Showing posts with label #इतिहास. Show all posts
Showing posts with label #इतिहास. Show all posts

Sunday, 21 December 2025

एलियट साहब - मद्रास और दरभंगा

अभी पिछले दिनों जब मद्रास में था तो ड्राइवर ने कहा - “ये एलियट बीच है सार (सर)” - उस वक्त मानसिक व्यस्तता की वजह से मैंने ध्यान नहीं दिया। आजकल अनिंद्रा से पीड़ित हूँ सो सुबह तीन बजे इस Edward Francis Elliot जी की पड़ताल करने लगा। वो उन्नीसवीं सदी में पहले चीफ मजिस्ट्रेट और फिर बाद में सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस रह चुके थे मद्रास के। उनके पिता श्री ह्यू एलियट साहब १८१४ से १८२० के दौरान गवर्नर भी रह चुके थे मद्रास के।

अपने एलियट साहब अमीरज़ादे थे, पढ़े लिखे और बड़े आदमी भी। उनकी एक प्रेमिका हुई Isabella Napier जो संयोगवश Johnstone Napier की पत्नी भी थीं। करीब १९३० के वक्त यह हाई प्रोफाइल प्रेम प्रसंग बहुचर्चित रहा और अपने एलियट साहब ने इसाबेला के साथ विवाह करके इतिहास रच दिया। कहते हैं यह बीच उन्होंने इसाबेला के लिए बनवाया था।

जैसा की लोगों का आरोप है मैं हर बात में मिथिला और दरभंगा को खींच लाता हूँ, मेरा इलेक्ट्रॉनिक संजाल भी मुझ सा ही हो चुका है। इस पड़ताल के क्रम में मुझे एक दूसरे एलियट साहब का पता चला जो मिथिला अर्थात् दरभंगा से जुड़े हैं।

ये Elliot Macnotton साहब उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी हुए। इलियट साहब एक अच्छे प्रशासक, शिक्षाविद और मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते थे, लाजिमी है ब्रिटिश साम्राज्य के करीबी भी रहे।

उसी काल खंड में दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत उनके उत्तराधिकारी बने श्रीमान लक्ष्मेश्वर सिंह। चूँकि लक्ष्मेश्वर सिंह जी उस वक्त अल्पवयस्क थे, उस वक्त के क़ानून के मुताबिक़ उनकी राजसत्ता कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स के अधीन कर दी गई। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत एक यूरोपीय संरक्षक और शिक्षक की नियुक्ति की जाती थी, संयोगवश इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए एलियट मैकनॉटन को चुना गया।

संरक्षक और शिक्षक के रूप में एलियट मैकनॉटन का प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक रहा। वे युवराज के निकट रहते थे और उनकी शिक्षा, अनुशासन तथा नैतिक विकास की देखरेख भी करते थे। उनका दायित्व केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि एक भावी शासक के व्यक्तित्व निर्माण तक विस्तृत था। लक्ष्मेश्वर सिंह को जहाँ अंग्रेज़ी शिक्षा, विधि, अर्थशास्त्र और आधुनिक प्रशासन की समझ दी गई वहीं उनके अंदर सार्वजनिक दायित्व और उत्तरदायी शासन की भावना भी विकसित की गई।

एलियट मैकनॉटन को अन्य औपनिवेशिक शिक्षकों से अलग करने वाली बात यह थी कि वे स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान रखते थे। एक अंग्रेजी प्रशासक के अधिकारी होने के बावजूद कभी भी उन्होंने मैथिली परंपराओं या संस्कृत अध्ययन को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। उनके समय में पारंपरिक विद्वानों को युवराज को शिक्षा देने की अनुमति दी गई और पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ देशज परंपराओं को भी संरक्षित रखा गया।

आधुनिक ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता के इस संतुलन ने लक्ष्मेश्वर सिंह के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। इस शिक्षण और मार्गदर्शन का प्रभाव तब स्पष्ट हुआ जब महाराजा ने दरभंगा राज का दायित्व संभाला। लक्ष्मेश्वर सिंह अपने समय के सबसे प्रगतिशील ज़मींदारों में गिने जाने लगे। वे अपनी उदार दानशीलता, शिक्षा के प्रति समर्थन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अकाल राहत और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण के लिए व्यापक रूप से सम्मानित हुए। इतिहासकार मानते हैं कि उनकी सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण उनके निर्माणकाल में एलियट मैकनॉटन के सान्निध्य का ही परिणाम था।

सो ये थे एलियट साहब !

(तस्वीर एलियट इसाबेला बीच की है।)

राजकमल चौधरी : साहित्य परिचय और विद्यापति से तुलना

मैथिली साहित्य का इतिहास केवल परंपरा-संरक्षण का इतिहास नहीं है, बल्कि वह परंपरा से टकराकर नई चेतना के निर्माण का भी इतिहास है। इस संदर्भ में जहाँ एक ओर विद्यापति मैथिली साहित्य के शास्त्रीय और सांस्कृतिक आधार-स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हैं, वहीं दूसरी ओर राजकमल चौधरी आधुनिक मैथिली चेतना के सबसे निर्भीक, प्रयोगधर्मी और विवादास्पद प्रतिनिधि के रूप में उभरते हैं।

यदि विद्यापति मैथिली कविता की गेय और रसात्मक आत्मा हैं, तो राजकमल चौधरी उसकी आधुनिक बेचैनी, प्रश्न करने की आकुलता और आत्मसंघर्ष का स्वर हैं। इन दोनों ध्रुवों के बीच मैथिली साहित्य की निरंतरता और विकास की धारा प्रवाहित होती रही है।


राजकमल का जीवन संघर्ष और व्यक्तित्व
राजकमल चौधरी का जन्म सन् 1929 ई॰ में हुआ और उनकी मृत्यु 1967 ई॰ में अल्पायु में ही हो गई। उनका जीवन निरंतर आर्थिक अभाव, जीवन यापन के संसाधनों में अस्थिरता, मानसिक तनाव और सामाजिक उपेक्षा से ग्रस्त रहा। स्थायी जीविका के अभाव और साहित्यिक अस्वीकृति ने स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक चेतना पर गहरा प्रभाव डाला। उनके कड़वे जीवनानुभवों ने उनके साहित्य को कल्पनात्मक नहीं बल्कि अनुभवात्मक बनाया। राजकमल चौधरी की रचनाएँ वस्तुतः उनके जीवन-संघर्ष का प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं।

रचना-दृष्टि और लेखन का स्वर
राजकमल चौधरी साहित्य को सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि सत्य का साक्ष्य मानते हैं। उनके लेखन का स्वर मूलतः प्रश्नाकुल, असहज और प्रतिरोधी है। उनकी रचनाओं में भूख, बेरोज़गारी, अकेलापन, यौन-कुंठा और सामाजिक पाखंड जैसे विषयों की मुखरता रही। साथ ही यह विषय मैथिली साहित्य में पहली बार स्पष्ट, निर्भीक और अनावृत रूप में उपस्थित हुए। उनकी कविता पाठक को सांत्वना नहीं देती, बल्कि उसकी चेतना को झकझोरती है।

रचनाओं में देह-बोध और स्त्री-चेतना
राजकमल चौधरी के लेखन का सबसे अधिक विवादास्पद पक्ष उनका देह-बोध है। वे देह को पाप नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। उनकी कविता में स्त्री आदर्श नहीं है और कोई प्रतीक भी नहीं है बल्कि उनके हिसाब से स्त्री पीड़ित, अकेली, संघर्षशील और सचेत जीव है। यही वजह है कि उनकी रचनाओं पर “अश्लीलता” का आरोप लगाया गया। किंतु आधुनिक आलोचना इस देह-बोध को नैतिक पाखंड, सामाजिक दंभ और पुरुषसत्तात्मक दृष्टि के उद्घाटन के रूप में देखती है।

राजकमल चौधरी की अनेक कविताएँ किसी एक शीर्षक के कारण नहीं, बल्कि उनके समूचे काव्य-स्वर के कारण विवादित रहीं। उनकी रचनाओं में चुंबन, स्पर्श, देह की थकान, यौन-कुंठा और शारीरिक अकेलेपन जैसे अनुभवों का प्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है। उस समय मैथिली साहित्य में इस प्रकार की भाषा और विषय-वस्तु असाधारण मानी जाती थी। हालांकि उनकी रचनाओं का यह देह-बोध दरअसल मनुष्य की अपूर्णता, असंतोष और सामाजिक दबावों की अभिव्यक्ति है, न कि केवल कामुकता। 

तुलनात्मकता से उपजता विवाद 
राजकमल चौधरी को कई बार मैथिली का धूमिल या फिर मैथिली का दुष्यंत कुमार कहा गया। इस तुलना ने पारंपरिक विद्वानों में असंतोष उत्पन्न किया, क्योंकि वे राजकमल को विद्यापति परंपरा से विच्छिन्न मानते थे। वस्तुतः यह विवाद इस प्रश्न से जुड़ा था कि क्या मैथिली साहित्य केवल सौंदर्य और भक्ति तक सीमित रहेगा या फिर वह आधुनिक सामाजिक यथार्थ से भी संवाद करेगा। 

राजकमल चौधरी का विवाद उनके साहित्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी साहसिक आधुनिकता का प्रमाण है। उन्होंने मैथिली कविता को वह सारे विषय दिए, जिनसे समाज कतराता था और इसी कारण राजकमल आज भी प्रासंगिक हैं।

राजकमल चौधरी पर समय-समय पर अश्लीलता, संस्कृतिविरोध और विद्यापति-परंपरा से विचलन के आरोप लगाए गए। उनकी कविताओं का मंचीय निषेध और पत्रिकागत आलोचना इस विरोध के प्रमाण हैं। हालांकि यह समूचा विवाद परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष का परिणाम था न कि उनकी रचनात्मक दुर्बलता का।

राजकमल की प्रमुख रचनाओं का विश्लेषण 

|| स्वरगंधा : देह और स्त्री-स्वातंत्र्य का प्रश्न ||

विवाद का कारण - काव्य-संग्रह स्वरगंधा राजकमल चौधरी की सबसे अधिक विवादित कृतियों में गिना जाता है। इस संग्रह में स्त्री-देह का प्रत्यक्ष चित्रण, कामना, अकेलापन और अधूरी तृप्ति जैसे अनुभवों को किसी भी प्रकार के नैतिक आवरण या सांस्कृतिक अलंकरण के बिना प्रस्तुत किया गया है। उस समय के मैथिली साहित्य में इस प्रकार की निर्भीक अभिव्यक्ति अभूतपूर्व थी।

तत्कालीन प्रतिक्रिया - पारंपरिक आलोचकों ने इस कृति को अश्लील करार दिया। मैथिली समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे “संस्कृति-विरोधी” और “नैतिक मर्यादा का उल्लंघन” माना। विशेष रूप से यह आरोप लगाया गया कि राजकमल स्त्री-देह को अनावश्यक रूप से कविता का विषय बना रहे हैं। 

वास्तविक अर्थ - आधुनिक आलोचना के अनुसार स्वरगंधा की कविता कामुकता का उत्सव नहीं है, बल्कि वह स्त्री की अस्मिता, उसकी देह पर समाज के नियंत्रण और पुरुष-सत्तात्मक नैतिकता की तीखी आलोचना है। यह कृति स्त्री को वस्तु नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना वाले मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती है।

|| बहुत रास बाकी है : सामाजिक पाखंड पर करारा व्यंग्य ||

विवाद का कारण - इस काव्य-संग्रह में राजकमल चौधरी ने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का विघटन किया है। ‘रास’ जैसे पवित्र और भक्तिपरक माने जाने वाले शब्द का उन्होंने व्यंग्यात्मक प्रयोग किया, जिससे परंपरागत पाठकों को गहरा असंतोष हुआ।

समझ और प्रतिक्रिया - इस रचना पर धर्म के अपमान और आस्था-विरोध के आरोप लगाए गए। यह कहा गया कि कवि ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया है। 

वास्तविक अर्थ - वास्तव में राजकमल यह इंगित करते हैं कि समाज में धार्मिक अनुष्ठानों और प्रतीकों का प्रदर्शन तो बहुत है, परंतु सत्य, प्रेम, करुणा और न्याय जैसे मूल मानवीय मूल्य अधूरे पड़े हैं। “रास” यहाँ एक व्यवस्थागत ढोंग का प्रतीक बन जाता है।

|| आत्महत्या के विरुद्ध : व्यवस्था के विरुद्ध अभियोग ||

विवाद का कारण - इस कविता में आत्महत्या को एक व्यक्तिगत कमजोरी न मानकर सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम बताया गया है। भूख, बेरोज़गारी, अपमान और व्यवस्था की असंवेदनशीलता को आत्महत्या के मूल कारणों के रूप में रेखांकित किया गया है।

समझ और प्रतिक्रिया - कुछ पाठकों और आलोचकों ने इसे आत्महत्या के समर्थन के रूप में गलत ढंग से व्याख्यायित किया, जिससे कविता को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा हुआ।

वास्तविक अर्थ - इस रचना का उद्देश्य आत्महत्या का महिमामंडन नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना है जो मनुष्य को इस हद तक तोड़ देती है कि उसे जीवन से पलायन का मार्ग चुनना पड़ता है। यह कविता व्यक्ति नहीं, प्रणाली को अभियुक्त बनाती है। 

विद्यापति और राजकमल : तुलनात्मक दृष्टि

"मैथिली साहित्य का विकास दो प्रमुख ध्रुवों के इर्द-गिर्द समझा जा सकता है। एक ओर विद्यापति, जो मध्यकालीन मैथिली कविता के सर्वोच्च शिखर माने जाते हैं तो दूसरी ओर राजकमल चौधरी, जो आधुनिक मैथिली साहित्य की सबसे प्रखर, चुनौतीपूर्ण और विवादास्पद चेतना हैं। यह तुलना किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं है, बल्कि युग-बोध, काव्य-दृष्टि और साहित्यिक प्रयोजन को समझने का उपक्रम है। विद्यापति मैथिली कविता की जड़ हैं, जबकि राजकमल चौधरी उसकी आधुनिक शाखा और विस्तार।"

ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ
विद्यापति चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी के कवि हैं। उनका समय सामंती, दरबारी और धार्मिक संरचनाओं से जुड़ा हुआ था। राजाश्रय, भक्ति-संस्कृति और सामूहिक चेतना उनके साहित्य की पृष्ठभूमि है। उस समय का समाज अपेक्षाकृत स्थिर और आस्था-प्रधान था।

इसके विपरीत, राजकमल चौधरी बीसवीं शताब्दी के उत्तर-औपनिवेशिक भारत के कवि हैं। उनका समय बेरोज़गारी, शहरीकरण, सामाजिक विघटन और व्यक्ति की आंतरिक असुरक्षा से ग्रस्त है। उन्हें किसी प्रकार का राजाश्रय प्राप्त नहीं था। उनका साहित्य संकटग्रस्त, प्रश्नाकुल और आत्मसंघर्ष से भरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है।

काव्य-दृष्टि और साहित्यिक उद्देश्य
विद्यापति की कविता का मूल उद्देश्य रसोत्पत्ति और सौंदर्यबोध है। उनकी कविता पाठक को आनंद, माधुर्य और भावात्मक तृप्ति प्रदान करती है। प्रेम और भक्ति उनके काव्य के केंद्रीय तत्व हैं।

राजकमल चौधरी की कविता का उद्देश्य सत्य का अनावरण और यथार्थ का उद्घाटन है। उनकी कविता आनंद नहीं देती, बल्कि पाठक को असहज करती है, प्रश्नों के सामने खड़ा करती है और सामाजिक ढोंग को उजागर करती है। उनकी काव्य-दृष्टि प्रतिरोधात्मक और वैचारिक है।

नारी-दृष्टि - देह और कामना की अभिव्यक्ति 
विद्यापति की नारी-छवि मुख्यतः राधा-केंद्रित है। वह कोमल, लज्जाशील और प्रेम में रमी हुई आदर्श नायिका है। नारी उनके यहाँ प्रेम और भक्ति की प्रतीक बनकर आती है। राजकमल चौधरी के यहाँ स्त्री किसी आदर्श की मूर्ति नहीं है। वह एक वास्तविक मनुष्य है जो पीड़ित है, अकेली है, संघर्षशील और सामाजिक शोषण से जूझती हुई है। राजकमल की स्त्री आधुनिक यथार्थ की साक्षी है, न कि सौंदर्य का अलंकार।

विद्यापति के काव्य में देह और कामना का चित्रण संकेतात्मक और मर्यादित है। वहाँ शृंगार रस आध्यात्मिक ऊँचाई की ओर ले जाता है और कामना भक्ति में रूपांतरित हो जाती है। राजकमल चौधरी के यहाँ देह का चित्रण प्रत्यक्ष और अनावृत है। उनके लिए देह पाप नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की सच्चाई है। कामना उनके काव्य में सौंदर्य नहीं, बल्कि अस्तित्वगत पीड़ा और सामाजिक दबाव का रूप ले लेती है। इसी कारण उनका लेखन विवादास्पद भी बना।

भाषा और शिल्प
विद्यापति की भाषा लयात्मक, संगीतात्मक और गेय है। उनकी पद-परंपरा लोक और शास्त्र का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। उनके पद आज भी गाए जाते हैं। राजकमल चौधरी की भाषा खुरदरी, तीखी और मुक्त छंद में ढली हुई है। उनकी कविता गाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने और झेलने के लिए है। शहरी बिंब, टूटे वाक्य और वैचारिक दबाव उनके शिल्प की पहचान हैं।

धर्म और आस्था
विद्यापति के साहित्य में ईश्वर की सन्निधि स्पष्ट रूप से उपस्थित है। भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक समर्पण उनके काव्य का आधार है। राजकमल चौधरी के यहाँ ईश्वर मौन है। वे आस्था को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उस पर प्रश्न उठाते हैं। उनका साहित्य विश्वास से अधिक संदेह और टूटन का साहित्य है।

स्वीकृति
विद्यापति अपने समय में भी और बाद में भी व्यापक रूप से स्वीकृत रहे। वे परंपरा के स्वाभाविक वाहक माने गए। राजकमल चौधरी अपने जीवनकाल में तीव्र विवादों से घिरे रहे। उन पर अश्लीलता और संस्कृतिविरोध के आरोप लगे। किंतु मरणोपरांत उनका पुनर्मूल्यांकन हुआ और आज उन्हें आधुनिक मैथिली साहित्य का अनिवार्य स्तंभ माना जाता है।

साहित्यिक योगदान
विद्यापति ने मैथिली भाषा को साहित्यिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया। उन्होंने मैथिली को लोक से शास्त्र तक पहुँचाया। राजकमल चौधरी ने मैथिली को आधुनिक चेतना, वैचारिक साहस और यथार्थ की तीक्ष्ण दृष्टि दी। उन्होंने भाषा को समय से संवाद करना सिखाया।

तुलना का सारांश
विद्यापति और राजकमल चौधरी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। विद्यापति के बिना मैथिली साहित्य की जड़ नहीं समझी जा सकती और राजकमल चौधरी के बिना उसकी आधुनिक पहचान अधूरी रहती है।

विद्यापति ने मैथिली को स्वर दिया, राजकमल चौधरी ने उसी मैथिली को विवेक दिया। यही परंपरा और आधुनिकता का सजीव संवाद है। विद्यापति मध्यकालीन सामंती समाज के कवि हैं, जहाँ सामूहिक चेतना, भक्ति और शृंगार जीवन के केंद्र में हैं। इसके विपरीत, राजकमल चौधरी आधुनिक संकटग्रस्त समाज के कवि हैं, जहाँ व्यक्ति अकेला, असुरक्षित और प्रश्नाकुल है। विद्यापति रस और सौंदर्य के कवि हैं, जबकि राजकमल प्रश्न, प्रतिरोध और यथार्थ के।

विद्यापति ने मैथिली साहित्य को काव्यात्मक और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया, जबकि राजकमल चौधरी ने उसे आधुनिक चेतना, आत्मसंघर्ष और वैचारिक तीक्ष्णता दी। मैथिली साहित्य इन दोनों ध्रुवों के बीच निरंतर प्रवाहित होता रहा है। विद्यापति ने जिस मैथिली को गाया, राजकमल चौधरी ने उसी मैथिली से सवाल पूछे और यही प्रश्न करने की आकुलता मैथिली साहित्य की आधुनिक जीवंतता है।

____________
Praveen Kumar 
praveenfnp@gmail.com || +91-9643208300
13 December 2025 || Mumbai 

Saturday, 4 October 2025

पुस्तक समीक्षा - भू-परिक्रमण (इ-समाद)


जबकि मेरे जैसे आम मैथिल विद्यापति को मात्र जय जय भैरवि, प्रेम सह भक्ति रस में डूबे कवि, एक दरबारी और शिवभक्त के तौर पर जानते हैं, जबकि अधिसंख्य मैथिली प्रकाशन का फोकस मात्र सीता का दर्द, अबला नारी, मिथिला महान, चैट जीपीटी ज्ञान और दोयम दर्जे की हिन्दी कविताओं के घटिया नकल तक सीमित होता जा है, जबकि नवांकुर (उम्र से नहीं) कथित प्रगतिशील मैथिल साहित्यकार सड़क छाप प्रेम कहानियाँ लिखने में व्यस्त हैं.... ऐसे में मेरे लिए इस पुस्तक का जिक्र महत्वपूर्ण के साथ साथ एक दायित्वबोध भी है।

पुस्तक की समीक्षा से पूर्व इस पुस्तक को हमारे सामने लाने हेतु मैं आदरणीय भवनाथ झा, अनुज विजयदेव झा और इ-समाद का आभार प्रकट करना चाहता हूँ। इस कालजयी, शोधपरक और ऐतिहासिक पुस्तक के लिए मिथिला मैथिली संबंधित हर एक सम्मान और पुरस्कार इस तिकड़ी के कदमों में न्योछावर !

बात पुस्तक की।

भगवान कृष्ण के मित्र बलदेव ने "नैमिषारण्य से मिथिला की यात्रा" की और उनके यात्रा की चर्चा तब के मिथिला के महाराजा देव सिंह के सामने विद्यापति जी ने की। ऐसी मान्यता है कि स्वयं महाराजा देव सिंह ने न केवल इस यात्रा के स्थलों पर विद्यापति के साथ भ्रमण किया बल्कि यात्रा वृतांत लिखने को प्रेरित भी किया। 

परिणामस्वरूप विद्यापति ने इसे भूपरिक्रमण के नाम से लिखा और उनकी यह पांडुलिपि संस्कृत के कुल 84 श्लोक के तौर पर प्रस्तुत हुई। कोलकाता के संस्कृत कॉलेज में रखी इस पांडुलिपि का जिक्र उत्तरप्रदेश के श्री हर प्रसाद शास्त्री द्वारा पहली बार हुआ और फिर बाद में पहले पंडित श्री मुनीश्वर झा और फिर पंडित श्री बासुकीनाथ झा ने पांडुलिपि का अनुवाद किया।


दोनों ही विद्वान मिथिला से थे और योग्य थे किन्तु उन्होने पांडुलिपि के मर्म को समझने का अतिरिक्त प्रयास किये बगैर इसका अनुवाद मात्र किया। हालांकि दुनियाँ को इस पांडुलिपि से परिचय करवाने का श्रेय इन्हीं दो विद्वानों को जाता है किन्तु इस पांडुलिपि के संस्कृत श्लोकों के प्रामाणिक व्याख्या का सफल प्रयास किया है आज के लब्धप्रतिष्ठित इतिहासकार और पांडुलिपि विशेषज्ञ पंडित श्री भवनाथ झा जी और मिथिला पर अनवरत शोधरत श्रीमान विजयदेव झा ने। 

पांडुलिपि में उद्धृत भौगोलिक सूचना आधारित 135 संस्कृत श्लोक को Geographical, Historical और Spiritual कसौटी पर कसते हुए और इसके पाठ दोष का शुद्धिकरण करते हुए यह पुस्तक सर्वाधिक प्रामाणिक होने के साथ साथ रोचक भी बनाई गई है। तकरीबन बीस वर्ष की आयु में (1360 ईस्वी के आस पास) विद्यापति द्वारा लिखी इस पांडुलिपि को विस्तृत भाव देती इस पुस्तक की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस एक पुस्तक में संस्कृत के मूल पाठ के अलावा इसका विश्लेषणपूर्ण अंग्रेजी और हिन्दी अनुवाद भी इसमें समाहित है। 

पुस्तक खास क्यों है ?

आम तौर पर हम और आप नैमिषारण्य का जो अर्थ जान पाते हैं वो है - उत्तरप्रदेश के गोमती नदी का किनारा विद्यापति की यह पुस्तक उत्तरप्रदेश से मिथिला की कथा मात्र है। जबकि यहाँ अंतर यह है कि इ-समाद की यह पुस्तक प्रामाणिक तरीके से यह बताती है कि यह हरियाणा से मिथिला तक की कथा है। 

पुस्तक माता सीता के जन्मस्थली संबंधी हमारी सूचनाओं पर सवाल खड़े करती हुई उसे जनकपुर से 28 कोस दूर होने की बात करती है... जनक, विश्वामित्र और काशी का अछूता सच बयां करती है। यात्रा संस्मरण के तौर पर पुस्तक में देश के अलग अलग स्थानों,  नदियों, धार्मिक स्थलों और उनके इतिहास से जुड़े किस्से लिखे गए हैं। अधिक लिख कर पुस्तक के कौतूहल को समाप्त नहीं करते हुए मात्र इतना कहूँगा की यह पुस्तक अपने समय के भूगोल, संस्कृति और धार्मिक जीवन को समझने में एक प्रामाणिक स्रोत बन पड़ी है।

ई-समाद के माध्यम से मैंने इस पुस्तक के निर्माण की यात्रा देखी है। ब्रिटिश आर्काइव के श्रोत पर हफ्तों चल चलने वाली चर्चा, चार लाइन के श्लोक पर पंद्रह पंक्तियों का विश्लेषण, इस विश्लेषण पर दोनों विद्वानों का घमर्थन... देखा है मैंने। मथा अधिक गया है तो मक्खन भी उच्च कोटी का होगा...  पुस्तक आपको स्पष्ट कर देगी की हमारा मिथिला और हमारे विद्यापति उतने विपन्न नहीं जितना आज के विद्यापति नाइट स्पेशलिस्टों ने उन्हें बना दिया है। 

अंत में अच्छी छपाई, जिल्द और कागज की गुणवत्ता द्वारा पुस्तक को पठनीय बनाने हेतु इ-समाद को मेरी तरफ से विशेष शुभकामना। पुस्तक की रेटिंग मेरी तरफ से कुल 4.8/5 (आवरण - 5, छपाई - 4.5, पठनियता - 4.5, तथ्य - 5, सामाजिक सरोकार - 5) है। 

कुल जमा 228 पृष्ठ के इस संग्रहणीय पुस्तक की कीमत 599 रुपये रखी गई है जिसे आप इ-समाद की वेबसाईट पर लिंक पुस्तक प्राप्ति का लिंक पर प्राप्त कर सकते हैं। 



Sunday, 24 August 2025

साहित्य और राज्य से इतर मिथिला


मिथिला के इतिहास के नाम पर अधिकांशतः साहित्य विवेचना ही देखी है। चूँकि मैंने कोई किताब नहीं लिखी, और न ही टीवी में आता हूँ, साहित्य से इतर मिथिला का संक्षित इतिहास लिखने की धृष्टता करते डर रहा हूँ। चीज़ें शायद विस्तार से भले न मिलें, क़रीने से भी न मिले किंतु जो हैं वो सच्ची हैं इसकी गारंटी लेता हूँ।

मिथिला की गाँव वापसी

सन १८१२ में पटना की जनसंख्याँ तक़रीबन ३ लाख थी और कलकत्ता की १.७५ लाख. १८७१ में पटना १.६ लाख और कोलकाता ४.५ लाख. पटना की तरह यही हाल भागलपुर और पुरनियाँ का भी रहा. कारण दो थे. इस दौरान अंग्रेजों की मदद से कलकत्ता में फला फुला उद्योग और बिहार/ मिथिला इलाके में देशी उद्योग के विनाश से लोगों का शहर से गाँव की ओर पलायन. मिस्टर बुकानन ने अपने सर्वे में १९ वीं सदी के बड़े हिस्से तक इस पलायन की पुष्टि की है. अंग्रेजी शासन की दोहन निति के कारण शहर के उद्योग धंधे नष्ट होते गए और लोग गाँव में वापस आते गए.

इसका परिणाम गाँव के घरेलु उद्योग और कृषि क्षेत्र में उन्नति लेकर आया. दुष्परिणाम सिर्फ इतना की गाँव में काम कम और लोग ज्यादा हो गए. इस क्रम में अति तब हुई जब अंग्रेजों ने गाँव की जमीन का दोहन भी आरम्भ किया... १८५७ की क्रांति में सरकार के खिलाफ ज्यादा लोगों का जुटना संभवतः इसी करण हुआ. लोग शहर में मारे गए और गाँव में भी शुकुन से न रह पाए तो विरोध लाजिमी था. ऊपर से कुछ स्थानीय लोगों द्वारा अंग्रेजों की चमचई...

इसको लिखने का कारण सिर्फ इतना की मुझे इसी प्रकार की घुटन आज के हिन्दुस्तान में दिखती है. मुझे लगता है की लोग गाँव वापस जायेंगे... गाँव छोटे उद्योग धंधों, शिक्षा और व्यापार का केंद्र बनेगा... सरकारें जलेंगी...

दलान

उद्योग व् पलायन

अक्सर लोगों से सुनता हूँ, बिहार और मिथिला का खस्ता हाल है... लोग खतरनाक तरीके से पलायन कर रहे हैं... ब्ला ब्ला ब्ला. जरा अन्दर घुसिए तो पता चलता है की मिथिला से पलायन का इतिहास हजारों वर्ष पुराना रहा है. विद्वान, व्यापारी, मजदुर... सब बेहतर पारितोषिक के लिए बाहर जाते रहे. इतिहासकारों ने इस बात का सबुत ८०० वीं ईस्वी से बताया है.

जूट, नील और साल्ट-पिटर के नजदीकी उत्पादन क्षेत्रों (फारबिसगंज, किशनगंज दलसिंहसराय आदि) में मजदूरी के अलावा लोग मोटिया या तिहाडी मजदूरी करने नेपाल, मोरंग, सिल्लिगुड़ी और कलकत्ता भी जाते रहे हैं. श्री जे सी झा ने अपनी किताब Migration and Achievements of Maithil Pandits में लिखा है - मैथिल पंडित बेहतर अर्थ लाभ के लिए देश के अन्य क्षेत्रों में जाते रहे हैं.

हालाँकि तब और अब के इस पलायन में फर्क है. तब लोग मूलतः वापसी में अपने साथ कृषि की नई तकनीक सीख कर, स्वस्थ जीवन जीने के गुर सीखकर, घरेलु उद्योग लगाने की नई तकनीक सीख कर आते थे. जबकि अब हम छोटे कपडे, कान फाडू पंजाबी संगीत, प्रेम त्रिकोण और धोखेबाजी की नई तकनीक ज्यादा सीखते हैं.

इस दौर में एक वक़्त मिथिला क्षेत्र में उद्योग फला-फुला भी. अठारहवीं और उन्नीसवी शताब्दी में मिथिला के अलग अलग शहरों में विभिन्न उद्योग लगे. मधुबनी में मलमल, दुलालगंज व् पुरनियाँ में सस्ते कपड़ों का तो किशनगंज में कागज का उद्योग चला. दरभंगा, खगडिया, किशनगंज आदि ईलाका पीतल व् कांसे के बर्तनों के लिए जाना जाता था... भागलपुर सिल्क, डोरिया, चारखाना के लिए और मुंगेर घोड़े के नाल, स्टोव, जूते के लिए प्रसिद्ध था.

इन सबमे आश्चर्यजनक तरीके से पुरनियाँ तब भी काफी आगे था. कहते हैं पुरनियाँ का सिंदूर उत्पादन व् निर्यात तथा टेंट हाउस के सामान बनाने का काम विख्यात था. मेरे शहर दरभंगा के लोगों को बुरा न लगे इसलिए बताता चलूँ की दरभंगा शहर उस वक़्त हाथी दांत से बने सामानों का प्रमुख उत्पादन केंद्र था.


मिथिला में स्त्री

जितना पुराना इतिहास पुरुषों द्वारा मिथिला छोड़ने का रहा है ठीक उतना ही अकेली रहने वाली स्त्रियों के शोषण (विभिन्न स्तरों पर) का भी रहा. मैथिल समाज का छुपा हुआ किन्तु सत्य पक्ष है की स्त्रियाँ सताई जाती रही... परदे के पीछे यौन प्रताड़ना... लांछन... दोषारोपण... आदि करते हुए मैथिल समाज खुद को कलमुंहा साबित करता आया है.

इसका एक सकारात्मक पक्ष भी था. क्षेत्र में मैथिल स्त्रियों में शिक्षा का स्तर बढ़ा और वो स्वाबलंबी बनी. बिहार के औसतन ६% के सामने पूसा में स्त्री शिक्षा का दर १३%, सोनबरसा में ६%, मनिहारी में ९% थी. (जिन्हें % कम लग रहा है उनके लिए – १९९०-२००१ में यह दर २८% था)

स्वाभाविक रूप से गाँव की सत्ता स्त्रियों के हाथ में आ गई थी ऐसे में. गाँव की महिलाएं घरेलु उद्योग, पशु पालन आदि में आगे दिखने लगी थी. संभवतः गांधी का चरखा आन्दोलन इसी वजह से मिथिला के घर घर में पहुँच पाया.

समय के साथ साथ मैथिल स्त्रियों की दुनियां थोड़ी स्वप्निल बनाई गई जब दूर देश के सन्देश उसके पास भौतिक और काल्पनिक तरीके से पहुँचने लगे. इस रंग में भी भंग तब पड़ा जब पुरुष अपने साथ बीमारियाँ भी साथ लाने लगे.


मिथिला में जातियां

यहाँ हिन्दू परंपरा अपने प्रखरतम रूप में सभी जटिलताओं के साथ सदा विद्यमान रहीं. अलग जातियों के अलग अलग देवता और अलग गहबर होते थे. जातियों के देवताओं के नाम रोचक थे.

श्याम सिंह डोम जाति के, अमर सिंह हलवाई व् धोबियों के, गनिनाथ-गोविन्द हलवाइयों के सलहेस दुसाधों के दुलरा दयाल/ जय सिंह मल्लाहों के, विहुला तेली जाती के, दिनाभद्री मुसहरों के तो लालवन बाबा चमारों के देवता थे.

स्वाभाविक तौर पर सामाजिक कुरीतियाँ, अधविश्वास और धारणाएं ज्यादा थीं. तमाम् विरोधी उदाहरण के बावजूद ब्राम्हण, राजपूत या लाला विपदा में दुसाध, मुसहर के गहबर में जाते थे. जातियों के हिसाब से कार्य बंटे थे जो उत्तरोत्तर कम होते गए.

मिथिलांचल के कई इलाकों में मुसलमानों द्वारा मनाये जाने वाले ताजिये में हिन्दुओं का शामिल होना और हिन्दुओं के त्योहारों में मुस्लिमों के साथ होने के उदहारण भी हैं. कालांतर में हम समझदार होते गए और विषमतायें उग्र रूप धारण करने लगी.


ऐसे में यह स्पष्ट है कि हमें हमारे सीमित सोच से इतर मिथिला को बृहत् तौर पर देखे जाने की आवश्यकता है। मिथिला मात्र विद्यापति विद्यापति समारोह और प्रणाम मिथिलावासी और हमर मिथिला महान तक सीमित नहीं है। 

Saturday, 16 August 2025

आरएसएस आ स्वतंत्रता संग्राम - संक्षिप्त विवरण


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना 1925 मे डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर मे भेल छल। संगठनक मुख्य उद्देश्य हिंदू सभके एकजुट करबाक आ समाजक नैतिक मूल्य सभके सुदृढ़ करबाक छल। ध्यान देबऽ जोग बात ई जे स्व. हेडगेवार स्वयं पहिले कांग्रेस-नेतृत्व वाला राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोगी छलाह आ ओ लोकमान्य तिलकक विचार सँ बेसी प्रभावित छलाह। विद्यार्थी जीवन मे ओ ब्रिटिश शासनक खिलाफ बहुत आंदोलन मे भाग लेने छलाह जाहि में असहयोग आंदोलन (1920–22) सेहो शामिल अछि।

संघ केँ लय विरोधी इतिहासकार सभक दृष्टिकोण अलग छल। बहुतों इतिहासकार मानैत छथि जे स्थापनाक बाद आरएसएस सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) अथवा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) सन नमहर आंदोलन मे भाग नहि लेने छल। हुनक सबहुक मतानुसार ताहि समय संगठन राजनीतिक टकरावक बजाय सामाजिक कार्य, अनुशासन आ वैचारिक प्रशिक्षण पर बेसी ध्यान देने छल। 1930–40 दशकक ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टक मुताबिक़ आरएसएस केँ राजनीतिक रूप सँ ब्रिटिश शासनक लेल खतरा नहि मानल गेल छल। बल्कि संगठन समाज सुधार, भविष्यक भारत आ हिंदू एकजुटता के लय के बेसी मुखर छल। 

अहि सभ में पूर्वोत्तर राज्य आ पटना में व्याप्त देह व्यापार रोकब आ तखन के पाकिस्तान में स्त्री सब के सुदृढ़ आ एकजुट करब आरएसएस महिला विंग के प्रमुख काज छल। 

आरएसएस समर्थक आ ओहि सँ जुड़ल इतिहासकार मानैत छथि जे संगठन अप्रत्यक्ष रूप सँ स्वतंत्रता संग्राम में अपन योगदान देने छल। संघ सामाजिक अनुशासन, एकता आ राष्ट्रीय गौरवक भावना जागृत करब, जकरा ओ औपनिवेशिक शासनक खिलाफ दीर्घकालीन तैयारीक हिस्सा मानैत छलाह- अहि दिशा में प्रयासरत छलाह। अहि वर्ग के इतिहासकार लोकनि हेडगेवारक स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत योगदान आ किछु स्वयंसेवक द्वारा क्रांतिकारी गतिविधि सह स्वतंत्रता संग्राम संगठन में शामिल हेबाक बात सेहो कहैत छथि।

सारांश ई जे प्रत्यक्ष सशस्त्र वा जन-राजनीतिक संघर्ष में आरएसएसक भूमिका सीमित रहल मुदा अप्रत्यक्ष योगदानक तौर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सामाजिक एकता आ नैतिक दृष्टि सँ समाजक तैयारी द्वारा राष्ट्र-निर्माण में संघ के भूमिका मुखर आ अग्रणी रहल।

Monday, 4 August 2025

काली भैंस के दूध से कैसे गोरा हो सकता हूँ माँ - संघी मोगैंबो

एक वक़्त था जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सनातनी और देशभक्ति की विचारधारा में पलने वाले अमरीश पुरी जी ने कभी भी फिल्मों में काम न करने का निर्णय लिया था। बाद में मुंबई रहकर लगभग 18 वर्ष के संघर्ष के बाद फ़िल्मों की शुरुआत करते हुए उसी अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू, तमिल और हॉलीवुड समेत करीब 400 फिल्मों में काम किया। 

जी हाँ, अमरीश पुरी संघी थे ! 

अमरीश पुरी का जन्म 22 जून 1932 को पंजाब प्रान्त हुआ था। उनके पिता का नाम लाला निहाल सिंह और माता जी का नाम वेद कौर था। चमन पुरी, मदन पुरी, बहन चंद्रकांता और उनके छोटे भाई हरीश पुरी समेत वो पाँच भाई बहन थे। पंजाब और फिर दिल्ली के अपने घरों में रहकर उन्होंने आरम्भिक शिक्षा प्राप्त की थी। 

उनके बचपन की एक रोचक बात है कि चूँकि वो दिखने में सभी भाई बहनों में थोड़े काले थे, पहले तो काफी दूध पीया की शायद गोरा हो जाऊं फिर एक बार जब काली भैंस देखी तो कहा की इसके दूध से तो मैं और भी काला हो जाऊंगा, क्योंकि भैंस काली है - सो अपनी माता जी को आगे भैंस का दूध न देने का आग्रह कर दिया। 

अमरीश के बड़े भाई चमन और मदन पुरी सिनेमा में पहले से थे। मदन तो कोलकाता से अपनी नौकरी छोड़कर मुंबई चले गए थे जिसपर अमरीश पुरी के पिता बहुत नाखुश थे। उनके हिसाब से उनके परिवार में सबको सरकारी नौकरी करनी चाहिए। बकौल निहाल सिंह, फ़िल्मी दुनियां पाप और पापियों का अड्डा है जहाँ सिर्फ राजा महाराजा टाइप लोगों को जाना चाहिए। वो अपने साथ रह रहे अमरीश को अक्सर ऐसा कहते कि फिल्मों से दूर रहो। नतीजतन अमरीश पूरी ने लगभग 15 साल की बाली उम्र में ही यह तय कर लिया कि था वो कुछ भी करेंगे, फिल्मों में नहीं जायेंगे।


निहाल सिंह जी की सोच के पीछे एक ख़ास वजह थी। उन्होंने अपने भतीजे और संभवतः बॉलीवुड के पहले सुपर स्टार के एल सहगल को मात्र 42 वर्ष की उम्र में मरते देखा था। कहते हैं, शहगल साहब ड्रम के ड्रम रम पी जाया करते थे... तो अमरीश जी अपने पिता को दुःख न पहुंचाने का और फिल्मों की ओर रुख न करने का प्रण लेते हुए बी एम् कॉलेज शिमला में मन लगा कर पढ़ने लगे... ताकि अच्छी सरकारी नौकरी मिल सके। 

चूँकि वो वक़्त आजादी से पहले का था। कॉलेज के शुरूआती दिनों में ही देशप्रेम और आज़ादी की ओर आकर्षित होते हुए अमरीश पुरी ने आर. एस. एस. की सदस्यता ले ली। संघ के साथ जुड़कर अमरीश जी के साथ दो महत्वपूर्ण बातें हुयी। पहला की - उनके आदर्श बदल गए और "फ़िल्मी दुनियां गलत है" - अपने पिता के अलावा वो भी ऐसा मानने लगे। दूसरी बात - अमरीश पुरी देशभक्ति के रंग में रंग गए। उस वक़्त संघ की 'राष्ट्र के लिए बलिदान' की विचारधारा से प्रभावित अमरीश पुरी थोड़े दिनों में ही संघ के प्रशिक्षु से प्रशिक्षक बन गए। वो संघ के शिविरों में युवाओं को सैनिक प्रशिक्षण देने लगे। संभवत: आजीवन अनुशासित और सादगी भारी ज़िंदगी को जीना उन्होंने यहीं से सीखा। 

संघ के सम्बन्ध में अपनी आत्मकथा में उन्होंने कहा है - "बहुत ईमानदारी से कहूंगा कि मैं हिंदुत्व की विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ था, जिसके अनुसार हम हिंदू हैं और हमें विदेशी शक्तियों से हिंदुस्तान की रक्षा करनी है, उन्हें निकाल बाहर करना है ताकि अपने देश पर हमारा शासन हो। लेकिन, इसका धार्मिक कट्टरता से कोई सम्बंध नहीं था, यह मात्र देशभक्ति थी"

आगे जनवरी 1948 में महात्मा गांधी की हत्या और उसमें संघ के होने की सम्भावना ने अमरीश पुरी को संघ से थोड़ा विमुख कर दिया। वो इसके ख़िलाफ़ कभी कुछ न बोले किंतु धीरे धीरे अलग होकर कॉलेज में नाटक और गायन करने लगे। यही नहीं, शिक्षा पूरी कर वो मुंबई अपने भाई मदन पुरी के पास चले गए। 


कई सारे स्क्रीन टेस्ट में फ़ेल होने के बाद अमरीश पुरी ने वहाँ मुफ़्त में थिएटर में काम करना शुरू किया। गुज़ारे के लिए यहाँ वहाँ नौकरी में हाथ मारते रहे। कभी माचिस के ब्राण्ड का कमीशन एजेंट बने तो कभी बीमा कम्पनी के लिपिक। बीमा कम्पनी में काम करते उसी दफ़्तर में उनकी जीवन संगिनी भी मिली। 27 वर्ष की उम्र में उन्होंने उर्मिला जी से शादी कर ली। ज़िम्मेवारी बढ़ी तो ध्यान ऐक्टिंग से हट कर नौकरी पर ही रहा। दफ़्तर के ही एक महानुभाव इब्राहिम अलका जी को न जाने कैसे उनमें ऐक्टर दिख गया और वो मुफ़्त में थिएटर करने लगे।  

क़िस्मत देखिए की पहले नाटक में अंधे का रोल मिला और दूजे में मृत व्यक्ति का। दोनों रोल में आँखें निर्जीव और खुली रखनी थी। इस तरह लगभग 17-18 साल मुफ़्त में थिएटर करते अमरीश पुरी अपनी पहली फ़िल्म के मक़ाम पर पहुँचे। अपनी राष्ट्रवादी छवि और लॉबी न बना पाने की आज से उन्हें कोई नामचीन पुरस्कार तो नहीं मिल पाया किंतु दर्शकों का बेपनाह प्यार ऐसा मिला की लोग फ़िल्मी दुनियाँ के विलेन "मोगेम्बो" और "मिस्टर इंडिया" से प्रेम करने लगे। लोग हीरोईन के खड़ूस बाप बलदेव सिंह को दिल दे बैठे। 

अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'गांधी', 'कुली', 'नगीना', 'राम लखन', 'त्रिदेव', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि शामिल हैं। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय फिल्‍म 'गांधी' में 'खान' की भूमिका भी निभाई थी। उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म 'किसना' थी जो 2004 में ब्रेन ट्यूमर से हुई उनकी मौत के बाद 2005 में रिलीज हुई। 

थिएटर से कोई पैसा न बना पाने वाले अमरीश पुरी ने कहा था - "मैंने जीवन में जो कुछ हासिल किया उसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ थिएटर को जाता है।" अपनी आत्मकथा "एक्ट ऑफ़ लाइफ़" में अमरीश पुरी कहते हैं - "जीवन का सूक्ष्म अवलोकन ही एक अभिनेता को असाधारण बनाता है।"

Tuesday, 29 July 2025

मुगल साम्राज्यक अंत दरभंगा में

इतिहास रोचक आ अजब गजब अहि। सबटा एक दोसरा सौं जुड़ल आ जे कहूँ नजरि दौगबी त सब किछ आस पास सेहो। 

हिंदुस्तान में मुगल सल्तनतक आखिर बादशाह छला बहादुर शाह ज़फर। चूंकि हुनका समय में अंग्रेजक प्रादुर्भाव भ गेल छल, ओ 1857 में अपना के हिंदुस्तानी शासक बुझैत अंग्रेजिया शासन सौं मुक्ति लेल देशव्यापी आन्दोलनि ठानि देलनि। दुर्भाग्यवश अंग्रेज सब अही क्रांति के नृशंस दमन क देलक आ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर के नज़रबंद क के बर्मा में राखि देल गेल। तत्पश्चात दिल्ली में बांचल खुचल हुनक परिवार के सेहो यातना द क्रमश: मारि देल गेल। 


मुगल आ अंग्रेजी सल्तनत के बीचक अहि युध्द में जीवित बचि गेला बहादुर शाह के जेठ पुत्र मिर्ज़ा दारा बख़्त के पुत्र शहज़ादा जुबैरुद्दिन। उचितन येह छला मुगल साम्राज्य केर बारिस आ ताहि कारण सौं अँग्रेज़ी सल्तनत हिनका सेहो सज़ा द देलकनि। 

अँग्रेजिया आदेशक मुताबिक शहज़ादा हिन्दुस्तानक कोनो एक स्थान पर ३ बरख सौं बेसी नहि रुकि सकैत छला। अहि सज़ा के क्रम में शहज़ादा जुबैरुद्दिन तीन बरख धरि बनारस रुकला। अहि ठाम दरभंगा के तत्कालीन महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह सौं हिनक भेंट भेलनि। 

मुगल बादशाह आ बहादुरशाह जफरक पूर्वज अकबर कहियो दड़िभंगा राज स्थापित केने छलाह। अहि हिसाबे जौं देखल जाय त शहजादा जुबैरुद्दीन आ तात्कालीन दड़िभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह साम्राज्य भाय (संकेतात्मक रुपे) भेला। परिणाम ई जे बनारस में दूनू गोटे के एक दोसरा सौं भेंट घांट आ हेम छेम भेल। वर्तमान दड़िभंगा राजक राजा लक्ष्मीश्वर सिंह के शहज़ादा के हालात देख दया आबि गेलनि, ओ मैथिल गुणे हुनका दरभंगा आबि रुकय के नोत द देलखीन। 

आब शहज़ादा दरभंगा महराज के अतिथि भ गेलाह। चूँकि दरभंगा महराजक पैठ अंग्रेज दरबार में सेहो छल, किछ समय बीतलाक बाद ओ शहज़ादा जुबैरुद्दिन के सज़ा सेहो माफ़ करबा लेलनि। आब शहजादा तीन साल बीतलाक बादो दड़िभंगा में रहि सकैत छला। 

मिथिला में एकटा कहबि छैक - "जेबह नेपाल, कपार जेतह संगे" - शहज़ादा के दरभंगा प्रवासक बाद पहीने हिनक पुत्र के देहावसान भ गेलनि आ ओकरा बाद स्त्री के। चूंकि अहि नश्वर संसार में सब के जेबाक नियम बनल छैक किछु समयावधि के बाद महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंहक देहांत सेहो भ गेलनि। मुदा नीक गप ई जे महाराजक मृत्यु के बाद हुनक उत्तराधिकारी रमेश सिंह सेहो शहजादा के दड़िभंगा राजक अतिथि बनौने रहला। 

अहि सब खिस्सा में एकटा महत्वपूर्ण बात छुटि गेल। बात सौं पहिने फेर एकटा कहबि। अहाँ सब सुनने होयब - "वंशक गुण कम बेस धीया पुता में आबिये जायत छैक" अहि हिसाबे बहादुर शाह ज़फर सन शायर के शहज़ादा पोता में सेहो लेखन कला कुटि कुटि के भरल छल। पुत्र आ पत्नी के वियोग में ओ अधिकतर जीवन एकाकीपन के दंश सहैत शायरी करैत बितौला। दरभंगा में रहैत ओ ६ टा किताब लिखलनि। अहि में "मौज-ए-सुल्तानी" सब सौं बेसी चर्चित किताब छल। अहि किताब में शहजादा जुबैरुद्दीन देश भरिक रियासतक शासन व्यवस्था के खिस्सा लिखने छथि। 

जुबैरुद्दीन द्वारा लिखल पुस्तक "चमनिस्तान-ए–सुखन" एकटा शायरी संग्रह छल जखन कि "मशनवी-दूर- ए- सहसबार" महाकाब्य थीक। "मशनवी-दूर-ए- सहसबार" किताब में शहज़ादा जुबैरुद्दिन गोरगन दरभंगा राज परिवार आ मिथिला के संस्कृतिक ज़िक्र सेहो केने छथि।

साल 1905 में हुनका मृत्य के बाद तत्कालीन दरभंगा महराज रामेश्वर सिंह भाटीयारी सराय रोड में हुनक मकबरा बनौलनि। ई भटियारी सराय एखुनका दरभंगा के मिश्र टोला लग अहि।

एहि प्रकारेण लाल पाथरक किला में रहनिहार मुगल वंशक अंत दरभंगा में लाल ईंट सौं बनल मकबरा में भ गेल। #दड़िभंगा