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Friday, 9 January 2026

विजया महिमा - अमरनाथ कक्का केर एक गोट संस्मरण

अमरनाथ कक्का 

ई बड़ पुरान गप थिक, जहिया बैठारिये रही। सरिसब-पाहीक सटले गाम छै हाटी। एक गो मित्रक घर ओतहि हुनक गाममे नाच-तमाशा होइ छलै। गुलाबी ठंढक समय रहै। हुनकहि आमंत्रण पर ओतए जयबाक नेआर-भास भेलै। बेरूपहर जयबाक प्रोग्राम बनल। तीन मित्र, मुदा साइकिल दुइएटा। तेँ, एक मित्र कैरिअर पर असबार भेल बिदा भेलहुं। बाटमे सरिसबमे एक मित्र आओर सङ्ग भेलाह आब चारि पुरलहुं।

हाटी पहुंचला पर नेआर भेलै जे पहिने विजया सेवन हो, तखन किछु जलपान तखन नाच देखबाक बदान। पाँच मित्र एकसङ्ग एकत्रित भेल रही तेँ भरिपोख हँसी-मजाक आ गप्प-सड़ाकाक धार बहए लगलै। विजयाक प्रभावक जिज्ञासा कयल जाए लगलै आयोजक द्वारा। व्यवस्थाक साफल्य प्रभाव घरवारी केँ बड़ संतोख दै छै, असीम आनंदानूभूति होइ छै। तेँ, ई जिज्ञासा। 


- की रौ ? - घरबारीक प्रश्न

-- भनकीयो नञि - दोसरक उत्तर

- आ तोरा ?

-- रमकी बुझाइए

- उमकी नै ने ?

-- नञि, तते नञि 

- तखन आब चलै चलs। 

                 

भांग के प्रकाश आ ध्वनि बैरी। आयोजन स्थल पर लाउड स्पीकरक ध्वनि आ प्रकाश सँ जगमग, एनामे एक गोटाक पग डगमग होइत अ'ढ़-घात मे कात जा बैसल। आँखि मुनने। तौनी सँ मुंह झँपने, घार खसौने। अरौब्बा ! की भ' गेलै !


ओह, ई तS भनकी, रमकी सँ बढ़ि कए सनकी भ' गैल। अस्तु, साध्ये की ? के देखैए नाच तमेशा एहिठाँ त' तेसरे रङताल। हारि-दाड़ि मित्र के साइकिल पर लादि कोहुना सरिसब धरि आनल। ताबत एकटा बस अयलै। कंडक्टर के ऐ अनुरोधक सङ्ग जे हिनक मोन खराप भ' गेलनिएं, पैटघाट उतारि देबन्हि, ओइ मित्र केँ बसमे चढाय बिदा कयल, आ शेष दुनू मित्र साइकिल सँ घर घुमलहुं। अनठा-पनठा, बहन्ना बनबैत सुति रहलहुं।


परात भेलै। ओइ मित्रक माय खरोस मे अयली, अपन बेटाक मादें। हम दुनू गुम्म चिंतासँ जे कत' चल गेलै आ ड'र सँ जे की जबाब देबै। फूसि बजैक ताबत् ओतेक प्रैक्टिस नै रहय, अभ्यस्तो नञि रही, मुदा ओकर प्रारंभिक डेग बहन्ना, से बनबैक कोशिश मे कहलियै - "ओकर सार भेटल रहै नै मानने हेतै, अपना ज'रें ल' गेल हेतै। आबिए जाएत" - ई कहि कोनहुना हुनका टारि विजयबोधक अनुभव कयल। मुदा, हाय रे कपार ! घंटे-दू घंटाक फेर अयली। “कत' बौआ के छोड़ि देलियै अहाँ सभ। हम छोटका केँ पठौने रहियै ओकर सासुर। ओत' कहाँ गेलैए ?" 


आब त' शोनिते सुखा गेल। मित्रक चिंता फराके, आ हुनक आशंका, चिंता, भय लोकक निन्न हरण क' दैछै। आशंका नाना प्रकारक शंका उपजबैए। चिंता चित्त चंचल क' दैए। भयातुर लोक सदति चौंकले रहैए। एहेन परिस्थिति मे लोक सुतबाक उपक्रम मे आँखि मूनि त' लैए, मुदा निसभेर हएब असम्भव।

                             

ओइ मित्रक पछिला विजयापानानुभव आओरो विचलित क' देने रहय। अपना पर क्षोभ सेहो रहय, जे ओकरा एकसर किए आब' देलियै। एक गोटा अपन साइकिल कतहु गर लगाय सङ्ग भs' गेल रहितियै त' एना नै ने होइतइ। तखन की बूझल रहय ओकरा भांग नै पचै छै, ओकरा रोकलियै ने किए, मना किए ने केलियै... आदि आदि आशंका।

                       

आगां के खिस्सा सौं पहिने क्षेपक मे पछिला इतिवृत्ति कहि दी।पहिने सी एम कॉलेज, दरभंगा (ध्यान रहय, ताबत् तीन भागमे नञि बँटायल रहै, हँ ब्लॉक अलग अलग कहबै) मे उच्चाङ्क सँ द्वितीयश्रेणीमे उत्तीर्ण परीक्षार्थी के बाइलोजी मे नामाङ्कन भ' जाइ आ मारबाड़ी कॉलेज (सम्प्रति भारती-मण्डन कॉलेज) मे तृतीयो श्रेणी बलाकेँ। बेसी छात्र सएह पढ' चाहय। अभिभावकोक सएह अभिलाषा ।अस्तु, ई विषयांतर बात। हमर ओ मित्र मेधावी रहथि। मेडिकल कॉलेज मे प्रवेश लेल प्रतियोगिताक पहिल आयोजन भेल रहै, जै मे ओहो शामिल भेल रहथि।


एहिना एकदिन कोनो बहन्ने विजियायोजनक बाद टहलैले पैटघाट गेल रहथि। तहिया ओइ परिसरक लोकलेल पैटघाट एकमात्र जुटानी स्थल रहैक।ओतहि अकस्मात् अखबार पर नजरि पड़लनि, उनटा के नंबर देखलखिन। आनंदातिरेक मे उछलि गेलाह। सभके् खुशखबरि सुनाय, एक मटकूरी रसगुल्लाक सङ्ग श्रद्धेय मास्टर साहेब (हमरालोकनिक विद्यालयक पूर्व प्रधानाध्यापक) केँ गोड़लागि हुनक आशीष, बधाइ पौलनि। सौंसे परोपट्टा अनघोल भ' गेलैक। लोकक करमान लागि गेलनि हुनक दलान पर भोरे सँ। मुदा अपने ई निसभेर सूतल। जखन दिन चढ़लै, निन टुटलन्हि। हिनका किछु मोने ने रहनि। मुदा, लोकसभ जखन मोन पाड़य लगलनि तँ दौगल गेला पैटघाट। ओइ अखबार पर फेर ध्यान देलनि। मुदा आहिरेबा ! ई तँ लॉटरी रिजल्टक नंबर सभ रहै, जेकरा विजयाप्रभावात् मेडिकल रिजल्ट बूझि नेने रहथि। फल मे फल इएह जे किछुदिन कंछी काट' पड़लनि।

             

तेँ, विशेष चिंता, क्षोभ त' रहबे करय, काल्हि हिनक मायक सामना कोना करब, अभिभावक बुझताह त' फज्झैतासव, रेबाड़बटी आ कनैठीमायसिनक ड'र फराक।तेँ, परात लेल अपनाकेँ दृढ़ करबाक प्रयासक तानी-भरनी मे ओझरायल राति गमाओ।

                      

“होइहें सोइ जो राम रचि राखा" आ "जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई"। भेबो केलै सएह। पराते मातर हुनक माय जूमि गेलीह। फेर वएह जिज्ञासा मुदा उलहन उपरागक सङ्ग। काँट गड़ै छै त' काँटे सँ बहार कयलजाइ छै। एक फूसिके झँपै लेल दोसर फूसिक सहारा लेब' पड़ै छै। कहलिअनि "अन्हार रहै, रस्तो गड़बड़ छै। ओ अपनहि कहलनि अहाँ सभ साइकिल सँ जाउ, हम सरिसब मे बस ध' लैत छी। हमहु लोकनि एही छगुंता मे छी आखिर ओ कतय गेला"। आनो आनो लोक बाजय लगलै "कोनो नेना-बालक तS' छै नै। देखियौ कनीकाल। आबिए जेतै"।

                        

सएह भेलै। दसबजेक लगभग कोलाहल भेलै जे ओ आबि गेलै। भरिटोल अनघोल, दलान पर करमान लागल। लोक पूछै, मुदा ओ किछु बजबे नै करै। हमरा सभ केँ साधन्से नै जे ओकर दलान पर जाइ। सोचल, एकान्त मे सविस्तर बूझि लेब। ताबत् थम्ह्ह हे मोन...


उत्कंठा मनुखक चैन हरण क' लै छै। छटपटी मे कहुना दिन बितबैत रही, जे साँझमे एकान्त भेंट हएत त' सवित्सर जनतब लेब। से जतबा छटपटी हमरा दुनू केँ, ततबए हुनको जिनका विजयापानक दिव्यानुभव भेल रहनि। ओहो व्यग्र रहथि अपन अनुभूति कथा बिलहैले। हुनकर उत्कंठा किछु बेसिए तीव्र रहनि।

                     

गोधूलि बेर रहै, मुखांध नहिं भेल रहै। ताबत देखल ओ मुस्कियाइत, स्मित हासें झटकल आबि रहलाहे, हमरे सभक आवास दिशि। काल्हि सँ दाबल जिज्ञासा एकाएक मुखर भ' उठल। समवेते स्वरमे पुछलियनि " की भ' गेल रहय?"


आब हुनकहि मूंहें सूनल जाय - “अहाँ सभ सरिसब मे हमरा बस पर चढ़ाय देलहुं ।हमर हालति की रहय, से अपनहुं नञि बुझलियै। तौनी ओढ़ि घसमोरि जे बैसलहुं से लगैए सुतागेल। जखन अरड़िया संग्राम पहुंचलहुं, चाँकि भेल। कंडक्टर ओतहि उतारि देलक। अन्हरिया राति, अनचिन्हार जगह, केओ सरोसम्बंधी नहि, कत्त जाउ ? ताबत् एकटा छोटछिन असोरा पर नजरिगेल जै पर एकटा अखरा चौकी धयल रहै। तौनी रहबे करय, ओढ़ि, घसमोड़ि पड़ि रहलहुं। विजया सवारे रहथि तत्काल आँखि लागि गेल।

                      

कतू रातिमे, जखन जाड़ पछारलक, निन्न उचटि गेल। एक मोन हुअए घरवारी केँ उठबिअनि आ एकटा अतिरिक्त ओढ़ना माँगि लिअनि। मुदा अपरिचित जगह, अनचिन्हार लोक, निशाभाग राति, साधंस नहिं भेल। अस्तु, बैसले बैसल परात होइक प्रतीक्षा करबे समीचीन बुझायल। जतs चौकी पर बैसल रही, ठीक ऊपर एकटा जंगला (छोटसन खिड़की) रहै, दुपटिया। पट्टा भिरकाएल रहै। मुदा, तरका ऊपर आ उपरका त'र, तेँ गवाक्ष बनल रहय। अंदर सँ ढिबरीक मद्धिम प्रकाश मे, बुझना गेल जे दू व्यक्ति कम्बल मे लटपटाएल सूतल छै। कम्बलक त'रमे किछु उकस-पाकसक आ हलचलक भान भेल। एहना परिस्थिति मे निन्नक सभ सम्भावना समाप्त।


कोनहुना परात कयल आ पहिले घुड़ती बस सँ आपस अयलहुं।"...अपन आपबीती सुनबैत कहलनि "हे आब कान मोचरै छी। फेर नाढ़ो बेल त'र !"

                        

आइ उपरोक्त पाँचो मित्र अपन-अपन जीबन मे पोता-पोती, नाति-नातिन सङ्ग आनंदमय जीवन जीबि रहल छी। सभ "सर", "अर" भs यशस्वी जीवन बितौलन्हि, हमहींटा "टर"रहि गेलहुं। चारि मित्र हमरा सङ मुखपोथियो सँ जुड़ल छथि। मुदा, भुक्तभोगी मित्रक नाम नहि लेब, किन्नहु ने.... :) 

Sunday, 21 December 2025

राजकमल चौधरी : साहित्य परिचय और विद्यापति से तुलना

मैथिली साहित्य का इतिहास केवल परंपरा-संरक्षण का इतिहास नहीं है, बल्कि वह परंपरा से टकराकर नई चेतना के निर्माण का भी इतिहास है। इस संदर्भ में जहाँ एक ओर विद्यापति मैथिली साहित्य के शास्त्रीय और सांस्कृतिक आधार-स्तंभ के रूप में प्रतिष्ठित हैं, वहीं दूसरी ओर राजकमल चौधरी आधुनिक मैथिली चेतना के सबसे निर्भीक, प्रयोगधर्मी और विवादास्पद प्रतिनिधि के रूप में उभरते हैं।

यदि विद्यापति मैथिली कविता की गेय और रसात्मक आत्मा हैं, तो राजकमल चौधरी उसकी आधुनिक बेचैनी, प्रश्न करने की आकुलता और आत्मसंघर्ष का स्वर हैं। इन दोनों ध्रुवों के बीच मैथिली साहित्य की निरंतरता और विकास की धारा प्रवाहित होती रही है।


राजकमल का जीवन संघर्ष और व्यक्तित्व
राजकमल चौधरी का जन्म सन् 1929 ई॰ में हुआ और उनकी मृत्यु 1967 ई॰ में अल्पायु में ही हो गई। उनका जीवन निरंतर आर्थिक अभाव, जीवन यापन के संसाधनों में अस्थिरता, मानसिक तनाव और सामाजिक उपेक्षा से ग्रस्त रहा। स्थायी जीविका के अभाव और साहित्यिक अस्वीकृति ने स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक चेतना पर गहरा प्रभाव डाला। उनके कड़वे जीवनानुभवों ने उनके साहित्य को कल्पनात्मक नहीं बल्कि अनुभवात्मक बनाया। राजकमल चौधरी की रचनाएँ वस्तुतः उनके जीवन-संघर्ष का प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं।

रचना-दृष्टि और लेखन का स्वर
राजकमल चौधरी साहित्य को सौंदर्य का साधन नहीं, बल्कि सत्य का साक्ष्य मानते हैं। उनके लेखन का स्वर मूलतः प्रश्नाकुल, असहज और प्रतिरोधी है। उनकी रचनाओं में भूख, बेरोज़गारी, अकेलापन, यौन-कुंठा और सामाजिक पाखंड जैसे विषयों की मुखरता रही। साथ ही यह विषय मैथिली साहित्य में पहली बार स्पष्ट, निर्भीक और अनावृत रूप में उपस्थित हुए। उनकी कविता पाठक को सांत्वना नहीं देती, बल्कि उसकी चेतना को झकझोरती है।

रचनाओं में देह-बोध और स्त्री-चेतना
राजकमल चौधरी के लेखन का सबसे अधिक विवादास्पद पक्ष उनका देह-बोध है। वे देह को पाप नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की अनिवार्य सच्चाई मानते हैं। उनकी कविता में स्त्री आदर्श नहीं है और कोई प्रतीक भी नहीं है बल्कि उनके हिसाब से स्त्री पीड़ित, अकेली, संघर्षशील और सचेत जीव है। यही वजह है कि उनकी रचनाओं पर “अश्लीलता” का आरोप लगाया गया। किंतु आधुनिक आलोचना इस देह-बोध को नैतिक पाखंड, सामाजिक दंभ और पुरुषसत्तात्मक दृष्टि के उद्घाटन के रूप में देखती है।

राजकमल चौधरी की अनेक कविताएँ किसी एक शीर्षक के कारण नहीं, बल्कि उनके समूचे काव्य-स्वर के कारण विवादित रहीं। उनकी रचनाओं में चुंबन, स्पर्श, देह की थकान, यौन-कुंठा और शारीरिक अकेलेपन जैसे अनुभवों का प्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है। उस समय मैथिली साहित्य में इस प्रकार की भाषा और विषय-वस्तु असाधारण मानी जाती थी। हालांकि उनकी रचनाओं का यह देह-बोध दरअसल मनुष्य की अपूर्णता, असंतोष और सामाजिक दबावों की अभिव्यक्ति है, न कि केवल कामुकता। 

तुलनात्मकता से उपजता विवाद 
राजकमल चौधरी को कई बार मैथिली का धूमिल या फिर मैथिली का दुष्यंत कुमार कहा गया। इस तुलना ने पारंपरिक विद्वानों में असंतोष उत्पन्न किया, क्योंकि वे राजकमल को विद्यापति परंपरा से विच्छिन्न मानते थे। वस्तुतः यह विवाद इस प्रश्न से जुड़ा था कि क्या मैथिली साहित्य केवल सौंदर्य और भक्ति तक सीमित रहेगा या फिर वह आधुनिक सामाजिक यथार्थ से भी संवाद करेगा। 

राजकमल चौधरी का विवाद उनके साहित्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उसकी साहसिक आधुनिकता का प्रमाण है। उन्होंने मैथिली कविता को वह सारे विषय दिए, जिनसे समाज कतराता था और इसी कारण राजकमल आज भी प्रासंगिक हैं।

राजकमल चौधरी पर समय-समय पर अश्लीलता, संस्कृतिविरोध और विद्यापति-परंपरा से विचलन के आरोप लगाए गए। उनकी कविताओं का मंचीय निषेध और पत्रिकागत आलोचना इस विरोध के प्रमाण हैं। हालांकि यह समूचा विवाद परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष का परिणाम था न कि उनकी रचनात्मक दुर्बलता का।

राजकमल की प्रमुख रचनाओं का विश्लेषण 

|| स्वरगंधा : देह और स्त्री-स्वातंत्र्य का प्रश्न ||

विवाद का कारण - काव्य-संग्रह स्वरगंधा राजकमल चौधरी की सबसे अधिक विवादित कृतियों में गिना जाता है। इस संग्रह में स्त्री-देह का प्रत्यक्ष चित्रण, कामना, अकेलापन और अधूरी तृप्ति जैसे अनुभवों को किसी भी प्रकार के नैतिक आवरण या सांस्कृतिक अलंकरण के बिना प्रस्तुत किया गया है। उस समय के मैथिली साहित्य में इस प्रकार की निर्भीक अभिव्यक्ति अभूतपूर्व थी।

तत्कालीन प्रतिक्रिया - पारंपरिक आलोचकों ने इस कृति को अश्लील करार दिया। मैथिली समाज के एक बड़े वर्ग ने इसे “संस्कृति-विरोधी” और “नैतिक मर्यादा का उल्लंघन” माना। विशेष रूप से यह आरोप लगाया गया कि राजकमल स्त्री-देह को अनावश्यक रूप से कविता का विषय बना रहे हैं। 

वास्तविक अर्थ - आधुनिक आलोचना के अनुसार स्वरगंधा की कविता कामुकता का उत्सव नहीं है, बल्कि वह स्त्री की अस्मिता, उसकी देह पर समाज के नियंत्रण और पुरुष-सत्तात्मक नैतिकता की तीखी आलोचना है। यह कृति स्त्री को वस्तु नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना वाले मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती है।

|| बहुत रास बाकी है : सामाजिक पाखंड पर करारा व्यंग्य ||

विवाद का कारण - इस काव्य-संग्रह में राजकमल चौधरी ने धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों का विघटन किया है। ‘रास’ जैसे पवित्र और भक्तिपरक माने जाने वाले शब्द का उन्होंने व्यंग्यात्मक प्रयोग किया, जिससे परंपरागत पाठकों को गहरा असंतोष हुआ।

समझ और प्रतिक्रिया - इस रचना पर धर्म के अपमान और आस्था-विरोध के आरोप लगाए गए। यह कहा गया कि कवि ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया है। 

वास्तविक अर्थ - वास्तव में राजकमल यह इंगित करते हैं कि समाज में धार्मिक अनुष्ठानों और प्रतीकों का प्रदर्शन तो बहुत है, परंतु सत्य, प्रेम, करुणा और न्याय जैसे मूल मानवीय मूल्य अधूरे पड़े हैं। “रास” यहाँ एक व्यवस्थागत ढोंग का प्रतीक बन जाता है।

|| आत्महत्या के विरुद्ध : व्यवस्था के विरुद्ध अभियोग ||

विवाद का कारण - इस कविता में आत्महत्या को एक व्यक्तिगत कमजोरी न मानकर सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों का परिणाम बताया गया है। भूख, बेरोज़गारी, अपमान और व्यवस्था की असंवेदनशीलता को आत्महत्या के मूल कारणों के रूप में रेखांकित किया गया है।

समझ और प्रतिक्रिया - कुछ पाठकों और आलोचकों ने इसे आत्महत्या के समर्थन के रूप में गलत ढंग से व्याख्यायित किया, जिससे कविता को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा हुआ।

वास्तविक अर्थ - इस रचना का उद्देश्य आत्महत्या का महिमामंडन नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करना है जो मनुष्य को इस हद तक तोड़ देती है कि उसे जीवन से पलायन का मार्ग चुनना पड़ता है। यह कविता व्यक्ति नहीं, प्रणाली को अभियुक्त बनाती है। 

विद्यापति और राजकमल : तुलनात्मक दृष्टि

"मैथिली साहित्य का विकास दो प्रमुख ध्रुवों के इर्द-गिर्द समझा जा सकता है। एक ओर विद्यापति, जो मध्यकालीन मैथिली कविता के सर्वोच्च शिखर माने जाते हैं तो दूसरी ओर राजकमल चौधरी, जो आधुनिक मैथिली साहित्य की सबसे प्रखर, चुनौतीपूर्ण और विवादास्पद चेतना हैं। यह तुलना किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं है, बल्कि युग-बोध, काव्य-दृष्टि और साहित्यिक प्रयोजन को समझने का उपक्रम है। विद्यापति मैथिली कविता की जड़ हैं, जबकि राजकमल चौधरी उसकी आधुनिक शाखा और विस्तार।"

ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ
विद्यापति चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी के कवि हैं। उनका समय सामंती, दरबारी और धार्मिक संरचनाओं से जुड़ा हुआ था। राजाश्रय, भक्ति-संस्कृति और सामूहिक चेतना उनके साहित्य की पृष्ठभूमि है। उस समय का समाज अपेक्षाकृत स्थिर और आस्था-प्रधान था।

इसके विपरीत, राजकमल चौधरी बीसवीं शताब्दी के उत्तर-औपनिवेशिक भारत के कवि हैं। उनका समय बेरोज़गारी, शहरीकरण, सामाजिक विघटन और व्यक्ति की आंतरिक असुरक्षा से ग्रस्त है। उन्हें किसी प्रकार का राजाश्रय प्राप्त नहीं था। उनका साहित्य संकटग्रस्त, प्रश्नाकुल और आत्मसंघर्ष से भरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है।

काव्य-दृष्टि और साहित्यिक उद्देश्य
विद्यापति की कविता का मूल उद्देश्य रसोत्पत्ति और सौंदर्यबोध है। उनकी कविता पाठक को आनंद, माधुर्य और भावात्मक तृप्ति प्रदान करती है। प्रेम और भक्ति उनके काव्य के केंद्रीय तत्व हैं।

राजकमल चौधरी की कविता का उद्देश्य सत्य का अनावरण और यथार्थ का उद्घाटन है। उनकी कविता आनंद नहीं देती, बल्कि पाठक को असहज करती है, प्रश्नों के सामने खड़ा करती है और सामाजिक ढोंग को उजागर करती है। उनकी काव्य-दृष्टि प्रतिरोधात्मक और वैचारिक है।

नारी-दृष्टि - देह और कामना की अभिव्यक्ति 
विद्यापति की नारी-छवि मुख्यतः राधा-केंद्रित है। वह कोमल, लज्जाशील और प्रेम में रमी हुई आदर्श नायिका है। नारी उनके यहाँ प्रेम और भक्ति की प्रतीक बनकर आती है। राजकमल चौधरी के यहाँ स्त्री किसी आदर्श की मूर्ति नहीं है। वह एक वास्तविक मनुष्य है जो पीड़ित है, अकेली है, संघर्षशील और सामाजिक शोषण से जूझती हुई है। राजकमल की स्त्री आधुनिक यथार्थ की साक्षी है, न कि सौंदर्य का अलंकार।

विद्यापति के काव्य में देह और कामना का चित्रण संकेतात्मक और मर्यादित है। वहाँ शृंगार रस आध्यात्मिक ऊँचाई की ओर ले जाता है और कामना भक्ति में रूपांतरित हो जाती है। राजकमल चौधरी के यहाँ देह का चित्रण प्रत्यक्ष और अनावृत है। उनके लिए देह पाप नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की सच्चाई है। कामना उनके काव्य में सौंदर्य नहीं, बल्कि अस्तित्वगत पीड़ा और सामाजिक दबाव का रूप ले लेती है। इसी कारण उनका लेखन विवादास्पद भी बना।

भाषा और शिल्प
विद्यापति की भाषा लयात्मक, संगीतात्मक और गेय है। उनकी पद-परंपरा लोक और शास्त्र का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती है। उनके पद आज भी गाए जाते हैं। राजकमल चौधरी की भाषा खुरदरी, तीखी और मुक्त छंद में ढली हुई है। उनकी कविता गाने के लिए नहीं, बल्कि सोचने और झेलने के लिए है। शहरी बिंब, टूटे वाक्य और वैचारिक दबाव उनके शिल्प की पहचान हैं।

धर्म और आस्था
विद्यापति के साहित्य में ईश्वर की सन्निधि स्पष्ट रूप से उपस्थित है। भक्ति, विश्वास और आध्यात्मिक समर्पण उनके काव्य का आधार है। राजकमल चौधरी के यहाँ ईश्वर मौन है। वे आस्था को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उस पर प्रश्न उठाते हैं। उनका साहित्य विश्वास से अधिक संदेह और टूटन का साहित्य है।

स्वीकृति
विद्यापति अपने समय में भी और बाद में भी व्यापक रूप से स्वीकृत रहे। वे परंपरा के स्वाभाविक वाहक माने गए। राजकमल चौधरी अपने जीवनकाल में तीव्र विवादों से घिरे रहे। उन पर अश्लीलता और संस्कृतिविरोध के आरोप लगे। किंतु मरणोपरांत उनका पुनर्मूल्यांकन हुआ और आज उन्हें आधुनिक मैथिली साहित्य का अनिवार्य स्तंभ माना जाता है।

साहित्यिक योगदान
विद्यापति ने मैथिली भाषा को साहित्यिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया। उन्होंने मैथिली को लोक से शास्त्र तक पहुँचाया। राजकमल चौधरी ने मैथिली को आधुनिक चेतना, वैचारिक साहस और यथार्थ की तीक्ष्ण दृष्टि दी। उन्होंने भाषा को समय से संवाद करना सिखाया।

तुलना का सारांश
विद्यापति और राजकमल चौधरी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। विद्यापति के बिना मैथिली साहित्य की जड़ नहीं समझी जा सकती और राजकमल चौधरी के बिना उसकी आधुनिक पहचान अधूरी रहती है।

विद्यापति ने मैथिली को स्वर दिया, राजकमल चौधरी ने उसी मैथिली को विवेक दिया। यही परंपरा और आधुनिकता का सजीव संवाद है। विद्यापति मध्यकालीन सामंती समाज के कवि हैं, जहाँ सामूहिक चेतना, भक्ति और शृंगार जीवन के केंद्र में हैं। इसके विपरीत, राजकमल चौधरी आधुनिक संकटग्रस्त समाज के कवि हैं, जहाँ व्यक्ति अकेला, असुरक्षित और प्रश्नाकुल है। विद्यापति रस और सौंदर्य के कवि हैं, जबकि राजकमल प्रश्न, प्रतिरोध और यथार्थ के।

विद्यापति ने मैथिली साहित्य को काव्यात्मक और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया, जबकि राजकमल चौधरी ने उसे आधुनिक चेतना, आत्मसंघर्ष और वैचारिक तीक्ष्णता दी। मैथिली साहित्य इन दोनों ध्रुवों के बीच निरंतर प्रवाहित होता रहा है। विद्यापति ने जिस मैथिली को गाया, राजकमल चौधरी ने उसी मैथिली से सवाल पूछे और यही प्रश्न करने की आकुलता मैथिली साहित्य की आधुनिक जीवंतता है।

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Praveen Kumar 
praveenfnp@gmail.com || +91-9643208300
13 December 2025 || Mumbai 

Sunday, 17 August 2025

मित्र धैर्यकांतक नाम लिखल एकटा पाती

२० अक्टूबर २०२२, पुणे
प्रिय धैर्यकाँत, 

काल्हि चारि मासक बाद अहां अपन मुखपृष्ठ पर लिखलहुं। अहां जखन लिखैत छी, हृदय सं लिखैत छी‌। अद्भुत लिखलहुं मित्र।

ई एकटा पैघ सत्य थिक जे लिखला सं मोन हल्लुक होइत छैक मुदा सत्य त' इहो थिक जे प्रश्न, उत्तर आ तकर प्रतिउत्तर सं वैह मोन फेर सं ओहिना भारी भ' जाइत छैक। अहां नीक करैत छी जे आब एहि सभ फेरी मे नहि पड़ैत छी।


ई सत्य थिक जे सोशल मीडिया पर जे किछु देखाइत छैक वास्तव मे असल जिनगी मे ओहेन किछु नहिए जकां होइत छैक। एतय अपन सभटा दुख, कष्ट, कमी आ कमजोरी कें नुका क' अबैत अछि लोक। हालाँकि एहि सभक कारण की हेतैक तकर जनतब नहि अछि हमरा मुदा, संभवतः एकटा होड़ आ प्रतिस्पर्धा हमरा जनैत सभसं पैघ कारण भ' सकैत छैक जाहि मे मनुक्ख कें कत' जयबाक छैक तकर ओकरा कोनो जनतब नहि। देखि रहल छी जे सभ पड़ाएल जा रहल अछि...एक-दोसर सं नीक देखेबाक लेल त' कियो स्वयं के बड्ड पैघ ज्ञानी प्रमाणित करबाक लेल... किछु गोटें त' अपनहि जिनगीक एकांत अवस्था भ्रमित करबाक लेल लिखैत अछि। 

हमरा लगैत अछि जे हम सभ एकटा मुखौटा पहीरि लेने छी आ कतहु ने कतहु ई मुखौटा संभवतः आवश्यको अछि। जिनगी जीबाक लेल। बिना आवरण कें संभवतः अहां नकारि देल जाइ, अहांक अपनहि लोक अहांकें चिन्हबा सं मना क' देथि, कारण हुनका सभक लेल अहाँ जे आवरण धारण कयलहुं ओ सभ अहाकें आब ओही आवरण मे देखय चाहैत छथि। कियो अहांक वास्तविक रूप अथवा अहांकें स्वयं कें आवश्यक रूप मे नहि देखय चाहैत अछि। एहेन स्थिति मे हम सभ 'जॉन'क ओहि शेर कें मोन पाड़ि जीबैत जा रहल छी जे - 

"कितने दिलकश हो तुम कितना दिलजूं हूँ मैं, 
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे" 

हं, संभवतः इएह सोचि क' जे संसार त' दू दिनक मेला अछि, मरबाक अछिए तखन किए शत्रुता मोल ली! त' साहस करैत हम सभ आवरण धारण कयने रहैत छी।

हं, अहां सही छी जे जखन मनुक्ख स्वयं कें अपनहि द्वारा परिभाषित सांच मे गलत पबैत अछि त' ओ अलग-अलग युक्ति ताकय लगैत अछि आ ओकरा अजमाबय लगैत अछि। जल्दीसं सभ किछु सरियाबै के प्रयत्न करै मे ओ सभ किछु आधा-अधूरा छोड़ैत जाइत अछि। ओकरा लगैत छैक जे ई सभ त' बाद मे क' लेब मुदा ई सभटा आधा काज ओकर कान्ह पर बोझ बनैत चलि जाइत छैक। ओ झुकि क' चलै लगैत अछि, हेराएल जकां रहैत अछि,सिगरेट आ शराब कें अपन मित्र बूझय लगैय अछि। ओकर आंखिक नीचां गहींर होइत जाइत छैक,ओकर अपन सभटा व्यवस्था खराब होइत जाइत छैक दोसरक व्यवस्था कें ठीक करबाक फेर मे।

हं, संबंध चाहे घरक होइ अथवा बाहर, अथवा सोशल मीडियाक, सभटा स्वार्थे पर आधारित रहैत छैक। जखनहि अहां स्वार्थ पूर्ति करब बंद कयलहुं कि ओ गधाक सींग जकां अहांक जीवन सं विलीन। ओ इहो नहि सोचत जे अहांक सेहो कोनो स्वार्थ भ' सकैत अछि। कोन ठेकान जे कोनो विवशता हुअए। हुनकर सभक हिसाबे विवशता त' हमर अपन अछि ने! ओ सभ चलि जाइत छथि कतहु आर आ... संभवतः कोनो आर व्यक्तिक दुनिया मे। हमर सभक दुर्भाग्य जे ओतय ओ हमर केलहाक चर्च करबाक स्थान पर हमर सोखर करबा मे लागि जाइत अछि। ओ हमर कुचिष्टा करबा धरि चैन नहि होइत अछि बल्कि हमर अस्तित्व समाप्त करबाक योजना मे लागि जाइत अछि। ओ ई प्रमाणित करबा मे लागि जाइत अछि जे ओ कोना हमरा लेल आवश्यक छल, हम नहि। एहि मे एक स्तर आगू हम इहो देखलियै जे जाहि व्यक्तिक सोझां हमर प्रशंसा होइत रहैत अछि ओ व्यक्ति हमरा संदर्भ मे एकटा अवधारणा बना लैत अछि। हमरा सं बिना कोनो गप कयने कोनो व्यक्ति कोना हमरा संदर्भ मे कोनो अवधारणा बना लैत अछि से नहि कहि मुदा, आइ-काल्हि ई बड्ड चलती मे छैक जे अहां किनको सं किछु सुनि क' हमरा संदर्भ मे राय बना लिअ। सोशल मीडिया पर किनको पढ़ि क' हुनकर आंकलन क' लिअ आ फेर मोनमोटाव क' लिअ। 

अहां लिखलहुं जे परिवार आ संबंध अहांक सोझां खाधि खूनि दैत अछि। शत-प्रतिशत त' एहेन नहि छैक मुदा हम सभ जतय सं छी ओतय एकर अनुपात बहुत अधिक छैक। कतेक उदाहरण देखने छियै हम जखन एकटा लड़का अपन परिवारक लेल स्वयं कें समाप्त क' लैत अछि आ ओकर परिवार ओकरा शाबाशी देबाक स्थान पर ओकरा सं जे काज नहि भेल रहैत छैक तकर उलहन देबय लगैत छैक। ओ की सभ कयलक से नहि बता क' ओ की सभ नहि क' सकल वैह कहल जाइत छैक, जाहि सं ओकरा मोन रहै जे ओ मात्र सहबाक लेल आ थोड़े आर काज करबाक लेल मात्र बनल अछि।

पैघ शहरक प्रेमिका सभ! आब एतेक उदाहरण देखि चुकलहुं जे एहि सभ पर हमरा किछु लिखतो लाज लगैए। ई मानि क' चलू जे 'दिल्ली एन सी आर'क प्रेमिका सभ प्रेम नहि करैत अछि बल्कि, अहांक मासूमियतक हिसाब सं अहांक जेब आ मानसिक शक्ति (...) कें खोखला होबाक बाट तकैत अछि। बस एतबै कहब जे जं प्रेम करबाक अछि त' बच्चा सभसं करू, महिला सभकें मित्र बनाउ। बेसी मोन हुअए त' केजरीवाल कें चंदा द' आउ अथवा स्वयं कें चॉकलेट, वाइन आदि गिफ्ट क' दिअ। मुदा दिल्लीक प्रेमिका! नहि-नहि! 

जनै छी! हमरा एहि सभ बात सभक कोनो ख़ास कचोट नहि अछि आ हमहूं अहीं जकां तकर कोनो परवाहो नहि करैत छी। जं हम भूखल छी त' हॅंसैत छी, पेट भरला पर कने आर हॅंसैत छी। तकर कारण जे अहाक भूखल रहबा सं सभ... हं, सभ! सभ हँसत आ अहांक पेट भरल बूझि हँसैत देखि क' लोक बूझत जे एकरा हॅंसबाक बीमारी छैक। असल मे चिन्ता कतय होइत छैक जे एहि कारण किछु प्रतिशत जे नीक लोक छथि, हुनको सभक भरोस समाप्त भ' जाइत छनि। गहूमक संग जेना जौ पिसाइत अछि ओहिना किछु प्रतिशत लोक पिसाइत रहथि। कियो हिनका सभ पर भरोस नही क' रहल। हुनका सभकें हुनकर सभक नीक कर्मक लाभ नहि भेटि रहल।

अहां त' जनैत छी बीतल समयक ओ सभटा बात जहिया हम बहुत कष्ट मे रही। किछु संकोच सेहो रहैत छल जे जिनका सभकें हमरा सं उपकारक आशा रहैत छलनि हुनका सभकें हम कोना कहियनि जे हम मदति लेबाक स्थिति मे पहुंच गेल छी। हालाँकि तैयो जे सभ हमर लगीच रहथि ओ सभ अयलथि, हमर परिवार हमर संग ठाढ़ छल। हमर दुःख कें बुझलक, हमर तकलीफ मे साझी बनल आ पूछैत रहल। कियो एतय त' कियो कोनो अन्य पैघ शहर मे, अथवा कियो विदेश मे। जनै छी! एक राति डेढ़ बजे कियो हमरा अमरीका सं फोन कयलनि आ कहलनि - " प्रवीण, अहांकें जे मदति चाही से कहू, हम तैयार छी... कहू त' हम आबि जाउ।" नीक लागल। 

हालाँकि हमरा ओतबै अधलाह लागल जखन बीतल १० मासक एहि संघर्ष मे आ संभवतः जीवनक सभसॅं पैघ लड़ाइ मे किछु गोटें या त' अनभिज्ञ बनि गेलथि अथवा जानि-बूझि क' हमरा सं कतिया गेलथि। पहिने त' हमर आदतिक हिसाब सं हम एहि सभक कारण स्वयं कें मानलहुं जे संभवतः हमरहि मे कोनो कमी रहल हैत। मुदा बाद मे अधिक मंथन कयलाक बाद बुझबा मे आयल जे नहि, ई सभ त' हमरा सं मात्र एहि लेल जुड़ल रहथि जे हम हिनकर सभक कोनो काज आबि सकी। अहां सही कहने रही - "प्रवीण जी, सोझ गप नहि करै बला सं दूर रहू।" 

धैर्यकाँत, हम आब ई निर्णय ल' लेलहुं अछि जे मात्र सुखक समयक मित्र कें त्यागि देब। हम जनैत छी जे अहां कहब कि हम त' सभ किछु स्वयं पर ल' किनको जीवन भरिक लेल नहि त्याग' चाहैत छी तें अहां सं ई सभ नहि होयत। त' भाइ हम इएह कहब जे हम ई प्रयत्न करब। कारण, बीतल दस मास (जकरा हम दस साल जकां जीलहुं) हमरा सिखा देलक जे हमहूं मनुक्ख छी। ओ मनुक्ख जे नीक-बेजाए बुझबा मे गलती क' सकैत अछि आ ओकरा एहि गलती कें सुधारि लेबाक चाही। किछु पुरान कें 'क्रॉस' आ किछु नब कें 'टिक' क' लेबाक चाही। परिणामक चिंताक बिना मुंह पर कहबाक चाही जे 'नहि साहेब! अहां नहि चाही।' चाहे कियो खराब मानि जाए, हमरा बताह बूझय, अभिमानी कहै अथवा कुलबोरन। 

लिखैत रहू,
अहांक शुभचिंतक,

प्रवीण

अमृता - इमरोज़ की कहानी के बहाने

भारत की लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था- "मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगाने की कोशिश थी, उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं।”


अमृता और इमरोज़ के बीच का सिलसिला धीरे-धीरे ही शुरू हुआ था। अमृता ने एक चित्रकार सेठी से अपनी किताब 'आख़िरी ख़त' का कवर डिज़ाइन करने का अनुरोध किया था। सेठी ने कहा कि वो एक ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो ये काम उनसे बेहतर कर सकता है। सेठी के कहने पर अमृता ने इमरोज़ को अपने पास बुलाया। उस ज़माने में वो उर्दू पत्रिका शमा में काम किया करते थे। इमरोज़ ने उनके कहने पर इस किताब का डिज़ाइन तैयार किया। इमरोज़ याद करते हैं, ''उन्हें डिज़ाइन भी पसंद आ गया और आर्टिस्ट भी। उसके बाद मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू हो गया। हम दोनों पास ही रहते थे। मैं साउथ पटेल नगर में और वो वेस्ट पटेल नगर में।" 

"एक बार मैं यूँ ही उनसे मिलने चला गया। बातों-बातों में मैंने कह दिया कि मैं आज के दिन पैदा हुआ था। गांवों में लोग पैदा तो होते हैं लेकिन उनके जन्मदिन नहीं होते। वो एक मिनट के लिए उठीं, बाहर गईं और फिर आकर वापस बैठ गईं। थोड़ी देर में एक नौकर प्लेट में केक रखकर बाहर चला गया। उन्होंने केक काट कर एक टुकड़ा मुझे दिया और एक ख़ुद लिया। ना उन्होंने हैपी बर्थडे कहा ना ही मैंने केक खाकर शुक्रिया कहा। बस एक-दूसरे को देखते रहे। आँखों से ज़रूर लग रहा था कि हम दोनों खुश हैं।'' 

पिता की चपत

ये तो एक शुरुआत भर थी लेकिन इससे बरसों पहले अमृता के ज़हन में एक काल्पनिक प्रेमी मौजूद था और उसे उन्होंने राजन नाम भी दिया था। अमृता ने इसी नाम को अपनी ज़िंदगी की पहली नज़्म का विषय बनाया। एक बार अमृता ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था कि जब वो स्कूल में पढ़ती थीं तो उन्होंने एक नज़्म लिखी। उसे उन्होंने ये सोचकर अपनी जेब में डाल लिया कि स्कूल जाकर अपनी सहेली को दिखाऊँगी। 


अमृता अपने पिता के पास कुछ पैसे मांगने गईं। उन्होंने वो पैसे उनके हाथ में न देकर उनकी जेब में डालने चाहे। उसी जेब में वो नज़्म रखी हुई थी। पिता का हाथ उस नज़्म पर पड़ा तो उन्होंने उसे निकालकर पढ़ लिया। पूछा कि क्या इसे तुमने लिखा है। अमृता ने झूठ बोला कि ये नज़्म उनकी सहेली ने लिखी है। उन्होंने उस झूठ को पकड़ लिया और उसे दोबारा पढ़ा। पढ़ने के बाद पूछा कि ये राजन कौन है? अमृता ने कहा, कोई नहीं। उन्हें ऐतबार नहीं हुआ। पिता ने उन्हें ज़ोर से चपत लगाई और वो काग़ज़ फाड़ दिया। अमृता बताती हैं, ''ये हश्र था मेरी पहली नज़्म का। झूठ बोलकर अपनी नज़्म किसी और के नाम लगानी चाही थी लेकिन वो नज़्म एक चपत को साथ लिए फिर से मेरे नाम लग गई।'' 

अलग-अलग कमरे इमरोज़ के साथ 

दुनिया में हर आशिक़ की तमन्ना होती है कि वो अपने इश्क़ का इज़हार करें लेकिन अमृता और इमरोज़ इस मामले में अनूठे थे कि उन्होंने कभी भी एक दूसरे से नहीं कहा कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं। इमरोज़ बताते हैं, ''जब प्यार है तो बोलने की क्या ज़रूरत है? फ़िल्मों में भी आप उठने-बैठने के तरीक़े से बता सकते हैं कि हीरो-हीरोइन एक दूसरे से प्यार करते हैं लेकिन वो फिर भी बार-बार कहते हैं कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं और ये भी कहते हैं कि वो सच्चा प्यार करते हैं जैसे कि प्यार भी कभी झूठा होता है।'' 

परंपरा ये है कि आदमी-औरत एक ही कमरे में रहते हैं। हम पहले दिन से ही एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहते रहे। वो रात के समय लिखती थीं। जब ना कोई आवाज़ होती हो ना टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और ना कोई आता-जाता हो। उस समय मैं सो रहा होता था। उनको लिखते समय चाय चाहिए होती थी। वो ख़ुद तो उठकर चाय बनाने जा नहीं सकती थीं। इसलिए मैंने रात के एक बजे उठना शुरू कर दिया। मैं चाय बनाता और चुपचाप उनके आगे रख आता। वो लिखने में इतनी खोई हुई होती थीं कि मेरी तरफ़ देखती भी नहीं थीं। ये सिलसिला चालीस-पचास सालों तक चला। 

उमा त्रिलोक इमरोज़ और अमृता दोनों की नज़दीकी दोस्त रही हैं और उन पर उन्होंने एक किताब भी लिखी है- 'अमृता एंड इमरोज़- ए लव स्टोरी।' उमा कहती हैं कि अमृता और इमरोज़ की लव-रिलेशनशिप तो रही है लेकिन इसमें आज़ादी बहुत है। बहुत कम लोगों को पता है कि वो अलग-अलग कमरों में रहते थे एक ही घर में और जब इसका ज़िक्र होता था तो इमरोज़ कहा करते थे कि एक-दूसरे की ख़ुशबू तो आती है। ऐसा जोड़ा मैंने बहुत कम देखा है कि एक दूसरे पर इतनी निर्भरता है लेकिन कोई दावा नहीं है। 

बुख़ार गायब हुआ

वर्ष 1958 में जब इमरोज़ को मुंबई में नौकरी मिली तो अमृता को दिल ही दिल अच्छा नहीं लगा। उन्हें लगा कि साहिर लुधियानवी की तरह इमरोज़ भी उनसे अलग हो जाएंगे। इमरोज़ बताते हैं कि गुरु दत्त उन्हें अपने साथ रखना चाहते थे। वेतन पर बात तय नहीं हो पा रही थी। अचानक एक दिन अपॉएंटमेंट-लैटर आ गया और वो उतने पैसे देने के लिए राज़ी हो गए जितने मैं चाहता था। 


मैं बहुत ख़ुश हुआ। दिल्ली में अमृता ही अकेले थीं जिनसे मैं अपनी ख़ुशी शेयर कर सकता था। मुझे ख़ुश देख कर वो ख़ुश तो हुईं लेकिन फिर उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने थोड़ा घुमा-फिराकर जताया कि वो मुझे मिस करेंगी, लेकिन कहा कुछ नहीं। मेरे जाने में अभी तीन दिन बाक़ी थे। उन्होंने कहा कि ये तीन दिन जैसे मेरी ज़िंदगी के आख़िरी दिन हों। तीन दिन हम दोनों जहाँ भी उनका जी चाहता, जाकर बैठते। फिर मैं मुंबई चला गया। मेरे जाते ही अमृता को बुख़ार आ गया। तय तो मैंने यहीं कर लिया था कि मैं वहाँ नौकरी नहीं करूँगा। दूसरे दिन ही मैंने फ़ोन किया कि मैं वापस आ रहा हूँ। उन्होंने पूछा सब कुछ ठीक है ना। मैंने कहा कि सब कुछ ठीक है लेकिन मैं इस शहर में नहीं रह सकता। मैंने तब भी उन्हें नहीं बताया कि मैं उनके लिए वापस आ रहा हूँ। मैंने उन्हें अपनी ट्रेन और कोच नंबर बता दिया था। जब मैं दिल्ली पहुंचा वो मेरे कोच के बाहर खड़ी थीं और मुझे देखते ही उनका बुख़ार उतर गया। 

साहिर से भी प्यार

अमृता को साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत थी। अपनी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' में वो लिखती हैं कि किस तरह साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे। साहिर के जाने के बाद वो उनकी सिगरेट की बटों को दोबारा पिया करती थीं। इस तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लगी। अमृता साहिर को ताउम्र नहीं भुला पाईं और इमरोज़ को भी इसका अंदाज़ा था। अमृता और इमरोज़ की दोस्त उमा त्रिलोक कहती हैं कि ये कोई अजीब बात नहीं थी। दोनों इस बारे में काफ़ी सहज थे। 

उमा त्रिलोक आगे बताती हैं, ''वो ये कहती थी कि साहिर एक तरह से आसमान हैं और इमरोज़ मेरे घर की छत! साहिर और अमृता का प्लैटोनिक इश्क था। इमरोज़ ने मुझे एक बात बताई कि जब उनके पास कार नहीं थी वो अक्सर उन्हें स्कूटर पर ले जाते थे।" 

"अमृता की उंगलियाँ हमेशा कुछ न कुछ लिखती रहती थीं, चाहे उनके हाथ में कलम हो या न हो। उन्होंने कई बार पीछे बैठे हुए मेरी पीठ पर साहिर का नाम लिख दिया। इससे उन्हें पता चला कि वो साहिर को कितना चाहती थीं! लेकिन इससे फ़र्क क्या पड़ता है। वो उन्हें चाहती हैं तो चाहती हैं। मैं भी उन्हें चाहता हूँ।'' 

साथी भी और ड्राइवर भी

अमृता जहाँ भी जाती थीं इमरोज़ को साथ लेकर जाती थीं। यहाँ तक कि जब उन्हें राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया तो इमरोज़ हर दिन उनके साथ संसद भवन जाते थे और बाहर बैठकर उन का इंतज़ार किया करते थे। 


वो उनके साथी भी थे और उनके ड्राइवर भी। इमरोज़ कहते हैं, ''अमृता काफ़ी मशहूर थीं। उनको कई दूतावासों की ओर से अक्सर खाने पर बुलाया जाता था। मैं उनको लेकर जाता था और उन्हें वापस भी लाता था। मेरा नाम अगर कार्ड पर नहीं होता था तो मैं अंदर नहीं जाता था। मेरा डिनर मेरे साथ जाता था और मैं कार में बैठकर संगीत सुनते हुए अमृता का इंतज़ार करता था।" 

"धीरे-धीरे उनको पता चला गया कि इनका ब्वॉय-फ़्रेंड भी है। तब उन्होंने मेरा नाम भी कार्ड पर लिखना शुरू कर दिया। जब वो संसद भवन से बाहर निकलती थीं तो उद्घोषक को कहती थीं कि इमरोज़ को बुला दो। वो समझता था कि मैं उनका ड्राइवर हूँ। वो चिल्लाकर कहता था- इमरोज़ ड्राइवर और मैं गाड़ी लेकर पहुंच जाता था।'' 

जिस्म छोड़ा है साथ नहीं

अमृता प्रीतम का विवाह प्रीतम सिंह से हुआ था लेकिन कुछ वर्ष बाद उनका तलाक़ हो गया था। अमृता का आख़िरी समय बहुत तकलीफ़ और दर्द में बीता। बाथरूम में गिर जाने से उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई। उसके बाद मिले दर्द ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। 

उमा त्रिलोक कहती हैं, ''इमरोज़ ने अमृता की सेवा करने में अपने आपको पूरी तरह से झोंक दिया। उन दिनों को अमृता के लिए इमरोज़ ने ख़ूबसूरत बना दिया। उन्होंने उनकी बीमारी को उनके साथ-साथ सहा। बहुत ही प्यार से वो उनको खिलाते, उनको पिलाते, उनको नहलाते, उनको कपड़े पहनाते। वो क़रीब-क़रीब शाकाहारी हो गईं थीं बाद में, वो उनसे बातें करते, उन पर कविताएं लिखते, उनकी पसंद के फूल लेकर आते। जबकि वो इस काबिल भी नहीं थीं कि वो हूँ-हाँ करके उसका जवाब ही दे दें।''

31 अक्तूबर 2005 को अमृता ने आख़िरी सांस ली। लेकिन इमरोज़ के लिए अमृता अब भी उनके साथ हैं। उनके बिल्कुल क़रीब। इमरोज़ कहते हैं- ''उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं। वो अब भी मिलती है कभी तारों की छांव में कभी बादलों की छांव में कभी किरणों की रोशनी में कभी ख़्यालों के उजाले में हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना अपना कलाम सुनाते हैं उसने जिस्म छोड़ है साथ नहीं।

नोट : यह आलेख सचिन यादव जी समेत कई अन्य आलेखों को पढ़कर लिखा गया है। इन सब बातों का ज़िक्र उमा त्रिलोक की "अमृता इमरोज़" और खुद अमृता प्रीतम की 'रसीदी टिकट" में भी है.