Friday, 9 January 2026

विजया महिमा - अमरनाथ कक्का केर एक गोट संस्मरण

अमरनाथ कक्का 

ई बड़ पुरान गप थिक, जहिया बैठारिये रही। सरिसब-पाहीक सटले गाम छै हाटी। एक गो मित्रक घर ओतहि हुनक गाममे नाच-तमाशा होइ छलै। गुलाबी ठंढक समय रहै। हुनकहि आमंत्रण पर ओतए जयबाक नेआर-भास भेलै। बेरूपहर जयबाक प्रोग्राम बनल। तीन मित्र, मुदा साइकिल दुइएटा। तेँ, एक मित्र कैरिअर पर असबार भेल बिदा भेलहुं। बाटमे सरिसबमे एक मित्र आओर सङ्ग भेलाह आब चारि पुरलहुं।

हाटी पहुंचला पर नेआर भेलै जे पहिने विजया सेवन हो, तखन किछु जलपान तखन नाच देखबाक बदान। पाँच मित्र एकसङ्ग एकत्रित भेल रही तेँ भरिपोख हँसी-मजाक आ गप्प-सड़ाकाक धार बहए लगलै। विजयाक प्रभावक जिज्ञासा कयल जाए लगलै आयोजक द्वारा। व्यवस्थाक साफल्य प्रभाव घरवारी केँ बड़ संतोख दै छै, असीम आनंदानूभूति होइ छै। तेँ, ई जिज्ञासा। 


- की रौ ? - घरबारीक प्रश्न

-- भनकीयो नञि - दोसरक उत्तर

- आ तोरा ?

-- रमकी बुझाइए

- उमकी नै ने ?

-- नञि, तते नञि 

- तखन आब चलै चलs। 

                 

भांग के प्रकाश आ ध्वनि बैरी। आयोजन स्थल पर लाउड स्पीकरक ध्वनि आ प्रकाश सँ जगमग, एनामे एक गोटाक पग डगमग होइत अ'ढ़-घात मे कात जा बैसल। आँखि मुनने। तौनी सँ मुंह झँपने, घार खसौने। अरौब्बा ! की भ' गेलै !


ओह, ई तS भनकी, रमकी सँ बढ़ि कए सनकी भ' गैल। अस्तु, साध्ये की ? के देखैए नाच तमेशा एहिठाँ त' तेसरे रङताल। हारि-दाड़ि मित्र के साइकिल पर लादि कोहुना सरिसब धरि आनल। ताबत एकटा बस अयलै। कंडक्टर के ऐ अनुरोधक सङ्ग जे हिनक मोन खराप भ' गेलनिएं, पैटघाट उतारि देबन्हि, ओइ मित्र केँ बसमे चढाय बिदा कयल, आ शेष दुनू मित्र साइकिल सँ घर घुमलहुं। अनठा-पनठा, बहन्ना बनबैत सुति रहलहुं।


परात भेलै। ओइ मित्रक माय खरोस मे अयली, अपन बेटाक मादें। हम दुनू गुम्म चिंतासँ जे कत' चल गेलै आ ड'र सँ जे की जबाब देबै। फूसि बजैक ताबत् ओतेक प्रैक्टिस नै रहय, अभ्यस्तो नञि रही, मुदा ओकर प्रारंभिक डेग बहन्ना, से बनबैक कोशिश मे कहलियै - "ओकर सार भेटल रहै नै मानने हेतै, अपना ज'रें ल' गेल हेतै। आबिए जाएत" - ई कहि कोनहुना हुनका टारि विजयबोधक अनुभव कयल। मुदा, हाय रे कपार ! घंटे-दू घंटाक फेर अयली। “कत' बौआ के छोड़ि देलियै अहाँ सभ। हम छोटका केँ पठौने रहियै ओकर सासुर। ओत' कहाँ गेलैए ?" 


आब त' शोनिते सुखा गेल। मित्रक चिंता फराके, आ हुनक आशंका, चिंता, भय लोकक निन्न हरण क' दैछै। आशंका नाना प्रकारक शंका उपजबैए। चिंता चित्त चंचल क' दैए। भयातुर लोक सदति चौंकले रहैए। एहेन परिस्थिति मे लोक सुतबाक उपक्रम मे आँखि मूनि त' लैए, मुदा निसभेर हएब असम्भव।

                             

ओइ मित्रक पछिला विजयापानानुभव आओरो विचलित क' देने रहय। अपना पर क्षोभ सेहो रहय, जे ओकरा एकसर किए आब' देलियै। एक गोटा अपन साइकिल कतहु गर लगाय सङ्ग भs' गेल रहितियै त' एना नै ने होइतइ। तखन की बूझल रहय ओकरा भांग नै पचै छै, ओकरा रोकलियै ने किए, मना किए ने केलियै... आदि आदि आशंका।

                       

आगां के खिस्सा सौं पहिने क्षेपक मे पछिला इतिवृत्ति कहि दी।पहिने सी एम कॉलेज, दरभंगा (ध्यान रहय, ताबत् तीन भागमे नञि बँटायल रहै, हँ ब्लॉक अलग अलग कहबै) मे उच्चाङ्क सँ द्वितीयश्रेणीमे उत्तीर्ण परीक्षार्थी के बाइलोजी मे नामाङ्कन भ' जाइ आ मारबाड़ी कॉलेज (सम्प्रति भारती-मण्डन कॉलेज) मे तृतीयो श्रेणी बलाकेँ। बेसी छात्र सएह पढ' चाहय। अभिभावकोक सएह अभिलाषा ।अस्तु, ई विषयांतर बात। हमर ओ मित्र मेधावी रहथि। मेडिकल कॉलेज मे प्रवेश लेल प्रतियोगिताक पहिल आयोजन भेल रहै, जै मे ओहो शामिल भेल रहथि।


एहिना एकदिन कोनो बहन्ने विजियायोजनक बाद टहलैले पैटघाट गेल रहथि। तहिया ओइ परिसरक लोकलेल पैटघाट एकमात्र जुटानी स्थल रहैक।ओतहि अकस्मात् अखबार पर नजरि पड़लनि, उनटा के नंबर देखलखिन। आनंदातिरेक मे उछलि गेलाह। सभके् खुशखबरि सुनाय, एक मटकूरी रसगुल्लाक सङ्ग श्रद्धेय मास्टर साहेब (हमरालोकनिक विद्यालयक पूर्व प्रधानाध्यापक) केँ गोड़लागि हुनक आशीष, बधाइ पौलनि। सौंसे परोपट्टा अनघोल भ' गेलैक। लोकक करमान लागि गेलनि हुनक दलान पर भोरे सँ। मुदा अपने ई निसभेर सूतल। जखन दिन चढ़लै, निन टुटलन्हि। हिनका किछु मोने ने रहनि। मुदा, लोकसभ जखन मोन पाड़य लगलनि तँ दौगल गेला पैटघाट। ओइ अखबार पर फेर ध्यान देलनि। मुदा आहिरेबा ! ई तँ लॉटरी रिजल्टक नंबर सभ रहै, जेकरा विजयाप्रभावात् मेडिकल रिजल्ट बूझि नेने रहथि। फल मे फल इएह जे किछुदिन कंछी काट' पड़लनि।

             

तेँ, विशेष चिंता, क्षोभ त' रहबे करय, काल्हि हिनक मायक सामना कोना करब, अभिभावक बुझताह त' फज्झैतासव, रेबाड़बटी आ कनैठीमायसिनक ड'र फराक।तेँ, परात लेल अपनाकेँ दृढ़ करबाक प्रयासक तानी-भरनी मे ओझरायल राति गमाओ।

                      

“होइहें सोइ जो राम रचि राखा" आ "जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई"। भेबो केलै सएह। पराते मातर हुनक माय जूमि गेलीह। फेर वएह जिज्ञासा मुदा उलहन उपरागक सङ्ग। काँट गड़ै छै त' काँटे सँ बहार कयलजाइ छै। एक फूसिके झँपै लेल दोसर फूसिक सहारा लेब' पड़ै छै। कहलिअनि "अन्हार रहै, रस्तो गड़बड़ छै। ओ अपनहि कहलनि अहाँ सभ साइकिल सँ जाउ, हम सरिसब मे बस ध' लैत छी। हमहु लोकनि एही छगुंता मे छी आखिर ओ कतय गेला"। आनो आनो लोक बाजय लगलै "कोनो नेना-बालक तS' छै नै। देखियौ कनीकाल। आबिए जेतै"।

                        

सएह भेलै। दसबजेक लगभग कोलाहल भेलै जे ओ आबि गेलै। भरिटोल अनघोल, दलान पर करमान लागल। लोक पूछै, मुदा ओ किछु बजबे नै करै। हमरा सभ केँ साधन्से नै जे ओकर दलान पर जाइ। सोचल, एकान्त मे सविस्तर बूझि लेब। ताबत् थम्ह्ह हे मोन...


उत्कंठा मनुखक चैन हरण क' लै छै। छटपटी मे कहुना दिन बितबैत रही, जे साँझमे एकान्त भेंट हएत त' सवित्सर जनतब लेब। से जतबा छटपटी हमरा दुनू केँ, ततबए हुनको जिनका विजयापानक दिव्यानुभव भेल रहनि। ओहो व्यग्र रहथि अपन अनुभूति कथा बिलहैले। हुनकर उत्कंठा किछु बेसिए तीव्र रहनि।

                     

गोधूलि बेर रहै, मुखांध नहिं भेल रहै। ताबत देखल ओ मुस्कियाइत, स्मित हासें झटकल आबि रहलाहे, हमरे सभक आवास दिशि। काल्हि सँ दाबल जिज्ञासा एकाएक मुखर भ' उठल। समवेते स्वरमे पुछलियनि " की भ' गेल रहय?"


आब हुनकहि मूंहें सूनल जाय - “अहाँ सभ सरिसब मे हमरा बस पर चढ़ाय देलहुं ।हमर हालति की रहय, से अपनहुं नञि बुझलियै। तौनी ओढ़ि घसमोरि जे बैसलहुं से लगैए सुतागेल। जखन अरड़िया संग्राम पहुंचलहुं, चाँकि भेल। कंडक्टर ओतहि उतारि देलक। अन्हरिया राति, अनचिन्हार जगह, केओ सरोसम्बंधी नहि, कत्त जाउ ? ताबत् एकटा छोटछिन असोरा पर नजरिगेल जै पर एकटा अखरा चौकी धयल रहै। तौनी रहबे करय, ओढ़ि, घसमोड़ि पड़ि रहलहुं। विजया सवारे रहथि तत्काल आँखि लागि गेल।

                      

कतू रातिमे, जखन जाड़ पछारलक, निन्न उचटि गेल। एक मोन हुअए घरवारी केँ उठबिअनि आ एकटा अतिरिक्त ओढ़ना माँगि लिअनि। मुदा अपरिचित जगह, अनचिन्हार लोक, निशाभाग राति, साधंस नहिं भेल। अस्तु, बैसले बैसल परात होइक प्रतीक्षा करबे समीचीन बुझायल। जतs चौकी पर बैसल रही, ठीक ऊपर एकटा जंगला (छोटसन खिड़की) रहै, दुपटिया। पट्टा भिरकाएल रहै। मुदा, तरका ऊपर आ उपरका त'र, तेँ गवाक्ष बनल रहय। अंदर सँ ढिबरीक मद्धिम प्रकाश मे, बुझना गेल जे दू व्यक्ति कम्बल मे लटपटाएल सूतल छै। कम्बलक त'रमे किछु उकस-पाकसक आ हलचलक भान भेल। एहना परिस्थिति मे निन्नक सभ सम्भावना समाप्त।


कोनहुना परात कयल आ पहिले घुड़ती बस सँ आपस अयलहुं।"...अपन आपबीती सुनबैत कहलनि "हे आब कान मोचरै छी। फेर नाढ़ो बेल त'र !"

                        

आइ उपरोक्त पाँचो मित्र अपन-अपन जीबन मे पोता-पोती, नाति-नातिन सङ्ग आनंदमय जीवन जीबि रहल छी। सभ "सर", "अर" भs यशस्वी जीवन बितौलन्हि, हमहींटा "टर"रहि गेलहुं। चारि मित्र हमरा सङ मुखपोथियो सँ जुड़ल छथि। मुदा, भुक्तभोगी मित्रक नाम नहि लेब, किन्नहु ने.... :) 

Saturday, 27 December 2025

मिथिला मैथिली पर पाँच बातें

परसों शाम किसी कार्य में लगा था जो लगभग मध्यरात्रि में जाकर समाप्त हुआ। संबंधित दो व्यक्ति को मैसेज किया की इसपर बात हो, स्वाभाविक रूप से वो सो चुके थे। मैंने सुबह तक़रीबन चार बजे उन्हें फिर से मैसेज किया, माय बैड लक की वो बेचारे मेरी तरह अनिद्रा के शिकार नहीं थे, सो रहे थे। फिर मैं भी रूटीन काम की तैयारी में लग गया। 

दरअसल मैंने एक आर्टिकल लिखा था जिसे किसी पुस्तक में छपना था। पुस्तक मैथिली और अंग्रेजी में थी सो मुझे मैथिली में लिखने को कहा गया था। तथ्यात्मक दृष्टिकोण से सहमति के लिए अपना हिंदी लिखा हुआ ही पहले भेज दिया मैंने। इस उम्मीद से की यदि ये ठीक कहा समझा गया तो इसका मैथिली अनुवाद कर दूँगा मैं। 

सुबह तक़रीबन ०९ बजे के क़रीब एक महोदय का फ़ोन आया। उन्होंने कहा - “अरे ये तो ग़ज़ब लिखा आपने, मस्त है ये। न मसाला कम ना ज़्यादा। बिल्कुल बैलेंस्ड किंतु असरदार। मैं आग्रह करूँगा कि आप इसे हिंदी में ही रहने दें। मैथिली करके इसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी।” - मैंने पहले तो सवाल किया की क्या मैथिली भाषा को असरदार नहीं मानते आप ? … और फिर मजाक में उनसे ये भी कहा - “आप क्यों चाहेंगे कि मैथिली में लिखूँ और नाम हो मेरा…” 

इस पर भाई संजीदा हो गए। बोले - “कई वर्षों से वार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ। भरसक पढ़ता भी हूँ मैथिली किताबें, कवि गोष्ठी और विद्यापति नाइट्स वग़ैरा में भी जाता हूँ, मुझे पता है मैथिली भाषा की औक़ात। खासकर तब जबकि आप सोशल मीडिया से हट कर किसी पुस्तक में लिखो। आप अकादमीक भाषा लिखो।” 

मैं गंभीर होकर सुनने लगा उनको और भाई बोलते रहे - “आप जब हिंदी लिखते हो तो आप उसमें अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, मैथिली, भोजपुरी… सबका समावेश करते हो। इससे लोक भाषा बनती है, लोकप्रिय शब्दों से लोग कनेक्ट करते हैं, आप मैथिली में ऐसा करके देखो ना, झंडाबरदार आपको भाषा, व्याकरण से लेकर विद्यापति तक की मार से आपका थोबड़ा सूजा देंगे…” - मैंने दफ्तर की बात कहके भाई को कहा - “देखिए ब्रो, थोबड़ा तो वैसे भी सूजेगा मेरा जब मैथिली किताब में हिंदी आलेख होगा… आप देख लीजिए कैसे सुजाना है।” 

दूसरी घटना - जैसा की मैं यूँ ही #अलरबलर लिखता हूँ, एक पोस्ट लिख दिया जिसमें लोगों के द्वारा साल भर में पुस्तक पढ़ने की बात पूछी थी। जवाब देने वाले सभी मैथिल लोग थे और आप जाकर उस पोस्ट पर देख लीजिए की उनके द्वारा पढ़े किताबों की लिस्ट में से एक-दो किताब को छोड़कर बांकी सभी पचास के करीब किताबें या तो हिंदी की हैं या फिर अंग्रेजी की। अब आप देख समझ लीजिए की मैथिल मैथिली को कितना पढ़ रहा है। कुछ ऐसे लोग जो मैथिली भाषा साहित्य के झंडाबरदार बने हैं और खुद की बादशाहत क़ायम रखना चाहते हैं उनको यह सब नहीं दिखता है, वो आँख बंद करके सब कुछ हरा-हरा देखते हैं। यदि आपने नया प्रयोग किया तो वो अपनी झूठी शान क़ायम रखने के दवाब में आपका थोबड़ा सूजा देंगे… 

तीसरी बात - अभी पटना की मैथिली अकादमी बंद कर दी गई। मेरे जैसे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कूथ-पाद कर अपनी जिम्मेवारी की इतिश्री कर ली। हालांकि इससे फैले बदबू पर कुछेक संस्थाओं ने जहाँ अब धरना करने का विचार किया है वहीं कुछ लोग सरकार द्वारा सभी भाषा के अकादमी का पुनर्गठन होने की बात कर रहे हैं। अब जबकि सरकार ने अकादमियों के पुनर्गठन की घोषणा कुछेक साल पहले ही की थी और अकादमी के बंदी पर सबसे कारगर कार्य हाई कोर्ट में सरकार के ख़िलाफ़ याचिका देने का या फिर किसी सरकारी आदमी को काला झंडा आदि दिखाने का होता…. मैथिलों के इन नौटंकियों को देखकर दया आती है मुझे। 

तक़रीबन पंद्रह-बीस साल पहले कार्यस्थल पर एक मित्र ने मुझे एक कविता सुनाई थी - “काम से डरो नहीं, काम को करो नहीं… काम का फ़िक्र करो या ना करो, फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करो…” यही हाल पटना के मैथिल संस्थाओं की है। उन्हें समाज को विरोध करते भी दिखना है और सरकार अनुदानित संस्था के पद पर कायम भी रहना है…” बेचारे !

चौथी बात - जैसा की मैं पहले कह चुका हूँ, विद्यापति जी को जाड़ा नहीं लगता सो जाड़े के मौसम में जहाँ तहाँ विद्यापति नाइट्स का आयोजन होता है। हालाँकि अब लोग नाम बदल बदल आयोजन कर रहे हैं किंतु नौटंकी वही है। मंच, पाग-डोपटा, बेमतलब के विषयों पर संगोष्ठी, फोटो सेशन… बस। किसी भी ऐसे आयोजन में आपने देखा की सरकाआर के ख़िलाफ़ या अकादमी के समर्थन में कोई एक शब्द बोल दे, कोई सेशन / सत्र इसके ख़िलाफ़ योजना बनाने को ह रख दें… नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि उनका मुख्य अतिथि ही उस सरकार से संबद्ध होता है जिसने अकादमी बंद किया है। 

आपके लिट फेस्ट या फिर अन्यान्य महोत्सवों की चर्चाओं में अनेक एक्शन पॉइंट बनते हैं। कभी किस को उसपर दुबारा बात करते, फॉलो अप लेते देखा आपने ? क्या नफा हुआ है सिवाय लोगों के मिलने जुलने, ब्यूटी पार्लर और कुर्ता बंडी पर खर्च करने के ? 

पाँचवी बात - आज फिर से ललित झा अपने चैनल मिथिला मिरर को लेकर मैथिल भाइयों को इमोशनल करते हुए कह रहे हैं - “मुझे मत बचाइए… आप तय करिए कि मैथिली के लिए कम करते मिथिला मिहिर को बचाना है या नहीं…?” - मैंने उनके लाइव सत्र में कमेंट किया भी की मुझे मिथिला मिरर से कोई मतलब नहीं, हाँ, ललित झा से मतलब है सो आपको कोई मदद चाहिए तो कहें, हम करेंगे। दरअसल सच यही है, आपके मैथिली से कोई लेना देना नहीं है मिथिला को, और यह बात मैंने अनुज ललित को संभवत: पाँच-छह साल पहले कही थी। हिंदी में काम करने को कहा था… अपना कैरीअर संवारने को कहा था…मैथिल और मिथिला ना तो रोटी देता है और नहीं ही मैथिली भाषा साहित्य को इन लोगों ने समृद्ध होने दिया कि इसमें व्यावसायिकता आए… मान लो इस बात को ! 

तो भाइयों शुरू हो जायें… टोटके करें मुझ पर… बाण चलायें मुझ पर…ज्ञान वर्षा करें मुझे पर, वो ज्ञान जिसको लेकर आप कुछ उखाड़ नहीं पा रहे। मेरा क्या हैं, इतना झेल चुका हूँ, थोड़ा और झेल लूँगा…

#मिथिला #मैथिली


Sunday, 21 December 2025

एलियट साहब - मद्रास और दरभंगा

अभी पिछले दिनों जब मद्रास में था तो ड्राइवर ने कहा - “ये एलियट बीच है सार (सर)” - उस वक्त मानसिक व्यस्तता की वजह से मैंने ध्यान नहीं दिया। आजकल अनिंद्रा से पीड़ित हूँ सो सुबह तीन बजे इस Edward Francis Elliot जी की पड़ताल करने लगा। वो उन्नीसवीं सदी में पहले चीफ मजिस्ट्रेट और फिर बाद में सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस रह चुके थे मद्रास के। उनके पिता श्री ह्यू एलियट साहब १८१४ से १८२० के दौरान गवर्नर भी रह चुके थे मद्रास के।

अपने एलियट साहब अमीरज़ादे थे, पढ़े लिखे और बड़े आदमी भी। उनकी एक प्रेमिका हुई Isabella Napier जो संयोगवश Johnstone Napier की पत्नी भी थीं। करीब १९३० के वक्त यह हाई प्रोफाइल प्रेम प्रसंग बहुचर्चित रहा और अपने एलियट साहब ने इसाबेला के साथ विवाह करके इतिहास रच दिया। कहते हैं यह बीच उन्होंने इसाबेला के लिए बनवाया था।

जैसा की लोगों का आरोप है मैं हर बात में मिथिला और दरभंगा को खींच लाता हूँ, मेरा इलेक्ट्रॉनिक संजाल भी मुझ सा ही हो चुका है। इस पड़ताल के क्रम में मुझे एक दूसरे एलियट साहब का पता चला जो मिथिला अर्थात् दरभंगा से जुड़े हैं।

ये Elliot Macnotton साहब उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी हुए। इलियट साहब एक अच्छे प्रशासक, शिक्षाविद और मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते थे, लाजिमी है ब्रिटिश साम्राज्य के करीबी भी रहे।

उसी काल खंड में दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत उनके उत्तराधिकारी बने श्रीमान लक्ष्मेश्वर सिंह। चूँकि लक्ष्मेश्वर सिंह जी उस वक्त अल्पवयस्क थे, उस वक्त के क़ानून के मुताबिक़ उनकी राजसत्ता कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स के अधीन कर दी गई। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत एक यूरोपीय संरक्षक और शिक्षक की नियुक्ति की जाती थी, संयोगवश इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए एलियट मैकनॉटन को चुना गया।

संरक्षक और शिक्षक के रूप में एलियट मैकनॉटन का प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक रहा। वे युवराज के निकट रहते थे और उनकी शिक्षा, अनुशासन तथा नैतिक विकास की देखरेख भी करते थे। उनका दायित्व केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि एक भावी शासक के व्यक्तित्व निर्माण तक विस्तृत था। लक्ष्मेश्वर सिंह को जहाँ अंग्रेज़ी शिक्षा, विधि, अर्थशास्त्र और आधुनिक प्रशासन की समझ दी गई वहीं उनके अंदर सार्वजनिक दायित्व और उत्तरदायी शासन की भावना भी विकसित की गई।

एलियट मैकनॉटन को अन्य औपनिवेशिक शिक्षकों से अलग करने वाली बात यह थी कि वे स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान रखते थे। एक अंग्रेजी प्रशासक के अधिकारी होने के बावजूद कभी भी उन्होंने मैथिली परंपराओं या संस्कृत अध्ययन को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। उनके समय में पारंपरिक विद्वानों को युवराज को शिक्षा देने की अनुमति दी गई और पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ देशज परंपराओं को भी संरक्षित रखा गया।

आधुनिक ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता के इस संतुलन ने लक्ष्मेश्वर सिंह के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। इस शिक्षण और मार्गदर्शन का प्रभाव तब स्पष्ट हुआ जब महाराजा ने दरभंगा राज का दायित्व संभाला। लक्ष्मेश्वर सिंह अपने समय के सबसे प्रगतिशील ज़मींदारों में गिने जाने लगे। वे अपनी उदार दानशीलता, शिक्षा के प्रति समर्थन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अकाल राहत और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण के लिए व्यापक रूप से सम्मानित हुए। इतिहासकार मानते हैं कि उनकी सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण उनके निर्माणकाल में एलियट मैकनॉटन के सान्निध्य का ही परिणाम था।

सो ये थे एलियट साहब !

(तस्वीर एलियट इसाबेला बीच की है।)

राजकमल चौधरी : साहित्य परिचय और विद्यापति से तुलना

मैथिली साहित्य का इतिहास केवल परंपरा-संरक्षण का इतिहास नहीं है, बल्कि वह परंपरा से टकराकर नई चेतना के निर्माण का भी इतिहास है। इस संदर्भ में जहाँ एक ओर विद्यापति मैथिली साहित्य के शास्त्रीय और सांस्कृतिक आधार-स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हैं, वहीं दूसरी ओर राजकमल चौधरी आधुनिक मैथिली चेतना के सबसे निर्भीक, प्रयोगधर्मी और विवादास्पद प्रतिनिधि के रूप में उभरते हैं।

यदि विद्यापति मैथिली कविता की गेय और रसात्मक आत्मा हैं, तो राजकमल चौधरी उसकी आधुनिक बेचैनी, प्रश्न करने की आकुलता और आत्मसंघर्ष का स्वर हैं। इन दोनों ध्रुवों के बीच मैथिली साहित्य की निरंतरता और विकास की धारा प्रवाहित होती रही है।


राजकमल का जीवन संघर्ष और व्यक्तित्व
राजकमल चौधरी का जन्म सन् 1929 ई॰ में हुआ और उनकी मृत्यु 1967 ई॰ में अल्पायु में ही हो गई। उनका जीवन निरंतर आर्थिक अभाव, जीवन यापन के संसाधनों में अस्थिरता, मानसिक तनाव और सामाजिक उपेक्षा से ग्रस्त रहा। स्थायी जीविका के अभाव और साहित्यिक अस्वीकृति ने स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक चेतना पर गहरा प्रभाव डाला। उनके कड़वे जीवनानुभवों ने उनके साहित्य को कल्पनात्मक नहीं बल्कि अनुभवात्मक बनाया। राजकमल चौधरी की रचनाएँ वस्तुतः उनके जीवन-संघर्ष का प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं।

रचना-दृष्टि और लेखन का स्वर
राजकमल चौधरी साहित्य को सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि सत्य का साक्ष्य मानते हैं। उनके लेखन का स्वर मूलतः प्रश्नाकुल, असहज और प्रतिरोधी है। उनकी रचनाओं में भूख, बेरोज़गारी, अकेलापन, यौन-कुंठा और सामाजिक पाखंड जैसे विषयों की मुखरता रही। साथ ही यह विषय मैथिली साहित्य में पहली बार स्पष्ट, निर्भीक और अनावृत रूप में उपस्थित हुए। उनकी कविता पाठक को सांत्वना नहीं देती, बल्कि उसकी चेतना को झकझोरती है।

रचनाओं में देह-बोध और स्त्री-चेतना
राजकमल चौधरी के लेखन का सबसे अधिक विवादास्पद पक्ष उनका देह-बोध है। वे देह को पाप नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। उनकी कविता में स्त्री आदर्श नहीं है और कोई प्रतीक भी नहीं है बल्कि उनके हिसाब से स्त्री पीड़ित, अकेली, संघर्षशील और सचेत जीव है। यही वजह है कि उनकी रचनाओं पर “अश्लीलता” का आरोप लगाया गया। किंतु आधुनिक आलोचना इस देह-बोध को नैतिक पाखंड, सामाजिक दंभ और पुरुषसत्तात्मक दृष्टि के उद्घाटन के रूप में देखती है।

राजकमल चौधरी की अनेक कविताएँ किसी एक शीर्षक के कारण नहीं, बल्कि उनके समूचे काव्य-स्वर के कारण विवादित रहीं। उनकी रचनाओं में चुंबन, स्पर्श, देह की थकान, यौन-कुंठा और शारीरिक अकेलेपन जैसे अनुभवों का प्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है। उस समय मैथिली साहित्य में इस प्रकार की भाषा और विषय-वस्तु असाधारण मानी जाती थी। हालांकि उनकी रचनाओं का यह देह-बोध दरअसल मनुष्य की अपूर्णता, असंतोष और सामाजिक दबावों की अभिव्यक्ति है, न कि केवल कामुकता। 

तुलनात्मकता से उपजता विवाद 
राजकमल चौधरी को कई बार मैथिली का धूमिल या फिर मैथिली का दुष्यंत कुमार कहा गया। इस तुलना ने पारंपरिक विद्वानों में असंतोष उत्पन्न किया, क्योंकि वे राजकमल को विद्यापति परंपरा से विच्छिन्न मानते थे। वस्तुतः यह विवाद इस प्रश्न से जुड़ा था कि क्या मैथिली साहित्य केवल सौंदर्य और भक्ति तक सीमित रहेगा या फिर वह आधुनिक सामाजिक यथार्थ से भी संवाद करेगा। 

राजकमल चौधरी का विवाद उनके साहित्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी साहसिक आधुनिकता का प्रमाण है। उन्होंने मैथिली कविता को वह सारे विषय दिए, जिनसे समाज कतराता था और इसी कारण राजकमल आज भी प्रासंगिक हैं।

राजकमल चौधरी पर समय-समय पर अश्लीलता, संस्कृतिविरोध और विद्यापति-परंपरा से विचलन के आरोप लगाए गए। उनकी कविताओं का मंचीय निषेध और पत्रिकागत आलोचना इस विरोध के प्रमाण हैं। हालांकि यह समूचा विवाद परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष का परिणाम था न कि उनकी रचनात्मक दुर्बलता का।

राजकमल की प्रमुख रचनाओं का विश्लेषण 

|| स्वरगंधा : देह और स्त्री-स्वातंत्र्य का प्रश्न ||

विवाद का कारण - काव्य-संग्रह स्वरगंधा राजकमल चौधरी की सबसे अधिक विवादित कृतियों में गिना जाता है। इस संग्रह में स्त्री-देह का प्रत्यक्ष चित्रण, कामना, अकेलापन और अधूरी तृप्ति जैसे अनुभवों को किसी भी प्रकार के नैतिक आवरण या सांस्कृतिक अलंकरण के बिना प्रस्तुत किया गया है। उस समय के मैथिली साहित्य में इस प्रकार की निर्भीक अभिव्यक्ति अभूतपूर्व थी।

तत्कालीन प्रतिक्रिया - पारंपरिक आलोचकों ने इस कृति को अश्लील करार दिया। मैथिली समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे “संस्कृति-विरोधी” और “नैतिक मर्यादा का उल्लंघन” माना। विशेष रूप से यह आरोप लगाया गया कि राजकमल स्त्री-देह को अनावश्यक रूप से कविता का विषय बना रहे हैं। 

वास्तविक अर्थ - आधुनिक आलोचना के अनुसार स्वरगंधा की कविता कामुकता का उत्सव नहीं है, बल्कि वह स्त्री की अस्मिता, उसकी देह पर समाज के नियंत्रण और पुरुष-सत्तात्मक नैतिकता की तीखी आलोचना है। यह कृति स्त्री को वस्तु नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना वाले मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती है।

|| बहुत रास बाकी है : सामाजिक पाखंड पर करारा व्यंग्य ||

विवाद का कारण - इस काव्य-संग्रह में राजकमल चौधरी ने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का विघटन किया है। ‘रास’ जैसे पवित्र और भक्तिपरक माने जाने वाले शब्द का उन्होंने व्यंग्यात्मक प्रयोग किया, जिससे परंपरागत पाठकों को गहरा असंतोष हुआ।

समझ और प्रतिक्रिया - इस रचना पर धर्म के अपमान और आस्था-विरोध के आरोप लगाए गए। यह कहा गया कि कवि ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया है। 

वास्तविक अर्थ - वास्तव में राजकमल यह इंगित करते हैं कि समाज में धार्मिक अनुष्ठानों और प्रतीकों का प्रदर्शन तो बहुत है, परंतु सत्य, प्रेम, करुणा और न्याय जैसे मूल मानवीय मूल्य अधूरे पड़े हैं। “रास” यहाँ एक व्यवस्थागत ढोंग का प्रतीक बन जाता है।

|| आत्महत्या के विरुद्ध : व्यवस्था के विरुद्ध अभियोग ||

विवाद का कारण - इस कविता में आत्महत्या को एक व्यक्तिगत कमजोरी न मानकर सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम बताया गया है। भूख, बेरोज़गारी, अपमान और व्यवस्था की असंवेदनशीलता को आत्महत्या के मूल कारणों के रूप में रेखांकित किया गया है।

समझ और प्रतिक्रिया - कुछ पाठकों और आलोचकों ने इसे आत्महत्या के समर्थन के रूप में गलत ढंग से व्याख्यायित किया, जिससे कविता को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा हुआ।

वास्तविक अर्थ - इस रचना का उद्देश्य आत्महत्या का महिमामंडन नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना है जो मनुष्य को इस हद तक तोड़ देती है कि उसे जीवन से पलायन का मार्ग चुनना पड़ता है। यह कविता व्यक्ति नहीं, प्रणाली को अभियुक्त बनाती है। 

विद्यापति और राजकमल : तुलनात्मक दृष्टि

"मैथिली साहित्य का विकास दो प्रमुख ध्रुवों के इर्द-गिर्द समझा जा सकता है। एक ओर विद्यापति, जो मध्यकालीन मैथिली कविता के सर्वोच्च शिखर माने जाते हैं तो दूसरी ओर राजकमल चौधरी, जो आधुनिक मैथिली साहित्य की सबसे प्रखर, चुनौतीपूर्ण और विवादास्पद चेतना हैं। यह तुलना किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं है, बल्कि युग-बोध, काव्य-दृष्टि और साहित्यिक प्रयोजन को समझने का उपक्रम है। विद्यापति मैथिली कविता की जड़ हैं, जबकि राजकमल चौधरी उसकी आधुनिक शाखा और विस्तार।"

ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ
विद्यापति चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी के कवि हैं। उनका समय सामंती, दरबारी और धार्मिक संरचनाओं से जुड़ा हुआ था। राजाश्रय, भक्ति-संस्कृति और सामूहिक चेतना उनके साहित्य की पृष्ठभूमि है। उस समय का समाज अपेक्षाकृत स्थिर और आस्था-प्रधान था।

इसके विपरीत, राजकमल चौधरी बीसवीं शताब्दी के उत्तर-औपनिवेशिक भारत के कवि हैं। उनका समय बेरोज़गारी, शहरीकरण, सामाजिक विघटन और व्यक्ति की आंतरिक असुरक्षा से ग्रस्त है। उन्हें किसी प्रकार का राजाश्रय प्राप्त नहीं था। उनका साहित्य संकटग्रस्त, प्रश्नाकुल और आत्मसंघर्ष से भरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है।

काव्य-दृष्टि और साहित्यिक उद्देश्य
विद्यापति की कविता का मूल उद्देश्य रसोत्पत्ति और सौंदर्यबोध है। उनकी कविता पाठक को आनंद, माधुर्य और भावात्मक तृप्ति प्रदान करती है। प्रेम और भक्ति उनके काव्य के केंद्रीय तत्व हैं।

राजकमल चौधरी की कविता का उद्देश्य सत्य का अनावरण और यथार्थ का उद्घाटन है। उनकी कविता आनंद नहीं देती, बल्कि पाठक को असहज करती है, प्रश्नों के सामने खड़ा करती है और सामाजिक ढोंग को उजागर करती है। उनकी काव्य-दृष्टि प्रतिरोधात्मक और वैचारिक है।

नारी-दृष्टि - देह और कामना की अभिव्यक्ति 
विद्यापति की नारी-छवि मुख्यतः राधा-केंद्रित है। वह कोमल, लज्जाशील और प्रेम में रमी हुई आदर्श नायिका है। नारी उनके यहाँ प्रेम और भक्ति की प्रतीक बनकर आती है। राजकमल चौधरी के यहाँ स्त्री किसी आदर्श की मूर्ति नहीं है। वह एक वास्तविक मनुष्य है जो पीड़ित है, अकेली है, संघर्षशील और सामाजिक शोषण से जूझती हुई है। राजकमल की स्त्री आधुनिक यथार्थ की साक्षी है, न कि सौंदर्य का अलंकार।

विद्यापति के काव्य में देह और कामना का चित्रण संकेतात्मक और मर्यादित है। वहाँ शृंगार रस आध्यात्मिक ऊँचाई की ओर ले जाता है और कामना भक्ति में रूपांतरित हो जाती है। राजकमल चौधरी के यहाँ देह का चित्रण प्रत्यक्ष और अनावृत है। उनके लिए देह पाप नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की सच्चाई है। कामना उनके काव्य में सौंदर्य नहीं, बल्कि अस्तित्वगत पीड़ा और सामाजिक दबाव का रूप ले लेती है। इसी कारण उनका लेखन विवादास्पद भी बना।

भाषा और शिल्प
विद्यापति की भाषा लयात्मक, संगीतात्मक और गेय है। उनकी पद-परंपरा लोक और शास्त्र का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। उनके पद आज भी गाए जाते हैं। राजकमल चौधरी की भाषा खुरदरी, तीखी और मुक्त छंद में ढली हुई है। उनकी कविता गाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने और झेलने के लिए है। शहरी बिंब, टूटे वाक्य और वैचारिक दबाव उनके शिल्प की पहचान हैं।

धर्म और आस्था
विद्यापति के साहित्य में ईश्वर की सन्निधि स्पष्ट रूप से उपस्थित है। भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक समर्पण उनके काव्य का आधार है। राजकमल चौधरी के यहाँ ईश्वर मौन है। वे आस्था को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उस पर प्रश्न उठाते हैं। उनका साहित्य विश्वास से अधिक संदेह और टूटन का साहित्य है।

स्वीकृति
विद्यापति अपने समय में भी और बाद में भी व्यापक रूप से स्वीकृत रहे। वे परंपरा के स्वाभाविक वाहक माने गए। राजकमल चौधरी अपने जीवनकाल में तीव्र विवादों से घिरे रहे। उन पर अश्लीलता और संस्कृतिविरोध के आरोप लगे। किंतु मरणोपरांत उनका पुनर्मूल्यांकन हुआ और आज उन्हें आधुनिक मैथिली साहित्य का अनिवार्य स्तंभ माना जाता है।

साहित्यिक योगदान
विद्यापति ने मैथिली भाषा को साहित्यिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया। उन्होंने मैथिली को लोक से शास्त्र तक पहुँचाया। राजकमल चौधरी ने मैथिली को आधुनिक चेतना, वैचारिक साहस और यथार्थ की तीक्ष्ण दृष्टि दी। उन्होंने भाषा को समय से संवाद करना सिखाया।

तुलना का सारांश
विद्यापति और राजकमल चौधरी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। विद्यापति के बिना मैथिली साहित्य की जड़ नहीं समझी जा सकती और राजकमल चौधरी के बिना उसकी आधुनिक पहचान अधूरी रहती है।

विद्यापति ने मैथिली को स्वर दिया, राजकमल चौधरी ने उसी मैथिली को विवेक दिया। यही परंपरा और आधुनिकता का सजीव संवाद है। विद्यापति मध्यकालीन सामंती समाज के कवि हैं, जहाँ सामूहिक चेतना, भक्ति और शृंगार जीवन के केंद्र में हैं। इसके विपरीत, राजकमल चौधरी आधुनिक संकटग्रस्त समाज के कवि हैं, जहाँ व्यक्ति अकेला, असुरक्षित और प्रश्नाकुल है। विद्यापति रस और सौंदर्य के कवि हैं, जबकि राजकमल प्रश्न, प्रतिरोध और यथार्थ के।

विद्यापति ने मैथिली साहित्य को काव्यात्मक और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया, जबकि राजकमल चौधरी ने उसे आधुनिक चेतना, आत्मसंघर्ष और वैचारिक तीक्ष्णता दी। मैथिली साहित्य इन दोनों ध्रुवों के बीच निरंतर प्रवाहित होता रहा है। विद्यापति ने जिस मैथिली को गाया, राजकमल चौधरी ने उसी मैथिली से सवाल पूछे और यही प्रश्न करने की आकुलता मैथिली साहित्य की आधुनिक जीवंतता है।

____________
Praveen Kumar 
praveenfnp@gmail.com || +91-9643208300
13 December 2025 || Mumbai 

Wednesday, 26 November 2025

स्वयं को साबित करने की पीड़ा का अंत

हमारे आपके जीवन की बहुत-सी पीड़ाएँ गूँगी होती हैं। वो चीख नहीं सकतीं। वो चुपचाप हमारे भीतर जन्म लेती है और कोई कोना पकड़ कर बैठी होती हैं। ऐसी ही एक पीड़ा है हमारे अंदर मौजूद सम्मान, सराहना और लोगों द्वारा हमें समझ लेने की अपेक्षा ! हम अक्सर हमारे ही दिल में यह इच्छा लिए चलते हैं कि लोग हमें समझें, हमारी कद्र करें, हमारे प्रयासों को पहचानें… वो हमारे अस्तित्व को महत्व दें और फिर जब भी ऐसा नहीं होता तो हमारे मन को लगता है मानो कुछ छिन गया…खिन्न होकर अपने जीवन तक धिक्कारने लगते हैं। जबकि असल में हमसे कुछ भी नहीं छिनता, हाँ, बस हमारी अपेक्षाएँ ही टूटती हैं।


सच्चाई यह है कि दुनिया हमें हमारी नज़रों से नहीं देखती। हर इंसान हमें अपने अनुभवों, अपनी सीमाओं और अपनी कमियों की आँखों से देखता है। इसलिए दूसरों से पूर्ण समझ की अपेक्षा रखना खुद को दुःख देने जैसा है और फिर ऐसे में ही हमारे अंदर जन्म लेती है खुद को साबित करने की इच्छा। हम यह साबित करना चाहते हैं कि हम सही हैं, हम सक्षम हैं, हम योग्य हैं, हम महत्वपूर्ण हैं।

ऐसे में हम ऐसी लड़ाइयाँ लड़ने लगते हैं जिनकी कोई ज़रूरत ही नहीं होती। हम अपने काम को अपनी तरक्की के लिए नहीं बल्कि स्वयं को प्रमाणित करने के लिए करने लगते हैं… धीरे-धीरे हम स्वयं का जीवन जीना भूलकर दुनिया के सामने प्रदर्शन करने लगते हैं, करतब करने लगते हैं, हम दौड़ने भागने लगते हैं। 


हाँ, जब हम ठहरते हैं, विलमकर थोड़ा सोचते हैं, लंबी साँस लेते हैं और अपने ही अंदर झाँकते हैं, तो एक गहरी सच्चाई जो हमारे सामने आती है वो है - जो वास्तविक है, उसे किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं। जो मूल्यवान है, वह अंधेरे में भी चमकता है, चुप रहकर भी सब कह जाता है वो और इन सबसे ऊपर ये की दुनियाँ की कोई भी ताक़त हमसे ईश्वर प्रदत्त सम्मान छीन नहीं सकती।


सम्मान जब बिना माँगे मिलता है तो वह सबसे मधुर होता है। स्नेह जब स्वाभाविक होता है तो वह सबसे पवित्र होता है और पहचान जब स्वयं चलकर आती है तो वह सबसे स्थायी होती है। जब हम बाह्य मान्यताओं की प्यास छोड़ देते हैं तब हम एक अपनी ही भूली हुई आवाज़ सुन पाते है। हमारी अपनी आवाज़। जो कहती है - “तुम पर्याप्त हो। तुम्हें किसी सबूत की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी यात्रा पवित्र है, चाहे दुनिया इसे देखे या नहीं।”


जिस दिन हम दूसरों को साबित करना छोड़ देते हैं, उसी दिन हम खुद को पहचानना शुरू करते हैं और जब आत्मबोध आता है, तो दूसरों के विचारों की शक्ति हम पर से स्वयं ही समाप्त हो जाती है। इसी मौन, इसी स्वतंत्रता में हमारे आत्मा की असली गरिमा जन्म लेती है जो हमारे अंदर जन्म लिए पीड़ा को समाप्त करने की शक्ति रखती है।