Showing posts with label #खिस्सा-पिहानी. Show all posts
Showing posts with label #खिस्सा-पिहानी. Show all posts

Saturday, 5 September 2026

नाट्यकलाकार रमेशचंद्र जीक जुबानी नाटकक रपटि - बड़ मुश्किल छै


काल्हि (शुक्र दिन, 04 सितंबर, 2026) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी छल आ ताहिपर भदवरिया अपन विकराल रूप सेहो देखा रहल छल। एहेन स्थितिमे लोककें प्रेक्षागृह धरि घीचिकें आनब ठीके बड़ मोसकिल छल। मुदा, एहि मोसकिल सन काजकें आसान बनओलनि श्री रौशन झा जी। हम बात कऽ रहल छी नई दिल्लीक मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटरमे सायं साढ़े छओ बजेसँ मंचित होमय वला मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर। नाटकक प्रति (करबाक नहि, मात्र देखबाक आ कहिओ काल खेलयबाक रुचि नेनपनसँ रहल अछि, तैं, फेसबुकपर भेटल हकारकें स्वीकारैत हमहूँ ससमय श्री राम सेंटरक प्रेक्षागृहमे पहुँचि गेलहुँ। प्रेक्षागृहमे प्रवेशोपरांत देखल जे सामने वला सीट सभपर एक टा दुपनियाँ बुकलेट राखल अछि। भेल जे ई सीट सभ आरक्षित ने हो तैं, पाछू वला सीट दिस बढ़लहुँ तँ देखल जे हमरासँ पहिनहि ई बुकलेट ओतहु विराजमान अछि। पछाति बुझबामे आयल जे उक्त बुकलेट प्रत्येक सीटपर दर्शक सभक अवलोकन हेतु राखल गेल अछि। ई देखि नीक लागल। एकर लाभ ई भेल जे नाटक संबंधी जानकारी लेल किनको तंग नहि करय पड़ल। सभ टा जानकारी चारि पृष्ठक ई दुपनियाँ बुकलेटमे समेटल छल। बुकलेटक पहिल पृष्ठपर एक टा क्यूआर कोड सेहो अंकित छल आ लिखल छल जे एहि कोड केर माध्यमसँ आर्थिक सहयोग कएल जा सकैछ। 

अखन पूर्वनिर्धारित समयानुसार नाटकक मंचन होयबामे किछु मिनट शेष छल। एहि बीच श्री रौशन जी उद्घोषना केलनि जे समयक विकटता देखैत नाटकक मंचन सायं सात बजेसँ होयत कारण, बहुत गोटे ट्रैफिक जाममे फँसल छथि। एहि समयक सदुपयोग किछु परिचित लोकसभसँ भेंट-घांटमे कएल। आब समय लगभग पौने सात बाजि रहल छल। एकबेर पुनः रौशन जी सभसँ मुखातिब होइत सूचना देलनि जे उक्त नाटकक अवधि जे पहिने एक घंटा दस मिनट छल, आब बढ़िकऽ दू घंटा बीस मिनट भऽ गेल अछि। हुनका द्वारा ई सूचित करब जे उक्त नाटक एहिसँ पहिने भारतक अन्यान्य शहर सभमे दर्जन भरिसँ बेसी बेर मंचित भऽ चुकल अछि, हमर उत्कंठाकें बढ़बय वला छल। हम मोने-मोन खूब प्रसन्न भेलहुँ जे भने हम विस्तृत नाटकक मंचनक साक्षी बनब। 


आब नाटकक मंचन आरंभ होमय वला छल, मुदा, ताहिसँ पहिने हालहिमे दिवंगत स्व. पं. कौशल झा जीक स्मृतिमे एक मिनट केर मौन राखि हुनका श्रद्धांजलि देबाक आह्वान कएल गेल। तदुपरांत, प्रेक्षागृहमे उपस्थित सभ गोटे ठाढ़भऽ दिवंगत आत्माक प्रति एक मिनट केर मौन राखि हुनका प्रति अपन श्रद्धांजलि अर्पित केलनि। एकबेर फेर पं. कौशल जीक संग बितायल किछु अविस्मरणीय पल जीवंत भऽ उठल आ आँखि डबाडबा गेल। जगत जननी जानकी हुनका अपन शरणागति प्रदान करथि !

ठीक छओ बाजिकऽ पचास मिनटपर चिरप्रतीक्षित मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर मंचन आरंभ भेल। मंचपर बरियातीक दुआरि लगबाक दृश्य उपस्थित छल आ संगहि डीजे पर भोजपुरी गीतक बोलपर थिरकैत धिया-पुता, युवा आ कनियाँ-बहुरिया। कहबाक प्रयोजन नहि जे डीजे पर कोन तरहक गीत बाजि रहल छल। एतय नाटकक मूल विषय बूझब आवश्यक अछि। नाटक आधारित अछि मिथिला क्षेत्रमे व्याप्त पलायन आओर मिथिलासँ बाहर भेल मैथिलक विवाह केर बाद उत्पन्न नाना तरहक विसंगति सभपर। नाटकक नायक समुन जे मैथिल छथि आ गामसँ पलायनक पश्चात दिल्लीमे रहैत छथि, हुनक विवाह (जेकि प्रेम-विवाह थिक), मिथिला क्षेत्रसँ बाहर होइत अछि। कन्यागतक ओहिठाम विधि-व्यवहारक अंतर एहि विसंगति दिस पहिलुके दृश्यसँ दृष्टिगोचर होमय लगैत अछि। खैर जे से, जेना-तेना मान-मनौव्वलक बाद विवाह संपन्न होइछ आ पहिल दृश्यक पटाक्षेप होइत अछि।

तदुपरांत, नगहर भरबाक मनोहारी दृश्य आ दुरागमनक पश्चात नवकनियाँ द्वारा सासुरमे निमाहल जाय वला नाना तरहक विधि-व्यवहार आ ताहिमे होमयवला विसंगतिक जीवंत मंचन, दर्शक-दीर्घामे उपस्थित समस्त दर्शककें गुदगुदा रहल छल। नहुँ-नहुँ नाटक अपन गति पकड़ैत अछि। आगूक दृश्य सभमे देखाओल जाइत अछि जे कोना एक टा परदेसी परिस्थितिवश गाममे रहय वला अपन माय-बापसँ दूर होइत चलि जाइत अछि। परिस्थितिक भयावहता तखन आओर झकझोरि दैत अछि जखन देखबामे अबैत अछि जे कोना एक टा लायक बेटा चाहिओकऽ माय-बापकें मुइलाक पछाति मुखाग्नि धरि नहि दऽ पबैत अछि। नाटकक संपूर्ण व्याख्या करब तँ संभव नहि, मुदा, एतबा कहल जा सकैछ जे ई पलायनक बाद समाजमे आएल नाना तरहक विसंगति दिस जोरदार ढ़ंगसँ सभकें आकृष्ट अवश्य करैत अछि।

आब अबैत छी नाटकक कलाकार दिस। हमरा तँ सभ कलाकारक अभिनय उत्कृष्ट लागल। खाहे नाटकक नायक, सुमन केर भूमिकामे श्री विजय झा होथि वा नायिका, गायत्रीक भूमिकामे सुश्री रचना दास। को बड़-छोट कहत अपराधू सन स्थिति अछि। दुनू गोटे अपन अभिनय-कौशलसँ बेस प्रभावित केलनि। नायकक माय, काकी केर कथे कोन। काकी केर भूमिकामे आदरणीया नीरा झा जीक अभिनय-कुशलताक वर्णन करब हमर बूतासँ बाहरक बात अछि। बुकलेटसँ ई जनतब भेटल जे नीरा जी दिल्लीमे सक्रिय मैथिल महिला कलाकारमे सभसँ बेसी अनुभवी छथि आ अखनि धरि सयसँ बेसी मैथिली नाटक आ फिल्ममे अपन अभिनयक छाप छोड़ि चुकल छथि आ से देखबोमे आयल। हुनक अभिनय वर्णनातीत अछि, देखनहि बनय। 

हँ, एतबा अवश्य कहब जे भरि नाटकमे हमर आँखि दू बेर नोरा गेल आ से ई दुनू माय-बेटा दुआरे। गामक बहिनपा सभक उतरा-चौल, उकटा-पैंची आ कनफुसकीकें मंचपर जीवंत केलनि तीन टा स्त्रीक भूमिका निमाहनारि मिथिलाक तीन टा धिया सुश्री नेहा झा, आकांक्षा झा आ कल्पना। हिनका सभक त्रयी, दर्शकसभकें नाटकमे परिस्थितिजन्य उत्पन्न भेल अवसादसँ नहि मात्र निकालबामे सफल भेल, अपितु, सभकें ठहक्का लगबै लेल विवश कऽ देलक। हिनका सभक अभिनय-कौशल देखि ई कहल जा सकैछ जे ई सभ आबय वला समयमे अभिनयक क्षेत्रमे अपन एक टा अलग आ महत्वपूर्ण प्रतिमान गढ़बामे अवश्य सफल हेतीह। 

नायकक पिता, मनोज बाबूक भूमिकाकें जीवंत केलनि भाई हेमंत झा जी। साहित्यिक चौपाड़िसँ लऽकऽ मैथिली साहित्य महासभा (मैसाम) धरिक हिनक यात्राक साक्षी रहितहुँ ई कहाँ बूझल छल जे ई एतेक मांजल कलाकार छथि। हिनक ई रूप हमरा अचरजसँ भरि देलक ताहिमे कोनो संशय नहि। सहनायक, रोहितक भूमिकाकें जतेक सहजतासँ श्री सत्यम काश्यप जी मंचपर जीलथि ओ हुनक सात वर्षक रंगकर्म आ सत्तरिसँ अधिक स्टेज शोकें परिलक्षित कऽ रहल छल। नायिकासँ भैंसुरक रूपमे हिनक लजेनाई, दर्शक-दीर्घाकें लहालोट करैत रहल। भूमिका छोट होइतहुँ अपन अभिनय-कौशलसँ दर्शककें कोना अपना दिस आकृष्ट कएल जाय, ई श्री पंकज मिश्र जीसँ सीखल जा सकैछ। सेल्समैनक छोट सन मुदा प्रभावी पात्रकें अपन ग्रामीण रंगमंचक अनुभवसँ जीवंत कए दर्शक सभक थोपड़ीकें खूब हंसोथलनि श्री पंकज मिश्र जी। आदरणीय विद्यानंद ठाकुर जीकें नायिकाक पिताक रूपमे देखब एक टा सुखद अनुभूति छल। ओ रामलीलामे नाना तरहक भूमिकाकें निमाहि चुकल छथि से जनतब हुनकहि द्वारा नाटकक मध्यांतरमे भेटल। ई तँ भेल नाटकक मुख्य पात्रक संक्षिप्त परिचय जे हम अपन अनुभव आ अल्पज्ञानसँ आहाँ सभक समक्ष रखलहुँ। 

ई समस्त परिचय देब ताधरि नहि पूर्ण होयत जाधरि एहि नाटकक सूत्रधारक भूमिका सहित संपूर्ण नाटकपर अपन अमिट छाप छोड़िनिहार हरफनमौला कलाकार श्री अजित झा जीक चर्च नहि होयत। अहा! की प्रतिभा छनि, अप्रतिम! ई दिल्लीक रंगमंचक खास चेहरा छथि जे अपन निर्देशनसँ भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालयक अधीन संस्था, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी) द्वारा आयोजित विश्वप्रसिद्ध नाट्यमहोत्सव, भारत रंग महोत्सव (भारंगम) मे अपन झंडा गाड़ि, कुशल नाट्य-निर्देशकक रूपमे स्थापित भऽ चुकल छथि। हिनक अभिनयकें प्रत्यक्षतः अनुभव करब कम रोमांचकारी नहि छल। असगरे कोना नाटककें आगू बढ़ाओल जा सकैछ, ई हिनक अभिनय-कौशल देखि बूझल जा सकैछ। कुल मिलाकऽ हम ई कहि सकैत छी जे काल्हुक समय हमरा लेल अत्यंत फलदायी रहल। एक टा नीक नाटकक संग कतोक हित-अपेक्षित सभसँ प्रत्यक्ष दर्शनक लाभ भेटल। किछु नव लोक सभसँ सेहो परिचिति भेल। नाटकक सफल मंचन हेतु रौशन जी समेत समस्त कलाकार, खाहे ओ मंचपर अपन अभिनयक जादू देखाबय वला होथि वा नेपथ्यमे रहि एहि आयोजनकें संपूर्णता प्रदान केनिहार/केनिहारि होथि - सभकें खूब रास बधाई आ अशेष शुभकामना ! 

नाटकक मार्फत किछु बात जे पहिने हम सोचलहुँ जे नहि रखबाक चाही, मुदा, अंततोगत्वा एहि निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ जे अगबे मधुर परसब उचित नहि, किछु नोनगर आ चहटगर सेहो हेबाक चाही । एक टा आम दर्शकक रूपमे एहि नाटककें हम कोन रूपें देखल, तकर सबल पक्ष तँ अपने सभक समक्ष राखि चुकलहुँ। आब, एकर कमजोर पक्षकें, जाहि पर हमर नजरि पड़ल, ओ एहि उद्देश्य आ आशासँ राखि रहल छी जे जौं उचित बुझना जेतनि तँ भविष्यमे उक्त नाटकक मंचन काल निर्देशक महोदय एहि कमीकें दूर करबाक प्रयास करता। नाटकक आरंभसँ पहिने रौशन जी कहलनि जे ई नाटक पूर्वमे एक घंटा दस मिनट केर छल जकरा बढ़ाकए दू घंटा बीस मिनट कएल गेल अछि। 

शुरूमे हम आशान्वित रही जे किछु नव विषयवस्तु जोड़ल गेल हेतैक, मुदा, नाटकक समापनक पश्चात ई कहबामे हमरा कोनो असौकर्य नहि अछि जे नाटककें अनावश्यक रूपें नमारल गेल अछि। कम अवधिमे कसगर कथानक राखि ओकर प्रभावी प्रस्तुति बेसी आवश्यक, नहि कि एकहि संदेशकें अलग-अलग ढ़ंगसँ कहब। एहिसँ हमरा सन अबूझ दर्शक खौंझा जायत । दोसर कमी छल सूत्रधारक सहीसँ उपयोग नहि करब। एहेन मांजल कलाकारकें नाटकक अव्यवस्थित तारतम्यता असहज करैत छै। सूत्रधार द्वारा घटनाक्रमक विवरण आगू-पाछू करब असहज करय वला छल। तेसर कमी संवादक असंगत (Contradictory) होयब रहल। जखन नायक, सुमन आ सहनायक रोहितकें पहिलबेर भेंट होइत छैक तँ रोहित द्वारा पहिने कहल जाइत छैक जे ओ असगरे रहैत अछि दिल्लीमे, मुदा, किछुए कालक बाद ओही दृश्यमे ओकर कथनसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ओकर कनियाँ सेहो दिल्लियेमे रहैत छै। एहि तरहक असंगतिसँ बचब जरूरी। 

अंतमे, सभसँ पैघ असंगति नाटकक मूल विषय लऽकऽ अभरल हमरा। मूल विषयानुसार लोककें अपनहि क्षेत्रमे विवाह-दान करबाक चाही नहि तँ आन क्षेत्रक कनियाँ भेने नाना तरहक विसंगतिक सामना करय पड़ैत छै, यथा- ओ घर-दुआरि, सर-समाज आ माय-बापसँ दूर कए दैत छै। मुदा, जखन रोहित द्वारा सुमनक मार्फत गाममे अपन माय लेल कंबल पठयबाक आग्रह कएल जाइत अछि तँ ओ कहैत अछि जे ई बात हमर कनियाँ ने बूझय। एतय ई बात ध्यातव्य जे रोहितक विवाह अपनहि क्षेत्रमे भेल छै। जखन कि नाटकमे ई देखबामे सेहो आयल जे सुमन केर पत्नी द्वारा सुमनकें कहियो अपन माय-बापक सहायता लेल मना नहि कएल गेल छल। आब ई कहू जे रोहित द्वारा ई कहब जे कंबल पठयबाक बात ओकर पत्नी नहि बूझय, की नाटकक मूल विषयक विपरीत नहि जाइत अछि? 

कहबाक तात्पर्य जे व्यवहार कुशलतामे तँ रोहितक कनियाँसँ बेसी नीक सुमन केर कनिया साबित भेलीह। तखन नाटकक मूल विषयमे सँ एक विषयकें उक्त नाटकक एकटा पात्र द्वारा कमजोर करब भेल की नहि?  नाटकक तकनीकी पक्षक विषयमे हमरा कोनो ज्ञान नहि अछि, तैं ओहि मादे किछु नहि कहि सकब। मुदा, एक टा बात आओर अखरल ओ छल - एक टा दृश्यमे तीनू स्त्री द्वारा आपसी संवाद कालक आपसी दूरी... उक्त दूरी कोरोना कालकें मोन पाड़ि रहल छल। 

आशा अछि हमर ई नीक-बेजाय अनुभव अपने लोकनिकें नीक लागत। - रमेश चंद्र झा

Thursday, 5 December 2024

जब बाल मंडली ने अंग्रेजों के प्रतिकार के लिए चाकू खरीदा

बात 1947 की है। लहेरियासराय दरभंगा में एक इंग्लिश मीडीयम स्कूल हुआ करता था - "गुरु ट्रैनिंग स्कूल" - यह स्कूल इलाके भर में गुलटेनी स्कूल के नाम से प्रसिद्ध था। उस वक्त देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ वैसा ही महौल था जैसे आज देश भर में इन्डी ठगबंधन के खिलाफ है। इसका असर उस मिडिल स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों पर भी था। 9-10 लड़कों के झुंड ने अंग्रेजों के खिलाफ गुप्त मीटिंग कर एक मंडली बनाई जिसका नाम रखा गया "भारत बालमंडली"। ये सब लड़के समय समय पर आपस में मिलते और आजादी की लड़ाई संबंधी बातों पर गुपचुप बतियाते।

एक दिन की बात है, इन बच्चों की मंडली में एक सवाल अनुत्तरित हो खड़ा था - "यदि किसी अंग्रेजी अधिकारी ने हमें परेशान किया तो हम क्या करेंगे ?" गहन विचार विमर्श के बाद बाल बुद्धियों के झुंड ने निर्णय लिया की हम एक चाकू खरीदेंगे और ऐसी किसी भी परिस्थिति में इस चाकू से अंग्रेजों का प्रतिकार करेंगे। विषय गूढ और गंभीर था सो इसके इस्तेमाल हेतु बाल मंडली की उसी बैठक में एक कानून भी पास हुआ - यह चाकू बारी बारी से सभी मित्रों में पास होती जाएगी ताकि सब बराबर के हकदार और जिम्मेवार हों।

बच्चों द्वारा आपस में पैसा जमा होने लगा और फिर एक दिन बाजार से चाकू भी खरीद लिया गया। संयोगवश थोड़े समय बाद देश आजाद हो गया और यह चाकू अप्रयुक्त ही रह गया। नहीं नहीं, जैसे फोटो सेशन के माध्यम से गोपला जी ठाकुर और पपुआ जी जादो यह दावा करते हैं कि क्रमशः दरभंगा और पूर्णियाँ हवाई अड्डा का निर्माण उनकी ही वजह से हुआ वैसे मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कह रहा की देश इस मंडली के चाकू खरीदने से ही आजाद हुआ था।


क्या आपको पता है कि वो कौन सा एक दरभंगिया इस मंडली का सदस्य था जो आगे चलकर मैथिली साहित्य का एक मजबूत स्तम्भ साबित हुआ ? जी, इस मंडली में थे कबिलपुर, लहेरियासराय के स्व. रामदेव झा, जो आगे चलकर न केवल मैथिली साहित्य के ध्वज वाहक बने बल्कि मैथिली साहित्य में राष्ट्रवादी विचारधारा के जनक भी रहे।
प्रवीण कुमार झा
05/12/2024 
वडोदरा, गुजरात 

Friday, 8 March 2024

पार्वती द्वारा वरदान का दान और शिव-पार्वती ब्याह में कुल परिचय विधान


...हाँ, तो कई वर्षों तक चली माता पार्वती की तपस्या को देख महादेव प्रकट हुए. बोले - मांगिये जी, क्या चाहिए... आपको ? माता ने अपनी मनोकामना बतायी, प्रभु तथास्तु बोल अंतर्धान हो लिए.


अगले ही पल एक घटनाक्रम सामने था की एक बालक एक मगरमच्छ के चंगुल में फंसा था और वो माता पार्वती से अपनी जान बचाने की गुहार लगा रहा था. आनन फानन में बात ये तय हुई की यदि माता अभी अभी मिले वरदान का फल दे देवें तो बच्चे की जान बचे. समस्या विकट थी. एक तरफ बच्चे की जान और दूसरी तरफ कई दशकों तक की गयी तपस्या का फल.

अंततोगत्वा माता पार्वती ने बालक की जान बचाई और पुनः तपस्या पर बैठ गयीं. प्रभु पुनः प्रकट हुए, बोले - "वो बालक और मगरमच्छ मैं ही था..." माता जी को फिर से वरदान की प्राप्ति हुई...

समयोपरांत भोलेनाथ और पार्वती का विवाह तय हुआ. आज अम्बानी द्वारा जामनगर में किये आयोजन से कई गुणा बड़ा आयोजन हुआ उस वक़्त. जहाँ पार्वती की ओर से उनके माता-पिता हिमावन और मैनावती ने अपने सारे सगे सम्बन्धियों, राजा, सिपहसलार, विद्वानों और अन्यान्य विशिष्ट लोगों को आमंत्रित किया हुआ था वहीँ शिव की तरफ से सभी जंगली जानवर, गाय, बैल, सांप-बिच्छु, भुत-प्रेत, असुर सह भाष्माहुत नागा बाबा लोग मौजूद थे.

विवाह कार्य में अभी भी मिथिला में वर और वधु पक्ष के बीच पात्र परिचय सह एक दूजे के कुल के विशिष्ट लोगों का परिचय हुआ करता है. यह परिचय माता-पिता से लेकर परिवार के विशिष्ट विद्वानों और बड़े लोगों के परिचय तक जाता है. उद्देश्य ये कि दोनों घरानों को एक दूजे के परिवार का पूरा पता हो, पता चले कि वर या वधु आखिर कैसे परिवार में जा या आ रहे हैं.

इसी तरह का कुछ शिव-पार्वती विवाह में भी हुआ. माता पार्वती के पक्ष वाले अपने पुरे खानदान का ब्यौरा देने लगे. उनके पक्ष का परिचय समाप्त होते ही सबने शिव की ओर देखा. अव्वल तो उनका कोई सगा वहां था नहीं, जो थे भी वो बेचारे बोलने में असमर्थ निरीह प्राणी.

उधर माता पार्वती के माता-पिता को शिव के परिवार का परिचय चाहिए ही था. आखिर पता तो चले कि बेटी कैसे घर में ब्याह रहे. इधर शिव जी चुप्प. न घर है न कोई ठिकाना और न ही कोई चल-अचल संपत्ति.. बेचारे कहें तो क्या कहें. करें तो क्या करें.

नारद मुनि ने स्थिति की नाजुकता को भांपा, बोले - "इनका कोई नहीं !" - इस पर माता पार्वती के पिता ने पूछा - "क्या इन्हें नहीं पता इनके माता-पिता, खानदान का परिचय ?" - इस पर नारद बोले - "ऐसा नहीं है, ये तो स्वयंसिद्धा हैं, स्वयं से स्वयं का निर्माण किया है, आगे जब जो इच्छा होगी करेंगे... "

महौल में सन्नाटा छा गया. लोग महादेव के मौन और अस्पृश्य चेहरे को तकते रहे. उधर माता पार्वती अलग परेशान की अब क्या हो... नारद जी ने कन्या पक्ष से गुफ्तगू की, सारी जिम्मेवारी अपने सर ली और ब्याह का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ.

#HappyMahaShivratri

केमिकल प्रोफेशनल्स द्वारा नृत्य चर्चा - कत्थक

रसायन शास्त्र (केमिस्ट्री) मेरे लिए उबाऊ विषय रहा है. बारहवीं में इस विषय से बचता रहा मैं. चूँकि ठीक ठाक छात्र था सो पास होने में दिक्कत कभी न हुई किन्तु रदरफोर्ड, अवोगाद्रो और फैराडे में रूचि कभी न हुयी मेरी. कहते हैं आप जिस चीज से बचो वो पीछे पड़ती ही है, किस्मत ने मेरे कैरियर को केमिकल लोचे में ही ला पटका. जिदगी फैराडे लॉ के इर्द गिर्द यूँ मंडरा रही है जैसे इलेक्ट्रोन अपना विन्यास पूरा करने हेतु एटम के चारो ओर मंडराता है. 

आम लोगों के लिए रसायन शास्त्र सम्बंधित हमारी बातें वाहियात और बेवजह सा टॉपिक है. लम्बी चर्चाएँ, ट्रायल्स और परिणाम में अप्रत्याशितता इसके प्रति लोगों को और उदासीन बना देती है. पिछले कुछेक महीनों से एक बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहा हूँ. केमिकल लोचा भी बड़ा और बजट भी काफी बड़ा है. एक सत्तर वर्षीय बुजुर्ग इस प्रोजेक्ट में मेरी मदद कर रहे हैं. 

यह आलेख इसी बुजुर्ग महोदय (श्रीमान अभय जी) पर केन्द्रित है. इतनी उम्र में उनके चेहरे पर व्याप्त क्यूटनेस बच्चों सा और उर्जा युवाओं वाली है. साथ ही विषय पर तो उनका ज्ञान समंदर सा है ही. मैंने कोई टॉपिक छेड़ा हो और उन्होंने मुझे इनपुट ना दिया हो ऐसा अभी तक हुआ नहीं. महोदय मराठी हैं, गुजरात में बस गए और देश विदेश में कंसल्टिंग का काम करते हैं. प्रधानमंत्री द्वारा दिए उर्जा संरक्षण प्रोजेक्ट पर पीएमओ को रिपोर्ट दे चुके हैं. 

मेरे साथ कार्य के दौरान मेरा जुझारूपन और विषय के तह तक जाने की मेरी इच्छाशक्ति उन्हें भा गयी. नतीजतन हम दोनों थोड़े मित्रवत हो गए. ये बीते कल की बात है, हम दोनों ने एक कंपनी के ED से मीटिंग रखी थी. ED साहब बड़े आदमी थे और हम दोनों समय पर, सो हमारे पास एक अनियोजित समय उपलब्ध था. सो बुजुर्ग अभय साहब हालिया अपने जयपुर और रणथम्भौर यात्रा का जिक्र करने लगे. उन्होंने पास से शेर देखने का जिक्र किया. मैंने परिवार का पूछ दिया. 


महोदय ने बताया की उनकी पत्नी नैना जी कत्थक नृत्यांगना हैं और वो दोनों अपने एक मित्र के वैवाहिक आयोजन पर जयपुर में थे. नृत्यांगना वाली बात थोड़ी अलग सी लगी मुझे तो बात आगे बढ़ी. नैना जी कत्थक पर पुस्तक लिख चुकी हैं और बच्चों को नृत्य सिखाती हैं. नृत्य पर मेरा ज्ञान इतना ही था कि मैंने उन्हें कत्थक को दक्षिण भारतीय नृत्य कह कर मुझपर हँसने का मौका दे दिया. 

हंसी मजाक और चाय के बाद उन्होंने कहा - "कत्थक उत्तर प्रदेश और राजस्थान राज्य के नृत्य हैं. लखनऊ और जयपुर घराना महत्वपूर्ण हैं.... कत्थक से सम्बंधित एक बनारस घराना भी है किन्तु बहुत छोटा और गौण." महोदय जो आजतक मुझसे केमिकल रिएक्शन, मशीनी उर्जा और पम्पिंग की तकनीक मात्र पर चर्चा करते थे आज कत्थक में लखनऊ और जयपुर के बीच का अंतर समझा रहे थे. बोलने लगे - "चूँकि लखनऊ मुस्लिम नवाबों का शहर रहा है, वहां के कत्थक में प्रोफेशनलिज्म और नजाकत अधिक रही जबकि जयपुर चूँकि हिन्दू राजाओं का क्षेत्र रहा वहां प्यूरिटी और रिदम का बोलबाला रहा. इस अंतर की एक वजह और भी है कि मुस्लिम नवाब नृत्य से अधिक भी कुछ चाहते थे सो वो इरान से नर्तकी मंगाने लगे जिसका असर कत्थक पर हुआ." 

नृत्य सम्बन्धी मुआमले पर अपने न्यूनतम ज्ञान को छुपाने को मैंने संगीत का जिक्र करते डॉक्टर प्रवीण झा जी की पुस्तक "वाह - उस्ताद" का जिक्र कर दिया. ये अलग विषय है कि उन्होंने इस पुस्तक की मांग कर दी है और मैंने उन्हें घर पहुँचाने का वादा भी कर लिया... 

उधर ED साहब को और देर हो रही थी और यहाँ कत्थक पर चर्चा आगे बढ़ने लगी थी. महोदय आगे बोले - "कत्थक नृत्य के द्वारा कहानी कहने की कला है. इसमें नृत्य और उसकी भंगिमाओं के द्वारा किसी घटना विशेष का वर्णन होता है. जैसे कृष्ण के कालिया नाग की घटना." 

बातचीत को रोचक होता देखा मैंने पूछा - "कथकली क्या कत्थक का ही कोई रिश्तेदार है ?" - वो फिर हँसने लगे, बोले - "कथकली केरला का नृत्य है जिसे मोहिनी अट्टम भी कहते हैं. भारतनाट्यम तमिलनाडु से है, कुचिपुड़ी आँध्रप्रदेश से और ओडिसी उड़ीसा से." - मैंने अधिक काबिल मैथिल बनते हुए बिहू का पूछकर उन्हें हँसने का एक और मौका दिया. वो बोलने लगे - "देखिये, एक होता है फोक (FOLK) डांस जिसे एक ग्रुप मिलकर करता है जैसे झारखण्ड का बिहू, महाराष्ट्र का लावणी आदि. जबकि फोक का सिस्टेमेटिक अपग्रेड करके बना इंडिविजुअल परफोर्मेंस डांस जिसे क्लासिकल डांस कहते हैं." 

बातचीत आगे बढती इससे पहले ED साहब की एंट्री हो गयी और हम Hazardous Waste, Recovery, ZLD जैसे मुद्दों पर अपने समय और जीवन ख़राब करने लगे... इस वादे के साथ की अगली मुलाकात नैना जी के साथ होगी किन्तु तब जब मेरे हाथ में "वाह-उस्ताद" होगी और साथ में श्रेया !