनू स्त्री द्वारा आपसी संवाद कालक आपसी दूरी... उक्त दूरी कोरोना कालकें मोन पाड़ि रहल छल। 

आशा अछि हमर ई नीक-बेजाय अनुभव अपने लोकनिकें नीक लागत। - रमेश चंद्र झा

Saturday, 1 August 2026

स्वयं को साबित करने की पीड़ा का अंत


हमारे आपके जीवन की बहुत-सी पीड़ाएँ गूँगी होती हैं। वो चीख नहीं सकतीं। वो चुपचाप हमारे भीतर जन्म लेती है और कोई कोना पकड़ कर बैठी होती हैं। ऐसी ही एक पीड़ा है हमारे अंदर मौजूद सम्मान-सराहना का लोभ और लोगों द्वारा हमें समझ लेने की अपेक्षा ! हम अक्सर हमारे ही दिल में यह इच्छा लिए चलते हैं कि लोग हमें समझें, हमारी कद्र करें, हमारे प्रयासों को पहचानें… वो हमारे अस्तित्व को महत्व दें और फिर जब भी ऐसा नहीं होता तो हमारे मन को लगता है मानो कुछ छिन गया… हम खिन्न होकर अपने जीवन तक धिक्कारने लगते हैं। जबकि असल में हमसे कुछ भी नहीं छिनता, हाँ, बस हमारी अपेक्षाएँ ही टूटती हैं।

सच्चाई यह है कि दुनिया हमें हमारी नज़रों से नहीं देखती। हर इंसान हमें अपने अनुभवों, अपनी सीमाओं और अपनी कमियों की आँखों से देखता है। इसलिए दूसरों से पूर्ण समझ की अपेक्षा रखना खुद को दुःख देने जैसा है और फिर ऐसे में ही हमारे अंदर जन्म लेती है खुद को साबित करने की इच्छा। हम यह साबित करना चाहते हैं कि हम सही हैं, हम सक्षम हैं, हम योग्य हैं, हम महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में हम ऐसी लड़ाइयाँ लड़ने लगते हैं जिसकी कोई ज़रूरत ही नहीं होती। हम अपने काम अपनी तरक्की के लिए नहीं बल्कि स्वयं को प्रमाणित करने के लिए करने लगते हैं… धीरे-धीरे हम स्वयं का जीवन जीना भूलकर दुनिया के सामने स्वयं का प्रदर्शन करने लगते हैं, करतब करने लगते हैं, हम दौड़ने भागने लगते हैं।

हाँ, जब हम ठहरते हैं, विलमकर थोड़ा सोचते हैं, लंबी साँस लेते हैं और अपने ही अंदर झाँकते हैं, तो एक गहरी सच्चाई जो हमारे सामने आती है वो है - जो वास्तविक है, उसे किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं। जो मूल्यवान है, वह अंधेरे में भी चमकता है, चुप रहकर भी सब कह जाता है वो और इन सबसे ऊपर ये की दुनियाँ की कोई भी ताक़त हमसे ईश्वर प्रदत्त सम्मान छीन नहीं सकती।

यही सम्मान जब बिना माँगे मिलता है तो सबसे मधुर होता है। स्नेह जब स्वाभाविक होता है तो सबसे पवित्र होता है और पहचान जब स्वयं चलकर आती है तो सबसे स्थायी होती है। जब हम बाह्य मान्यताओं की प्यास छोड़ देते हैं तब हम एक अपनी ही भूली हुई आवाज़ को सुन पाते है। हमारी अपनी आवाज़। जो कहती है - “तुम पर्याप्त हो। तुम्हें किसी सबूत की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी यात्रा पवित्र है, चाहे दुनिया इसे देखे या नहीं।”

जिस दिन हम दूसरों के सामने स्वयं को साबित करना छोड़ देते हैं, उसी दिन हम खुद को पहचानना शुरू करते हैं और जब आत्मबोध आता है, तो दूसरों के विचारों की शक्ति हम पर से स्वयं ही समाप्त हो जाती है। इसी मौन, इसी स्वतंत्रता में हमारे आत्मा की असली गरिमा जन्म लेती है जो हमारे अंदर जन्म लिए पीड़ा को समाप्त करने की शक्ति रखती है।

प्रशांत किशोर, बांकीपुर और मिथिलावाद के लड़के


मैं इस विषय पर लिखते बचता रहा हूँ. हालांकि मैं स्वयं को इतना बड़ा भी नहीं मानता कि लिखकर कोई क्रांति ला दूँ किन्तु भिन्न कारणों से यह मामला बहुत सेंसिटिव रहा है मेरे लिए. विचारधारा, अपने लोग इधर, अपने लोग उधर, मिथिलावाद वाले इनके साथ, मिथिलावाद वाले कांग्रेस के साथ, बिहार का अभिशाप, बिहार भाजपा का नकारा नेतृत्व, प्रशांत से उम्मीद, प्रशांत का ट्रैक रिकॉर्ड आदि आदि वजहें रहीं जहाँ चुप रहना बेहतर समझा मैंने. अब चुकी चुनाव समाप्त हो गया है, संभवतः इसपर अपने विचार रखकर किसी टकराहट और दुराव को आमंत्रण ना मिले... और फिर अभी चुनाव परिणाम भी आना बाँकी है, सो लिखने का यही समय चुना मैंने.

पहले प्रशांत से आरम्भ करता हूँ. प्रशांत किशोर भाजपा और अमित शाह के साथ अपनी जोड़ी के रूप में जाने गए और फिर उसी अमित शाह से दुराव की वजह से उनसे अलग भी हुए. एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत ने साम-दाम-दंड भेद के उपयोग को उसके चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया. सफल भी हुए. समय के साथ पैतरे बदलते रहना, कहाँ जातीय कार्ड खेलना है, कहाँ धार्मिक, कहाँ विकास की बात नहीं करनी है, कहाँ किस व्यक्ति से क्या प्रभाव पड़ेगा, कहाँ किसको शांत करना है, कहाँ किसको मिलाना है, कहाँ किसे धमकाना है.... डेटा एनालिसिस और उसके ऊपर कार्य योजना - इन सबके उपयोग को प्रशांत ने प्रोफेशनल रूप दिया. हालांकि बदलते समय में उन्होंने इन सबसे ऊपर पैसे को पाया और फलस्वरूप दक्षिण के राज्य सह ममता बनर्जी के लिए पैसे के ट्रांजेक्शन को ''देखना'' मात्र उन्हें सफलता दे गया.

इतना सब होकर भी प्रशान्त पिछड़ क्यों गए ?

दरअसल एक एम्प्लोयी और एक मालिक के बीच का मौलिक अंतर नहीं जानते प्रशांत. एक एम्प्लोयी होकर आप बेहतर कार्ययोजना बना कर अपने मालिक को सफल बना सकते हैं, किंतु इस सफल होने में मालिक को मालिक सा बनना होता है. पब्लिक लाइफ में उसे ईर्ष्या, द्वेष और दम्भ से बचना होता है. उसे बर्दाश्त करना होता है, एप्रोच को बहुत होलिस्टिक (संपूर्णता वाला) बनाना होता है. आप ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि जो भी मालिक ऐसे नहीं हुए उनके लिए प्रशांत कुछ नहीं कर पाये.

इसे थोड़ा बेहतर रूप से समझते हैं. एक मालिक राहुल गांधी को देखें. उनके एप्रोच को देखें - "अमित शाह काँप रहा है, मोदी आँख नहीं मिला पा रहा.... मैं दुनियाँ हिला दूँगा" - आदि आदि जैसा दंभ उन्हें प्रशान्त जैसे दसियों एम्प्लोयी भी सफल नहीं कर सकते. अफ़सोस, प्रशांत स्वयं ऐसे मालिक नहीं बन पाये. हर जगह मीडिया के सामने आकर अपना दंभ दिखाना - "कौन बोलेगा सामने मेरे, किसकी इतनी हिम्मत है, तुम क्या उखाड़ लोगे मेरा, सब चोर और हत्यारे हैं"- आदि आदि कहना उन्हें ग़लत मालिक बनाता रहा. मीडिया के सामने आपकी यही बात आपका कोई एम्प्लोयी कह सकता था, अफ़सोस, आप मीडिया में आकर बाहें चढ़ाते रहे और कम से कम बिहार जैसे राज्य में जहाँ राजनैतिक समझ में लोग काफ़ी अनुभवी हैं वहाँ इन सब करतबों से आपकी स्वीकार्यता कभी नहीं होती. बिहार में मीडिया मैनेजमेंट और बड़बोलापन चुनाव में सफलता नहीं देता. आपने यही सब विधानसभा चुनाव में भी किया और अभी बांकीपुर में भी कर रहे... आपने जिसपर सबसे अधिक दोषारोपण किया वो अयोग्य होकर भी मुख्यमंत्री बना है.... ध्यान दें, मालिक बनें पहले !

बांकीपुर में क्या होगा ?

ना तो मैं चुनाव विशेषज्ञ रहा हूँ और ना ही बांकीपुर से अधिक कनेक्शन रहा है मेरा किंतु प्रशांत ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है इसमें कोई दो मत नहीं. यहाँ और एक बात जो सत्य है वो ये कि भाजपा ने चुनाव जीतने को आज से 25-30 साल पहले के कांग्रेस की याद दिला दी. उन्होंने एक भी निम्न स्तरीय पैंतरा छोड़ा नहीं यहाँ. सत्ता में रहकर चुनाव जीतने के हर एक हथकंडे अपनाये उन्होंने. स्टार प्रचारकों को झोंकना, पैसे का उपयोग, प्रतिद्वंदी को धमकाना, बूथ पर कब्जा समेत प्रशासनिक मदद... सब आज़माया है भाजपा ने. हालांकि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट को देखते हुए ये उनके नाक की लड़ाई भी थी. परिणाम के तौर पर मुझे लगता है कि पूर्व परिणामों की अपेक्षा काफ़ी कम अंतर से भाजपा जीत जाएगी....

हाँ, यहाँ प्रशांत कमाल भी कर सकते हैं किंतु इस कमाल करे की राह में राजद द्वारा भाजपा को किया अपरोक्ष मदद सबसे बड़ा माइलस्टोन होगा. जिसे यह लगता है कि बिहार में राजद भाजपा को मदद नहीं कर रही, बेहतर है वो लोग बिहार की राजनीति में अपना अपरिपक्व नाक ना घुसायें.

मिथिलावाद के लड़के !

MSU के संस्थापक सदस्य अनूप और MSU की स्वीकार्यता को मिथिला से बाहर वृहत आकार देने वाले आदित्य प्रशांत किशोर से ना केवल जुड़े हैं बल्कि बांकीपुर चुनाव में उन्होंने अकेले दम पर आरएसएस सह भाजपा के संगठन को बड़ी चुनौती भी दी है. इस विषय में संक्षेप में कहूँ तो इन दोनों ने अपने मालिक प्रशांत के लिए श्रेष्ठ एम्प्लोयी का रोल भलीभाँति निभाया है.

यहाँ इन दोनों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह है कि इन दोनों के ऊपर 'जय-मिथिला' छोड़कर 'जय-बिहार' करने का आरोप लगा है. और तो और यह आरोप भी उनके ही पुराने साथियों ने सबसे अधिक मुखरता से लगाया है. 'मौके की तलाश में रहना, समय आने पर काटना, संग-साथ को भुलाकर स्वयं का दामन साफ़ दिखा दूसरे का मलीन करना' - मिथिला के सांस्कृतिक परम्पराओं में से एक रहा है. ऐसे में मेरे लिए यह एक दु;खद अनुभव वाला पल रहा जब पुराने साथियों ने इनके ऊपर दोषारोपण किया.

कई ऐसे लड़के हैं जिनकी पहचान में अनूप का हाथ है. कई ऐसे लड़के हैं जो कांग्रेस, राजद, आप आदि दलों के दफ़्तर में जाते आते रहे हैं. कई ऐसे लड़के हैं जो पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा-जदयू संगठन से नगदी पाकर उनके समर्थन में लगे रहे, ठीकेदारी पाते रहे, MSU को इस्तेमाल कर अपना बिजनेस प्लान करते रहे... कुछ छुपा नहीं है.

सबको अपनी राजनीति करनी है. सब मौके की तलाश में हैं, सबको बेहतर अवसर चाहिए और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं. सबको अपनी बेहतरी, तरक्की, कमाई का हक है. हाँ, ऐसा करने के क्रम में अपने ही साथियों का विरोध करना मुझे मिथिलावाद को कमजोर करने सा लगा. चुप रहा जा सकता था, सामने आने से बचा जा सकता था...

अंत में
बिहार की जय हो.
मिथिला को एकजुटता मिले.

Tuesday, 2 June 2026

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : चन्द्रमणि झा

वर्तमान भारतीय राजनीति मेँ नरेंद्र मोदी एहन व्यक्तित्वक रूप मेँ स्थापित छथि जिनकर पक्ष आ विपक्ष दुनूमेँ तीव्र मतभेद देखबाक लेल भेटैत अछि। एहन समय मेँ The Leader Narendra D. Modi जेकाँ पुस्तक मात्र एक व्यक्तिक जीवनी बनिकऽ नहि रहि जाइत अछि, बल्कि समकालीन भारतक राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक यात्राक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सेहो बनि जाइत अछि। एहि पुस्तकमेँ नरेंद्र मोदीक नेतृत्व, कार्यशैली आ राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोणकेँ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करबाक प्रयास कएल गेल अछि।

एहि पुस्तकक लेखक आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगतक प्रतिष्ठित गीतकार आ सांस्कृतिक चेतनाक सशक्त हस्ताक्षर छथि। हुनकर साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तकक प्रत्येक अध्यायमेँ स्पष्ट रूपसँ देखाइत अछि। लेखक तथ्य आ घटनाकेँ केवल सूचनात्मक रूपमेँ नहि रखने छथि, बल्कि तकरा भावात्मक आ प्रेरणादायक स्वर सेहो देने छथि। एहि कारणेँ पुस्तक राजनीतिक विश्लेषणक संग-संग साहित्यिक पठनीयता सेहो बनौने रखैत अछि।

पुस्तकक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्वकेँ केवल राजनीतिक उपलब्धिसभ धरि सीमित नहि रखने छथि, बल्कि हुनकर संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता आ जनसंपर्क कौशलकेँ सेहो रेखांकित केने छथि। एक सामान्य पृष्ठभूमिसँ निकलि देशक सर्वोच्च राजनीतिक पद धरि पहुँचबाक यात्राकेँ लेखक प्रेरणादायक आख्यानक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि।

भाषाक दृष्टिसँ पुस्तक सरल आ प्रवाहपूर्ण अछि। घटनासभक क्रमबद्ध विन्यास आ सहज प्रस्तुति एकरा सामान्य पाठकसँ लऽ कऽ राजनीति आ समाजशास्त्रक अध्येतासभ धरि लेल उपयोगी बनबैत अछि। यद्यपि, एक समीक्षकक रूपमेँ ई कहब उचित होयत जे पुस्तकमेँ मोदीजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक सकारात्मक पक्षकेँ अपेक्षाकृत बेसी स्थान भेटल अछि। यदि आलोचनात्मक विमर्श आ वैकल्पिक दृष्टिकोणकेँ सेहो किछु बेसी विस्तार देल जाइत तँ पुस्तकक विश्लेषणात्मक पक्ष आरो सुदृढ़ भऽ सकैत छल। तथापि लेखकक उद्देश्य स्पष्ट रूपसँ नेतृत्व आ प्रेरणाक आयामकेँ रेखांकित करब रहल अछि, आ ओ एहि उद्देश्य मेँ सफल देखाइत छथि।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi  केवल एक राजनीतिक जीवनी नहि, बल्कि नेतृत्व, संकल्प आ राष्ट्रसेवाक विचारकेँ बुझबाक एक गंभीर प्रयास अछि। आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा अपन साहित्यिक दृष्टि आ संवेदनशील अभिव्यक्तिक माध्यमसँ एहि पुस्तककेँ विशिष्ट बना देने छथि। ई पुस्तक विशेष रूपसँ ओहि पाठकसभक लेल उपयोगी अछि जे नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व, हुनकर नेतृत्व-मॉडल आ समकालीन भारतक राजनीतिक यात्राकेँ निकटसँ बुझय चाहैत छथि।

एक पाठकक रूपमेँ सर्वप्रथम तँ हम The Leader Narendra D. Modi केर लिखल जाएबाकेँ लऽ आलोचना करय चाहब। हमर ई आलोचना पुस्तकक विषय-वस्तु वा निष्कर्षकेँ लऽ नहि, बल्कि एकर अस्तित्वकेँ लऽ अछि। आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ई पुस्तक लिखलाहे किएक?

हमर बुझाइत अछि जे नरेंद्र मोदी पर लिखबाक लेल किछु न्यूनतम "अर्हता" होयबाक चाही। जेना - 

  • या तँ लेखक स्वयं संघ-परिवारसँ जुड़ल होथि।

  • या फेर ओ मोदीजीक गृहप्रदेशक होथि।

  • या हुनकर संग कोनो संस्थामेँ कार्य कएने होथि।

  • अथवा पेशासँ पत्रकार होथि, जे वर्षौंसँ हुनकर राजनीतिक जीवनक अध्ययन कएने होथि।

एतय किछु लोक ईहो मानि सकैत छथि जे एहन पुस्तक लिखबाक पाछाँ कोनो राजनीतिक महत्वाकांक्षा वा लाभक संभावना होयबाक चाही। मुदा विडम्बना ई अछि जे चंद्रमणि झा जी एहि तथाकथित अर्हतासभमेँ सँ कोनो अर्हता नहि रखैत छथि।

ओ न तँ राजनीतिक कार्यकर्ता छथि, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ताक गलियारामेँ नियमित रूपसँ विचरण करनिहार, आ नहिए कोनो राजनीतिक लाभक आकांक्षी। ओ मूलतः साहित्यक आदमी छथि—गीतक आदमी, संवेदनाक आदमी, भाषा आ संस्कृतिक आदमी। एहन स्थितिमेँ हुनकर नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखब ओहि लोकसभक लेल आश्चर्यक विषय भऽ सकैत अछि जे साहित्य आ राजनीति बीच कठोर दीवार ठाढ़ कऽ कऽ देखैत छथि।

मुदा हमर शिकायत एतय समाप्त नहि होइत अछि। एक मैथिल हृदयक शिकायत तँ एहि सँ पैघ अछि। यदि चंद्रमणि झा जी केँ ई पुस्तक लिखबे करबाक छल, तँ कम-सँ-कम एकरा मैथिलीमेँ लिखितथि। जे व्यक्ति अपन सम्पूर्ण जीवन मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवामेँ समर्पित कएने छथि, हुनका सँ ई स्वाभाविक अपेक्षा रहैत अछि जे अपन महत्वपूर्ण कृतिसभ लेल मातृभाषाकेँ प्राथमिकता देतीह। The Leader Narendra D. Modi केर अंग्रेजीमेँ प्रकाशित होयब व्यापक पाठक-वर्ग धरि पहुँचबाक दृष्टिसँ उचित भऽ सकैत अछि, मुदा एक मैथिली प्रेमीक मनमेँ ई प्रश्न अनायास उठैत अछि जे की ई पुस्तक मैथिलीमेँ नहि आबि सकैत छल?

तथापि जखन हम पुस्तक पढ़ब आरम्भ करैत छी तँ धीरे-धीरे ई शिकायत कम होमऽ लगैत अछि। तखन बुझाइत अछि जे लेखकक वास्तविक अर्हता न राजनीतिक निकटता अछि, न वैचारिक प्रतिबद्धता आ नहिए कोनो व्यक्तिगत स्वार्थ। हुनकर सभसँ पैघ अर्हता अछि—एक सजग साहित्यकारक दृष्टि, जे अपन समयक प्रभावशाली व्यक्तित्व आ घटनाकेँ बुझबाक तथा ओकरा शब्द देबाक साहस रखैत अछि। सम्भवतः ईहे अर्हता हुनका एहि पुस्तकक रचनाक लेल प्रेरित कएने अछि।

आब पुस्तकक विषय-वस्तु पर अबैत छी। क्राउन पब्लिकेशन, छत्तीसगढ़सँ प्रकाशित ई 278 पृष्ठक पुस्तक वास्तवमेँ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। यद्यपि पुस्तकक सामग्री आ लेखकक परिश्रम एकरा संग्रहणीय बनबैत अछि, तथापि हमर मानब अछि जे एहन महत्वपूर्ण कृतिकेँ हार्डबाउंड संस्करण आ आरो आकर्षक आवरणक संग प्रस्तुत कएल जाइत तँ एकर गरिमा आरो बढ़ि जाइत।

पुस्तकक सभसँ पैघ विशेषता एकर व्यापक फलक अछि। कुल 77 आलेखक माध्यमसँ लेखक नरेंद्र मोदीक जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि आ सामाजिक सरोकार सहित लगभग सभ महत्वपूर्ण पक्षकेँ समेटबाक प्रयास केने छथि। ई कार्य निश्चयहि श्रमसाध्य आ सराहनीय अछि।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तक उपलब्ध अछि, मुदा अधिकांश पुस्तक या तँ जीवनी धरि सीमित रहि जाइत अछि अथवा कोनो एक विशेष पक्ष पर केन्द्रित रहैत अछि। चंद्रमणि झा जीक ई कृति एहि अर्थमेँ अलग देखाइत अछि जे एहि मेँ विविध स्रोत, प्रसंग आ दृष्टिकोणकेँ एकहि स्थान पर संकलित करबाक प्रयास भेल अछि। पाठककेँ मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ सम्बन्धित अनेक एहन सूचना एकत्र भेटैत अछि जाहि लेल अन्यथा अनेक पुस्तक आ स्रोतक सहारा लेबाक आवश्यकता पड़ित।

77 स्वतंत्र आलेख होयबाक बावजूद पुस्तक कतौ बिखरल नहि लगैत अछि। प्रत्येक आलेख एक पैघ व्यक्तित्व-चित्रक अंश बनिकऽ सामने अबैत अछि। पाठक चाहे कोनो अध्यायसँ पढ़ब शुरू करथि, अंततः हुनका नरेंद्र मोदीक जीवन आ नेतृत्वक एक समग्र तस्वीर भेटैत अछि।

लेखकक दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक आ प्रेरणात्मक अछि। ओ मोदीकेँ मात्र राजनेताक रूपमेँ नहि, बल्कि एहन नेताक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य पृष्ठभूमिसँ उठि असाधारण उपलब्धि प्राप्त केने छथि। एहि कारण कतेको स्थान पर पुस्तक जीवनीसँ बेसी प्रेरक साहित्यक रूप धारण कऽ लैत अछि।

एक पाठकक रूपमेँ पुस्तक पढ़ैत समय ई अनुभव अवश्य होइत अछि जे भाषाकेँ आरो रोचक, संवादधर्मी आ प्रवाहयुक्त बनाओल जा सकैत छल। कतेको स्थान पर भाषा अत्यधिक अकादमिक आ विवरणप्रधान भऽ जाइत अछि, जाहिसँ सामान्य पाठककेँ किछु अध्याय बोझिल वा नीरस प्रतीत भऽ सकैत अछि। मुदा एहि पक्षकेँ पुस्तकक सीमा होयबाक संग-संग एकर विशेषता सेहो मानल जा सकैत अछि। लेखक रोचकताक अपेक्षा प्रामाणिकता आ सूचना-संपन्नताकेँ बेसी महत्व देने छथि। एहि कारण पुस्तक भावनात्मक आख्यानक अपेक्षा एक संदर्भग्रंथ आ दस्तावेजक स्वरूप ग्रहण करैत अछि।

यदि कोनो पाठक केवल साहित्यिक आनन्दक लेल एहि पुस्तककेँ पढ़य चाहैत छथि तँ सम्भव अछि जे हुनका किछु निराशा हो। मुदा यदि हुनकर रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्व अथवा एहि विषय पर गंभीर अध्ययन आ शोधमेँ अछि, तँ ई पुस्तक निश्चयहि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होयत।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेताक जीवनी नहि, बल्कि एहन राजनीतिक व्यक्तित्वकेँ बुझबाक प्रयास अछि जाहि इक्कीसम शताब्दीक भारतक दिशा आ विमर्शकेँ गहराईसँ प्रभावित केने अछि। विषयक व्यापकता, सामग्रीक समृद्धि आ दस्तावेजी महत्वक कारण ई कृति विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि।

पुस्तकक एक आन महत्वपूर्ण उपलब्धि एकर सहज उपलब्धता अछि। प्रसन्नताक विषय ई अछि जे ई पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल आ गूगल बुक्स जेकाँ प्रमुख मंचसभ पर उपलब्ध अछि। दुर्भाग्यवश मैथिलीक अधिकांश लेखक आ प्रकाशक अपन पुस्तकक वितरण आ विपणन एहि स्तर धरि नहि पहुँचा पबैत छथि। एहि दृष्टिसँ सेहो ई पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।

एक मैथिल पाठकक रूपमेँ, आ विशेष रूपसँ लेखकक साहित्यिक अवदानसँ परिचित होयबाक कारण, एहि पुस्तककेँ देखिकऽ हमरा स्वाभाविक गर्वक अनुभूति होइत अछि। मैथिली गीत-साहित्यक शिखर पुरुषसभमेँ गिनल जाएबला आदरणीय चंद्रमणि झा जीक राष्ट्रीय स्तरक विषय पर अंग्रेजीमेँ एहन व्यापक आ सुव्यवस्थित पुस्तक प्रस्तुत करब केवल हुनकर व्यक्तिगत उपलब्धि नहि, बल्कि सम्पूर्ण मैथिली समाज आ साहित्य-जगतक लेल गौरवक विषय अछि।

अंतमेँ आदरणीय चंद्रमणि झा जीकेँ एहि महत्वपूर्ण कृतिक लेल हमर हार्दिक शुभकामना। हमर कामना अछि जे ई पुस्तक देश-विदेशक अधिकाधिक पाठक धरि पहुँचे, पढ़ल जाए, चर्चित होउ आ अपन उद्देश्यक सार्थकता सिद्ध करय। संगहि, ई कृति मैथिली समाजकेँ सेहो प्रेरित करय जे ओकर साहित्यिक प्रतिभासभ क्षेत्रीय सीमासँ बाहर निकलि राष्ट्रीय आ वैश्विक स्तर पर अपन सशक्त पहचान स्थापित करय।


प्रवीण कुमार

पाठकों के लिए बोनस
695 रूपा के पुस्तक एखन अमेजन पर 521 रूपा में उपलब्ध अहि. पुस्तक प्राप्ति लेल लिंक