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Tuesday, 2 June 2026

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : चन्द्रमणि झा

वर्तमान भारतीय राजनीति मेँ नरेंद्र मोदी एहन व्यक्तित्वक रूप मेँ स्थापित छथि जिनकर पक्ष आ विपक्ष दुनूमेँ तीव्र मतभेद देखबाक लेल भेटैत अछि। एहन समय मेँ The Leader Narendra D. Modi जेकाँ पुस्तक मात्र एक व्यक्तिक जीवनी बनिकऽ नहि रहि जाइत अछि, बल्कि समकालीन भारतक राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक यात्राक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सेहो बनि जाइत अछि। एहि पुस्तकमेँ नरेंद्र मोदीक नेतृत्व, कार्यशैली आ राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोणकेँ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करबाक प्रयास कएल गेल अछि।

एहि पुस्तकक लेखक आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगतक प्रतिष्ठित गीतकार आ सांस्कृतिक चेतनाक सशक्त हस्ताक्षर छथि। हुनकर साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तकक प्रत्येक अध्यायमेँ स्पष्ट रूपसँ देखाइत अछि। लेखक तथ्य आ घटनाकेँ केवल सूचनात्मक रूपमेँ नहि रखने छथि, बल्कि तकरा भावात्मक आ प्रेरणादायक स्वर सेहो देने छथि। एहि कारणेँ पुस्तक राजनीतिक विश्लेषणक संग-संग साहित्यिक पठनीयता सेहो बनौने रखैत अछि।

पुस्तकक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्वकेँ केवल राजनीतिक उपलब्धिसभ धरि सीमित नहि रखने छथि, बल्कि हुनकर संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता आ जनसंपर्क कौशलकेँ सेहो रेखांकित केने छथि। एक सामान्य पृष्ठभूमिसँ निकलि देशक सर्वोच्च राजनीतिक पद धरि पहुँचबाक यात्राकेँ लेखक प्रेरणादायक आख्यानक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि।

भाषाक दृष्टिसँ पुस्तक सरल आ प्रवाहपूर्ण अछि। घटनासभक क्रमबद्ध विन्यास आ सहज प्रस्तुति एकरा सामान्य पाठकसँ लऽ कऽ राजनीति आ समाजशास्त्रक अध्येतासभ धरि लेल उपयोगी बनबैत अछि। यद्यपि, एक समीक्षकक रूपमेँ ई कहब उचित होयत जे पुस्तकमेँ मोदीजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक सकारात्मक पक्षकेँ अपेक्षाकृत बेसी स्थान भेटल अछि। यदि आलोचनात्मक विमर्श आ वैकल्पिक दृष्टिकोणकेँ सेहो किछु बेसी विस्तार देल जाइत तँ पुस्तकक विश्लेषणात्मक पक्ष आरो सुदृढ़ भऽ सकैत छल। तथापि लेखकक उद्देश्य स्पष्ट रूपसँ नेतृत्व आ प्रेरणाक आयामकेँ रेखांकित करब रहल अछि, आ ओ एहि उद्देश्य मेँ सफल देखाइत छथि।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi  केवल एक राजनीतिक जीवनी नहि, बल्कि नेतृत्व, संकल्प आ राष्ट्रसेवाक विचारकेँ बुझबाक एक गंभीर प्रयास अछि। आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा अपन साहित्यिक दृष्टि आ संवेदनशील अभिव्यक्तिक माध्यमसँ एहि पुस्तककेँ विशिष्ट बना देने छथि। ई पुस्तक विशेष रूपसँ ओहि पाठकसभक लेल उपयोगी अछि जे नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व, हुनकर नेतृत्व-मॉडल आ समकालीन भारतक राजनीतिक यात्राकेँ निकटसँ बुझय चाहैत छथि।

एक पाठकक रूपमेँ सर्वप्रथम तँ हम The Leader Narendra D. Modi केर लिखल जाएबाकेँ लऽ आलोचना करय चाहब। हमर ई आलोचना पुस्तकक विषय-वस्तु वा निष्कर्षकेँ लऽ नहि, बल्कि एकर अस्तित्वकेँ लऽ अछि। आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ई पुस्तक लिखलाहे किएक?

हमर बुझाइत अछि जे नरेंद्र मोदी पर लिखबाक लेल किछु न्यूनतम "अर्हता" होयबाक चाही। जेना - 

  • या तँ लेखक स्वयं संघ-परिवारसँ जुड़ल होथि।

  • या फेर ओ मोदीजीक गृहप्रदेशक होथि।

  • या हुनकर संग कोनो संस्थामेँ कार्य कएने होथि।

  • अथवा पेशासँ पत्रकार होथि, जे वर्षौंसँ हुनकर राजनीतिक जीवनक अध्ययन कएने होथि।

एतय किछु लोक ईहो मानि सकैत छथि जे एहन पुस्तक लिखबाक पाछाँ कोनो राजनीतिक महत्वाकांक्षा वा लाभक संभावना होयबाक चाही। मुदा विडम्बना ई अछि जे चंद्रमणि झा जी एहि तथाकथित अर्हतासभमेँ सँ कोनो अर्हता नहि रखैत छथि।

ओ न तँ राजनीतिक कार्यकर्ता छथि, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ताक गलियारामेँ नियमित रूपसँ विचरण करनिहार, आ नहिए कोनो राजनीतिक लाभक आकांक्षी। ओ मूलतः साहित्यक आदमी छथि—गीतक आदमी, संवेदनाक आदमी, भाषा आ संस्कृतिक आदमी। एहन स्थितिमेँ हुनकर नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखब ओहि लोकसभक लेल आश्चर्यक विषय भऽ सकैत अछि जे साहित्य आ राजनीति बीच कठोर दीवार ठाढ़ कऽ कऽ देखैत छथि।

मुदा हमर शिकायत एतय समाप्त नहि होइत अछि। एक मैथिल हृदयक शिकायत तँ एहि सँ पैघ अछि। यदि चंद्रमणि झा जी केँ ई पुस्तक लिखबे करबाक छल, तँ कम-सँ-कम एकरा मैथिलीमेँ लिखितथि। जे व्यक्ति अपन सम्पूर्ण जीवन मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवामेँ समर्पित कएने छथि, हुनका सँ ई स्वाभाविक अपेक्षा रहैत अछि जे अपन महत्वपूर्ण कृतिसभ लेल मातृभाषाकेँ प्राथमिकता देतीह। The Leader Narendra D. Modi केर अंग्रेजीमेँ प्रकाशित होयब व्यापक पाठक-वर्ग धरि पहुँचबाक दृष्टिसँ उचित भऽ सकैत अछि, मुदा एक मैथिली प्रेमीक मनमेँ ई प्रश्न अनायास उठैत अछि जे की ई पुस्तक मैथिलीमेँ नहि आबि सकैत छल?

तथापि जखन हम पुस्तक पढ़ब आरम्भ करैत छी तँ धीरे-धीरे ई शिकायत कम होमऽ लगैत अछि। तखन बुझाइत अछि जे लेखकक वास्तविक अर्हता न राजनीतिक निकटता अछि, न वैचारिक प्रतिबद्धता आ नहिए कोनो व्यक्तिगत स्वार्थ। हुनकर सभसँ पैघ अर्हता अछि—एक सजग साहित्यकारक दृष्टि, जे अपन समयक प्रभावशाली व्यक्तित्व आ घटनाकेँ बुझबाक तथा ओकरा शब्द देबाक साहस रखैत अछि। सम्भवतः ईहे अर्हता हुनका एहि पुस्तकक रचनाक लेल प्रेरित कएने अछि।

आब पुस्तकक विषय-वस्तु पर अबैत छी। क्राउन पब्लिकेशन, छत्तीसगढ़सँ प्रकाशित ई 278 पृष्ठक पुस्तक वास्तवमेँ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। यद्यपि पुस्तकक सामग्री आ लेखकक परिश्रम एकरा संग्रहणीय बनबैत अछि, तथापि हमर मानब अछि जे एहन महत्वपूर्ण कृतिकेँ हार्डबाउंड संस्करण आ आरो आकर्षक आवरणक संग प्रस्तुत कएल जाइत तँ एकर गरिमा आरो बढ़ि जाइत।

पुस्तकक सभसँ पैघ विशेषता एकर व्यापक फलक अछि। कुल 77 आलेखक माध्यमसँ लेखक नरेंद्र मोदीक जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि आ सामाजिक सरोकार सहित लगभग सभ महत्वपूर्ण पक्षकेँ समेटबाक प्रयास केने छथि। ई कार्य निश्चयहि श्रमसाध्य आ सराहनीय अछि।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तक उपलब्ध अछि, मुदा अधिकांश पुस्तक या तँ जीवनी धरि सीमित रहि जाइत अछि अथवा कोनो एक विशेष पक्ष पर केन्द्रित रहैत अछि। चंद्रमणि झा जीक ई कृति एहि अर्थमेँ अलग देखाइत अछि जे एहि मेँ विविध स्रोत, प्रसंग आ दृष्टिकोणकेँ एकहि स्थान पर संकलित करबाक प्रयास भेल अछि। पाठककेँ मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ सम्बन्धित अनेक एहन सूचना एकत्र भेटैत अछि जाहि लेल अन्यथा अनेक पुस्तक आ स्रोतक सहारा लेबाक आवश्यकता पड़ित।

77 स्वतंत्र आलेख होयबाक बावजूद पुस्तक कतौ बिखरल नहि लगैत अछि। प्रत्येक आलेख एक पैघ व्यक्तित्व-चित्रक अंश बनिकऽ सामने अबैत अछि। पाठक चाहे कोनो अध्यायसँ पढ़ब शुरू करथि, अंततः हुनका नरेंद्र मोदीक जीवन आ नेतृत्वक एक समग्र तस्वीर भेटैत अछि।

लेखकक दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक आ प्रेरणात्मक अछि। ओ मोदीकेँ मात्र राजनेताक रूपमेँ नहि, बल्कि एहन नेताक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य पृष्ठभूमिसँ उठि असाधारण उपलब्धि प्राप्त केने छथि। एहि कारण कतेको स्थान पर पुस्तक जीवनीसँ बेसी प्रेरक साहित्यक रूप धारण कऽ लैत अछि।

एक पाठकक रूपमेँ पुस्तक पढ़ैत समय ई अनुभव अवश्य होइत अछि जे भाषाकेँ आरो रोचक, संवादधर्मी आ प्रवाहयुक्त बनाओल जा सकैत छल। कतेको स्थान पर भाषा अत्यधिक अकादमिक आ विवरणप्रधान भऽ जाइत अछि, जाहिसँ सामान्य पाठककेँ किछु अध्याय बोझिल वा नीरस प्रतीत भऽ सकैत अछि। मुदा एहि पक्षकेँ पुस्तकक सीमा होयबाक संग-संग एकर विशेषता सेहो मानल जा सकैत अछि। लेखक रोचकताक अपेक्षा प्रामाणिकता आ सूचना-संपन्नताकेँ बेसी महत्व देने छथि। एहि कारण पुस्तक भावनात्मक आख्यानक अपेक्षा एक संदर्भग्रंथ आ दस्तावेजक स्वरूप ग्रहण करैत अछि।

यदि कोनो पाठक केवल साहित्यिक आनन्दक लेल एहि पुस्तककेँ पढ़य चाहैत छथि तँ सम्भव अछि जे हुनका किछु निराशा हो। मुदा यदि हुनकर रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्व अथवा एहि विषय पर गंभीर अध्ययन आ शोधमेँ अछि, तँ ई पुस्तक निश्चयहि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होयत।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेताक जीवनी नहि, बल्कि एहन राजनीतिक व्यक्तित्वकेँ बुझबाक प्रयास अछि जाहि इक्कीसम शताब्दीक भारतक दिशा आ विमर्शकेँ गहराईसँ प्रभावित केने अछि। विषयक व्यापकता, सामग्रीक समृद्धि आ दस्तावेजी महत्वक कारण ई कृति विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि।

पुस्तकक एक आन महत्वपूर्ण उपलब्धि एकर सहज उपलब्धता अछि। प्रसन्नताक विषय ई अछि जे ई पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल आ गूगल बुक्स जेकाँ प्रमुख मंचसभ पर उपलब्ध अछि। दुर्भाग्यवश मैथिलीक अधिकांश लेखक आ प्रकाशक अपन पुस्तकक वितरण आ विपणन एहि स्तर धरि नहि पहुँचा पबैत छथि। एहि दृष्टिसँ सेहो ई पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।

एक मैथिल पाठकक रूपमेँ, आ विशेष रूपसँ लेखकक साहित्यिक अवदानसँ परिचित होयबाक कारण, एहि पुस्तककेँ देखिकऽ हमरा स्वाभाविक गर्वक अनुभूति होइत अछि। मैथिली गीत-साहित्यक शिखर पुरुषसभमेँ गिनल जाएबला आदरणीय चंद्रमणि झा जीक राष्ट्रीय स्तरक विषय पर अंग्रेजीमेँ एहन व्यापक आ सुव्यवस्थित पुस्तक प्रस्तुत करब केवल हुनकर व्यक्तिगत उपलब्धि नहि, बल्कि सम्पूर्ण मैथिली समाज आ साहित्य-जगतक लेल गौरवक विषय अछि।

अंतमेँ आदरणीय चंद्रमणि झा जीकेँ एहि महत्वपूर्ण कृतिक लेल हमर हार्दिक शुभकामना। हमर कामना अछि जे ई पुस्तक देश-विदेशक अधिकाधिक पाठक धरि पहुँचे, पढ़ल जाए, चर्चित होउ आ अपन उद्देश्यक सार्थकता सिद्ध करय। संगहि, ई कृति मैथिली समाजकेँ सेहो प्रेरित करय जे ओकर साहित्यिक प्रतिभासभ क्षेत्रीय सीमासँ बाहर निकलि राष्ट्रीय आ वैश्विक स्तर पर अपन सशक्त पहचान स्थापित करय।


प्रवीण कुमार

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695 रूपा के पुस्तक एखन अमेजन पर 521 रूपा में उपलब्ध अहि. पुस्तक प्राप्ति लेल लिंक

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : डॉ. चन्द्रमणि झा


वर्तमान भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हैं जिनके पक्ष और विपक्ष दोनों में तीव्र मतभेद दिखाई देते हैं। ऐसे समय में The Leader Narendra D. Modi जैसी पुस्तक केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं रह जाती, बल्कि वह समकालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा का भी एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है। पुस्तक में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, कार्यशैली और राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोण को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक के लेखक आदरणीय डॉक्टर चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगत के प्रतिष्ठित गीतकार एवं सांस्कृतिक चेतना के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में दिखाई देती है। लेखक ने तथ्यों और घटनाओं को न केवल सूचनात्मक ढंग से रखा है, बल्कि उन्हें एक भावात्मक और प्रेरणात्मक स्वर भी प्रदान किया है। यही कारण है कि पुस्तक राजनीतिक विश्लेषण के साथ-साथ साहित्यिक पठनीयता भी बनाए रखती है।

पुस्तक का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि लेखक ने नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता और जनसंपर्क कौशल को भी रेखांकित किया है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुँचने की यात्रा को लेखक ने प्रेरक आख्यान के रूप में प्रस्तुत किया है।

भाषा की दृष्टि से पुस्तक सरल और प्रवाहपूर्ण है। पुस्तक में घटनाओं का क्रमबद्ध विन्यास और सहज प्रस्तुति इसे सामान्य पाठकों से लेकर राजनीति एवं समाजशास्त्र के अध्येताओं तक के लिए उपयोगी बनाती है।हालाँकि, एक समीक्षक के रूप में यह भी कहा जा सकता है कि पुस्तक में मोदी के व्यक्तित्व और कार्यों के सकारात्मक पक्षों को अपेक्षाकृत अधिक स्थान मिला है। यदि आलोचनात्मक विमर्श और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को भी कुछ अधिक विस्तार दिया जाता, तो पुस्तक का विश्लेषणात्मक पक्ष और अधिक सुदृढ़ हो सकता था। फिर भी लेखक का उद्देश्य स्पष्टतः नेतृत्व और प्रेरणा के आयामों को रेखांकित करना रहा है, और उस उद्देश्य में वे सफल दिखाई देते हैं।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi केवल एक राजनीतिक जीवनी नहीं, बल्कि नेतृत्व, संकल्प और राष्ट्र-सेवा के विचारों को समझने का एक गंभीर प्रयास है। आदरणीय चंद्रमणि झा जी ने अपनी साहित्यिक दृष्टि और संवेदनशील अभिव्यक्ति के माध्यम से इस पुस्तक को विशिष्ट बना दिया है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व,  उनके नेतृत्व-मॉडल और समकालीन भारत की राजनीतिक यात्रा को निकट से समझना चाहते हैं।

एक पाठक के तौर पर सर्वप्रथम तो मैं The Leader Narendra D. Modi के लिखे जाने की ही आलोचना करना चाहता हूँ। मेरी यह आलोचना पुस्तक की विषयवस्तु या उसके निष्कर्षों को लेकर नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को लेकर है कि आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ने यह पुस्तक लिखी ही क्यों ? 

मेरी समझ में नरेंद्र मोदी पर लिखने के लिए आपमें कुछ न्यूनतम "अर्हताएँ" होनी चाहिए। जैसे - 

-  या तो लेखक स्वयं संघ-परिवार से जुड़ा हो, 
-  या फिर वो मोदी जी के गृहप्रदेश का हो,
-  या उनके साथ किसी संस्था में कार्यरत रहा हो, 
-  या फिर पेशे से पत्रकार हो जिसने वर्षों तक उनके राजनीतिक जीवन का अध्ययन किया हो। 

यहाँ कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि ऐसी पुस्तक लिखने के पीछे कोई राजनीतिक आकांक्षा या लाभ की संभावना होनी चाहिये, किंतु अफसोस कि चंद्रमणि झा जी इन अर्हताओं में से कोई भी नहीं रखते। वे न तो राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ता के गलियारों के नियमित यात्री, न ही किसी प्रकार के राजनीतिक लाभ के आकांक्षी। वे मूलतः साहित्य के आदमी हैं - गीत के आदमी, संवेदना के आदमी, भाषा और संस्कृति के आदमी। ऐसे में उनका नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखना उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है जो साहित्य और राजनीति के बीच कठोर दीवारें खड़ी करके देखते हैं।

लेकिन मेरी शिकायत यहीं समाप्त नहीं होती। एक मैथिल हृदय की शिकायत इससे भी बड़ी है। यदि चंद्रमणि झा जी को यह पुस्तक लिखनी ही थी, तो कम-से-कम इसे मैथिली में लिखते। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति की सेवा में लगाया हो, उनसे यह स्वाभाविक अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपनी महत्वपूर्ण कृतियों के लिए अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता दे। The Leader Narendra D. Modi का अंग्रेज़ी में प्रकाशित होना एक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचने की दृष्टि से उचित हो सकता है, किंतु एक मैथिली प्रेमी के मन में यह प्रश्न अनायास उठता है कि क्या यह पुस्तक मैथिली में नहीं आ सकती थी?

फिर भी, जब पुस्तक को पढ़ना शुरू करता हूँ तो धीरे-धीरे यह शिकायत कम होने लगती है। तब समझ में आता है कि लेखक की वास्तविक अर्हता न तो राजनीतिक निकटता है, न वैचारिक प्रतिबद्धता और न ही कोई व्यक्तिगत स्वार्थ। उनकी सबसे बड़ी अर्हता है - एक सजग साहित्यकार की दृष्टि, जो अपने समय के प्रभावशाली व्यक्तित्वों और घटनाओं को समझने तथा उन्हें शब्द देने का साहस रखती है। संभवतः इसी अर्हता ने उन्हें इस पुस्तक को लिखने के लिए प्रेरित किया।

अब आते हैं पुस्तक की विषय-वस्तु पर। Crown Publication, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित यह पुस्तक 278 पृष्ठों का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यद्यपि पुस्तक की सामग्री और परिश्रम इसे संग्रहणीय बनाते हैं, फिर भी मेरा मानना है कि इतने महत्त्वपूर्ण कार्य को हार्डबाउंड संस्करण तथा अधिक आकर्षक आवरण के साथ प्रस्तुत किया जाता तो इसकी गरिमा और बढ़ जाती। पुस्तक का विषय और उसका संदर्भ ऐसी प्रस्तुति की अपेक्षा करता है। पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक फलक है। कुल 77 आलेखों के माध्यम से लेखक ने नरेंद्र मोदी के जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि तथा सामाजिक सरोकारों सहित लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों को समेटने का प्रयास किया है। यह कार्य निश्चय ही श्रमसाध्य और सराहनीय है।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तकें उपलब्ध हैं, किंतु अधिकांश पुस्तकें या तो जीवनी तक सीमित रह जाती हैं अथवा किसी एक विशेष पक्ष पर केंद्रित होती हैं। चंद्रमणि झा जी की यह कृति इस अर्थ में अलग दिखाई देती है कि इसमें विविध स्रोतों, प्रसंगों और दृष्टिकोणों को एक ही स्थान पर संकलित करने का प्रयास हुआ है। पाठक को मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित अनेक ऐसी सूचनाएँ एक साथ प्राप्त होती हैं, जिन्हें अन्यत्र खोजने के लिए अनेक पुस्तकों और स्रोतों का सहारा लेना पड़ सकता है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण गुण इसकी संरचना है। 77 स्वतंत्र आलेख होने के बावजूद पुस्तक बिखरी हुई नहीं लगती। प्रत्येक आलेख एक बड़े व्यक्तित्व-चित्र का हिस्सा बनकर सामने आता है। पाठक चाहे किसी भी अध्याय से पढ़ना आरम्भ करे, वह अंततः नरेंद्र मोदी के जीवन और नेतृत्व की एक समग्र तस्वीर तक पहुँचता है।
लेखक का दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक और प्रेरणात्मक है। वे मोदी को केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसने साधारण पृष्ठभूमि से उठकर असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। इस कारण कई स्थानों पर पुस्तक जीवनी से अधिक प्रेरक साहित्य का रूप धारण करती दिखाई देती है। यद्यपि आलोचनात्मक विमर्श की अपेक्षा रखने वाले पाठकों को कुछ प्रश्न अनुत्तरित लग सकते हैं, फिर भी पुस्तक का घोषित उद्देश्य किसी राजनीतिक बहस को खड़ा करना नहीं, बल्कि एक नेतृत्व-यात्रा का दस्तावेज़ प्रस्तुत करना है।

सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लेखक ने सूचनाओं को केवल संकलित नहीं किया है, बल्कि उन्हें साहित्यिक संवेदना और सहज भाषा के माध्यम से पाठक तक पहुँचाया है। यही कारण है कि पुस्तक तथ्य और भाव, दोनों के स्तर पर अपनी पठनीयता बनाए रखती है। नरेंद्र मोदी के संबंध में इतनी एकीकृत और व्यवस्थित सामग्री संभवतः अन्यत्र दुर्लभ है, और यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।

एक पाठक के रूप में पुस्तक को पढ़ते हुए यह अनुभव अवश्य होता है कि इसकी भाषा को और अधिक रोचक, संवादधर्मी तथा प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता था। लेखक का उद्देश्य स्पष्ट रूप से तथ्यों और सूचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना रहा है, किंतु इसी कारण कई स्थानों पर भाषा अत्यधिक अकादमिक और विवरणप्रधान हो जाती है। परिणामस्वरूप सामान्य पाठक, जो किसी जीवनी या संस्मरणात्मक शैली की अपेक्षा लेकर पुस्तक के पास आता है, उसे कुछ अध्याय अपेक्षाकृत बोझिल अथवा नीरस प्रतीत हो सकते हैं। हालाँकि, इस पक्ष को पुस्तक की सीमा कहने के साथ-साथ उसकी विशेषता भी माना जा सकता है। लेखक ने रोचकता की अपेक्षा प्रामाणिकता और सूचना-संपन्नता को अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि पुस्तक भावनात्मक आख्यान की बजाय एक संदर्भग्रंथ और दस्तावेज़ का स्वरूप ग्रहण करती है।

इसलिए यदि कोई पाठक केवल साहित्यिक आनंद या कथा-सुख की अपेक्षा से इस पुस्तक को पढ़ना चाहता है, तो संभव है कि उसे कुछ निराशा हो। लेकिन यदि उसकी रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व अथवा इन विषयों पर गंभीर अध्ययन और शोध में है, तो यह पुस्तक उसके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। वस्तुतः नरेंद्र मोदी से संबंधित विविध सूचनाओं, विचारों, भाषणों और संदर्भों को एक ही स्थान पर संकलित करने के कारण यह पुस्तक शोधार्थियों, राजनीतिक अध्येताओं और गंभीर पाठकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ-दस्तावेज़ के रूप में देखी जा सकती है।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने का प्रयास है जिसने इक्कीसवीं सदी के भारत की दिशा और विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। चंद्रमणि झा की यह कृति अपने विषय की व्यापकता, सामग्री की समृद्धि और दस्तावेज़ी महत्व के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इस पुस्तक की एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इसकी सहज उपलब्धता है। आज के समय में किसी पुस्तक का अच्छा होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उसका पाठकों तक पहुँचना भी है। प्रसन्नता की बात है कि The Leader Narendra D. Modi अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल तथा गूगल बुक्स जैसे प्रमुख मंचों पर उपलब्ध है। दुर्भाग्यवश मैथिली के अधिकांश लेखक और प्रकाशक अपनी पुस्तकों के वितरण और विपणन को इस स्तर तक नहीं पहुँचा पाते हैं। इस दृष्टि से भी यह पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

एक मैथिल पाठक के रूप में, और विशेषकर लेखक के साहित्यिक अवदान से परिचित होने के कारण, इस पुस्तक को देखकर मुझे एक स्वाभाविक गर्व-बोध होता है। मैथिली गीत-साहित्य के शिखर पुरुषों में गिने जाने वाले आदरणीय चंद्रमणि झा जी का इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर के विषय पर अंग्रेज़ी में एक सुव्यवस्थित और व्यापक पुस्तक प्रस्तुत करना न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मैथिली समाज और साहित्य-जगत के लिए भी गौरव का विषय है।

पुस्तक के साथ एक अप्रत्याशित किंतु महत्त्वपूर्ण लाभ यह भी जुड़ा हुआ है कि इसके बहाने पाठक स्वयं लेखक से परिचित हो पाता है। पुस्तक में चंद्रमणि झा जी का परिचय विस्तार से दिया गया है, जिसे पढ़ते हुए उनके साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान की व्यापकता का अनुमान होता है।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi एक ऐसी कृति है जो अपने विषय, सामग्री और दस्तावेज़ी महत्त्व के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करती है। इसमें कुछ सीमाएँ अवश्य हैं, किंतु इसकी उपलब्धियाँ उन सीमाओं से कहीं अधिक बड़ी हैं। यह पुस्तक नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और विचारों को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए उपयोगी है ही, साथ ही यह इस बात का भी प्रमाण है कि एक संवेदनशील साहित्यकार अपने समय के ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पर गंभीर और श्रमसाध्य कार्य कर सकता है जो साहित्य से ईतर है... राजनीति, खेल, सिनेमा आदि आदि.

अंत में आदरणीय चंद्रमणि झा जी को इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। मेरी कामना है कि यह पुस्तक देश-विदेश के अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचे, पढ़ी जाए, चर्चा में आए और अपने उद्देश्य की सार्थकता सिद्ध करे। साथ ही, यह कृति मैथिली समाज को भी प्रेरित करे कि उसकी साहित्यिक प्रतिभाएँ क्षेत्रीय सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करें।

Praveen Kumar
समीक्षक
पाठकों के लिए बोनस
695 रुपये मूल्य की यह पुस्तक फ़िलहाल अमेजन पर 521 रुपये में उपलब्ध है . 

Saturday, 27 December 2025

मिथिला मैथिली पर पाँच बातें

परसों शाम किसी कार्य में लगा था जो लगभग मध्यरात्रि में जाकर समाप्त हुआ। संबंधित दो व्यक्ति को मैसेज किया की इसपर बात हो, स्वाभाविक रूप से वो सो चुके थे। मैंने सुबह तक़रीबन चार बजे उन्हें फिर से मैसेज किया, माय बैड लक की वो बेचारे मेरी तरह अनिद्रा के शिकार नहीं थे, सो रहे थे। फिर मैं भी रूटीन काम की तैयारी में लग गया। 

दरअसल मैंने एक आर्टिकल लिखा था जिसे किसी पुस्तक में छपना था। पुस्तक मैथिली और अंग्रेजी में थी सो मुझे मैथिली में लिखने को कहा गया था। तथ्यात्मक दृष्टिकोण से सहमति के लिए अपना हिंदी लिखा हुआ ही पहले भेज दिया मैंने। इस उम्मीद से की यदि ये ठीक कहा समझा गया तो इसका मैथिली अनुवाद कर दूँगा मैं। 

सुबह तक़रीबन ०९ बजे के क़रीब एक महोदय का फ़ोन आया। उन्होंने कहा - “अरे ये तो ग़ज़ब लिखा आपने, मस्त है ये। न मसाला कम ना ज़्यादा। बिल्कुल बैलेंस्ड किंतु असरदार। मैं आग्रह करूँगा कि आप इसे हिंदी में ही रहने दें। मैथिली करके इसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी।” - मैंने पहले तो सवाल किया की क्या मैथिली भाषा को असरदार नहीं मानते आप ? … और फिर मजाक में उनसे ये भी कहा - “आप क्यों चाहेंगे कि मैथिली में लिखूँ और नाम हो मेरा…” 

इस पर भाई संजीदा हो गए। बोले - “कई वर्षों से वार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ। भरसक पढ़ता भी हूँ मैथिली किताबें, कवि गोष्ठी और विद्यापति नाइट्स वग़ैरा में भी जाता हूँ, मुझे पता है मैथिली भाषा की औक़ात। खासकर तब जबकि आप सोशल मीडिया से हट कर किसी पुस्तक में लिखो। आप अकादमीक भाषा लिखो।” 

मैं गंभीर होकर सुनने लगा उनको और भाई बोलते रहे - “आप जब हिंदी लिखते हो तो आप उसमें अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, मैथिली, भोजपुरी… सबका समावेश करते हो। इससे लोक भाषा बनती है, लोकप्रिय शब्दों से लोग कनेक्ट करते हैं, आप मैथिली में ऐसा करके देखो ना, झंडाबरदार आपको भाषा, व्याकरण से लेकर विद्यापति तक की मार से आपका थोबड़ा सूजा देंगे…” - मैंने दफ्तर की बात कहके भाई को कहा - “देखिए ब्रो, थोबड़ा तो वैसे भी सूजेगा मेरा जब मैथिली किताब में हिंदी आलेख होगा… आप देख लीजिए कैसे सुजाना है।” 

दूसरी घटना - जैसा की मैं यूँ ही #अलरबलर लिखता हूँ, एक पोस्ट लिख दिया जिसमें लोगों के द्वारा साल भर में पुस्तक पढ़ने की बात पूछी थी। जवाब देने वाले सभी मैथिल लोग थे और आप जाकर उस पोस्ट पर देख लीजिए की उनके द्वारा पढ़े किताबों की लिस्ट में से एक-दो किताब को छोड़कर बांकी सभी पचास के करीब किताबें या तो हिंदी की हैं या फिर अंग्रेजी की। अब आप देख समझ लीजिए की मैथिल मैथिली को कितना पढ़ रहा है। कुछ ऐसे लोग जो मैथिली भाषा साहित्य के झंडाबरदार बने हैं और खुद की बादशाहत क़ायम रखना चाहते हैं उनको यह सब नहीं दिखता है, वो आँख बंद करके सब कुछ हरा-हरा देखते हैं। यदि आपने नया प्रयोग किया तो वो अपनी झूठी शान क़ायम रखने के दवाब में आपका थोबड़ा सूजा देंगे… 

तीसरी बात - अभी पटना की मैथिली अकादमी बंद कर दी गई। मेरे जैसे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कूथ-पाद कर अपनी जिम्मेवारी की इतिश्री कर ली। हालांकि इससे फैले बदबू पर कुछेक संस्थाओं ने जहाँ अब धरना करने का विचार किया है वहीं कुछ लोग सरकार द्वारा सभी भाषा के अकादमी का पुनर्गठन होने की बात कर रहे हैं। अब जबकि सरकार ने अकादमियों के पुनर्गठन की घोषणा कुछेक साल पहले ही की थी और अकादमी के बंदी पर सबसे कारगर कार्य हाई कोर्ट में सरकार के ख़िलाफ़ याचिका देने का या फिर किसी सरकारी आदमी को काला झंडा आदि दिखाने का होता…. मैथिलों के इन नौटंकियों को देखकर दया आती है मुझे। 

तक़रीबन पंद्रह-बीस साल पहले कार्यस्थल पर एक मित्र ने मुझे एक कविता सुनाई थी - “काम से डरो नहीं, काम को करो नहीं… काम का फ़िक्र करो या ना करो, फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करो…” यही हाल पटना के मैथिल संस्थाओं की है। उन्हें समाज को विरोध करते भी दिखना है और सरकार अनुदानित संस्था के पद पर कायम भी रहना है…” बेचारे !

चौथी बात - जैसा की मैं पहले कह चुका हूँ, विद्यापति जी को जाड़ा नहीं लगता सो जाड़े के मौसम में जहाँ तहाँ विद्यापति नाइट्स का आयोजन होता है। हालाँकि अब लोग नाम बदल बदल आयोजन कर रहे हैं किंतु नौटंकी वही है। मंच, पाग-डोपटा, बेमतलब के विषयों पर संगोष्ठी, फोटो सेशन… बस। किसी भी ऐसे आयोजन में आपने देखा की सरकाआर के ख़िलाफ़ या अकादमी के समर्थन में कोई एक शब्द बोल दे, कोई सेशन / सत्र इसके ख़िलाफ़ योजना बनाने को ह रख दें… नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि उनका मुख्य अतिथि ही उस सरकार से संबद्ध होता है जिसने अकादमी बंद किया है। 

आपके लिट फेस्ट या फिर अन्यान्य महोत्सवों की चर्चाओं में अनेक एक्शन पॉइंट बनते हैं। कभी किस को उसपर दुबारा बात करते, फॉलो अप लेते देखा आपने ? क्या नफा हुआ है सिवाय लोगों के मिलने जुलने, ब्यूटी पार्लर और कुर्ता बंडी पर खर्च करने के ? 

पाँचवी बात - आज फिर से ललित झा अपने चैनल मिथिला मिरर को लेकर मैथिल भाइयों को इमोशनल करते हुए कह रहे हैं - “मुझे मत बचाइए… आप तय करिए कि मैथिली के लिए कम करते मिथिला मिहिर को बचाना है या नहीं…?” - मैंने उनके लाइव सत्र में कमेंट किया भी की मुझे मिथिला मिरर से कोई मतलब नहीं, हाँ, ललित झा से मतलब है सो आपको कोई मदद चाहिए तो कहें, हम करेंगे। दरअसल सच यही है, आपके मैथिली से कोई लेना देना नहीं है मिथिला को, और यह बात मैंने अनुज ललित को संभवत: पाँच-छह साल पहले कही थी। हिंदी में काम करने को कहा था… अपना कैरीअर संवारने को कहा था…मैथिल और मिथिला ना तो रोटी देता है और नहीं ही मैथिली भाषा साहित्य को इन लोगों ने समृद्ध होने दिया कि इसमें व्यावसायिकता आए… मान लो इस बात को ! 

तो भाइयों शुरू हो जायें… टोटके करें मुझ पर… बाण चलायें मुझ पर…ज्ञान वर्षा करें मुझे पर, वो ज्ञान जिसको लेकर आप कुछ उखाड़ नहीं पा रहे। मेरा क्या हैं, इतना झेल चुका हूँ, थोड़ा और झेल लूँगा…

#मिथिला #मैथिली


Sunday, 24 August 2025

साहित्य और राज्य से इतर मिथिला


मिथिला के इतिहास के नाम पर अधिकांशतः साहित्य विवेचना ही देखी है। चूँकि मैंने कोई किताब नहीं लिखी, और न ही टीवी में आता हूँ, साहित्य से इतर मिथिला का संक्षित इतिहास लिखने की धृष्टता करते डर रहा हूँ। चीज़ें शायद विस्तार से भले न मिलें, क़रीने से भी न मिले किंतु जो हैं वो सच्ची हैं इसकी गारंटी लेता हूँ।

मिथिला की गाँव वापसी

सन १८१२ में पटना की जनसंख्याँ तक़रीबन ३ लाख थी और कलकत्ता की १.७५ लाख. १८७१ में पटना १.६ लाख और कोलकाता ४.५ लाख. पटना की तरह यही हाल भागलपुर और पुरनियाँ का भी रहा. कारण दो थे. इस दौरान अंग्रेजों की मदद से कलकत्ता में फला फुला उद्योग और बिहार/ मिथिला इलाके में देशी उद्योग के विनाश से लोगों का शहर से गाँव की ओर पलायन. मिस्टर बुकानन ने अपने सर्वे में १९ वीं सदी के बड़े हिस्से तक इस पलायन की पुष्टि की है. अंग्रेजी शासन की दोहन निति के कारण शहर के उद्योग धंधे नष्ट होते गए और लोग गाँव में वापस आते गए.

इसका परिणाम गाँव के घरेलु उद्योग और कृषि क्षेत्र में उन्नति लेकर आया. दुष्परिणाम सिर्फ इतना की गाँव में काम कम और लोग ज्यादा हो गए. इस क्रम में अति तब हुई जब अंग्रेजों ने गाँव की जमीन का दोहन भी आरम्भ किया... १८५७ की क्रांति में सरकार के खिलाफ ज्यादा लोगों का जुटना संभवतः इसी करण हुआ. लोग शहर में मारे गए और गाँव में भी शुकुन से न रह पाए तो विरोध लाजिमी था. ऊपर से कुछ स्थानीय लोगों द्वारा अंग्रेजों की चमचई...

इसको लिखने का कारण सिर्फ इतना की मुझे इसी प्रकार की घुटन आज के हिन्दुस्तान में दिखती है. मुझे लगता है की लोग गाँव वापस जायेंगे... गाँव छोटे उद्योग धंधों, शिक्षा और व्यापार का केंद्र बनेगा... सरकारें जलेंगी...

दलान

उद्योग व् पलायन

अक्सर लोगों से सुनता हूँ, बिहार और मिथिला का खस्ता हाल है... लोग खतरनाक तरीके से पलायन कर रहे हैं... ब्ला ब्ला ब्ला. जरा अन्दर घुसिए तो पता चलता है की मिथिला से पलायन का इतिहास हजारों वर्ष पुराना रहा है. विद्वान, व्यापारी, मजदुर... सब बेहतर पारितोषिक के लिए बाहर जाते रहे. इतिहासकारों ने इस बात का सबुत ८०० वीं ईस्वी से बताया है.

जूट, नील और साल्ट-पिटर के नजदीकी उत्पादन क्षेत्रों (फारबिसगंज, किशनगंज दलसिंहसराय आदि) में मजदूरी के अलावा लोग मोटिया या तिहाडी मजदूरी करने नेपाल, मोरंग, सिल्लिगुड़ी और कलकत्ता भी जाते रहे हैं. श्री जे सी झा ने अपनी किताब Migration and Achievements of Maithil Pandits में लिखा है - मैथिल पंडित बेहतर अर्थ लाभ के लिए देश के अन्य क्षेत्रों में जाते रहे हैं.

हालाँकि तब और अब के इस पलायन में फर्क है. तब लोग मूलतः वापसी में अपने साथ कृषि की नई तकनीक सीख कर, स्वस्थ जीवन जीने के गुर सीखकर, घरेलु उद्योग लगाने की नई तकनीक सीख कर आते थे. जबकि अब हम छोटे कपडे, कान फाडू पंजाबी संगीत, प्रेम त्रिकोण और धोखेबाजी की नई तकनीक ज्यादा सीखते हैं.

इस दौर में एक वक़्त मिथिला क्षेत्र में उद्योग फला-फुला भी. अठारहवीं और उन्नीसवी शताब्दी में मिथिला के अलग अलग शहरों में विभिन्न उद्योग लगे. मधुबनी में मलमल, दुलालगंज व् पुरनियाँ में सस्ते कपड़ों का तो किशनगंज में कागज का उद्योग चला. दरभंगा, खगडिया, किशनगंज आदि ईलाका पीतल व् कांसे के बर्तनों के लिए जाना जाता था... भागलपुर सिल्क, डोरिया, चारखाना के लिए और मुंगेर घोड़े के नाल, स्टोव, जूते के लिए प्रसिद्ध था.

इन सबमे आश्चर्यजनक तरीके से पुरनियाँ तब भी काफी आगे था. कहते हैं पुरनियाँ का सिंदूर उत्पादन व् निर्यात तथा टेंट हाउस के सामान बनाने का काम विख्यात था. मेरे शहर दरभंगा के लोगों को बुरा न लगे इसलिए बताता चलूँ की दरभंगा शहर उस वक़्त हाथी दांत से बने सामानों का प्रमुख उत्पादन केंद्र था.


मिथिला में स्त्री

जितना पुराना इतिहास पुरुषों द्वारा मिथिला छोड़ने का रहा है ठीक उतना ही अकेली रहने वाली स्त्रियों के शोषण (विभिन्न स्तरों पर) का भी रहा. मैथिल समाज का छुपा हुआ किन्तु सत्य पक्ष है की स्त्रियाँ सताई जाती रही... परदे के पीछे यौन प्रताड़ना... लांछन... दोषारोपण... आदि करते हुए मैथिल समाज खुद को कलमुंहा साबित करता आया है.

इसका एक सकारात्मक पक्ष भी था. क्षेत्र में मैथिल स्त्रियों में शिक्षा का स्तर बढ़ा और वो स्वाबलंबी बनी. बिहार के औसतन ६% के सामने पूसा में स्त्री शिक्षा का दर १३%, सोनबरसा में ६%, मनिहारी में ९% थी. (जिन्हें % कम लग रहा है उनके लिए – १९९०-२००१ में यह दर २८% था)

स्वाभाविक रूप से गाँव की सत्ता स्त्रियों के हाथ में आ गई थी ऐसे में. गाँव की महिलाएं घरेलु उद्योग, पशु पालन आदि में आगे दिखने लगी थी. संभवतः गांधी का चरखा आन्दोलन इसी वजह से मिथिला के घर घर में पहुँच पाया.

समय के साथ साथ मैथिल स्त्रियों की दुनियां थोड़ी स्वप्निल बनाई गई जब दूर देश के सन्देश उसके पास भौतिक और काल्पनिक तरीके से पहुँचने लगे. इस रंग में भी भंग तब पड़ा जब पुरुष अपने साथ बीमारियाँ भी साथ लाने लगे.


मिथिला में जातियां

यहाँ हिन्दू परंपरा अपने प्रखरतम रूप में सभी जटिलताओं के साथ सदा विद्यमान रहीं. अलग जातियों के अलग अलग देवता और अलग गहबर होते थे. जातियों के देवताओं के नाम रोचक थे.

श्याम सिंह डोम जाति के, अमर सिंह हलवाई व् धोबियों के, गनिनाथ-गोविन्द हलवाइयों के सलहेस दुसाधों के दुलरा दयाल/ जय सिंह मल्लाहों के, विहुला तेली जाती के, दिनाभद्री मुसहरों के तो लालवन बाबा चमारों के देवता थे.

स्वाभाविक तौर पर सामाजिक कुरीतियाँ, अधविश्वास और धारणाएं ज्यादा थीं. तमाम् विरोधी उदाहरण के बावजूद ब्राम्हण, राजपूत या लाला विपदा में दुसाध, मुसहर के गहबर में जाते थे. जातियों के हिसाब से कार्य बंटे थे जो उत्तरोत्तर कम होते गए.

मिथिलांचल के कई इलाकों में मुसलमानों द्वारा मनाये जाने वाले ताजिये में हिन्दुओं का शामिल होना और हिन्दुओं के त्योहारों में मुस्लिमों के साथ होने के उदहारण भी हैं. कालांतर में हम समझदार होते गए और विषमतायें उग्र रूप धारण करने लगी.


ऐसे में यह स्पष्ट है कि हमें हमारे सीमित सोच से इतर मिथिला को बृहत् तौर पर देखे जाने की आवश्यकता है। मिथिला मात्र विद्यापति विद्यापति समारोह और प्रणाम मिथिलावासी और हमर मिथिला महान तक सीमित नहीं है। 

Sunday, 17 August 2025

मित्र धैर्यकांतक नाम लिखल एकटा पाती

२० अक्टूबर २०२२, पुणे
प्रिय धैर्यकाँत, 

काल्हि चारि मासक बाद अहां अपन मुखपृष्ठ पर लिखलहुं। अहां जखन लिखैत छी, हृदय सं लिखैत छी‌। अद्भुत लिखलहुं मित्र।

ई एकटा पैघ सत्य थिक जे लिखला सं मोन हल्लुक होइत छैक मुदा सत्य त' इहो थिक जे प्रश्न, उत्तर आ तकर प्रतिउत्तर सं वैह मोन फेर सं ओहिना भारी भ' जाइत छैक। अहां नीक करैत छी जे आब एहि सभ फेरी मे नहि पड़ैत छी।


ई सत्य थिक जे सोशल मीडिया पर जे किछु देखाइत छैक वास्तव मे असल जिनगी मे ओहेन किछु नहिए जकां होइत छैक। एतय अपन सभटा दुख, कष्ट, कमी आ कमजोरी कें नुका क' अबैत अछि लोक। हालाँकि एहि सभक कारण की हेतैक तकर जनतब नहि अछि हमरा मुदा, संभवतः एकटा होड़ आ प्रतिस्पर्धा हमरा जनैत सभसं पैघ कारण भ' सकैत छैक जाहि मे मनुक्ख कें कत' जयबाक छैक तकर ओकरा कोनो जनतब नहि। देखि रहल छी जे सभ पड़ाएल जा रहल अछि...एक-दोसर सं नीक देखेबाक लेल त' कियो स्वयं के बड्ड पैघ ज्ञानी प्रमाणित करबाक लेल... किछु गोटें त' अपनहि जिनगीक एकांत अवस्था भ्रमित करबाक लेल लिखैत अछि। 

हमरा लगैत अछि जे हम सभ एकटा मुखौटा पहीरि लेने छी आ कतहु ने कतहु ई मुखौटा संभवतः आवश्यको अछि। जिनगी जीबाक लेल। बिना आवरण कें संभवतः अहां नकारि देल जाइ, अहांक अपनहि लोक अहांकें चिन्हबा सं मना क' देथि, कारण हुनका सभक लेल अहाँ जे आवरण धारण कयलहुं ओ सभ अहाकें आब ओही आवरण मे देखय चाहैत छथि। कियो अहांक वास्तविक रूप अथवा अहांकें स्वयं कें आवश्यक रूप मे नहि देखय चाहैत अछि। एहेन स्थिति मे हम सभ 'जॉन'क ओहि शेर कें मोन पाड़ि जीबैत जा रहल छी जे - 

"कितने दिलकश हो तुम कितना दिलजूं हूँ मैं, 
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे" 

हं, संभवतः इएह सोचि क' जे संसार त' दू दिनक मेला अछि, मरबाक अछिए तखन किए शत्रुता मोल ली! त' साहस करैत हम सभ आवरण धारण कयने रहैत छी।

हं, अहां सही छी जे जखन मनुक्ख स्वयं कें अपनहि द्वारा परिभाषित सांच मे गलत पबैत अछि त' ओ अलग-अलग युक्ति ताकय लगैत अछि आ ओकरा अजमाबय लगैत अछि। जल्दीसं सभ किछु सरियाबै के प्रयत्न करै मे ओ सभ किछु आधा-अधूरा छोड़ैत जाइत अछि। ओकरा लगैत छैक जे ई सभ त' बाद मे क' लेब मुदा ई सभटा आधा काज ओकर कान्ह पर बोझ बनैत चलि जाइत छैक। ओ झुकि क' चलै लगैत अछि, हेराएल जकां रहैत अछि,सिगरेट आ शराब कें अपन मित्र बूझय लगैय अछि। ओकर आंखिक नीचां गहींर होइत जाइत छैक,ओकर अपन सभटा व्यवस्था खराब होइत जाइत छैक दोसरक व्यवस्था कें ठीक करबाक फेर मे।

हं, संबंध चाहे घरक होइ अथवा बाहर, अथवा सोशल मीडियाक, सभटा स्वार्थे पर आधारित रहैत छैक। जखनहि अहां स्वार्थ पूर्ति करब बंद कयलहुं कि ओ गधाक सींग जकां अहांक जीवन सं विलीन। ओ इहो नहि सोचत जे अहांक सेहो कोनो स्वार्थ भ' सकैत अछि। कोन ठेकान जे कोनो विवशता हुअए। हुनकर सभक हिसाबे विवशता त' हमर अपन अछि ने! ओ सभ चलि जाइत छथि कतहु आर आ... संभवतः कोनो आर व्यक्तिक दुनिया मे। हमर सभक दुर्भाग्य जे ओतय ओ हमर केलहाक चर्च करबाक स्थान पर हमर सोखर करबा मे लागि जाइत अछि। ओ हमर कुचिष्टा करबा धरि चैन नहि होइत अछि बल्कि हमर अस्तित्व समाप्त करबाक योजना मे लागि जाइत अछि। ओ ई प्रमाणित करबा मे लागि जाइत अछि जे ओ कोना हमरा लेल आवश्यक छल, हम नहि। एहि मे एक स्तर आगू हम इहो देखलियै जे जाहि व्यक्तिक सोझां हमर प्रशंसा होइत रहैत अछि ओ व्यक्ति हमरा संदर्भ मे एकटा अवधारणा बना लैत अछि। हमरा सं बिना कोनो गप कयने कोनो व्यक्ति कोना हमरा संदर्भ मे कोनो अवधारणा बना लैत अछि से नहि कहि मुदा, आइ-काल्हि ई बड्ड चलती मे छैक जे अहां किनको सं किछु सुनि क' हमरा संदर्भ मे राय बना लिअ। सोशल मीडिया पर किनको पढ़ि क' हुनकर आंकलन क' लिअ आ फेर मोनमोटाव क' लिअ। 

अहां लिखलहुं जे परिवार आ संबंध अहांक सोझां खाधि खूनि दैत अछि। शत-प्रतिशत त' एहेन नहि छैक मुदा हम सभ जतय सं छी ओतय एकर अनुपात बहुत अधिक छैक। कतेक उदाहरण देखने छियै हम जखन एकटा लड़का अपन परिवारक लेल स्वयं कें समाप्त क' लैत अछि आ ओकर परिवार ओकरा शाबाशी देबाक स्थान पर ओकरा सं जे काज नहि भेल रहैत छैक तकर उलहन देबय लगैत छैक। ओ की सभ कयलक से नहि बता क' ओ की सभ नहि क' सकल वैह कहल जाइत छैक, जाहि सं ओकरा मोन रहै जे ओ मात्र सहबाक लेल आ थोड़े आर काज करबाक लेल मात्र बनल अछि।

पैघ शहरक प्रेमिका सभ! आब एतेक उदाहरण देखि चुकलहुं जे एहि सभ पर हमरा किछु लिखतो लाज लगैए। ई मानि क' चलू जे 'दिल्ली एन सी आर'क प्रेमिका सभ प्रेम नहि करैत अछि बल्कि, अहांक मासूमियतक हिसाब सं अहांक जेब आ मानसिक शक्ति (...) कें खोखला होबाक बाट तकैत अछि। बस एतबै कहब जे जं प्रेम करबाक अछि त' बच्चा सभसं करू, महिला सभकें मित्र बनाउ। बेसी मोन हुअए त' केजरीवाल कें चंदा द' आउ अथवा स्वयं कें चॉकलेट, वाइन आदि गिफ्ट क' दिअ। मुदा दिल्लीक प्रेमिका! नहि-नहि! 

जनै छी! हमरा एहि सभ बात सभक कोनो ख़ास कचोट नहि अछि आ हमहूं अहीं जकां तकर कोनो परवाहो नहि करैत छी। जं हम भूखल छी त' हॅंसैत छी, पेट भरला पर कने आर हॅंसैत छी। तकर कारण जे अहाक भूखल रहबा सं सभ... हं, सभ! सभ हँसत आ अहांक पेट भरल बूझि हँसैत देखि क' लोक बूझत जे एकरा हॅंसबाक बीमारी छैक। असल मे चिन्ता कतय होइत छैक जे एहि कारण किछु प्रतिशत जे नीक लोक छथि, हुनको सभक भरोस समाप्त भ' जाइत छनि। गहूमक संग जेना जौ पिसाइत अछि ओहिना किछु प्रतिशत लोक पिसाइत रहथि। कियो हिनका सभ पर भरोस नही क' रहल। हुनका सभकें हुनकर सभक नीक कर्मक लाभ नहि भेटि रहल।

अहां त' जनैत छी बीतल समयक ओ सभटा बात जहिया हम बहुत कष्ट मे रही। किछु संकोच सेहो रहैत छल जे जिनका सभकें हमरा सं उपकारक आशा रहैत छलनि हुनका सभकें हम कोना कहियनि जे हम मदति लेबाक स्थिति मे पहुंच गेल छी। हालाँकि तैयो जे सभ हमर लगीच रहथि ओ सभ अयलथि, हमर परिवार हमर संग ठाढ़ छल। हमर दुःख कें बुझलक, हमर तकलीफ मे साझी बनल आ पूछैत रहल। कियो एतय त' कियो कोनो अन्य पैघ शहर मे, अथवा कियो विदेश मे। जनै छी! एक राति डेढ़ बजे कियो हमरा अमरीका सं फोन कयलनि आ कहलनि - " प्रवीण, अहांकें जे मदति चाही से कहू, हम तैयार छी... कहू त' हम आबि जाउ।" नीक लागल। 

हालाँकि हमरा ओतबै अधलाह लागल जखन बीतल १० मासक एहि संघर्ष मे आ संभवतः जीवनक सभसॅं पैघ लड़ाइ मे किछु गोटें या त' अनभिज्ञ बनि गेलथि अथवा जानि-बूझि क' हमरा सं कतिया गेलथि। पहिने त' हमर आदतिक हिसाब सं हम एहि सभक कारण स्वयं कें मानलहुं जे संभवतः हमरहि मे कोनो कमी रहल हैत। मुदा बाद मे अधिक मंथन कयलाक बाद बुझबा मे आयल जे नहि, ई सभ त' हमरा सं मात्र एहि लेल जुड़ल रहथि जे हम हिनकर सभक कोनो काज आबि सकी। अहां सही कहने रही - "प्रवीण जी, सोझ गप नहि करै बला सं दूर रहू।" 

धैर्यकाँत, हम आब ई निर्णय ल' लेलहुं अछि जे मात्र सुखक समयक मित्र कें त्यागि देब। हम जनैत छी जे अहां कहब कि हम त' सभ किछु स्वयं पर ल' किनको जीवन भरिक लेल नहि त्याग' चाहैत छी तें अहां सं ई सभ नहि होयत। त' भाइ हम इएह कहब जे हम ई प्रयत्न करब। कारण, बीतल दस मास (जकरा हम दस साल जकां जीलहुं) हमरा सिखा देलक जे हमहूं मनुक्ख छी। ओ मनुक्ख जे नीक-बेजाए बुझबा मे गलती क' सकैत अछि आ ओकरा एहि गलती कें सुधारि लेबाक चाही। किछु पुरान कें 'क्रॉस' आ किछु नब कें 'टिक' क' लेबाक चाही। परिणामक चिंताक बिना मुंह पर कहबाक चाही जे 'नहि साहेब! अहां नहि चाही।' चाहे कियो खराब मानि जाए, हमरा बताह बूझय, अभिमानी कहै अथवा कुलबोरन। 

लिखैत रहू,
अहांक शुभचिंतक,

प्रवीण

Saturday, 16 August 2025

"न त्वत्समश्चाभ्यधिकश्च् दृश्यते" - खट्टर काका के संस्मरण


मैथिली साहित्यक क्षितिज पर जाज्वल्यमान नक्षत्र सन अहर्निश प्रदीप्त सर्वाधिक लोकप्रिय रचनाकार प्रो.हरिमोहन झाक जन्म १८ सितम्बर १९०८ केँ वैशाली जिलाक कुमर बाजितपुर गाम मे भेल रहनि। हिंदी आ मैथिलीक लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार जनार्दन झा जनसीदनक तेसर संतान प्रो. झा केँ संस्कार मे पांडित्य आ साहित्य परिवार सँ उपहार मे भेटलनि। बाल्यकालहि सँ 'ननकिङबू' केँ पिताक सानिध्य मे साहित्यक गहन बोध होएब आरंभ भए गेल रहनि आ खेलौनाक स्थान पर ओ शब्दालङ्कार सँ खेलाए लागल रहथि। कहबी अछि जे पिता-पुत्रक संवाद सेहो सानुप्रास पद्य मे होइत रहनि। 

प्रो. झा नियमित शिक्षा सँ दूर रहि पिताक साहचर्य मे विद्योपार्जन करैत रहलाह आ पंद्रह बरख धरि हिनक नामाकरण कोनो विद्यालय मे नहि कराओल गेल। पिताक संसर्ग मे रहैत 'ननकिङबू' पूर्ण मनोयोग सँ साहित्यिक अवगाहन करैत रहलाक आ 'अपूर्णे पंचमेवर्षे वर्णयामि जगत्रयम' चरित्रार्थ करए लगलाह । विद्यालाय मे नामांकनक समय संस्कृत मे धाराप्रवाह वक्तृता सँ अचंभित गुरुजन समाज हिनक विशिष्ट प्रतिभाक आदर कएलनि आ हिनक नामाकरण सोझे मैट्रिक मे कराओल गेल आ १९२५ मे पटना विश्वविद्यालय सँ ई प्रथम श्रेणी मे मैट्रिकक परीक्षा उतीर्ण कएलनि। १९२७ मे इंटरमिडियटक परीक्षा मे तेजस्वी छात्र हरिमोहन बिहार आ उड़ीसा मे संयुक्त रूप सँ सर्वोच्च्य स्थान प्राप्त कएलनि । १९३२ मे दर्शनशास्त्र सँ स्नातक मे सर्वोच्च स्थान प्राप्त कए स्वर्ण पदक सँ विभूषित भेलाह आ १९४८ मे पटना कॉलेज मे प्राध्यापक नियुक्त भेलाह से आगाँ पटना विश्वविद्यालय मे प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष पद केँ सेहो सुशोभित केलाह ।

बाल्यकालहि सँ साहित्यिक परिवेश भेटैत रहबाक कारणेँ साहित्य मे हिनक विशेष अभिरुचि स्वभावहि भए गेल रहनि। पिता जनार्दन झा जनसीदनक बहुतो काव्यक पहिल श्रोता प्रो. झा भेल करथि। एहि क्रम मे अपने सेहो पद्य रचब आरम्भ कए देने छलाह। पिताक संग भ्रमण मे रहबाक कारण सँ हिनका विभिन्न साहित्यिक विद्वान् ओ पंडित लोकनिक सानिध्य भेटैत रहलनि। जखन पित्तिक देख-रेख मे नियमित छात्रजीवन आरंभ कएलनि तँ हिनक 'पोएट्रिक' स्थान 'ज्योमेट्री' लए लेलक। बहुमुखी प्रतिभाक संपन्न प्रो. झा सदिखन अपन अध्यापक लोकनिक प्रिय पात्र बनल रहलाह आ नियमित अध्ययनक संग साहित्य सेहो पढ़िते रहलाह। ओना तँ साहित्यिक संसर्ग हिनका सबदिना भेटैत रहलनि मुदा प्रो. झा जखन लहेरियासराय पुस्तक भंडार मे रहब आरम्भ कएलनि तखन आचर्य रामलोचन शरणक रूप मे हिनका एकगोट आदर्श साहित्यिक गुरु भेटि गेलनि। एहिठाम सँ ओ साहित्यिक क्षेत्र मे मुखर भए प्रवेश कएलनि। 

पुस्तक भंडार ताहि समय मे महत्वपूर्ण साहित्यिक केंद्र केँ रूप मे स्थापित भए गेल छल जाहि ठाम ओहि समयक अधिकांश विद्वतजनक आन- जान होइत रहैत छल। प्रतिदिन संध्या काल मे विभिन्न साहित्यिक पक्ष पर एहिठाम परिचर्चा होइत छल। एकर खूब अनुकूल प्रभाव प्रो. झाक साहित्यिक जीवन पड़ भेलनि आ हुनक साहित्यिक विकासक श्रीवृद्धि होबए लगलनि आ हिनक आरंभिक रचना सभ मैथिलीक पत्रिका 'मिथिला' मे प्रकाशित होइत रहलनि। मैथिलीक सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास 'कन्यादान' एही पत्रिका मे पहिलुक बेर क्रमशः छपैत रहल। एही समय मे हिनक किछु छात्रोपयोगी पोथी सभ सेहो प्रकशित भेलनि यथा 'तीस दिन मे संस्कृत' ,'तीस दिन मे अंग्रेजी' आदि। ई पोथी सभ अपन रोचक शैली आ तथ्यक सहजताक कारण सँ छात्र लोकनिक बीच बहुत प्रसिद्ध भेल छल।

हरिमोहन झा जाहि समय मे रचना करैत छलाह से साहित्यिक आ सामाजिक उत्थान आ जनजागरणक समय रहैक । लोकक परिपेक्ष आ सरोकार मे परिवर्तन होएब आरम्भ भए गेल छलैक। एहि प्रभाव सँ समुच्चा विश्व एकटा नव वैचारिक परिवेश मे प्रविष्ट कए रहल छल। वैश्विक प्रभाव सँ भारत मे सेहो एकाधिक रूप मे परिवर्तन दृष्टिगोचर भए रहल छलैक । एहि परिवर्तनकारी समयक प्रभाव मे हिनक लेखनी मे समकालीन समाज मे पसरल धार्मिक रूढ़ीपंथ केर वर्णन प्रखरतम रूप मे भेटैत अछि। एहि समय मे सामान्यतः दूगोट विचारधारा मुख्य रूपेँ सक्रीय छलैक । एकटा वर्ग पाश्यात आदर्श केँ अपनबैत अपन समाज केँ पुनर्गठित आ चेतना सम्पन्न करबाक आग्रही छल तँ दोसर दिस किछु लोक अपन गौरवमय अतीत सँ सकारात्मक तत्व सबकेँ लए ताहि प्रवाभ केँ समेटैत समाज केँ पुनर्गठित आ चेतना सम्पन्न बनेबाक आग्रही छल। मिथिला पर एहि पुनरोत्थान प्रवित्ति केँ विशेष प्रभाव पड़लै। दोसर वर्ग जे पहिलुक स्थापित व्यवहारक सीमा मे रहैत सुधार चाहैत छलाह तिनकर सीमा के तोरैत हरिमोहन झा धर्मसातर पर प्रहारक रुख अपनौलनी। 

हुनक साहित्य में बुद्धिवाद और तर्कवाद केर सर्वोपरि स्थान भेटैत अछि आ हुनक धारणा रहैन जे तर्क नहि कए सकैत अछि से मूर्ख अछि। हिनक रचना मे एक दिस बौद्धक दुख:वाद केर प्रभाव तँ दोसर दिस चार्वाक केर दर्शनक प्रभाव भेटैत अछि। हिनकर लेखनी मे वर्ण व्यवस्थाक निंदा,दलित विमर्शक पक्ष,सामंती शोषणक विरोध आदि बड़ कम भेटैत अछि,तें हिनका मार्क्सवादी किंवा जनवादी तँ नहि मानवतावादी कहब बेसी युक्तसङ्गत होएत आ से हिनक रचना कन्याक जीवन आ पांच पात्र मे देखल जा सकैत अछि। ई धार्मिक पाखंड केँ अपन लेखनीक जड़ि बनौलनि आ किंसाइत एहि केँ सभक बीज मानि साबित करबाक यत्न कएलनि जे नाक एम्हर सँ छुबु वा उम्हर सँ बात एक्कहि।

अपन रचना काल मे प्रो. झा करीब दू दर्जन पोथीक रचना कएलनि। ई मूलतः गद्यकार छलाह। हिनकर लिखल मैथिली कृति मे विशेषतः उपन्यास आओर कथा अछि । यद्यपि पंडित झाक कविता सेहो ओतबे मनलग्गू आ प्रभावकारी होइत छल। कविता सभ मे व्यंग केर माध्यम सँ सामाजिक व्यवस्था पर प्रहार करैत हिनक कविता ढाला झा ,बुचकुन बाबू, पंडित आ मेम आदि सभ एखनहुँ प्रासंगिक अछि । हिनका द्वारा लिखल गेल उपन्यास सभ मे कन्यादान आ द्विरागमन सबसँ बेसी प्रसिद्ध अछि। बस्तुतः ई एके उपन्यासक दू भाग कहल जएबाक चाही । कथा संग्रह सभ मे प्रणम्य देवता,चर्चरी आ रंगशाला प्रमुख अछि । एकर अतिरिक्त हिनक आत्मकथा 'जीवन यात्रा' जे साहित्य अकादमी सँ छपल आ एहि पोथी पर पंडित झाकेँ मरणोपरांत साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेलनि। हिनक रचना सभ 'हरिमोहन झा रचनावली' नाम सँ सेहो प्रकाशित भेल अछि। हिनक सर्वश्रेष्ट कृति भेलनि 'खट्टर काकाक' तरंग' जकर अनुवाद कतेको भाषा मे भेल। प्रो. झा दर्शनशास्त्रक उद्भट विद्वान छलाह। एहि विषय मे हिनक सेहो किछु महत्वपूर्ण पोथी आ अनुदित पोथी सभ अछि। जाहि मे न्याय दर्शन(१९४०), निगम तर्कशास्त्र (१९५२),वैशेषिक दर्शन (१९४३),भारतीय दर्शन (अनुवाद १९५३) आ ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी । एहि सभ मे हिनकर शोध ग्रंथ - “ट्रेन्ड्स ऑफ लिंग्विस्टिक एनेलिसिस इन इंडियन फिलोसोफी” सर्वाधिक प्रसिद्ध अछि। हिनक किछु रचना संस्कृत मे सेहो भेटैत अछि जाहि मे 'संस्कृत इन थर्टी डेज ' आ 'संस्कृत अनुवाद चंद्रिका' छात्रोपयोगी आ प्रसिद्ध अछि। एकर अतिरिक्त प्रो झा कतिपय पोथी/पत्रिकाक सम्पादन कएल जाहि मे 'जयंती स्मारक प्रमुख अछि।

प्रो.झा द्वारा लिखल कथा आ ताहि मे वर्णित पात्र लोकक स्मृति मे सहजहि घर करैत अछि आ किछु पात्र तँ एतेक प्रचलित भेल जकर उदहारण एखनहुँ लोकव्यवहार मे अकानल जा सकैत अछि। चाहे तितिर दाई होथि वा खटर काका। के एहन मैथिलीक पाठक हेताह जे एहि पात्र सँ अवगत नहि हेताह। वस्तुतः प्रो झा केँ अपन भाषा पर ततेक मजगूत पकड़ छनि जे अपन शब्द विन्यास सँ कथानक केँ नचबैत लोकक स्मृति मे अपन विशिष्ट स्थान बनबैत अछि। अपन कथा सभ मे क्लिष्ट संस्कृतक शब्द सभक परित्याग करैत लोक मे प्रचलित शब्द आ फकड़ा आदिक प्रयोग करैत रचना सभ केँ जनसामान्यक लगीच अनैत अछि। गामक ठेंठ शब्द आ गमैया परिवेशक वर्णन करैत सामाजिक कुरुति पर व्यंगक माध्यमे अपन भाषाक निजताक पूर्ण व्यवहार करैत अमर रचना सभ करैत रहलाह। रचना सभ पढ़ैत काल वर्णित घटनाक्रम सद्य: घटित आ वास्तविक प्रतिक होइत अछि। पढ़ैत काल कखन हँसी छुटत आ कखन आँखि नोरायत ई अटकर कठिन भए जाइत अछि। 
हिनक रचना सभ मे परिवर्तनक स्वर उठैत अछि। नव परिवेशक झाँकी प्रस्तुत करैत अछि। पाठक केँ उचित -अनुचित सँ अवगत करबैत ओकरा अपन स्वत्व केँ चिन्हबाक मादे प्रेरित करैत अछि। ग्रामसेविका,मर्यादाक भंग ,ग्रेजुएट पुतौह एहने भूमिका मे लिखल कथा सभ अछि जे एकटा परिवर्तित समाज आ ताहि मे स्त्रीक भूमिका केँ सोंझा अनैत अछि। सामाजिक रूढ़ता पर प्रहार करैत कथा कन्याक जीवन , परिवारिक सामंजस्य आ मध्यम वर्गीय परिवारक सुच्चा चित्रण करैत कथा पंच पत्र आ मिथिलाक व्यवहार सँ परिचित करबैत कथा तिरहुताम सन अनेको कथा सभ अपन संवाद शैली आ कथ्य केर लेल विश्व साहित्यक कोनो भाषा केँ समक्ष ठाढ़ होएबाक सामर्थ्य रखैत अछि।

प्रो.झाक पत्र लिखबाक शैली सेहो विलक्षण रहनि। पिता,अग्रज,माए,पुत्र आ पत्नी सँ नियमित पत्राचार होइत छलनि।आगाँ साहित्यिक पत्राचार सेहो खूब होबए लगलनि। एहि पत्र सभ मे एकदिस प्रो.झाक व्यक्तिगत जिनगी केँ बहुत लगीच सँ देखल जाए सकैत अछि तँ दोसर दिस समकालीन परिदृश्य आ परिस्थितिक केँ सेहो फरीछ अवलोकन होइत अछि। आत्मीय भाषा शैली आ लेखनी मे निहित आपकता सहजहि आकर्षित करैत अछि। हिनक एहि विधाक विलक्षणता दू गोट कथा मे खूब प्रमुखता सँ उजागर भेल अछि। पहिल कथा अछि पाँच पत्र आ दोसर अछि दरोगाजीक मोंछ। पाँच पत्र कथा मे पांच गोट छोट -छोट पत्रक सङ्कलन अछि आ विशेषता ई जे पांचो पत्र विभिन्न मनोभावक मे एकटा समयांतरक संग लिखल गेल अछि। कथाक स्वरुप एकदम छोट अछि मुदा जँ भाव पक्षक विस्तार करी तँ एकटा सम्पूर्ण महाकाव्य बनि सोझाँ अबैत अछि। अभिव्यंजनाक शैली मे लिखल ई कथा अपन विशिष्ट शैलीक कारणे मैथिली साहित्य मे पृथक स्थान रखैत अछि। एहि मे निहित यथार्थक बोध ,करुणा ,सम्बन्धक गरिमा ओ आत्मीयता ,वैवाहिक जीवन आ पारिवारिक स्थिति एकहि संह मुखर भए पाठकक सोझाँ अबैत अछि। दोसर कथा अछि दरोग़ाजिक मोंछ। एहि मे संशय आ द्वन्द केर चित्रण भेल अछि जकर जड़ि मे रहैत अछि एकगोट अधटुकड़ी पत्र। ई कथा अपन रोचक सस्पेंश आ विलक्षण शिल्पक एकगोट माइलस्टोन ठाढ़ करैत अछि। प्रो.झाक केँ डायरी लिखब सेहो खूब रुचैत रहनि। प्रतिदिन किछु ने किछु लिखथि। अपन विचार सभकेँ 'My Stray Thoughts' शीर्षक सँ नोटबुक मे लिखल करथि। एहिसभ विधा मे लिखल रचना सभ संकलन आ प्रकाशनक माँग करैत अछि जाहि सँ पाठक अपन लोकप्रिय साहित्यकार केँ आओर लगीच सँ जानि सकताह।

हरिमोहन झाक गद्य सँ हमरा लोकनि खूब नीक सँ परिचित छी। एहन विरले मैथिली साहित्यानुरागी होएताह जे हिनक कथा सँ परिचय नहि हेतनि। गद्यक तुलना मे हिनक पद्य सँ पाठकक परिचय कम भेल अछि। हिनक गद्य ततेक लोकप्रिय भेलनि जे एहि आलोक मे हिनक पद्य हराएल सन लगैत अछि। बाद मे हरिमोहन झा रचनावली भाग ‍१ सँ ४ धरि प्रकाशित भेल आ रचनावलीक चारिम भाग मे हुनक ओ कविता सभ संकलित कएल गेल जे प्रणम्य देवता ओ खट्टर ककाक तरंग नामक पोथीमे नहि आएल छल। हरिमोहन झा समय-समय पर कविता सेहो लिखैत रहलाह जे विभिन्न समकालीन पत्र - पत्रिका सभ मे प्रकाशित होइत रहल। 

मिथिला मे व्याप्त आडम्बर, अर्थाभाव, परिवर्तित होइत समय आदि विभिन्न विषय पर लिखल हिनक कविता सभ अपन विलक्षण शिल्प आ अद्भभुत शैलीक हेतु सर्वथा पठनीय आ चिंतनीय अछि। हरिमोहन झाक कविता सभ सेहो हुनक कथे जकाँ हास्य-व्यंग सँ ओतप्रोत अछि। एहि व्यंगक ई विशेषता अछि जे ई अपन साहित्यिक गरिमाक निर्वहण करैत एकटा नव दृष्टिकोण पाठकक सोझाँ अनैत अछि। स्थापित चलन ओ कोनहुना ढोआ रहल परिपाटीक विरोध जखन एहि विधाक संग पद्य मे अबैत अछि तँ मनलग्गू होएबाक संगहि एकटा गंभीर विमर्श ठाढ़ करैत अछि जाहि मे समकालीन परिस्थितिक संग आँखि मिलेबाक खगता अभरैत अछि। प्रो.झाक कविता कतेको कवि सम्मलेन आ कवि गोष्ठीक आकर्षण रहल अछि।

प्रो झाक जीवन एकटा स्फुट किंवदंती सँ कम नहि कहल जाए सकैत अछि। प्रो.झा सँ संबंधित बहुतो संस्मरण सभ भेटैत अछि। एहि संस्मरण सभ मे हुनकर व्यक्तित्वक विलक्षणता ,आशु प्रतिभा, नामक धाख,साहित्यिक ओजन ,लिखबाक सनक आ अधीत विद्वताक परिचय भेटैत अछि। हिनक सद्यः स्फूर्त कविताक विषय मे एकगोट प्रचलित संस्मरण एहि प्रकार सँ अछि। जखन ई बीस बरखक रहथि तखन भारतीय हिंदी साहित्य सम्मलेनक अधिवेशन ( मुज्जफ्फारपुर) हरिऔधजीक अध्यक्षता मे भेल रहैक आ मंच पर रामधारी सिंह दिनकर,गोपाल सिंह नेपाली,राम वृक्ष बेनीपुरी सन उद्भट विद्वान सभ उपस्थित रहथिन। एहि बीच एकटा ठेंठ भोजपुरिया कवि मंच पर आबि तिरहुतिया केँ बनबए लगलाह आ कविता पाठ करैत कहला : "अइली अइसन तिरहुत देस/मउगा अदमी उजबुज भेस// मन लायक भोजन न पैली,चुडा दही फेंट कर खैली। एकर उतारा मे प्रो. झा अपन कविता मे कहलखिन -"भोजपुरिया सब केहन कठोर ,पुछैथ तसलबा तोर की मोर// सतुआ के मुठरा जे सानथि,चुडा दहिक मर्म की जानथि। सभा भवन करतल ध्वनि सँ गूँज उठल,हरिऔध जी माला पहिरौलखिन,बेनीपुरी जी बजला बचबा खूब सुनाओल,थएथए भ गेल ,आ भोजपुरिया कवि भरि पाँज कए धए कहलखिन आब तिरहुतक लोहा मानि गेलहुँ। ` 

एहने एकटा आओर संस्मरण अछि। एक बेर आकाशवाणी मे प्रतिभागीक चयन करबाक लेल हिनका जज चुनल गेल रहनि। एकटा गायक ऑडिशन मे समदाउन उठओलक "बड़ रे जतन सँ सिया दाए कें पाललहुँ , सेहो रघुबर लेने जाय।" से तेना खिसिया कए गौलकैक जे बुझाए सियाजीक पोसबाक खरचा माँगि रहल हो। जखन हरिमोहन झाकें पूछल गेलनि जे समदाउन केहन लागल तँ ओ अपन उत्तर मे कहलखिन जे हिनक विधा सँ सम हटा दियौ, ई दाउने टा कए रहल छथि।

मैथिली साहित्य मे विद्यापतिक बाद सबसँ लोकप्रिय जँ कोनो साहित्यकार भेलाह तँ से थिकाह हरिमोहन झा। हिनका द्वारा बनाओल साहित्यिक पात्र सभ आमलोकक बीच खूब प्रचलित भेल। जिनका साहित्यिक रूचि नहिओ रहनि सेहो लोकनि एहि पात्र सभसँ परिचित छलाह आ सामाजिक विभिन्न पक्ष केँ एहि पात्र सभक माध्यम सँ बूझैत छलाह। कोनो साहित्यकारक सभ सँ पैघ उपलब्धि ई होइत छैक जे ओकर रचनाक प्रभाव सँ किछु सकारात्मक परिवेशक निर्माण समाज मे होइ आ ई उपलब्धि तखन आओर विशिष्ट भए जाइत छैक जखन रचनाकार केँ प्रत्यक्ष रूप सँ ई दृष्टिगोचर होइत छैक। प्रो. झाक साहित्यक लोक पड़ अकल्पनीय प्रभाव पड़लैक। कन्यादान पढ़लाक उपरान्त बहुतो युवक लोकनि अपन विवाह मे टाका नहि लेलनि। गामक कतेको कन्या लोकनि बुच्चीदाइ सँ प्रभावित भए आधुनिक शिक्षा लेबाक लेल अग्रसर भेलीह। जाहि अभिजात्य वर्गक किछु लोक हिनक विरोध करैत छल ,हिनक साहित्य केँ अश्लील कहैत छल ताही वर्गक बहुतो माए लोकनि अपन कन्याक विवाह मे 'कन्यादान' पोथी साँठए लगलीह। एहन कहबी अछि जे अभिजात्य पंडित वर्ग प्रो. झाक साहित्यक दिन मे खिधांस करैत छलाह ओ लोकनि राति मे लालटेन मे हिनक साहित्य पढ़ैत छलाह। प्रो. झा मिथिला मे व्याप्त आडम्बर,स्त्री शिक्षाक प्रति उदासीनता, कन्या विवाह आ बहु विवाह सन स्थापित कुरीति आ जाति-धर्मक विभेद मे ओझराएल समाजक विभिन्न आयाम केँ अपन साहित्य मे उजागर करैत,अपन तर्क सँ ओकरा खंडित करैत, ताहि सँ होबए बाला हानि केँ उजागर करैत सहज भाषा आ मनलग्गू संवाद शैली मे पाठक धरि आनि एकदिस सूतल समाज मे चेतनाक विस्तार कएलनि आ दोसर दिस मैथिली कथा साहित्य केँ मजबूती दैत स्थापित सेहो कएलनि।

जहिना विद्यापति मैथिली पद्य केँ स्थापित कएलाह आ एकरा आमलोक धरि पहुँचा साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान कएलनि तहिना हरिमोहन झा मैथिली गद्य केँ एकटा नव आयाम दैत बेस पठनीय बनओलनि आ मैथिली गद्यक विद्यापति कहेबाक अवसर पओलनि। मैथिलीक श्रीवृद्धिक लेल आजीवन साकांक्ष रहल प्रो. झा द्वारा लिखल उपन्यास 'कन्यादान' पर पहिल मैथिली सिनेमा सेहो बनल। एखनधरि मैथिली मे सबसँ बेसी पढ़ल जाए बला लेखकक गौरव सेहो हिनकहि प्राप्त छनि। हिनक बहुत रास पोथी आब अनुपलब्ध भए रहल अछि आ एहि पोथी सभक मात्र फोटोकॉपी उपलब्ध भए पबैत अछि। एहि मादे विशेष पहल करबाक खगता अछि। मैथिलि भाषा केँ स्थापित करबा मे, लोकप्रिय बनएबा मे, एकर एकगोट बजार विकसित करबा मे हिनक योगदान अभूतपूर्व छनि । ई काव्य शास्त्र विनोदेना बला उक्ति केँ पूर्णतः सत्यापित करैत काव्य, शास्त्र आ विनोद तीनू पर सामान अधिपत्य रखैत अपन रचना सभ मे दिगंत धरि जिबैत २३ फ़रवरी १९८४ केँ देहातीत भेलाह। जिनकर एक कान मे सदति वेदक ऋचा गुंजायमान होइत रहलनि आ दोसर कान मे फ्रायड किंवा चार्वाकक सूक्ति समाहित रहनि, जे विनोद मे खट्टर कका रहथि आ दर्शन मे विकट पाहून, जिनका पर कन्यादान दायित्व रहनि आ तकर जे द्विरागमन धरि निर्वाह कएलनि,मैथिली साहित्यक एहि पितृ पुरुषक आयाम केँ प्रणाम।

सन्दर्भ :
१.देसिल बयना –हरिमोहन झा विशेषांक
२.अंतिका – हरिमोहन झा विशेषांक
३. हरिमोहन झा रचनावली
४. जीवन यात्रा
५ . बिछल कथा

विकास वत्सनाभ

आरएसएस आ स्वतंत्रता संग्राम - संक्षिप्त विवरण


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्थापना 1925 मे डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर मे भेल छल। संगठनक मुख्य उद्देश्य हिंदू सभके एकजुट करबाक आ समाजक नैतिक मूल्य सभके सुदृढ़ करबाक छल। ध्यान देबऽ जोग बात ई जे स्व. हेडगेवार स्वयं पहिले कांग्रेस-नेतृत्व वाला राष्ट्रीय आंदोलन में सहयोगी छलाह आ ओ लोकमान्य तिलकक विचार सँ बेसी प्रभावित छलाह। विद्यार्थी जीवन मे ओ ब्रिटिश शासनक खिलाफ बहुत आंदोलन मे भाग लेने छलाह जाहि में असहयोग आंदोलन (1920–22) सेहो शामिल अछि।

संघ केँ लय विरोधी इतिहासकार सभक दृष्टिकोण अलग छल। बहुतों इतिहासकार मानैत छथि जे स्थापनाक बाद आरएसएस सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–34) अथवा भारत छोड़ो आंदोलन (1942) सन नमहर आंदोलन मे भाग नहि लेने छल। हुनक सबहुक मतानुसार ताहि समय संगठन राजनीतिक टकरावक बजाय सामाजिक कार्य, अनुशासन आ वैचारिक प्रशिक्षण पर बेसी ध्यान देने छल। 1930–40 दशकक ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टक मुताबिक़ आरएसएस केँ राजनीतिक रूप सँ ब्रिटिश शासनक लेल खतरा नहि मानल गेल छल। बल्कि संगठन समाज सुधार, भविष्यक भारत आ हिंदू एकजुटता के लय के बेसी मुखर छल। 

अहि सभ में पूर्वोत्तर राज्य आ पटना में व्याप्त देह व्यापार रोकब आ तखन के पाकिस्तान में स्त्री सब के सुदृढ़ आ एकजुट करब आरएसएस महिला विंग के प्रमुख काज छल। 

आरएसएस समर्थक आ ओहि सँ जुड़ल इतिहासकार मानैत छथि जे संगठन अप्रत्यक्ष रूप सँ स्वतंत्रता संग्राम में अपन योगदान देने छल। संघ सामाजिक अनुशासन, एकता आ राष्ट्रीय गौरवक भावना जागृत करब, जकरा ओ औपनिवेशिक शासनक खिलाफ दीर्घकालीन तैयारीक हिस्सा मानैत छलाह- अहि दिशा में प्रयासरत छलाह। अहि वर्ग के इतिहासकार लोकनि हेडगेवारक स्वतंत्रता आंदोलन में व्यक्तिगत योगदान आ किछु स्वयंसेवक द्वारा क्रांतिकारी गतिविधि सह स्वतंत्रता संग्राम संगठन में शामिल हेबाक बात सेहो कहैत छथि।

सारांश ई जे प्रत्यक्ष सशस्त्र वा जन-राजनीतिक संघर्ष में आरएसएसक भूमिका सीमित रहल मुदा अप्रत्यक्ष योगदानक तौर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, सामाजिक एकता आ नैतिक दृष्टि सँ समाजक तैयारी द्वारा राष्ट्र-निर्माण में संघ के भूमिका मुखर आ अग्रणी रहल।

Monday, 7 April 2025

हमारी अवधारणाओं से ऊपर - मिथिला की रणभूमि


हमारी छोटी उम्र में नग्नता हमें उत्तेजना दिया करती है। युवावस्था में यही मौज हमें भौतिक (शारीरिक) सुख देता है और प्रौढ़ावस्था में इसकी प्राप्ति के लिए हमें उपलब्धियां, सुकून और नयापन का साथ चाहिए होता है।

जी नहीं, न तो मैं काम शास्त्र पर कोई शोध कर रहा हूँ और न ही मुझे कोई खास चाहत या फिर कोई कमी ही है मेरे अंदर। मैं बस यह कहना चाहता हूँ कि उम्र के हिसाब से आपकी समझ बूझ, आपकी स्वीकार्यता और आपकी इच्छाएं बदलती हैं।

दरअसल यही बात मैंने साहित्य को पढ़ते महसूस किया है। एक ही तरह के साहित्य का अलग अलग अवस्थाओं में अलग अलग असर होता है। जैसे जैसे आपकी समझबबूझ बदलती है (बढ़ती है नहीं लिखा है मैंने), हमारे लिए पढ़ी  पुस्तकों के मायने बदलते जाते हैं। इसका एक बहुत ही सहज उदाहरण है - मैंने शिवानी को लगभग 16-17 वर्ष की उम्र में पढ़ा और फिर 40-45 साल की अवस्था में फिर पढ़ा (जी नहीं, मेरी उम्र 50 साल है), दोनों ही समय मुझे इसका अलग अलग भावार्थ लगा। संभवतः बाद के दिनों में पढे को मैं समग्रता से समझ भी सका या यूं कहिए कि मैं साहित्यकार द्वारा किये अटेम्प्ट के सही इन्टेन्ट तक पहुँच पाया (मुझे पता है, "प्रयास के मर्म को समझ पाया" लिखना था यहाँ)। यह अवस्था संभवतः वह होती है जब आप बाह्य आवरणों के अंदर की बात भाँपने लगते हैं, जब आप चमक-दमक से आकर्षित नहीं होते हैं।

खैर, ऐसा विरले ही होता होगा जब आपकी उम्र (समझबूझ) के हिसाब से साहित्य पढ़ने को मिला हो आपको जब आपका और साहित्य का लेवल समानांतर हो... उदाहरणार्थ वो पल जब आपके मूड के हिसाब से ही पैग और सुट्टा मिल गया हो आपको।

संप्रति अभी मिथिला की रणभूमि पुस्तक को पढ़ते मुझे यही संयोग बनता दिखा। हमारी आम अवधारणायें हैं - हम विद्वान लोग, शास्त्र पुराण पढ़ने और सिखाने वाले लोग, भगवती को पूजने और महादेव से कार्य लेने वाले लोग, भगवान राम को गरियाने का अधिकार रखने वाले लोग, हमारी "अदृश्य" महानता का दंभ रखने वाले हम लोग। उफ्फ़ उफ्फ़ उफ्फ़ !  मेरी हो चुकी उम्र में भी जबकि कई बार उपेक्षा, अन्याय और सुविधाओं की अनउपलब्धता को देखकर मेरी भुजायें फड़कती हैं, कई बार ऐसा होता है जब खून की गर्मी सर तक जाती है किन्तु अपनी अवधारणाओं का ध्यान करके मैं चुप हो जाता रहा। 

ऐसे में इस किताब ने मुझे बल दिया जब मैंने पढ़ा कि हमारे मिथिला महान वाले इतिहास में इन अवधारणाओं के अलावा योद्धाओं और शस्त्र विद्या का पुट भी है। हमने न केवल मैथिली के माध्यम से संस्कृत पढ़ा है बल्कि हमने अस्त्र चलाना भी सीखा था। शास्त्र मात्र पढ़ने का लेबल लिए हमने वस्तुतः आत्मरक्षार्थ शस्त्र भी चलाया है।

जैसा कि मिथिला के सुपरिचित इतिहासकार अवनिन्द्र सर ने पुस्तक के प्राक्कथन में लिखा है - लेखक ने वैज्ञानिक तरीके से संदर्भों की प्रस्तुति तो की ही है, रेफ्रन्स देकर उसे प्रामाणिक भी किया है। लेखक (वस्तुतः शोधकर्ता) सुनील कुमार झा "भानु" जी सहरसा (मुझे दरभंगा वालों, गैर-मैथिल न कहना) के निवासी हैं। भोजपुरी, हिन्दी, अंग्रेजी, जापानी और मैथिली भाषा के जानकार भानु जी ई-समाद के प्रबंध न्यासी भी हैं जो इससे पहले "मंटुनमा" और "प्रेमक टाइमलाइन" लिख चुके हैं। 

कुल जमा 126 पृष्ठ की इस आकर्षक छपाई वाली इस पुस्तक की कीमत बिहार में मिलने वाले एक बियर बोतल के बराबर यानि मात्र 249 रुपया है जिसे ई-समाद बिना डाक खर्च के आप तक पहुंचाता है।

अन्य पुस्तक समीक्षाओं की तरह इसकी अधिक व्याख्या कर मैं पुस्तक का रोमांच कम नहीं करना चाहता... आप इसे पढ़ें, पढ़ाएं और कुछेक गरिष्ठ लोगों के बपौती से इतर और अवधारणाओं से ऊपर अपने वास्तविक मिथिला को जानें !

Wednesday, 15 January 2025

पाँच गोट मैथिली कविता - प्रवीण कुमार

बंधुगण, हम टोई टापि मैथिली लिखबाक प्रयास करैत छी। स्पष्ट जे, निम्नस्तरीय मैथिली लिखैत छी। ताहु में गद्य त थोडेक पढल लिखल अहियो, पद्य में हम भुसकोले। खैर, जे से... अग्रिम माफीक संग अपन पाँच टा कविता/ पद्य पसारबक धृष्टता कS रहल छी।

आई हम कविता लिखब !
(1)
हे, अहाँ छिटकले रहब !
कहु त, कतेब आब सहब,
हमहु अपन बात कहब
आई हम कविता लिखब।

असग़रे कतेक चलब
किनको संग त जियब-मरब
हमरो कियो मनायत आ हम लड़ब
आई हम कविता लिखब।

आब न पसारब, आ नहिये जोड़ब
हाथ फूल नहि जे नित तोड़ब
कतेक अहाँ'क ताल पर सुर हम छेड़ब
आई हम कविता लिखब।

सबटा कहब, पड़त सुनब
तपलहूँ, मुदा किएक जड़ब
कपार, पाथर कहाँ जे फोड़ब
आई हम कविता लिखब।

मथब, घोंटब, विचाराब
नोड़ायब, औनायब
नै आब बेसी विचारब
आई हम कविता लिखब।

हम कोशिश करैत छी
(2)
खुशिये मात्र टा रहि जाइक,
मोन सँ सबहक द्वेष-ईर्ष्या
सबटा छटि जाइक
हम कोशिश करैत छी

होइक सब मे प्रेम अगाध
पीठ मे नै
गाँथय कियो ककरो गाँथ
हम कोशिश करैत छी

होइक नै दुःख मन केँ कोनो मन सँ
हरियर रहय संसार सबहक
खिलय उपवन महकय चमन सँ
हम कोशिश करैत छी

सभ व्यक्त करौक अपना केँ
नहि रखौक भविष्य लेल राग कोनो
मन मे कहैत एलहुँ सब केँ
हम कोशिश करैत छी

ल' सकी दुःख सबहक माथ अपन
सहज रही तकलीफहु मे
मुस्काइत रहौक सब बिनु जतन
हम कोशिश करैत छी

होइक बँटवारा खुशीक सब मे बरोबरि
विषम होइक ने भंडार धनक
नै रहौक बाँचल मूलभूत चीज सँ कोनो नर
हम कोशिश करैत छी
...मुदा निराश भ' जाइत छी।

आदर्श लोक
(3)
आदर्श लोक'के भ रहल ओहिना विलोप
जेहिना पुरोहित आ हुनक माथक ठोप ॥

छद्म छवि आ ओहि के आभा मंडल
जेना रहौक विजेता'क मुकुट-मेडल

मंडन-विद्यापति केर नाम जपथि
चरित्-त्याग मुदा काते राखथि

सीता-अनसुइया केर जपथि नाम
देह-शृंगार' आगाँ कऽ जोड़थि दाम

झूठ-प्रपंच'क क्षणिक सु-फल
अमर्यादित मिथिला बनि रहल

पघिताय आ पागक मोह लय
बनथि विभूति, रत्न आ स्व'के जय

रोकत के, टोकत के आ के देखत आब
दूषित संस्कार सौं आह्लादित मिथिला साफ़े- साफ़ ॥

कॉफ़ी आ ‘ओ’
(4)
अक्कत तीत ब्लैक कॉफी
बेस्वाद, निरस सन्
ने मीठ आ नहिए नोनगर
मुदा तलब एहन की
जेना अहाँ के हो चाह ॥

गहिंर आ पकिया रंग
रसगर निर्मल निश्छल सुगंधि
आ पसरैत ओकर निंशा
जेना प्रीत अहां के ॥

झक्क अदत्त कप
दाग नै कोनो नहिये कथुक छाप
मुखमण्डल जेना अहाँ'के
आ व्यवहार अहि सन् ॥

भाप उठि रहल उन्मत्त
आ बूंद टूटैत कप'क कोर पर
मादकता जेना अहिंक
झहरैत पानि जेना केस सौं ॥

उसिनल आलू केर चोखा
(5)
उसिनल आलू केर चोखा
आ त'ब पर पकाओल टमाटर
संगहि कांच मिरचाई केर
छोट ओ टूक
अहिं सन सोन्ह्गर आ तीख

यादि में अहां के,
खा लईत छी हम
मेटा लईत छी अपन भूख
दफ्तर में बैसल
लैईत अझक झपकी आ सोचईत
आहां सन, की कैबता हमरो
भ जाईत नीक ?
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