मुझे लगता है ये हर जगह और समाज में होता होगा जब आप व्यक्ति के साथ रहते उसका महत्व नहीं समझते. उस वक़्त उनकी कहीं बातों का सामान्यीकरण करते हुए सब औसत सा मान लेते हैं हमलोग. संभवतः यह एक मानवीय गुण है और इस बात का सबूत भी कि हम सब ईश्वर नहीं. …और बाद में जब हम उस व्यक्ति को खो देते हैं तो उनकी कहीं वही बातें असामान्य, व्यावहारिक और अमूल्य सिद्ध होने लगती हैं हमारे सामने.
बाबूजी जब कहते की - “आदमी को अभिव्यक्ति से अधिक मनन करना चाहिए” - तो उस वक़्त हम इस बात का महत्व नहीं समझते थे. अब अचानक से ऐसा अनुभव हो रहा कि इस मनन के प्रयास में मैं निर्णय लेने में थोड़ी देरी करने लगा हूँ. मैं बोलते बोलते चुप हो जा रहा हूँ. हालाँकि मेरे इस बदलाव से मेरे आस पास के लोग नाराज और फ्रस्ट्रेटेड होने लगे हैं किंतु मैं उनकी परवाह किए बग़ैर चीज़ों को नापने जोखने में लगा होता हूँ. …और इस क्रम में जब मैं निर्णय लेने की स्थिति में होता हूँ तो मैं अकेला होता हूँ और सामने वाला मेरे पास नहीं होता. सम्भवतः वो मुझे बीमार समझ कर आगे निकल जाता है. ऐसे में कई बार मेरा अंतर्मन कहता है कि मैं इन्हें कह दूँ - “मैं मेरे पिता के बारे में ऐसा सोचने का अपराध कर चुका हूँ…मत दुहराओ ना...” - नहीं बता पाता हूँ.
निर्णय की बात पर बाबूजी की कही एक और बात याद आई जब वो कहते - “कोई भी कर्म करते या फिर महत्वपूर्ण निर्णय लेते हमें एक बार अपने कुल, ख़ानदान और ग्राम देवता को अवश्य याद करना चाहिए. ऐसा करते आप अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं और आपका यह जुड़ाव आपको अपने सामाजिक दायरे में बाँधे रखने का काम करते है जो अंततः आपके निर्णय और कर्म को ऊँचाई देने में मददगार होते हैं.
मेरे और बाबूजी के बीच कई बार ऐसे कॉन्फ्लिक्ट हुए जब मैंने उन्हें कहा होगा की बाबूजी आपको ऐसा नहीं, बल्कि ऐसा करना चाहिए. ऐसे समय में वो कुछ जवाब नहीं देते बस अपना काम करते जाते. बीते कुछ महीनों में कई बार ऐसा हुआ जब ऐसी परिस्थितियां बनी की मैंने वही किया जिसके लिए कभी बाबूजी को मना किया था और ऐसा करते वो सब जवाब जो उन्होंने उस वक़्त नहीं दिए, चुपचाप मिलते रहे मुझे.
मेरी इन बदलती आदतों की सबसे नज़दीकी विश्लेषक और भुक्तभोगी मेरी पत्नी रही हैं. बीते दिनों उनके मुख से कई बार सुन चुका हूँ - “बाबूजी वाली आदतें आ गई हैं तुममें” - और अपनी पत्नी के ऐसा कहने पर मैं जवाब नहीं देता बल्कि मनन करने लगता हूँ अब. मनन करते मुझे कई बार यह अनुभव होता है कि मेरे चेहरे का भाव ठीक बाबूजी सा हो गया है. मेरी भंगिमायें बाबूजी की कॉपी कर रही हैं. मैं उनकी तरह खड़ा या बैठा हूँ. मेरा फेसिअल एक्सप्रेशन उनके ही जैसा होकर रुका हुआ है. कई बार बंद आँखों के साथ झूलते अपने अंगूठों को पकड़ते याद आता है कि ऐसा तो बाबूजी करते थे.
मैं पहले से रेस्टलेस रहा हूँ. बाबूजी रेस्टलेस तो नहीं थे किंतु वो स्थिर नहीं हुए कभी. सदा गतियमान, चलते हुए और एक स्टेट को मेंटेन नहीं करने वाले रहे. मैं और मेरे साथ मेरी पत्नी भी अब ये महसूस कर रही हैं कि मैं भी वैसा हो गया हूँ. मुझे रुकना बेचैन करता है. उनकी ही तरह मुझे आराम चुभता है और ख़ुद को परेशान करने के नए बहाने ढूँढने लगता है मेरा मन. मुझे लगता है कि ये सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी जिम्मेवारी है, मैं ही सब कंट्रोल करूँ, दुनियाँ में जो हो मेरे हिसाब से हो, मुझे बता कर हो… मैं ही सबके बुरे को अच्छा करने की जिम्मेवारी लूँ और तो और, ऐसा करते सब मेरी तरह ही बेचैन भी रहें. यहाँ “बेचैन” बेहतर मैथिली का शब्द “चैंक" में रहना बेहतर है शायद जो मैं अक्सर पत्नी से कहता हूँ - “अहाँ के चैंक नै रहय या या कोनो बातक”
बाबूजी समय के पाबंद थे। इतने अधिक पाबंद की कई बार नियत समय पर स्टाफ के नहीं पहुँचने पर अकेले ही ऑप्टिकल फाइबर फाल्ट करेक्शन को निकल लेते. मैं इसपर कुछ कहूँ इससे बेहतर कोई मेरी इस आदत के बारे में मेरी पत्नी से पूछ ले की वो कितना झेलती है मेरी इस आदत की वजह से. मैं कम पढ़ा आदमी हूँ. बाबूजी की तरह तेज तर्रार तो दूर, इंजीनियर भी नहीं हो सका. लोग कहते हैं मैं सफल हूँ जिसे अपने पिता के क़द के हिसाब से नकारता हूँ मैं. किंतु हाँ, जीवन में आज तक जो कुछ भी अर्जित किया वो उनके ही दिए दो मंत्र 'अनुशासन' और 'ईमानदारी' से पाया. हालाँकि मेरे कार्यस्थल के साथी सह मेरे परिवार के लोग इससे परेशान होते हैं किंतु मैं आमरण इसपर क़ायम रहना चाहता हूँ.
मेरे पिता अपनी उँगलियों पर अक्सर कुछ गिनती सा करते रहते. मैंने एकबार पूछकर स्पष्ट किया - वो मनन करते, कोई प्लानिंग करते या फिर जाप करते ऐसा करते - पिछले कुछ हफ़्तों में श्रेया ने कई बार मुझे बताया की मैं भी ऐसा करने लगा हूँ... कई बार तो ऐसा करते मैं ख़ुद अपने हाथ को रोकने लगता हूँ कि अरे ये तो पिताजी की तरह कर रहा हूँ मैं. मैं अक्सर श्रेया के दरवाज़े को नॉक कर उससे पूछता रहता हूँ - “कैसी हो, क्या कर रही हो, ख़ुश हो ना” - और ऐसा करते वो मुझे याद दिलाती है कि पापा आपको याद है बाबा भी ऐसा ही करते थे ? बाबूजी हर थोड़ी देर पर बच्चों को पूछते. सब बच्चे जो उस वक़्त इससे परेशान होते आज बाबूजी को याद करते उनकी आँखों में आँसू देखता हूँ मैं... श्रेया और बाबूजी को लेकर मैं वो बात कभी नहीं भूल पाऊँगा जब फ्लाइट में उसे चुप करवाने को सारी एयर होस्टेस लगी रहीं... श्रेया रोती रही - बाबाs
आगे की प्लानिंग अनवरत जारी रखने के क्रम में सोचते हुए मैं अक्सर कई स्टेप आगे निकल जाता हूँ. बाबूजी ने इसे शतरंज के खेल के हिसाब से बताया था कि जीतता वही है जो आगे की चाल सोच पाता है. हालांकि ऐसा करते मेरा मेरे करीबियों से तब विवाद होता है जब मैं दो-चार स्टेप आगे को देखकर अपना निर्णय सुनाता हूँ और लोग इसे सीरियसली ना लेते हुए मुझे पागल तक समझते हैं. मुझे कई बार ऐसा अनुभव होता है कि लोग परवाह नहीं करते मेरे ऐसा कहने करने का. यही वो पल होता है जब मैं फ्रस्ट्रेटेड होकर गुस्सा करते अपना आपा खो कर बाबूजी के सामने ख़ुद को बौना साबित कर देता हूँ... मेरे हिस्से का धैर्य भी आपमें ही क्यों था बाबूजी ?
बाबूजी कहते - "मर्द वही है जो दर्द पी सके, जिसमें धैर्य हो, जो अपनी प्रतिक्रिया को होल्ड कर सके, जो जिसका एप्रोच सबों के लिए एक समान हो, जो समग्रता में सोचे और जो दु:ख-सुख दोनों ही घड़ियों में एकसमान व्यवहार करे" - मैं ऐसा कभी नहीं हो सकता लेकिन मुझे लगता है मैं प्रयासरत हूँ. हालाँकि ऐसा करते मैंने बाबूजी को अपना बहुत कुछ गँवाते देखा है किंतु संभवतः वो जहाँ हैं वहाँ से ही शनैः शनैः मुझे ऐसा करने की शक्ति दे रहे हैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ मैं... इस क्रम में प्रतिदिन सुबह उठते और सोने से पहले “त्यागने” और “हर परिस्थिति में समभाव” बनाए। रहने के अभ्यास पर हूँ मैं इन दिनों.
एक और आदत जो बाबूजी की देन होती जा रही है वो है उनका कम बोलना और यह मान लेना की परिस्थिति और उनका भाव देख लोग उनके मन की बात बिना कहे ही समझ लें... यह बहुत खतरनाक है किंतु इस खतरनाक होने का प्रतिशत दिनानुदिन बढ़ रहा है मेरे अंदर ऐसा महसूस कर रहा हूँ मैं...
कार्यस्थल पर मेरा अनुभव बाबूजी से अलग रहा है. अपने जीवन में उनसे अधिक दुनियाँ देख ली ऐसा तो नहीं कहूँगा किंतु उनसे अधिक झेला हूँ यह सत्य भी झुठला नहीं सकता मैं. हाँ, इसकी अलग अलग कई वजहें हैं किंतु निर्विवाद रूप से अपने बाबूजी सा पिता खोना सबसे बड़ी वजह है. यहाँ अफ़सोस ये कि इतना अधिक झेल कर भी अब तक उनके जैसा भाई, पति और अभिभावक नहीं बन पाया हूँ फिर सामाजिक जिम्मेवारियों की तो बात ही बेमानी है. आशा है बाबूजी मेरे प्रयासों को संबल देते रहेंगे. जहाँ हैं वहीं से मुझ पर वैसा ही भरोसा क़ायम रखेंगे जैसा भरोसा अपने होने पर वो किसी भी परिस्थिति में जताते हुए कहते - “अरे कोनो चिंता कs बात नै छै, प्रवीण के कहि दय छी हम सबटा ठीक भs जेतैक !”





