Tuesday, 2 June 2026

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : चन्द्रमणि झा

वर्तमान भारतीय राजनीति मेँ नरेंद्र मोदी एहन व्यक्तित्वक रूप मेँ स्थापित छथि जिनकर पक्ष आ विपक्ष दुनूमेँ तीव्र मतभेद देखबाक लेल भेटैत अछि। एहन समय मेँ The Leader Narendra D. Modi जेकाँ पुस्तक मात्र एक व्यक्तिक जीवनी बनिकऽ नहि रहि जाइत अछि, बल्कि समकालीन भारतक राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक यात्राक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सेहो बनि जाइत अछि। एहि पुस्तकमेँ नरेंद्र मोदीक नेतृत्व, कार्यशैली आ राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोणकेँ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करबाक प्रयास कएल गेल अछि।

एहि पुस्तकक लेखक आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगतक प्रतिष्ठित गीतकार आ सांस्कृतिक चेतनाक सशक्त हस्ताक्षर छथि। हुनकर साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तकक प्रत्येक अध्यायमेँ स्पष्ट रूपसँ देखाइत अछि। लेखक तथ्य आ घटनाकेँ केवल सूचनात्मक रूपमेँ नहि रखने छथि, बल्कि तकरा भावात्मक आ प्रेरणादायक स्वर सेहो देने छथि। एहि कारणेँ पुस्तक राजनीतिक विश्लेषणक संग-संग साहित्यिक पठनीयता सेहो बनौने रखैत अछि।

पुस्तकक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्वकेँ केवल राजनीतिक उपलब्धिसभ धरि सीमित नहि रखने छथि, बल्कि हुनकर संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता आ जनसंपर्क कौशलकेँ सेहो रेखांकित केने छथि। एक सामान्य पृष्ठभूमिसँ निकलि देशक सर्वोच्च राजनीतिक पद धरि पहुँचबाक यात्राकेँ लेखक प्रेरणादायक आख्यानक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि।

भाषाक दृष्टिसँ पुस्तक सरल आ प्रवाहपूर्ण अछि। घटनासभक क्रमबद्ध विन्यास आ सहज प्रस्तुति एकरा सामान्य पाठकसँ लऽ कऽ राजनीति आ समाजशास्त्रक अध्येतासभ धरि लेल उपयोगी बनबैत अछि। यद्यपि, एक समीक्षकक रूपमेँ ई कहब उचित होयत जे पुस्तकमेँ मोदीजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक सकारात्मक पक्षकेँ अपेक्षाकृत बेसी स्थान भेटल अछि। यदि आलोचनात्मक विमर्श आ वैकल्पिक दृष्टिकोणकेँ सेहो किछु बेसी विस्तार देल जाइत तँ पुस्तकक विश्लेषणात्मक पक्ष आरो सुदृढ़ भऽ सकैत छल। तथापि लेखकक उद्देश्य स्पष्ट रूपसँ नेतृत्व आ प्रेरणाक आयामकेँ रेखांकित करब रहल अछि, आ ओ एहि उद्देश्य मेँ सफल देखाइत छथि।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi  केवल एक राजनीतिक जीवनी नहि, बल्कि नेतृत्व, संकल्प आ राष्ट्रसेवाक विचारकेँ बुझबाक एक गंभीर प्रयास अछि। आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा अपन साहित्यिक दृष्टि आ संवेदनशील अभिव्यक्तिक माध्यमसँ एहि पुस्तककेँ विशिष्ट बना देने छथि। ई पुस्तक विशेष रूपसँ ओहि पाठकसभक लेल उपयोगी अछि जे नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व, हुनकर नेतृत्व-मॉडल आ समकालीन भारतक राजनीतिक यात्राकेँ निकटसँ बुझय चाहैत छथि।

एक पाठकक रूपमेँ सर्वप्रथम तँ हम The Leader Narendra D. Modi केर लिखल जाएबाकेँ लऽ आलोचना करय चाहब। हमर ई आलोचना पुस्तकक विषय-वस्तु वा निष्कर्षकेँ लऽ नहि, बल्कि एकर अस्तित्वकेँ लऽ अछि। आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ई पुस्तक लिखलाहे किएक?

हमर बुझाइत अछि जे नरेंद्र मोदी पर लिखबाक लेल किछु न्यूनतम "अर्हता" होयबाक चाही। जेना - 

  • या तँ लेखक स्वयं संघ-परिवारसँ जुड़ल होथि।

  • या फेर ओ मोदीजीक गृहप्रदेशक होथि।

  • या हुनकर संग कोनो संस्थामेँ कार्य कएने होथि।

  • अथवा पेशासँ पत्रकार होथि, जे वर्षौंसँ हुनकर राजनीतिक जीवनक अध्ययन कएने होथि।

एतय किछु लोक ईहो मानि सकैत छथि जे एहन पुस्तक लिखबाक पाछाँ कोनो राजनीतिक महत्वाकांक्षा वा लाभक संभावना होयबाक चाही। मुदा विडम्बना ई अछि जे चंद्रमणि झा जी एहि तथाकथित अर्हतासभमेँ सँ कोनो अर्हता नहि रखैत छथि।

ओ न तँ राजनीतिक कार्यकर्ता छथि, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ताक गलियारामेँ नियमित रूपसँ विचरण करनिहार, आ नहिए कोनो राजनीतिक लाभक आकांक्षी। ओ मूलतः साहित्यक आदमी छथि—गीतक आदमी, संवेदनाक आदमी, भाषा आ संस्कृतिक आदमी। एहन स्थितिमेँ हुनकर नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखब ओहि लोकसभक लेल आश्चर्यक विषय भऽ सकैत अछि जे साहित्य आ राजनीति बीच कठोर दीवार ठाढ़ कऽ कऽ देखैत छथि।

मुदा हमर शिकायत एतय समाप्त नहि होइत अछि। एक मैथिल हृदयक शिकायत तँ एहि सँ पैघ अछि। यदि चंद्रमणि झा जी केँ ई पुस्तक लिखबे करबाक छल, तँ कम-सँ-कम एकरा मैथिलीमेँ लिखितथि। जे व्यक्ति अपन सम्पूर्ण जीवन मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवामेँ समर्पित कएने छथि, हुनका सँ ई स्वाभाविक अपेक्षा रहैत अछि जे अपन महत्वपूर्ण कृतिसभ लेल मातृभाषाकेँ प्राथमिकता देतीह। The Leader Narendra D. Modi केर अंग्रेजीमेँ प्रकाशित होयब व्यापक पाठक-वर्ग धरि पहुँचबाक दृष्टिसँ उचित भऽ सकैत अछि, मुदा एक मैथिली प्रेमीक मनमेँ ई प्रश्न अनायास उठैत अछि जे की ई पुस्तक मैथिलीमेँ नहि आबि सकैत छल?

तथापि जखन हम पुस्तक पढ़ब आरम्भ करैत छी तँ धीरे-धीरे ई शिकायत कम होमऽ लगैत अछि। तखन बुझाइत अछि जे लेखकक वास्तविक अर्हता न राजनीतिक निकटता अछि, न वैचारिक प्रतिबद्धता आ नहिए कोनो व्यक्तिगत स्वार्थ। हुनकर सभसँ पैघ अर्हता अछि—एक सजग साहित्यकारक दृष्टि, जे अपन समयक प्रभावशाली व्यक्तित्व आ घटनाकेँ बुझबाक तथा ओकरा शब्द देबाक साहस रखैत अछि। सम्भवतः ईहे अर्हता हुनका एहि पुस्तकक रचनाक लेल प्रेरित कएने अछि।

आब पुस्तकक विषय-वस्तु पर अबैत छी। क्राउन पब्लिकेशन, छत्तीसगढ़सँ प्रकाशित ई 278 पृष्ठक पुस्तक वास्तवमेँ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। यद्यपि पुस्तकक सामग्री आ लेखकक परिश्रम एकरा संग्रहणीय बनबैत अछि, तथापि हमर मानब अछि जे एहन महत्वपूर्ण कृतिकेँ हार्डबाउंड संस्करण आ आरो आकर्षक आवरणक संग प्रस्तुत कएल जाइत तँ एकर गरिमा आरो बढ़ि जाइत।

पुस्तकक सभसँ पैघ विशेषता एकर व्यापक फलक अछि। कुल 77 आलेखक माध्यमसँ लेखक नरेंद्र मोदीक जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि आ सामाजिक सरोकार सहित लगभग सभ महत्वपूर्ण पक्षकेँ समेटबाक प्रयास केने छथि। ई कार्य निश्चयहि श्रमसाध्य आ सराहनीय अछि।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तक उपलब्ध अछि, मुदा अधिकांश पुस्तक या तँ जीवनी धरि सीमित रहि जाइत अछि अथवा कोनो एक विशेष पक्ष पर केन्द्रित रहैत अछि। चंद्रमणि झा जीक ई कृति एहि अर्थमेँ अलग देखाइत अछि जे एहि मेँ विविध स्रोत, प्रसंग आ दृष्टिकोणकेँ एकहि स्थान पर संकलित करबाक प्रयास भेल अछि। पाठककेँ मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ सम्बन्धित अनेक एहन सूचना एकत्र भेटैत अछि जाहि लेल अन्यथा अनेक पुस्तक आ स्रोतक सहारा लेबाक आवश्यकता पड़ित।

77 स्वतंत्र आलेख होयबाक बावजूद पुस्तक कतौ बिखरल नहि लगैत अछि। प्रत्येक आलेख एक पैघ व्यक्तित्व-चित्रक अंश बनिकऽ सामने अबैत अछि। पाठक चाहे कोनो अध्यायसँ पढ़ब शुरू करथि, अंततः हुनका नरेंद्र मोदीक जीवन आ नेतृत्वक एक समग्र तस्वीर भेटैत अछि।

लेखकक दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक आ प्रेरणात्मक अछि। ओ मोदीकेँ मात्र राजनेताक रूपमेँ नहि, बल्कि एहन नेताक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य पृष्ठभूमिसँ उठि असाधारण उपलब्धि प्राप्त केने छथि। एहि कारण कतेको स्थान पर पुस्तक जीवनीसँ बेसी प्रेरक साहित्यक रूप धारण कऽ लैत अछि।

एक पाठकक रूपमेँ पुस्तक पढ़ैत समय ई अनुभव अवश्य होइत अछि जे भाषाकेँ आरो रोचक, संवादधर्मी आ प्रवाहयुक्त बनाओल जा सकैत छल। कतेको स्थान पर भाषा अत्यधिक अकादमिक आ विवरणप्रधान भऽ जाइत अछि, जाहिसँ सामान्य पाठककेँ किछु अध्याय बोझिल वा नीरस प्रतीत भऽ सकैत अछि। मुदा एहि पक्षकेँ पुस्तकक सीमा होयबाक संग-संग एकर विशेषता सेहो मानल जा सकैत अछि। लेखक रोचकताक अपेक्षा प्रामाणिकता आ सूचना-संपन्नताकेँ बेसी महत्व देने छथि। एहि कारण पुस्तक भावनात्मक आख्यानक अपेक्षा एक संदर्भग्रंथ आ दस्तावेजक स्वरूप ग्रहण करैत अछि।

यदि कोनो पाठक केवल साहित्यिक आनन्दक लेल एहि पुस्तककेँ पढ़य चाहैत छथि तँ सम्भव अछि जे हुनका किछु निराशा हो। मुदा यदि हुनकर रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्व अथवा एहि विषय पर गंभीर अध्ययन आ शोधमेँ अछि, तँ ई पुस्तक निश्चयहि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होयत।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेताक जीवनी नहि, बल्कि एहन राजनीतिक व्यक्तित्वकेँ बुझबाक प्रयास अछि जाहि इक्कीसम शताब्दीक भारतक दिशा आ विमर्शकेँ गहराईसँ प्रभावित केने अछि। विषयक व्यापकता, सामग्रीक समृद्धि आ दस्तावेजी महत्वक कारण ई कृति विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि।

पुस्तकक एक आन महत्वपूर्ण उपलब्धि एकर सहज उपलब्धता अछि। प्रसन्नताक विषय ई अछि जे ई पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल आ गूगल बुक्स जेकाँ प्रमुख मंचसभ पर उपलब्ध अछि। दुर्भाग्यवश मैथिलीक अधिकांश लेखक आ प्रकाशक अपन पुस्तकक वितरण आ विपणन एहि स्तर धरि नहि पहुँचा पबैत छथि। एहि दृष्टिसँ सेहो ई पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।

एक मैथिल पाठकक रूपमेँ, आ विशेष रूपसँ लेखकक साहित्यिक अवदानसँ परिचित होयबाक कारण, एहि पुस्तककेँ देखिकऽ हमरा स्वाभाविक गर्वक अनुभूति होइत अछि। मैथिली गीत-साहित्यक शिखर पुरुषसभमेँ गिनल जाएबला आदरणीय चंद्रमणि झा जीक राष्ट्रीय स्तरक विषय पर अंग्रेजीमेँ एहन व्यापक आ सुव्यवस्थित पुस्तक प्रस्तुत करब केवल हुनकर व्यक्तिगत उपलब्धि नहि, बल्कि सम्पूर्ण मैथिली समाज आ साहित्य-जगतक लेल गौरवक विषय अछि।

अंतमेँ आदरणीय चंद्रमणि झा जीकेँ एहि महत्वपूर्ण कृतिक लेल हमर हार्दिक शुभकामना। हमर कामना अछि जे ई पुस्तक देश-विदेशक अधिकाधिक पाठक धरि पहुँचे, पढ़ल जाए, चर्चित होउ आ अपन उद्देश्यक सार्थकता सिद्ध करय। संगहि, ई कृति मैथिली समाजकेँ सेहो प्रेरित करय जे ओकर साहित्यिक प्रतिभासभ क्षेत्रीय सीमासँ बाहर निकलि राष्ट्रीय आ वैश्विक स्तर पर अपन सशक्त पहचान स्थापित करय।


प्रवीण कुमार

पाठकों के लिए बोनस
695 रूपा के पुस्तक एखन अमेजन पर 521 रूपा में उपलब्ध अहि. पुस्तक प्राप्ति लेल लिंक

Book Review : The Leader Narendra D. Modi : Dr. Chandramani Jha


In contemporary Indian politics, Narendra Modi has emerged as a personality who evokes strong and often sharply divided opinions, both among his supporters and his critics. In such a context, a book like The Leader Narendra D. Modi transcends the boundaries of a conventional biography and becomes an important document of contemporary India's political, social, and cultural journey. The book seeks to present in detail Narendra Modi's leadership, working style, and vision of nation-building.

The author of this book, Dr. Chandramani Jha, is a distinguished lyricist and one of the most respected voices in the world of Maithili literature and cultural consciousness. His literary sensitivity is evident throughout the book. He does not merely present facts and events in an informative manner; he also lends them an emotional and inspirational tone. As a result, the book successfully maintains literary readability alongside political analysis.

One of the most remarkable aspects of the book is that the author does not limit Narendra Modi's personality to his political achievements alone. He highlights Modi's struggles, discipline, organizational abilities, and public outreach skills. The journey of a man rising from a modest background to the highest political office in the country is presented as an inspiring narrative.

From a linguistic perspective, the book is simple and fluid in its style. The systematic arrangement of events and their lucid presentation make it useful not only for general readers but also for students and scholars of politics and sociology. However, as a reviewer, one may observe that the positive aspects of Modi's personality and achievements receive relatively greater attention. Had the author devoted more space to critical perspectives and alternative viewpoints, the analytical dimension of the book might have become even stronger. Nevertheless, it is evident that the author's primary objective is to highlight the dimensions of leadership and inspiration, and in that respect, he succeeds admirably.

Overall, The Leader Narendra D. Modi is not merely a political biography but a serious attempt to understand the ideas of leadership, determination, and public service. Through his literary vision and sensitive expression, Dr. Chandramani Jha has given the book a distinctive character. It is particularly useful for readers who wish to gain a deeper understanding of Narendra Modi's personality, leadership model, and the political journey of contemporary India.

As a reader, however, I would like to begin by criticizing the very writing of this book. My criticism is not directed at its content or conclusions, but rather at its very existence. Why did the respected Dr. Chandramani Jha write this book at all?

In my understanding, writing about Narendra Modi requires certain minimum "qualifications." For example:

- The author should be associated with the Sangh Parivar;

- Or belong to Modi's home state; 

- Or have worked with him in some institution;

- Or be a journalist who has spent years studying his political life.

Some may even argue that writing such a book should be motivated by political ambition or the prospect of some benefit. Unfortunately, Dr. Chandramani Jha possesses none of these qualifications.

He is neither a political activist nor an election analyst. He is not a regular traveler in the corridors of power, nor does he appear to seek any political gain. Fundamentally, he is a man of literature—a man of songs, emotions, language, and culture. Therefore, for those who perceive a rigid wall between literature and politics, his decision to write a book on Narendra Modi may seem surprising.

But my complaint does not end there. As a Maithil, I have an even greater grievance. If Dr. Chandramani Jha had to write this book, why did he not write it in Maithili? A person who has devoted his life to the service of Maithili language, literature, and culture naturally invites the expectation that his most significant works would prioritize his mother tongue. Publishing The Leader Narendra D. Modi in English may be justified in terms of reaching a broader readership, yet a lover of Maithili cannot help wondering whether this book could not have been written in Maithili as well.

However, as one progresses through the book, this complaint gradually begins to fade. One realizes that the author's true qualification is neither political proximity nor ideological commitment, nor any personal interest. His greatest qualification is the vision of a vigilant literary mind—one capable of understanding the influential personalities and significant events of his time and giving them meaningful expression through words. Perhaps it is precisely this qualification that inspired him to write the book.

Now let us turn to the contents of the book itself. Published by Crown Publication, Chhattisgarh, this 278-page volume is an important document. While the effort and content make it worthy of preservation, I believe that such a significant work would have benefited from a hardbound edition and a more attractive cover design. Its subject matter and significance deserve such presentation.

The greatest strength of the book is its broad scope. Through seventy-seven essays, the author attempts to encompass nearly every important aspect of Narendra Modi's life and personality, including his struggles, leadership, administrative vision, nationalism, global image, and social concerns. This is undoubtedly a labor-intensive and commendable achievement.

Countless books have been written about Narendra Modi, but most either remain confined to biography or focus on a particular aspect of his life and career. Dr. Chandramani Jha's work stands apart because it brings together a wide range of sources, incidents, and perspectives in a single volume. Readers encounter numerous pieces of information about Modi's personality and achievements that would otherwise require consulting multiple books and references.

Another significant quality of the book is its structure. Despite consisting of seventy-seven independent essays, it never appears fragmented. Each essay functions as part of a larger portrait. Regardless of where readers begin, they eventually arrive at a comprehensive understanding of Narendra Modi's life and leadership.

The author's perspective is clearly positive and inspirational. He presents Modi not merely as a politician but as a leader who rose from humble beginnings to achieve extraordinary success. Consequently, the book often assumes the character of inspirational literature rather than that of a conventional political biography. Readers seeking extensive critical engagement may find certain questions unanswered; however, the declared objective of the book is not to generate political debate but to document a leadership journey.

Most importantly, the author has not simply compiled information; he has communicated it through literary sensitivity and accessible language. This enables the book to maintain readability at both factual and emotional levels. Such an integrated and systematic compilation of material on Narendra Modi is perhaps rare, and this may well be the book's greatest achievement.

As a reader, one does occasionally feel that the language could have been made more engaging, conversational, and dynamic. The author's primary concern appears to have been the systematic presentation of facts and information. Consequently, the language becomes highly academic and detail-oriented in places. Readers approaching the book with expectations of a biography or memoir may therefore find some sections somewhat dense or tedious.

Yet this limitation may also be viewed as a strength. The author clearly values authenticity and informational richness over entertainment. For that reason, the book often resembles a reference work and documentary record rather than an emotional narrative.

Readers seeking only literary pleasure or narrative enjoyment may therefore find parts of the book demanding. However, anyone interested in Indian politics, contemporary India, Narendra Modi's personality and achievements, or serious research on these subjects will find it immensely valuable. Indeed, by bringing together diverse information, ideas, speeches, and references in a single place, the book serves as an indispensable resource for researchers, political observers, and serious readers.

In fact, The Leader Narendra D. Modi is not merely a biography of a leader; it is an attempt to understand a political personality who has profoundly influenced the direction and discourse of twenty-first-century India. For the breadth of its subject matter, richness of content, and documentary value, Dr. Chandramani Jha's work deserves special recognition.

Another noteworthy achievement of the book is its accessibility. In today's world, it is not enough for a book to be good; it must also reach its readers. It is encouraging to note that The Leader Narendra D. Modi is available on Amazon, Flipkart, Kindle, and Google Books. Unfortunately, most Maithili authors and publishers have not been able to ensure such effective distribution and visibility for their works. In this regard, too, the book sets a positive example.

As a Maithil reader, and as someone familiar with the author's literary contributions, I feel a natural sense of pride upon seeing this work. For a leading figure of Maithili lyric literature to produce such a comprehensive English-language book on a subject of national importance is not merely a personal achievement; it is a matter of pride for the Maithili community and literary world as a whole.

There is also an unexpected but important benefit associated with the book: through it, readers become acquainted with the author himself. The book contains a detailed introduction to Dr. Chandramani Jha, which provides insight into the breadth of his literary, cultural, and social contributions.

Overall, The Leader Narendra D. Modi is a work that commands attention because of its subject matter, content, and documentary significance. It has certain limitations, but its achievements far outweigh them. The book is valuable not only for readers seeking to understand Narendra Modi's personality and ideas, but also as proof that a sensitive literary mind can undertake serious and painstaking work on major personalities outside the conventional realm of literature—whether in politics, sports, cinema, or other fields.

In conclusion, I extend my heartfelt congratulations and best wishes to Dr. Chandramani Jha for this significant contribution. I hope that the book reaches a wide readership in India and abroad, is read, discussed, and appreciated, and ultimately fulfills its purpose. I also hope that this work inspires the Maithili community to take its literary talents beyond regional boundaries and establish a meaningful presence on national and global platforms.

Praveen Kumar 

Bonus for Readers  - 695 Rs. book is available @ INR 521  - On This Link

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : डॉ. चन्द्रमणि झा


वर्तमान भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हैं जिनके पक्ष और विपक्ष दोनों में तीव्र मतभेद दिखाई देते हैं। ऐसे समय में The Leader Narendra D. Modi जैसी पुस्तक केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं रह जाती, बल्कि वह समकालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा का भी एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है। पुस्तक में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, कार्यशैली और राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोण को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक के लेखक आदरणीय डॉक्टर चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगत के प्रतिष्ठित गीतकार एवं सांस्कृतिक चेतना के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में दिखाई देती है। लेखक ने तथ्यों और घटनाओं को न केवल सूचनात्मक ढंग से रखा है, बल्कि उन्हें एक भावात्मक और प्रेरणात्मक स्वर भी प्रदान किया है। यही कारण है कि पुस्तक राजनीतिक विश्लेषण के साथ-साथ साहित्यिक पठनीयता भी बनाए रखती है।

पुस्तक का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि लेखक ने नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता और जनसंपर्क कौशल को भी रेखांकित किया है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुँचने की यात्रा को लेखक ने प्रेरक आख्यान के रूप में प्रस्तुत किया है।

भाषा की दृष्टि से पुस्तक सरल और प्रवाहपूर्ण है। पुस्तक में घटनाओं का क्रमबद्ध विन्यास और सहज प्रस्तुति इसे सामान्य पाठकों से लेकर राजनीति एवं समाजशास्त्र के अध्येताओं तक के लिए उपयोगी बनाती है।हालाँकि, एक समीक्षक के रूप में यह भी कहा जा सकता है कि पुस्तक में मोदी के व्यक्तित्व और कार्यों के सकारात्मक पक्षों को अपेक्षाकृत अधिक स्थान मिला है। यदि आलोचनात्मक विमर्श और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को भी कुछ अधिक विस्तार दिया जाता, तो पुस्तक का विश्लेषणात्मक पक्ष और अधिक सुदृढ़ हो सकता था। फिर भी लेखक का उद्देश्य स्पष्टतः नेतृत्व और प्रेरणा के आयामों को रेखांकित करना रहा है, और उस उद्देश्य में वे सफल दिखाई देते हैं।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi केवल एक राजनीतिक जीवनी नहीं, बल्कि नेतृत्व, संकल्प और राष्ट्र-सेवा के विचारों को समझने का एक गंभीर प्रयास है। आदरणीय चंद्रमणि झा जी ने अपनी साहित्यिक दृष्टि और संवेदनशील अभिव्यक्ति के माध्यम से इस पुस्तक को विशिष्ट बना दिया है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व,  उनके नेतृत्व-मॉडल और समकालीन भारत की राजनीतिक यात्रा को निकट से समझना चाहते हैं।

एक पाठक के तौर पर सर्वप्रथम तो मैं The Leader Narendra D. Modi के लिखे जाने की ही आलोचना करना चाहता हूँ। मेरी यह आलोचना पुस्तक की विषयवस्तु या उसके निष्कर्षों को लेकर नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को लेकर है कि आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ने यह पुस्तक लिखी ही क्यों ? 

मेरी समझ में नरेंद्र मोदी पर लिखने के लिए आपमें कुछ न्यूनतम "अर्हताएँ" होनी चाहिए। जैसे - 

-  या तो लेखक स्वयं संघ-परिवार से जुड़ा हो, 
-  या फिर वो मोदी जी के गृहप्रदेश का हो,
-  या उनके साथ किसी संस्था में कार्यरत रहा हो, 
-  या फिर पेशे से पत्रकार हो जिसने वर्षों तक उनके राजनीतिक जीवन का अध्ययन किया हो। 

यहाँ कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि ऐसी पुस्तक लिखने के पीछे कोई राजनीतिक आकांक्षा या लाभ की संभावना होनी चाहिये, किंतु अफसोस कि चंद्रमणि झा जी इन अर्हताओं में से कोई भी नहीं रखते। वे न तो राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ता के गलियारों के नियमित यात्री, न ही किसी प्रकार के राजनीतिक लाभ के आकांक्षी। वे मूलतः साहित्य के आदमी हैं - गीत के आदमी, संवेदना के आदमी, भाषा और संस्कृति के आदमी। ऐसे में उनका नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखना उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है जो साहित्य और राजनीति के बीच कठोर दीवारें खड़ी करके देखते हैं।

लेकिन मेरी शिकायत यहीं समाप्त नहीं होती। एक मैथिल हृदय की शिकायत इससे भी बड़ी है। यदि चंद्रमणि झा जी को यह पुस्तक लिखनी ही थी, तो कम-से-कम इसे मैथिली में लिखते। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति की सेवा में लगाया हो, उनसे यह स्वाभाविक अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपनी महत्वपूर्ण कृतियों के लिए अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता दे। The Leader Narendra D. Modi का अंग्रेज़ी में प्रकाशित होना एक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचने की दृष्टि से उचित हो सकता है, किंतु एक मैथिली प्रेमी के मन में यह प्रश्न अनायास उठता है कि क्या यह पुस्तक मैथिली में नहीं आ सकती थी?

फिर भी, जब पुस्तक को पढ़ना शुरू करता हूँ तो धीरे-धीरे यह शिकायत कम होने लगती है। तब समझ में आता है कि लेखक की वास्तविक अर्हता न तो राजनीतिक निकटता है, न वैचारिक प्रतिबद्धता और न ही कोई व्यक्तिगत स्वार्थ। उनकी सबसे बड़ी अर्हता है - एक सजग साहित्यकार की दृष्टि, जो अपने समय के प्रभावशाली व्यक्तित्वों और घटनाओं को समझने तथा उन्हें शब्द देने का साहस रखती है। संभवतः इसी अर्हता ने उन्हें इस पुस्तक को लिखने के लिए प्रेरित किया।

अब आते हैं पुस्तक की विषय-वस्तु पर। Crown Publication, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित यह पुस्तक 278 पृष्ठों का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यद्यपि पुस्तक की सामग्री और परिश्रम इसे संग्रहणीय बनाते हैं, फिर भी मेरा मानना है कि इतने महत्त्वपूर्ण कार्य को हार्डबाउंड संस्करण तथा अधिक आकर्षक आवरण के साथ प्रस्तुत किया जाता तो इसकी गरिमा और बढ़ जाती। पुस्तक का विषय और उसका संदर्भ ऐसी प्रस्तुति की अपेक्षा करता है। पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक फलक है। कुल 77 आलेखों के माध्यम से लेखक ने नरेंद्र मोदी के जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि तथा सामाजिक सरोकारों सहित लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों को समेटने का प्रयास किया है। यह कार्य निश्चय ही श्रमसाध्य और सराहनीय है।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तकें उपलब्ध हैं, किंतु अधिकांश पुस्तकें या तो जीवनी तक सीमित रह जाती हैं अथवा किसी एक विशेष पक्ष पर केंद्रित होती हैं। चंद्रमणि झा जी की यह कृति इस अर्थ में अलग दिखाई देती है कि इसमें विविध स्रोतों, प्रसंगों और दृष्टिकोणों को एक ही स्थान पर संकलित करने का प्रयास हुआ है। पाठक को मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित अनेक ऐसी सूचनाएँ एक साथ प्राप्त होती हैं, जिन्हें अन्यत्र खोजने के लिए अनेक पुस्तकों और स्रोतों का सहारा लेना पड़ सकता है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण गुण इसकी संरचना है। 77 स्वतंत्र आलेख होने के बावजूद पुस्तक बिखरी हुई नहीं लगती। प्रत्येक आलेख एक बड़े व्यक्तित्व-चित्र का हिस्सा बनकर सामने आता है। पाठक चाहे किसी भी अध्याय से पढ़ना आरम्भ करे, वह अंततः नरेंद्र मोदी के जीवन और नेतृत्व की एक समग्र तस्वीर तक पहुँचता है।
लेखक का दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक और प्रेरणात्मक है। वे मोदी को केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसने साधारण पृष्ठभूमि से उठकर असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। इस कारण कई स्थानों पर पुस्तक जीवनी से अधिक प्रेरक साहित्य का रूप धारण करती दिखाई देती है। यद्यपि आलोचनात्मक विमर्श की अपेक्षा रखने वाले पाठकों को कुछ प्रश्न अनुत्तरित लग सकते हैं, फिर भी पुस्तक का घोषित उद्देश्य किसी राजनीतिक बहस को खड़ा करना नहीं, बल्कि एक नेतृत्व-यात्रा का दस्तावेज़ प्रस्तुत करना है।

सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लेखक ने सूचनाओं को केवल संकलित नहीं किया है, बल्कि उन्हें साहित्यिक संवेदना और सहज भाषा के माध्यम से पाठक तक पहुँचाया है। यही कारण है कि पुस्तक तथ्य और भाव, दोनों के स्तर पर अपनी पठनीयता बनाए रखती है। नरेंद्र मोदी के संबंध में इतनी एकीकृत और व्यवस्थित सामग्री संभवतः अन्यत्र दुर्लभ है, और यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।

एक पाठक के रूप में पुस्तक को पढ़ते हुए यह अनुभव अवश्य होता है कि इसकी भाषा को और अधिक रोचक, संवादधर्मी तथा प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता था। लेखक का उद्देश्य स्पष्ट रूप से तथ्यों और सूचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना रहा है, किंतु इसी कारण कई स्थानों पर भाषा अत्यधिक अकादमिक और विवरणप्रधान हो जाती है। परिणामस्वरूप सामान्य पाठक, जो किसी जीवनी या संस्मरणात्मक शैली की अपेक्षा लेकर पुस्तक के पास आता है, उसे कुछ अध्याय अपेक्षाकृत बोझिल अथवा नीरस प्रतीत हो सकते हैं। हालाँकि, इस पक्ष को पुस्तक की सीमा कहने के साथ-साथ उसकी विशेषता भी माना जा सकता है। लेखक ने रोचकता की अपेक्षा प्रामाणिकता और सूचना-संपन्नता को अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि पुस्तक भावनात्मक आख्यान की बजाय एक संदर्भग्रंथ और दस्तावेज़ का स्वरूप ग्रहण करती है।

इसलिए यदि कोई पाठक केवल साहित्यिक आनंद या कथा-सुख की अपेक्षा से इस पुस्तक को पढ़ना चाहता है, तो संभव है कि उसे कुछ निराशा हो। लेकिन यदि उसकी रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व अथवा इन विषयों पर गंभीर अध्ययन और शोध में है, तो यह पुस्तक उसके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। वस्तुतः नरेंद्र मोदी से संबंधित विविध सूचनाओं, विचारों, भाषणों और संदर्भों को एक ही स्थान पर संकलित करने के कारण यह पुस्तक शोधार्थियों, राजनीतिक अध्येताओं और गंभीर पाठकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ-दस्तावेज़ के रूप में देखी जा सकती है।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने का प्रयास है जिसने इक्कीसवीं सदी के भारत की दिशा और विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। चंद्रमणि झा की यह कृति अपने विषय की व्यापकता, सामग्री की समृद्धि और दस्तावेज़ी महत्व के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इस पुस्तक की एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इसकी सहज उपलब्धता है। आज के समय में किसी पुस्तक का अच्छा होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उसका पाठकों तक पहुँचना भी है। प्रसन्नता की बात है कि The Leader Narendra D. Modi अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल तथा गूगल बुक्स जैसे प्रमुख मंचों पर उपलब्ध है। दुर्भाग्यवश मैथिली के अधिकांश लेखक और प्रकाशक अपनी पुस्तकों के वितरण और विपणन को इस स्तर तक नहीं पहुँचा पाते हैं। इस दृष्टि से भी यह पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

एक मैथिल पाठक के रूप में, और विशेषकर लेखक के साहित्यिक अवदान से परिचित होने के कारण, इस पुस्तक को देखकर मुझे एक स्वाभाविक गर्व-बोध होता है। मैथिली गीत-साहित्य के शिखर पुरुषों में गिने जाने वाले आदरणीय चंद्रमणि झा जी का इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर के विषय पर अंग्रेज़ी में एक सुव्यवस्थित और व्यापक पुस्तक प्रस्तुत करना न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मैथिली समाज और साहित्य-जगत के लिए भी गौरव का विषय है।

पुस्तक के साथ एक अप्रत्याशित किंतु महत्त्वपूर्ण लाभ यह भी जुड़ा हुआ है कि इसके बहाने पाठक स्वयं लेखक से परिचित हो पाता है। पुस्तक में चंद्रमणि झा जी का परिचय विस्तार से दिया गया है, जिसे पढ़ते हुए उनके साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान की व्यापकता का अनुमान होता है।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi एक ऐसी कृति है जो अपने विषय, सामग्री और दस्तावेज़ी महत्त्व के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करती है। इसमें कुछ सीमाएँ अवश्य हैं, किंतु इसकी उपलब्धियाँ उन सीमाओं से कहीं अधिक बड़ी हैं। यह पुस्तक नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और विचारों को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए उपयोगी है ही, साथ ही यह इस बात का भी प्रमाण है कि एक संवेदनशील साहित्यकार अपने समय के ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पर गंभीर और श्रमसाध्य कार्य कर सकता है जो साहित्य से ईतर है... राजनीति, खेल, सिनेमा आदि आदि.

अंत में आदरणीय चंद्रमणि झा जी को इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। मेरी कामना है कि यह पुस्तक देश-विदेश के अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचे, पढ़ी जाए, चर्चा में आए और अपने उद्देश्य की सार्थकता सिद्ध करे। साथ ही, यह कृति मैथिली समाज को भी प्रेरित करे कि उसकी साहित्यिक प्रतिभाएँ क्षेत्रीय सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करें।

Praveen Kumar
समीक्षक
पाठकों के लिए बोनस
695 रुपये मूल्य की यह पुस्तक फ़िलहाल अमेजन पर 521 रुपये में उपलब्ध है . 

Sunday, 24 May 2026

दादा जी और तीन पीढ़ियों का मल्लाह-ब्राह्मण संबंध


बात १९८०-८२ के आस पास की होगी। हमारा तीन दादा जी का संयुक्त परिवार था। फ़िल्मों में दिखने वाली हवेली सा आँगन था हमारा। तीन दिशाओं में बना घर, उत्तर दिशा में खुली सी बाड़ी और बीच में बड़ा सा आँगन। आँगन तक़रीबन ६०x८० फीट का जहाँ उसके पश्चिम में एक सार्वजनिक चूल्हा था और उत्तर दिशा में माछ बनाने का अलग चूल्हा। कुल ९ कमरे, एक लगभग स्टोर और एक पूजा का कमरा। आजकल हमारे सिमटते स्क्वायर फीट के घर में हम एक छोटे मंदिर को स्थान देते हैं, उस वक़्त पूर्व दिशा में एक बड़ा कमरा मंदिर-घर था जहाँ धर्मराज-बाबा विराजमान थे।

छोटी दादी जल्दी विधवा हो गई थी, उनका घर पश्चिम-दक्षिण कोने में था। मुझे याद है उनके कमरे में एक छोटा पलंग और एक बक्शा हुआ करता था। वो कभी कभार कुछ बोलती थीं लेकिन कभी उनके मुख से कोई दुःख या नकारात्मक बात नहीं सुनी मैंने। मेरी दादी सबसे बड़ी बहू थीं। उनका कमरा दक्षिण के दुहार पर था। कमरे के बाहर संदूक, उसमें कुछ किताबें, बर्तन और सुजनियाँ (कपड़ों के तह की सिलाई से बना बिस्तर)। मुझे याद है १९८८ के भूकम्प के समय मैं उसी संदूक पर सोया था। जो बीच वाली दादी थीं उनका कमरा पूर्वोत्तर कोने में था। वो सबों में सबसे अधिक मुखर थीं।

तीन दादा जी में सब कुछ बिना किसी अनुबंध, कागज़ी कारवाई और स्वार्थ के तय था। शायद किसी ने किसी से कुछ कहा भी ना हो कि उसे क्या करना है... छोटे दादा जी खेती बाड़ी देखते, मँझले कलकत्ता शहर से कमाई लाते और बड़े यानी मेरे दादा जी समाज संभालते। सबके अलग विभाग, किसी किसी के काम में कोई दखल नहीं, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं। जो भी कमाई होती, सबके लिए एक समान और सबका सब पर बराबर हक।

यहाँ मैंने मेरे दादा के बारे में "समाज देखते थे" लिखा है जिसे थोड़ा स्पष्ट करना आवश्यक है। उस वक़्त घर से थोड़ी दूरी पर दलान हुआ करता था। जहाँ घर के पुरुष रहा करते, खेती बाड़ी समाज और आयोजन आदि के लिए दलान था। यदि आँगन से किसी महिला के लिए दलान पर किसी को कोई सूचना भेजनी होती तो घर के बच्चे संदेश वाहक का काम करते। अहले सुबह फुल तोड़ने और गांव के पोखर में नहाने जाते वक़्त के आलावा ऐसा कम ही होता जब स्त्रियाँ दलान पर दिखतीं। दलान पर मेरे दादा जी का अपना एक संदूक और एक चौकी थी। पहले एक दूध पेड़ने की मशीन भी उस दलान पर हुआ करती थी जिसके विभागाध्यक्ष मेरे दादा जी ही थे। दूर गांव के लोग दूध लेकर आते और क्रीम निकाला जाता। बदले में कोई अनाज तो कोई क्रीम का हिस्सा दे जाता। ऐसे में दादा जी के पहचान की चौहद्दी बड़ी थी। अपने गाँव से १८-२० कोस दूर तक के गाँव उनको "पंचायती" के लिए बुलाया जाता। एक एक गाँव के लोगों के नाम और खानदान का ब्योरा उनके पास होता। शादी-विवाह उनके रिकमेंडेशन से हुआ करता और किसी भी नैयायिक मामले में उनका कहा पत्थर की लकीर समान होती।

मेरे मंझले दादा जी कलकत्ता में रहते। कहते हैं उनका वहाँ एक कमरा भी था जिसे उन्होंने अपने संन्यास के समय किसी रिश्तेदार को दान कर दिया था। उनकी शादी गांव से तक़रीबन ६ कोस दूर के गाँव नन्द जी के यहाँ हुई थी। नंद जी आस पास के इलाके में यात्रियों को अपने यहां रखने को लेकर मशहूर थे। उस वक़्त मोटर तो क्या, सायकल तक नहीं थी इलाके में। ऐसे में लोग कटही गाड़ी या फिर हाथी से चलते, समय अधिक लगता तो बीच गाँव में रुक जाते। ऐसे ही रुकाव के स्थान के लिए नंद जी का घर प्रसिद्ध था। कभी इस बात पर विवाद नहीं हुआ कि मेहमान १० हैं या १५ और ना ही इस पर सवाल हुआ कि इस समय में इतने लोगों का भोजन कौन बनाएगा। नंद जी की भतीजी मेरे मंझले बाबा की पत्नी... इसी जबान देने के क्रम में मेरे पिता की पत्नी नंद जी की पोती और फिर नंद जी के पुत्र यानी मेरे नाना द्वारा एक ब्राह्मण को जबान दिए जाने के वजह से मैं भी उसी गाँव का जमाई !

वापस दादा जी पर आते हुए - दादा जी का संदूक भानुमति का पिटारा था। उसमें हर वक़्त खाने का कोई ना कोई सामान मौजूद होता। लड्डू, खाजा, चूड़ा, दही, गुड़, कोई सिजनल फल... कुछ ना कुछ होता ही उसमें। दादा जी का रूटीन था सुबह चार बजे उठकर चार कोस घूमने का। वापस आते, शरीर में सरसों तेल पचाते, नहाते और आँगन जाकर बैठ जाते। दादी का काम था कुछ मिनट के अंदर उनके पास खाना लाना। दादा जी, दो-चार मिनट से अधिक आँगन में इंतज़ार नहीं करते। उनके पास संदूक और उसमें पड़ा खाना तो था ही।

कहते हैं दादा जी छाल्ही-रोटी (क्रीम और रोटी) मात्र खाते। कई बार अहले सुबह कहीं कोई पंचायती को जाते और देर शाम वापस आते तो छाल्ही-रोटी कहीं उनका इंतज़ार कर रहा होता। संभवतः यही वजह हो, मेरी दादी मुझे भी यही खिलाने के प्रयास में रहती और अपने मधुर मुस्कान के साथ अपने हाथ से मुँह में खिलाने के की वजह से वो अपने प्रयास में सफल भी होतीं।

मेरे पिता की शादी जिस उमाकांतबाबू जी की पुत्री से हुई वो मिथिलांचल में पहले दौर के संघी थे। आज के सारे विधायक-सांसद-मंत्री उनसे आशीर्वाद पा चुके थे। उनका दहेज, गहना आदि से कोई वास्ता नहीं, उनके समय वो अपनी खेती की उपज को संघ में लगाते... अब माँ ससुराल गईं तो उन्होंने उस वक़्त (संभवतः १९७१-७२ में) उनके साथ अपने मज़दूर का एक परिवार उनके साथ भेज दिया ताकि माँ और परिवार की सेवा सुश्रुषा हो सके। इसी "मुखिया" परिवार का काम था नाना जी और दादा जी के परिवार के बीच का संबंध क़ायम रखना। वो संवाद पहुचाता, सामान, पथ-परहेज, मौसमी फल-फ़सल और कभी कभी मछली भी पहुँचाता।

आज उस सम्बन्ध की तीसरी पीढ़ी हैं हम लोग। 'मुखिया' परिवार गांव में अब भी मेरे खेत-खलिहान की देखभाल करता है और उनके दो बेटे मुंबई में हैं। जो तस्वीर आप देख रहे वो उनके ही छोटे बेटे की है जो मुंबई में अपनी टैक्सी चलाता है। मैंने उसे भैया कहने को कहा है लेकिन वो अक्सर मुझे 'गिरहत' कहता है और मेरे हर एक स्थानीय यात्रा में मेरा सारथी भी बना होता है।

ये पिछले सोमवार सुबह लगभग पाँच बजे की बात है जब "मिथिलेश मुखिया" मुझे कह रहा था - "दो बच्चा है, एक स्कूल जाता है, टैक्सी चलाता हूँ तो टीवी नहीं देख पाता हाँ, यूट्यूब पर वीडियो देखता हूँ कुछ जिसमें एक 'अजीत भारती' है जो उसे बहुत पसंद है, बहुत अच्छा बोलता है..." - मैंने उसे अजीत के साथ की अपनी तस्वीर दिखायी तो उसके सवाल थे - "कहाँ का है... अच्छा फिर तो मैथिली बोलता होगा.... मेरा बात करवा दीजिएगा कभी, मैं चार साल से सुनता हूँ इनको...." #क्रमशः



Friday, 9 January 2026

विजया महिमा - अमरनाथ कक्का केर एक गोट संस्मरण

अमरनाथ कक्का 

ई बड़ पुरान गप थिक, जहिया बैठारिये रही। सरिसब-पाहीक सटले गाम छै हाटी। एक गो मित्रक घर ओतहि हुनक गाममे नाच-तमाशा होइ छलै। गुलाबी ठंढक समय रहै। हुनकहि आमंत्रण पर ओतए जयबाक नेआर-भास भेलै। बेरूपहर जयबाक प्रोग्राम बनल। तीन मित्र, मुदा साइकिल दुइएटा। तेँ, एक मित्र कैरिअर पर असबार भेल बिदा भेलहुं। बाटमे सरिसबमे एक मित्र आओर सङ्ग भेलाह आब चारि पुरलहुं।

हाटी पहुंचला पर नेआर भेलै जे पहिने विजया सेवन हो, तखन किछु जलपान तखन नाच देखबाक बदान। पाँच मित्र एकसङ्ग एकत्रित भेल रही तेँ भरिपोख हँसी-मजाक आ गप्प-सड़ाकाक धार बहए लगलै। विजयाक प्रभावक जिज्ञासा कयल जाए लगलै आयोजक द्वारा। व्यवस्थाक साफल्य प्रभाव घरवारी केँ बड़ संतोख दै छै, असीम आनंदानूभूति होइ छै। तेँ, ई जिज्ञासा। 


- की रौ ? - घरबारीक प्रश्न

-- भनकीयो नञि - दोसरक उत्तर

- आ तोरा ?

-- रमकी बुझाइए

- उमकी नै ने ?

-- नञि, तते नञि 

- तखन आब चलै चलs। 

                 

भांग के प्रकाश आ ध्वनि बैरी। आयोजन स्थल पर लाउड स्पीकरक ध्वनि आ प्रकाश सँ जगमग, एनामे एक गोटाक पग डगमग होइत अ'ढ़-घात मे कात जा बैसल। आँखि मुनने। तौनी सँ मुंह झँपने, घार खसौने। अरौब्बा ! की भ' गेलै !


ओह, ई तS भनकी, रमकी सँ बढ़ि कए सनकी भ' गैल। अस्तु, साध्ये की ? के देखैए नाच तमेशा एहिठाँ त' तेसरे रङताल। हारि-दाड़ि मित्र के साइकिल पर लादि कोहुना सरिसब धरि आनल। ताबत एकटा बस अयलै। कंडक्टर के ऐ अनुरोधक सङ्ग जे हिनक मोन खराप भ' गेलनिएं, पैटघाट उतारि देबन्हि, ओइ मित्र केँ बसमे चढाय बिदा कयल, आ शेष दुनू मित्र साइकिल सँ घर घुमलहुं। अनठा-पनठा, बहन्ना बनबैत सुति रहलहुं।


परात भेलै। ओइ मित्रक माय खरोस मे अयली, अपन बेटाक मादें। हम दुनू गुम्म चिंतासँ जे कत' चल गेलै आ ड'र सँ जे की जबाब देबै। फूसि बजैक ताबत् ओतेक प्रैक्टिस नै रहय, अभ्यस्तो नञि रही, मुदा ओकर प्रारंभिक डेग बहन्ना, से बनबैक कोशिश मे कहलियै - "ओकर सार भेटल रहै नै मानने हेतै, अपना ज'रें ल' गेल हेतै। आबिए जाएत" - ई कहि कोनहुना हुनका टारि विजयबोधक अनुभव कयल। मुदा, हाय रे कपार ! घंटे-दू घंटाक फेर अयली। “कत' बौआ के छोड़ि देलियै अहाँ सभ। हम छोटका केँ पठौने रहियै ओकर सासुर। ओत' कहाँ गेलैए ?" 


आब त' शोनिते सुखा गेल। मित्रक चिंता फराके, आ हुनक आशंका, चिंता, भय लोकक निन्न हरण क' दैछै। आशंका नाना प्रकारक शंका उपजबैए। चिंता चित्त चंचल क' दैए। भयातुर लोक सदति चौंकले रहैए। एहेन परिस्थिति मे लोक सुतबाक उपक्रम मे आँखि मूनि त' लैए, मुदा निसभेर हएब असम्भव।

                             

ओइ मित्रक पछिला विजयापानानुभव आओरो विचलित क' देने रहय। अपना पर क्षोभ सेहो रहय, जे ओकरा एकसर किए आब' देलियै। एक गोटा अपन साइकिल कतहु गर लगाय सङ्ग भs' गेल रहितियै त' एना नै ने होइतइ। तखन की बूझल रहय ओकरा भांग नै पचै छै, ओकरा रोकलियै ने किए, मना किए ने केलियै... आदि आदि आशंका।

                       

आगां के खिस्सा सौं पहिने क्षेपक मे पछिला इतिवृत्ति कहि दी।पहिने सी एम कॉलेज, दरभंगा (ध्यान रहय, ताबत् तीन भागमे नञि बँटायल रहै, हँ ब्लॉक अलग अलग कहबै) मे उच्चाङ्क सँ द्वितीयश्रेणीमे उत्तीर्ण परीक्षार्थी के बाइलोजी मे नामाङ्कन भ' जाइ आ मारबाड़ी कॉलेज (सम्प्रति भारती-मण्डन कॉलेज) मे तृतीयो श्रेणी बलाकेँ। बेसी छात्र सएह पढ' चाहय। अभिभावकोक सएह अभिलाषा ।अस्तु, ई विषयांतर बात। हमर ओ मित्र मेधावी रहथि। मेडिकल कॉलेज मे प्रवेश लेल प्रतियोगिताक पहिल आयोजन भेल रहै, जै मे ओहो शामिल भेल रहथि।


एहिना एकदिन कोनो बहन्ने विजियायोजनक बाद टहलैले पैटघाट गेल रहथि। तहिया ओइ परिसरक लोकलेल पैटघाट एकमात्र जुटानी स्थल रहैक।ओतहि अकस्मात् अखबार पर नजरि पड़लनि, उनटा के नंबर देखलखिन। आनंदातिरेक मे उछलि गेलाह। सभके् खुशखबरि सुनाय, एक मटकूरी रसगुल्लाक सङ्ग श्रद्धेय मास्टर साहेब (हमरालोकनिक विद्यालयक पूर्व प्रधानाध्यापक) केँ गोड़लागि हुनक आशीष, बधाइ पौलनि। सौंसे परोपट्टा अनघोल भ' गेलैक। लोकक करमान लागि गेलनि हुनक दलान पर भोरे सँ। मुदा अपने ई निसभेर सूतल। जखन दिन चढ़लै, निन टुटलन्हि। हिनका किछु मोने ने रहनि। मुदा, लोकसभ जखन मोन पाड़य लगलनि तँ दौगल गेला पैटघाट। ओइ अखबार पर फेर ध्यान देलनि। मुदा आहिरेबा ! ई तँ लॉटरी रिजल्टक नंबर सभ रहै, जेकरा विजयाप्रभावात् मेडिकल रिजल्ट बूझि नेने रहथि। फल मे फल इएह जे किछुदिन कंछी काट' पड़लनि।

             

तेँ, विशेष चिंता, क्षोभ त' रहबे करय, काल्हि हिनक मायक सामना कोना करब, अभिभावक बुझताह त' फज्झैतासव, रेबाड़बटी आ कनैठीमायसिनक ड'र फराक।तेँ, परात लेल अपनाकेँ दृढ़ करबाक प्रयासक तानी-भरनी मे ओझरायल राति गमाओ।

                      

“होइहें सोइ जो राम रचि राखा" आ "जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई"। भेबो केलै सएह। पराते मातर हुनक माय जूमि गेलीह। फेर वएह जिज्ञासा मुदा उलहन उपरागक सङ्ग। काँट गड़ै छै त' काँटे सँ बहार कयलजाइ छै। एक फूसिके झँपै लेल दोसर फूसिक सहारा लेब' पड़ै छै। कहलिअनि "अन्हार रहै, रस्तो गड़बड़ छै। ओ अपनहि कहलनि अहाँ सभ साइकिल सँ जाउ, हम सरिसब मे बस ध' लैत छी। हमहु लोकनि एही छगुंता मे छी आखिर ओ कतय गेला"। आनो आनो लोक बाजय लगलै "कोनो नेना-बालक तS' छै नै। देखियौ कनीकाल। आबिए जेतै"।

                        

सएह भेलै। दसबजेक लगभग कोलाहल भेलै जे ओ आबि गेलै। भरिटोल अनघोल, दलान पर करमान लागल। लोक पूछै, मुदा ओ किछु बजबे नै करै। हमरा सभ केँ साधन्से नै जे ओकर दलान पर जाइ। सोचल, एकान्त मे सविस्तर बूझि लेब। ताबत् थम्ह्ह हे मोन...


उत्कंठा मनुखक चैन हरण क' लै छै। छटपटी मे कहुना दिन बितबैत रही, जे साँझमे एकान्त भेंट हएत त' सवित्सर जनतब लेब। से जतबा छटपटी हमरा दुनू केँ, ततबए हुनको जिनका विजयापानक दिव्यानुभव भेल रहनि। ओहो व्यग्र रहथि अपन अनुभूति कथा बिलहैले। हुनकर उत्कंठा किछु बेसिए तीव्र रहनि।

                     

गोधूलि बेर रहै, मुखांध नहिं भेल रहै। ताबत देखल ओ मुस्कियाइत, स्मित हासें झटकल आबि रहलाहे, हमरे सभक आवास दिशि। काल्हि सँ दाबल जिज्ञासा एकाएक मुखर भ' उठल। समवेते स्वरमे पुछलियनि " की भ' गेल रहय?"


आब हुनकहि मूंहें सूनल जाय - “अहाँ सभ सरिसब मे हमरा बस पर चढ़ाय देलहुं ।हमर हालति की रहय, से अपनहुं नञि बुझलियै। तौनी ओढ़ि घसमोरि जे बैसलहुं से लगैए सुतागेल। जखन अरड़िया संग्राम पहुंचलहुं, चाँकि भेल। कंडक्टर ओतहि उतारि देलक। अन्हरिया राति, अनचिन्हार जगह, केओ सरोसम्बंधी नहि, कत्त जाउ ? ताबत् एकटा छोटछिन असोरा पर नजरिगेल जै पर एकटा अखरा चौकी धयल रहै। तौनी रहबे करय, ओढ़ि, घसमोड़ि पड़ि रहलहुं। विजया सवारे रहथि तत्काल आँखि लागि गेल।

                      

कतू रातिमे, जखन जाड़ पछारलक, निन्न उचटि गेल। एक मोन हुअए घरवारी केँ उठबिअनि आ एकटा अतिरिक्त ओढ़ना माँगि लिअनि। मुदा अपरिचित जगह, अनचिन्हार लोक, निशाभाग राति, साधंस नहिं भेल। अस्तु, बैसले बैसल परात होइक प्रतीक्षा करबे समीचीन बुझायल। जतs चौकी पर बैसल रही, ठीक ऊपर एकटा जंगला (छोटसन खिड़की) रहै, दुपटिया। पट्टा भिरकाएल रहै। मुदा, तरका ऊपर आ उपरका त'र, तेँ गवाक्ष बनल रहय। अंदर सँ ढिबरीक मद्धिम प्रकाश मे, बुझना गेल जे दू व्यक्ति कम्बल मे लटपटाएल सूतल छै। कम्बलक त'रमे किछु उकस-पाकसक आ हलचलक भान भेल। एहना परिस्थिति मे निन्नक सभ सम्भावना समाप्त।


कोनहुना परात कयल आ पहिले घुड़ती बस सँ आपस अयलहुं।"...अपन आपबीती सुनबैत कहलनि "हे आब कान मोचरै छी। फेर नाढ़ो बेल त'र !"

                        

आइ उपरोक्त पाँचो मित्र अपन-अपन जीबन मे पोता-पोती, नाति-नातिन सङ्ग आनंदमय जीवन जीबि रहल छी। सभ "सर", "अर" भs यशस्वी जीवन बितौलन्हि, हमहींटा "टर"रहि गेलहुं। चारि मित्र हमरा सङ मुखपोथियो सँ जुड़ल छथि। मुदा, भुक्तभोगी मित्रक नाम नहि लेब, किन्नहु ने.... :)