अपने मन का आंकलन, न किसी का रिफरेन्स और न ही व्यक्ति या वाद विशेष का अनुगामी. अपना पक्ष, अपना नजरिया और अपना ही अनुभव.
Saturday, 1 August 2026
प्रशांत किशोर, बांकीपुर और मिथिलावाद के लड़के
Tuesday, 2 June 2026
पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : चन्द्रमणि झा
वर्तमान भारतीय राजनीति मेँ नरेंद्र मोदी एहन व्यक्तित्वक रूप मेँ स्थापित छथि जिनकर पक्ष आ विपक्ष दुनूमेँ तीव्र मतभेद देखबाक लेल भेटैत अछि। एहन समय मेँ The Leader Narendra D. Modi जेकाँ पुस्तक मात्र एक व्यक्तिक जीवनी बनिकऽ नहि रहि जाइत अछि, बल्कि समकालीन भारतक राजनीतिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक यात्राक एक महत्वपूर्ण दस्तावेज सेहो बनि जाइत अछि। एहि पुस्तकमेँ नरेंद्र मोदीक नेतृत्व, कार्यशैली आ राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोणकेँ विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करबाक प्रयास कएल गेल अछि।
एहि पुस्तकक लेखक आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगतक प्रतिष्ठित गीतकार आ सांस्कृतिक चेतनाक सशक्त हस्ताक्षर छथि। हुनकर साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तकक प्रत्येक अध्यायमेँ स्पष्ट रूपसँ देखाइत अछि। लेखक तथ्य आ घटनाकेँ केवल सूचनात्मक रूपमेँ नहि रखने छथि, बल्कि तकरा भावात्मक आ प्रेरणादायक स्वर सेहो देने छथि। एहि कारणेँ पुस्तक राजनीतिक विश्लेषणक संग-संग साहित्यिक पठनीयता सेहो बनौने रखैत अछि।
पुस्तकक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्वकेँ केवल राजनीतिक उपलब्धिसभ धरि सीमित नहि रखने छथि, बल्कि हुनकर संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता आ जनसंपर्क कौशलकेँ सेहो रेखांकित केने छथि। एक सामान्य पृष्ठभूमिसँ निकलि देशक सर्वोच्च राजनीतिक पद धरि पहुँचबाक यात्राकेँ लेखक प्रेरणादायक आख्यानक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि।
भाषाक दृष्टिसँ पुस्तक सरल आ प्रवाहपूर्ण अछि। घटनासभक क्रमबद्ध विन्यास आ सहज प्रस्तुति एकरा सामान्य पाठकसँ लऽ कऽ राजनीति आ समाजशास्त्रक अध्येतासभ धरि लेल उपयोगी बनबैत अछि। यद्यपि, एक समीक्षकक रूपमेँ ई कहब उचित होयत जे पुस्तकमेँ मोदीजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक सकारात्मक पक्षकेँ अपेक्षाकृत बेसी स्थान भेटल अछि। यदि आलोचनात्मक विमर्श आ वैकल्पिक दृष्टिकोणकेँ सेहो किछु बेसी विस्तार देल जाइत तँ पुस्तकक विश्लेषणात्मक पक्ष आरो सुदृढ़ भऽ सकैत छल। तथापि लेखकक उद्देश्य स्पष्ट रूपसँ नेतृत्व आ प्रेरणाक आयामकेँ रेखांकित करब रहल अछि, आ ओ एहि उद्देश्य मेँ सफल देखाइत छथि।
समग्रतः The Leader Narendra D. Modi केवल एक राजनीतिक जीवनी नहि, बल्कि नेतृत्व, संकल्प आ राष्ट्रसेवाक विचारकेँ बुझबाक एक गंभीर प्रयास अछि। आदरणीय डॉ. चंद्रमणि झा अपन साहित्यिक दृष्टि आ संवेदनशील अभिव्यक्तिक माध्यमसँ एहि पुस्तककेँ विशिष्ट बना देने छथि। ई पुस्तक विशेष रूपसँ ओहि पाठकसभक लेल उपयोगी अछि जे नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व, हुनकर नेतृत्व-मॉडल आ समकालीन भारतक राजनीतिक यात्राकेँ निकटसँ बुझय चाहैत छथि।
एक पाठकक रूपमेँ सर्वप्रथम तँ हम The Leader Narendra D. Modi केर लिखल जाएबाकेँ लऽ आलोचना करय चाहब। हमर ई आलोचना पुस्तकक विषय-वस्तु वा निष्कर्षकेँ लऽ नहि, बल्कि एकर अस्तित्वकेँ लऽ अछि। आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ई पुस्तक लिखलाहे किएक?
हमर बुझाइत अछि जे नरेंद्र मोदी पर लिखबाक लेल किछु न्यूनतम "अर्हता" होयबाक चाही। जेना -
या तँ लेखक स्वयं संघ-परिवारसँ जुड़ल होथि।
या फेर ओ मोदीजीक गृहप्रदेशक होथि।
या हुनकर संग कोनो संस्थामेँ कार्य कएने होथि।
अथवा पेशासँ पत्रकार होथि, जे वर्षौंसँ हुनकर राजनीतिक जीवनक अध्ययन कएने होथि।
एतय किछु लोक ईहो मानि सकैत छथि जे एहन पुस्तक लिखबाक पाछाँ कोनो राजनीतिक महत्वाकांक्षा वा लाभक संभावना होयबाक चाही। मुदा विडम्बना ई अछि जे चंद्रमणि झा जी एहि तथाकथित अर्हतासभमेँ सँ कोनो अर्हता नहि रखैत छथि।
ओ न तँ राजनीतिक कार्यकर्ता छथि, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ताक गलियारामेँ नियमित रूपसँ विचरण करनिहार, आ नहिए कोनो राजनीतिक लाभक आकांक्षी। ओ मूलतः साहित्यक आदमी छथि—गीतक आदमी, संवेदनाक आदमी, भाषा आ संस्कृतिक आदमी। एहन स्थितिमेँ हुनकर नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखब ओहि लोकसभक लेल आश्चर्यक विषय भऽ सकैत अछि जे साहित्य आ राजनीति बीच कठोर दीवार ठाढ़ कऽ कऽ देखैत छथि।
मुदा हमर शिकायत एतय समाप्त नहि होइत अछि। एक मैथिल हृदयक शिकायत तँ एहि सँ पैघ अछि। यदि चंद्रमणि झा जी केँ ई पुस्तक लिखबे करबाक छल, तँ कम-सँ-कम एकरा मैथिलीमेँ लिखितथि। जे व्यक्ति अपन सम्पूर्ण जीवन मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक सेवामेँ समर्पित कएने छथि, हुनका सँ ई स्वाभाविक अपेक्षा रहैत अछि जे अपन महत्वपूर्ण कृतिसभ लेल मातृभाषाकेँ प्राथमिकता देतीह। The Leader Narendra D. Modi केर अंग्रेजीमेँ प्रकाशित होयब व्यापक पाठक-वर्ग धरि पहुँचबाक दृष्टिसँ उचित भऽ सकैत अछि, मुदा एक मैथिली प्रेमीक मनमेँ ई प्रश्न अनायास उठैत अछि जे की ई पुस्तक मैथिलीमेँ नहि आबि सकैत छल?
तथापि जखन हम पुस्तक पढ़ब आरम्भ करैत छी तँ धीरे-धीरे ई शिकायत कम होमऽ लगैत अछि। तखन बुझाइत अछि जे लेखकक वास्तविक अर्हता न राजनीतिक निकटता अछि, न वैचारिक प्रतिबद्धता आ नहिए कोनो व्यक्तिगत स्वार्थ। हुनकर सभसँ पैघ अर्हता अछि—एक सजग साहित्यकारक दृष्टि, जे अपन समयक प्रभावशाली व्यक्तित्व आ घटनाकेँ बुझबाक तथा ओकरा शब्द देबाक साहस रखैत अछि। सम्भवतः ईहे अर्हता हुनका एहि पुस्तकक रचनाक लेल प्रेरित कएने अछि।
आब पुस्तकक विषय-वस्तु पर अबैत छी। क्राउन पब्लिकेशन, छत्तीसगढ़सँ प्रकाशित ई 278 पृष्ठक पुस्तक वास्तवमेँ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज अछि। यद्यपि पुस्तकक सामग्री आ लेखकक परिश्रम एकरा संग्रहणीय बनबैत अछि, तथापि हमर मानब अछि जे एहन महत्वपूर्ण कृतिकेँ हार्डबाउंड संस्करण आ आरो आकर्षक आवरणक संग प्रस्तुत कएल जाइत तँ एकर गरिमा आरो बढ़ि जाइत।
पुस्तकक सभसँ पैघ विशेषता एकर व्यापक फलक अछि। कुल 77 आलेखक माध्यमसँ लेखक नरेंद्र मोदीक जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि आ सामाजिक सरोकार सहित लगभग सभ महत्वपूर्ण पक्षकेँ समेटबाक प्रयास केने छथि। ई कार्य निश्चयहि श्रमसाध्य आ सराहनीय अछि।
नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तक उपलब्ध अछि, मुदा अधिकांश पुस्तक या तँ जीवनी धरि सीमित रहि जाइत अछि अथवा कोनो एक विशेष पक्ष पर केन्द्रित रहैत अछि। चंद्रमणि झा जीक ई कृति एहि अर्थमेँ अलग देखाइत अछि जे एहि मेँ विविध स्रोत, प्रसंग आ दृष्टिकोणकेँ एकहि स्थान पर संकलित करबाक प्रयास भेल अछि। पाठककेँ मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्वसँ सम्बन्धित अनेक एहन सूचना एकत्र भेटैत अछि जाहि लेल अन्यथा अनेक पुस्तक आ स्रोतक सहारा लेबाक आवश्यकता पड़ित।
77 स्वतंत्र आलेख होयबाक बावजूद पुस्तक कतौ बिखरल नहि लगैत अछि। प्रत्येक आलेख एक पैघ व्यक्तित्व-चित्रक अंश बनिकऽ सामने अबैत अछि। पाठक चाहे कोनो अध्यायसँ पढ़ब शुरू करथि, अंततः हुनका नरेंद्र मोदीक जीवन आ नेतृत्वक एक समग्र तस्वीर भेटैत अछि।
लेखकक दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक आ प्रेरणात्मक अछि। ओ मोदीकेँ मात्र राजनेताक रूपमेँ नहि, बल्कि एहन नेताक रूपमेँ प्रस्तुत करैत छथि जे सामान्य पृष्ठभूमिसँ उठि असाधारण उपलब्धि प्राप्त केने छथि। एहि कारण कतेको स्थान पर पुस्तक जीवनीसँ बेसी प्रेरक साहित्यक रूप धारण कऽ लैत अछि।
एक पाठकक रूपमेँ पुस्तक पढ़ैत समय ई अनुभव अवश्य होइत अछि जे भाषाकेँ आरो रोचक, संवादधर्मी आ प्रवाहयुक्त बनाओल जा सकैत छल। कतेको स्थान पर भाषा अत्यधिक अकादमिक आ विवरणप्रधान भऽ जाइत अछि, जाहिसँ सामान्य पाठककेँ किछु अध्याय बोझिल वा नीरस प्रतीत भऽ सकैत अछि। मुदा एहि पक्षकेँ पुस्तकक सीमा होयबाक संग-संग एकर विशेषता सेहो मानल जा सकैत अछि। लेखक रोचकताक अपेक्षा प्रामाणिकता आ सूचना-संपन्नताकेँ बेसी महत्व देने छथि। एहि कारण पुस्तक भावनात्मक आख्यानक अपेक्षा एक संदर्भग्रंथ आ दस्तावेजक स्वरूप ग्रहण करैत अछि।
यदि कोनो पाठक केवल साहित्यिक आनन्दक लेल एहि पुस्तककेँ पढ़य चाहैत छथि तँ सम्भव अछि जे हुनका किछु निराशा हो। मुदा यदि हुनकर रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदीक व्यक्तित्व आ कृतित्व अथवा एहि विषय पर गंभीर अध्ययन आ शोधमेँ अछि, तँ ई पुस्तक निश्चयहि अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होयत।
दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेताक जीवनी नहि, बल्कि एहन राजनीतिक व्यक्तित्वकेँ बुझबाक प्रयास अछि जाहि इक्कीसम शताब्दीक भारतक दिशा आ विमर्शकेँ गहराईसँ प्रभावित केने अछि। विषयक व्यापकता, सामग्रीक समृद्धि आ दस्तावेजी महत्वक कारण ई कृति विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि।
पुस्तकक एक आन महत्वपूर्ण उपलब्धि एकर सहज उपलब्धता अछि। प्रसन्नताक विषय ई अछि जे ई पुस्तक अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल आ गूगल बुक्स जेकाँ प्रमुख मंचसभ पर उपलब्ध अछि। दुर्भाग्यवश मैथिलीक अधिकांश लेखक आ प्रकाशक अपन पुस्तकक वितरण आ विपणन एहि स्तर धरि नहि पहुँचा पबैत छथि। एहि दृष्टिसँ सेहो ई पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।
एक मैथिल पाठकक रूपमेँ, आ विशेष रूपसँ लेखकक साहित्यिक अवदानसँ परिचित होयबाक कारण, एहि पुस्तककेँ देखिकऽ हमरा स्वाभाविक गर्वक अनुभूति होइत अछि। मैथिली गीत-साहित्यक शिखर पुरुषसभमेँ गिनल जाएबला आदरणीय चंद्रमणि झा जीक राष्ट्रीय स्तरक विषय पर अंग्रेजीमेँ एहन व्यापक आ सुव्यवस्थित पुस्तक प्रस्तुत करब केवल हुनकर व्यक्तिगत उपलब्धि नहि, बल्कि सम्पूर्ण मैथिली समाज आ साहित्य-जगतक लेल गौरवक विषय अछि।
अंतमेँ आदरणीय चंद्रमणि झा जीकेँ एहि महत्वपूर्ण कृतिक लेल हमर हार्दिक शुभकामना। हमर कामना अछि जे ई पुस्तक देश-विदेशक अधिकाधिक पाठक धरि पहुँचे, पढ़ल जाए, चर्चित होउ आ अपन उद्देश्यक सार्थकता सिद्ध करय। संगहि, ई कृति मैथिली समाजकेँ सेहो प्रेरित करय जे ओकर साहित्यिक प्रतिभासभ क्षेत्रीय सीमासँ बाहर निकलि राष्ट्रीय आ वैश्विक स्तर पर अपन सशक्त पहचान स्थापित करय।
प्रवीण कुमार
पाठकों के लिए बोनस
695 रूपा के पुस्तक एखन अमेजन पर 521 रूपा में उपलब्ध अहि. पुस्तक प्राप्ति लेल लिंक
Saturday, 27 December 2025
मिथिला मैथिली पर पाँच बातें
परसों शाम किसी कार्य में लगा था जो लगभग मध्यरात्रि में जाकर समाप्त हुआ। संबंधित दो व्यक्ति को मैसेज किया की इसपर बात हो, स्वाभाविक रूप से वो सो चुके थे। मैंने सुबह तक़रीबन चार बजे उन्हें फिर से मैसेज किया, माय बैड लक की वो बेचारे मेरी तरह अनिद्रा के शिकार नहीं थे, सो रहे थे। फिर मैं भी रूटीन काम की तैयारी में लग गया।
दरअसल मैंने एक आर्टिकल लिखा था जिसे किसी पुस्तक में छपना था। पुस्तक मैथिली और अंग्रेजी में थी सो मुझे मैथिली में लिखने को कहा गया था। तथ्यात्मक दृष्टिकोण से सहमति के लिए अपना हिंदी लिखा हुआ ही पहले भेज दिया मैंने। इस उम्मीद से की यदि ये ठीक कहा समझा गया तो इसका मैथिली अनुवाद कर दूँगा मैं।
सुबह तक़रीबन ०९ बजे के क़रीब एक महोदय का फ़ोन आया। उन्होंने कहा - “अरे ये तो ग़ज़ब लिखा आपने, मस्त है ये। न मसाला कम ना ज़्यादा। बिल्कुल बैलेंस्ड किंतु असरदार। मैं आग्रह करूँगा कि आप इसे हिंदी में ही रहने दें। मैथिली करके इसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी।” - मैंने पहले तो सवाल किया की क्या मैथिली भाषा को असरदार नहीं मानते आप ? … और फिर मजाक में उनसे ये भी कहा - “आप क्यों चाहेंगे कि मैथिली में लिखूँ और नाम हो मेरा…”
इस पर भाई संजीदा हो गए। बोले - “कई वर्षों से वार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ। भरसक पढ़ता भी हूँ मैथिली किताबें, कवि गोष्ठी और विद्यापति नाइट्स वग़ैरा में भी जाता हूँ, मुझे पता है मैथिली भाषा की औक़ात। खासकर तब जबकि आप सोशल मीडिया से हट कर किसी पुस्तक में लिखो। आप अकादमीक भाषा लिखो।”
मैं गंभीर होकर सुनने लगा उनको और भाई बोलते रहे - “आप जब हिंदी लिखते हो तो आप उसमें अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, मैथिली, भोजपुरी… सबका समावेश करते हो। इससे लोक भाषा बनती है, लोकप्रिय शब्दों से लोग कनेक्ट करते हैं, आप मैथिली में ऐसा करके देखो ना, झंडाबरदार आपको भाषा, व्याकरण से लेकर विद्यापति तक की मार से आपका थोबड़ा सूजा देंगे…” - मैंने दफ्तर की बात कहके भाई को कहा - “देखिए ब्रो, थोबड़ा तो वैसे भी सूजेगा मेरा जब मैथिली किताब में हिंदी आलेख होगा… आप देख लीजिए कैसे सुजाना है।”
दूसरी घटना - जैसा की मैं यूँ ही #अलरबलर लिखता हूँ, एक पोस्ट लिख दिया जिसमें लोगों के द्वारा साल भर में पुस्तक पढ़ने की बात पूछी थी। जवाब देने वाले सभी मैथिल लोग थे और आप जाकर उस पोस्ट पर देख लीजिए की उनके द्वारा पढ़े किताबों की लिस्ट में से एक-दो किताब को छोड़कर बांकी सभी पचास के करीब किताबें या तो हिंदी की हैं या फिर अंग्रेजी की। अब आप देख समझ लीजिए की मैथिल मैथिली को कितना पढ़ रहा है। कुछ ऐसे लोग जो मैथिली भाषा साहित्य के झंडाबरदार बने हैं और खुद की बादशाहत क़ायम रखना चाहते हैं उनको यह सब नहीं दिखता है, वो आँख बंद करके सब कुछ हरा-हरा देखते हैं। यदि आपने नया प्रयोग किया तो वो अपनी झूठी शान क़ायम रखने के दवाब में आपका थोबड़ा सूजा देंगे…
तीसरी बात - अभी पटना की मैथिली अकादमी बंद कर दी गई। मेरे जैसे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कूथ-पाद कर अपनी जिम्मेवारी की इतिश्री कर ली। हालांकि इससे फैले बदबू पर कुछेक संस्थाओं ने जहाँ अब धरना करने का विचार किया है वहीं कुछ लोग सरकार द्वारा सभी भाषा के अकादमी का पुनर्गठन होने की बात कर रहे हैं। अब जबकि सरकार ने अकादमियों के पुनर्गठन की घोषणा कुछेक साल पहले ही की थी और अकादमी के बंदी पर सबसे कारगर कार्य हाई कोर्ट में सरकार के ख़िलाफ़ याचिका देने का या फिर किसी सरकारी आदमी को काला झंडा आदि दिखाने का होता…. मैथिलों के इन नौटंकियों को देखकर दया आती है मुझे।
तक़रीबन पंद्रह-बीस साल पहले कार्यस्थल पर एक मित्र ने मुझे एक कविता सुनाई थी - “काम से डरो नहीं, काम को करो नहीं… काम का फ़िक्र करो या ना करो, फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करो…” यही हाल पटना के मैथिल संस्थाओं की है। उन्हें समाज को विरोध करते भी दिखना है और सरकार अनुदानित संस्था के पद पर कायम भी रहना है…” बेचारे !
चौथी बात - जैसा की मैं पहले कह चुका हूँ, विद्यापति जी को जाड़ा नहीं लगता सो जाड़े के मौसम में जहाँ तहाँ विद्यापति नाइट्स का आयोजन होता है। हालाँकि अब लोग नाम बदल बदल आयोजन कर रहे हैं किंतु नौटंकी वही है। मंच, पाग-डोपटा, बेमतलब के विषयों पर संगोष्ठी, फोटो सेशन… बस। किसी भी ऐसे आयोजन में आपने देखा की सरकाआर के ख़िलाफ़ या अकादमी के समर्थन में कोई एक शब्द बोल दे, कोई सेशन / सत्र इसके ख़िलाफ़ योजना बनाने को ह रख दें… नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि उनका मुख्य अतिथि ही उस सरकार से संबद्ध होता है जिसने अकादमी बंद किया है।
आपके लिट फेस्ट या फिर अन्यान्य महोत्सवों की चर्चाओं में अनेक एक्शन पॉइंट बनते हैं। कभी किस को उसपर दुबारा बात करते, फॉलो अप लेते देखा आपने ? क्या नफा हुआ है सिवाय लोगों के मिलने जुलने, ब्यूटी पार्लर और कुर्ता बंडी पर खर्च करने के ?
पाँचवी बात - आज फिर से ललित झा अपने चैनल मिथिला मिरर को लेकर मैथिल भाइयों को इमोशनल करते हुए कह रहे हैं - “मुझे मत बचाइए… आप तय करिए कि मैथिली के लिए कम करते मिथिला मिहिर को बचाना है या नहीं…?” - मैंने उनके लाइव सत्र में कमेंट किया भी की मुझे मिथिला मिरर से कोई मतलब नहीं, हाँ, ललित झा से मतलब है सो आपको कोई मदद चाहिए तो कहें, हम करेंगे। दरअसल सच यही है, आपके मैथिली से कोई लेना देना नहीं है मिथिला को, और यह बात मैंने अनुज ललित को संभवत: पाँच-छह साल पहले कही थी। हिंदी में काम करने को कहा था… अपना कैरीअर संवारने को कहा था…मैथिल और मिथिला ना तो रोटी देता है और नहीं ही मैथिली भाषा साहित्य को इन लोगों ने समृद्ध होने दिया कि इसमें व्यावसायिकता आए… मान लो इस बात को !
तो भाइयों शुरू हो जायें… टोटके करें मुझ पर… बाण चलायें मुझ पर…ज्ञान वर्षा करें मुझे पर, वो ज्ञान जिसको लेकर आप कुछ उखाड़ नहीं पा रहे। मेरा क्या हैं, इतना झेल चुका हूँ, थोड़ा और झेल लूँगा…
#मिथिला #मैथिली
Sunday, 21 December 2025
एलियट साहब - मद्रास और दरभंगा
अपने एलियट साहब अमीरज़ादे थे, पढ़े लिखे और बड़े आदमी भी। उनकी एक प्रेमिका हुई Isabella Napier जो संयोगवश Johnstone Napier की पत्नी भी थीं। करीब १९३० के वक्त यह हाई प्रोफाइल प्रेम प्रसंग बहुचर्चित रहा और अपने एलियट साहब ने इसाबेला के साथ विवाह करके इतिहास रच दिया। कहते हैं यह बीच उन्होंने इसाबेला के लिए बनवाया था।
जैसा की लोगों का आरोप है मैं हर बात में मिथिला और दरभंगा को खींच लाता हूँ, मेरा इलेक्ट्रॉनिक संजाल भी मुझ सा ही हो चुका है। इस पड़ताल के क्रम में मुझे एक दूसरे एलियट साहब का पता चला जो मिथिला अर्थात् दरभंगा से जुड़े हैं।
ये Elliot Macnotton साहब उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी हुए। इलियट साहब एक अच्छे प्रशासक, शिक्षाविद और मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते थे, लाजिमी है ब्रिटिश साम्राज्य के करीबी भी रहे।
उसी काल खंड में दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत उनके उत्तराधिकारी बने श्रीमान लक्ष्मेश्वर सिंह। चूँकि लक्ष्मेश्वर सिंह जी उस वक्त अल्पवयस्क थे, उस वक्त के क़ानून के मुताबिक़ उनकी राजसत्ता कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स के अधीन कर दी गई। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत एक यूरोपीय संरक्षक और शिक्षक की नियुक्ति की जाती थी, संयोगवश इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए एलियट मैकनॉटन को चुना गया।
संरक्षक और शिक्षक के रूप में एलियट मैकनॉटन का प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक रहा। वे युवराज के निकट रहते थे और उनकी शिक्षा, अनुशासन तथा नैतिक विकास की देखरेख भी करते थे। उनका दायित्व केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि एक भावी शासक के व्यक्तित्व निर्माण तक विस्तृत था। लक्ष्मेश्वर सिंह को जहाँ अंग्रेज़ी शिक्षा, विधि, अर्थशास्त्र और आधुनिक प्रशासन की समझ दी गई वहीं उनके अंदर सार्वजनिक दायित्व और उत्तरदायी शासन की भावना भी विकसित की गई।
एलियट मैकनॉटन को अन्य औपनिवेशिक शिक्षकों से अलग करने वाली बात यह थी कि वे स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान रखते थे। एक अंग्रेजी प्रशासक के अधिकारी होने के बावजूद कभी भी उन्होंने मैथिली परंपराओं या संस्कृत अध्ययन को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। उनके समय में पारंपरिक विद्वानों को युवराज को शिक्षा देने की अनुमति दी गई और पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ देशज परंपराओं को भी संरक्षित रखा गया।
आधुनिक ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता के इस संतुलन ने लक्ष्मेश्वर सिंह के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। इस शिक्षण और मार्गदर्शन का प्रभाव तब स्पष्ट हुआ जब महाराजा ने दरभंगा राज का दायित्व संभाला। लक्ष्मेश्वर सिंह अपने समय के सबसे प्रगतिशील ज़मींदारों में गिने जाने लगे। वे अपनी उदार दानशीलता, शिक्षा के प्रति समर्थन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अकाल राहत और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण के लिए व्यापक रूप से सम्मानित हुए। इतिहासकार मानते हैं कि उनकी सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण उनके निर्माणकाल में एलियट मैकनॉटन के सान्निध्य का ही परिणाम था।
(तस्वीर एलियट इसाबेला बीच की है।)
Sunday, 24 August 2025
साहित्य और राज्य से इतर मिथिला

मिथिला के इतिहास के नाम पर अधिकांशतः साहित्य विवेचना ही देखी है। चूँकि मैंने कोई किताब नहीं लिखी, और न ही टीवी में आता हूँ, साहित्य से इतर मिथिला का संक्षित इतिहास लिखने की धृष्टता करते डर रहा हूँ। चीज़ें शायद विस्तार से भले न मिलें, क़रीने से भी न मिले किंतु जो हैं वो सच्ची हैं इसकी गारंटी लेता हूँ।
मिथिला की गाँव वापसी
सन १८१२ में पटना की जनसंख्याँ तक़रीबन ३ लाख थी और कलकत्ता की १.७५ लाख. १८७१ में पटना १.६ लाख और कोलकाता ४.५ लाख. पटना की तरह यही हाल भागलपुर और पुरनियाँ का भी रहा. कारण दो थे. इस दौरान अंग्रेजों की मदद से कलकत्ता में फला फुला उद्योग और बिहार/ मिथिला इलाके में देशी उद्योग के विनाश से लोगों का शहर से गाँव की ओर पलायन. मिस्टर बुकानन ने अपने सर्वे में १९ वीं सदी के बड़े हिस्से तक इस पलायन की पुष्टि की है. अंग्रेजी शासन की दोहन निति के कारण शहर के उद्योग धंधे नष्ट होते गए और लोग गाँव में वापस आते गए.
इसका परिणाम गाँव के घरेलु उद्योग और कृषि क्षेत्र में उन्नति लेकर आया. दुष्परिणाम सिर्फ इतना की गाँव में काम कम और लोग ज्यादा हो गए. इस क्रम में अति तब हुई जब अंग्रेजों ने गाँव की जमीन का दोहन भी आरम्भ किया... १८५७ की क्रांति में सरकार के खिलाफ ज्यादा लोगों का जुटना संभवतः इसी करण हुआ. लोग शहर में मारे गए और गाँव में भी शुकुन से न रह पाए तो विरोध लाजिमी था. ऊपर से कुछ स्थानीय लोगों द्वारा अंग्रेजों की चमचई...
इसको लिखने का कारण सिर्फ इतना की मुझे इसी प्रकार की घुटन आज के हिन्दुस्तान में दिखती है. मुझे लगता है की लोग गाँव वापस जायेंगे... गाँव छोटे उद्योग धंधों, शिक्षा और व्यापार का केंद्र बनेगा... सरकारें जलेंगी...

उद्योग व् पलायन
अक्सर लोगों से सुनता हूँ, बिहार और मिथिला का खस्ता हाल है... लोग खतरनाक तरीके से पलायन कर रहे हैं... ब्ला ब्ला ब्ला. जरा अन्दर घुसिए तो पता चलता है की मिथिला से पलायन का इतिहास हजारों वर्ष पुराना रहा है. विद्वान, व्यापारी, मजदुर... सब बेहतर पारितोषिक के लिए बाहर जाते रहे. इतिहासकारों ने इस बात का सबुत ८०० वीं ईस्वी से बताया है.
जूट, नील और साल्ट-पिटर के नजदीकी उत्पादन क्षेत्रों (फारबिसगंज, किशनगंज दलसिंहसराय आदि) में मजदूरी के अलावा लोग मोटिया या तिहाडी मजदूरी करने नेपाल, मोरंग, सिल्लिगुड़ी और कलकत्ता भी जाते रहे हैं. श्री जे सी झा ने अपनी किताब Migration and Achievements of Maithil Pandits में लिखा है - मैथिल पंडित बेहतर अर्थ लाभ के लिए देश के अन्य क्षेत्रों में जाते रहे हैं.
हालाँकि तब और अब के इस पलायन में फर्क है. तब लोग मूलतः वापसी में अपने साथ कृषि की नई तकनीक सीख कर, स्वस्थ जीवन जीने के गुर सीखकर, घरेलु उद्योग लगाने की नई तकनीक सीख कर आते थे. जबकि अब हम छोटे कपडे, कान फाडू पंजाबी संगीत, प्रेम त्रिकोण और धोखेबाजी की नई तकनीक ज्यादा सीखते हैं.
इस दौर में एक वक़्त मिथिला क्षेत्र में उद्योग फला-फुला भी. अठारहवीं और उन्नीसवी शताब्दी में मिथिला के अलग अलग शहरों में विभिन्न उद्योग लगे. मधुबनी में मलमल, दुलालगंज व् पुरनियाँ में सस्ते कपड़ों का तो किशनगंज में कागज का उद्योग चला. दरभंगा, खगडिया, किशनगंज आदि ईलाका पीतल व् कांसे के बर्तनों के लिए जाना जाता था... भागलपुर सिल्क, डोरिया, चारखाना के लिए और मुंगेर घोड़े के नाल, स्टोव, जूते के लिए प्रसिद्ध था.
इन सबमे आश्चर्यजनक तरीके से पुरनियाँ तब भी काफी आगे था. कहते हैं पुरनियाँ का सिंदूर उत्पादन व् निर्यात तथा टेंट हाउस के सामान बनाने का काम विख्यात था. मेरे शहर दरभंगा के लोगों को बुरा न लगे इसलिए बताता चलूँ की दरभंगा शहर उस वक़्त हाथी दांत से बने सामानों का प्रमुख उत्पादन केंद्र था.

मिथिला में स्त्री
जितना पुराना इतिहास पुरुषों द्वारा मिथिला छोड़ने का रहा है ठीक उतना ही अकेली रहने वाली स्त्रियों के शोषण (विभिन्न स्तरों पर) का भी रहा. मैथिल समाज का छुपा हुआ किन्तु सत्य पक्ष है की स्त्रियाँ सताई जाती रही... परदे के पीछे यौन प्रताड़ना... लांछन... दोषारोपण... आदि करते हुए मैथिल समाज खुद को कलमुंहा साबित करता आया है.
इसका एक सकारात्मक पक्ष भी था. क्षेत्र में मैथिल स्त्रियों में शिक्षा का स्तर बढ़ा और वो स्वाबलंबी बनी. बिहार के औसतन ६% के सामने पूसा में स्त्री शिक्षा का दर १३%, सोनबरसा में ६%, मनिहारी में ९% थी. (जिन्हें % कम लग रहा है उनके लिए – १९९०-२००१ में यह दर २८% था)
स्वाभाविक रूप से गाँव की सत्ता स्त्रियों के हाथ में आ गई थी ऐसे में. गाँव की महिलाएं घरेलु उद्योग, पशु पालन आदि में आगे दिखने लगी थी. संभवतः गांधी का चरखा आन्दोलन इसी वजह से मिथिला के घर घर में पहुँच पाया.
समय के साथ साथ मैथिल स्त्रियों की दुनियां थोड़ी स्वप्निल बनाई गई जब दूर देश के सन्देश उसके पास भौतिक और काल्पनिक तरीके से पहुँचने लगे. इस रंग में भी भंग तब पड़ा जब पुरुष अपने साथ बीमारियाँ भी साथ लाने लगे.
मिथिला में जातियां
यहाँ हिन्दू परंपरा अपने प्रखरतम रूप में सभी जटिलताओं के साथ सदा विद्यमान रहीं. अलग जातियों के अलग अलग देवता और अलग गहबर होते थे. जातियों के देवताओं के नाम रोचक थे.
श्याम सिंह डोम जाति के, अमर सिंह हलवाई व् धोबियों के, गनिनाथ-गोविन्द हलवाइयों के सलहेस दुसाधों के दुलरा दयाल/ जय सिंह मल्लाहों के, विहुला तेली जाती के, दिनाभद्री मुसहरों के तो लालवन बाबा चमारों के देवता थे.
स्वाभाविक तौर पर सामाजिक कुरीतियाँ, अधविश्वास और धारणाएं ज्यादा थीं. तमाम् विरोधी उदाहरण के बावजूद ब्राम्हण, राजपूत या लाला विपदा में दुसाध, मुसहर के गहबर में जाते थे. जातियों के हिसाब से कार्य बंटे थे जो उत्तरोत्तर कम होते गए.
मिथिलांचल के कई इलाकों में मुसलमानों द्वारा मनाये जाने वाले ताजिये में हिन्दुओं का शामिल होना और हिन्दुओं के त्योहारों में मुस्लिमों के साथ होने के उदहारण भी हैं. कालांतर में हम समझदार होते गए और विषमतायें उग्र रूप धारण करने लगी.

ऐसे में यह स्पष्ट है कि हमें हमारे सीमित सोच से इतर मिथिला को बृहत् तौर पर देखे जाने की आवश्यकता है। मिथिला मात्र विद्यापति विद्यापति समारोह और प्रणाम मिथिलावासी और हमर मिथिला महान तक सीमित नहीं है।

Saturday, 16 August 2025
"न त्वत्समश्चाभ्यधिकश्च् दृश्यते" - खट्टर काका के संस्मरण
आरएसएस आ स्वतंत्रता संग्राम - संक्षिप्त विवरण

Tuesday, 29 July 2025
बिहार की बाढ़ : कितनी ईमानदारी
यदि तथ्यों को देखें तो कुल मिलाकर नीतीश कुमार जी ने विधान सभा में भ्रामक और अर्ध सत्य बातें की थी और फिर बाद में उनके मंत्री जी ने भी सायं काल तक इस झूठ के पुलिंदे को जारी रखा था उस वक़्त।
Monday, 7 July 2025
मुखिया चुनाव - रमौली पंचायत - प्रवीण कुमार झा


Thursday, 16 January 2025
श्रेष्ठ शासक, दानवीर, धर्म रक्षक और दूरदर्शी उद्योगपति राजा - रामेश्वर सिंह ठाकुर
Wednesday, 18 December 2024
अहाँ के अहाँ से निकालि नाटक बनायब - अकादमी को बधाई
- पहली बात - इधर बीते कुछ वर्षों से फैल रहे मैथिली काव्य संस्कार के प्रदूषण से मुक्ति हेतु और
- दूजी बात - 1991 में रामदेव झा रचित "पसिझैत पाथर" के बाद 33 वर्ष उपरांत नाटक केटेगरी में पुरस्कार हेतु।
Thursday, 4 April 2024
केदार नाथ चौधरी - रिटायर उम्र के फायर साहित्यकार
हमारे मिथिला में एक गाँव है - "नेहरा" - कहते हैं सुबह -सुबह इस गाँव का नाम लेना अशुभ होता है. इस 'अशुभता' से बचने को कोई इसे "बड़का गाँव" कहता है, कोई "पुबारि गाम" तो कोई "चौधरी गाम". इसी गाँव के अभिभावक कुसुम-किशोरी के यहाँ दिनांक ३ जनवरी १९३६ को एक पुत्र रत्न का जन्म हुआ. यह गाँव आरम्भ से ही तुलनात्मक रूप से आस पास के गाँवों से अधिक विकसित गाँव रहा है. हालाँकि मिथिला में विकास की परिभाषा पढ़ लिख कर परदेश में नौकरी रही है. बालक पहले अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा और फिर लॉ की डिग्री उपरान्त कलकत्ता जाकर नौकरी करने लगा.
जैसा की होता आया है. उम्र के भिन्न पड़ाव पर लोग अपनी मान्यताएं और ज्ञान कोष अपग्रेड करते हैं. एक ब्रिटिश कंपनी में काम करते बालक ने खुद को अपग्रेड किया और उसे इस बात का भान हुआ की सफलता यह नहीं है. मंजिलें और भी हैं... ये तो छोटी पहाड़ी चढ़ा हूँ... आगे और भी कई ऊंचे पहाड़ हैं. हाँ, यहाँ नौकरी करते हमारे बालक ब्रो मैथिली आन्दोलन में भी सहभागी होते रहे.
नए मुकाम की राह में तक़रीबन सात-आठ वर्ष की नौकरी के उपरांत १९६९ में यह बालक अर्थशास्त्र पढने कैलिफोर्निया चला गया. तदोपरांत सन-फ्रांसिस्को विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट की पढ़ाई कर १९७८ में भारत लौटा और फिर ईरान सह फ़्रांस के संस्थानों में कार्य करते स्वदेश के मुंबई और पुणे में कार्य कर रिटायर हुए.
मिथिला में रिटायर होने के बाद बहुसंख्यक अभिभावक अपने इर्द गिर्द का समाज और अपने ही बालक वृन्द को "मैनेज" करने का शौक पाल लेते हैं...धर्म-कर्म, वेद-पुराण और गाँव अधिक याद आने लगता है उन्हें... उनपर स्वयं को महान साबित करने का दवाब ठीक वैसे ही हावी हो जाता है जैसे उम्र के ४५ वसंत के बाद सुन्दर लगने का दवाब महिलाओं को और आज स्वयं को नेहरु सा बड़ा साबित करने का दवाब मोदी को है. (इन पंक्तियों पर कुतर्क को तैयार मैथिल से कहूँगा - कुएं का मेढक कब तक बने रहोगे, दुनियां देखो, व्यावहारिक बनो, सच स्वीकारो)
हाँ तो बात रिटायर होने के बाद की थी. अब तक देश समाज में केदारनाथ चौधरी के नाम से जाने माने हो चुके बालक ने मिथ तोड़ा और अपने गाँव से दूर लहेरियासराय में अपना ठिया बनाकर कथित मैथिल बुजुर्गों से अलग राह चुनी. इस तरह से लगभग सत्तर वर्ष की आयु में उन्होंने आगे का जीवन मैथिली के लिए समर्पित किया.
मेरे हिसाब में डिग्री, उम्र (अनुभव वाली, काटी गयी नहीं), पैसे खर्च करना और यात्राएं करना आपका ज्ञान बढाते हैं... संयोगवश केदार बाबु में यह चारों था. उनकी मैथिली में यह सब झलका भी. उनका साहित्य सहज भाषा, प्रवाह और व्यावहारिकता के करीब रहा. कई जागृत पाठक को ऐसा कहते/लिखते सुना - उनका लिखा पढ़ते ऐसा लगता है जैसे घटना सामने घट रही हो.
केदार बाबु के साहित्य की शुरुआत मिथिला समाज को हिलोरने की कोशिश में "चमेली रानी" और "माहुर" से हुई. उनकी साहित्य यात्रा के दुसरे फेज में ग्राम्य जीवन सह आध्यात्म को ध्यान में रख लिखी पुस्तक आयी - "करार" - इस पुस्तक के माध्यम से अपने गाँव में पाए "छोटका काका" की उपाधि को चरितार्थ किया उन्होंने... आगे "हिना" अबारा नहितन" और अंत में "अयना" - इसमें "अबारा नहितन" मैथिली फिल्म "ममता गाबय गीत" के बनने की गाथा है. मैथिली क्षेत्र के बड़े और गरिष्ठ विद्वान् इस सम्बन्ध में बोलते ही आये हैं. खासकर उनकी मृत्यु के बाद उन्हें मैथिली सिनेमा का पुरोधा कहने वाले लोग, आज सिनेमा के नाम पर खुद को महान बनाते लोग और फिल्म के बहाने अपना छुपा एजेंडा साधते लोग जीते जी उनके संपर्क से दूर ही रहे... यह नया भी नहीं है, स्व. रामदेव झा जी इसके उदाहरण रहे हैं जब दरभंगा में रहते लीजेंड लोग उनका हाल जानने नहीं गए और मृत्यु के बाद "बवाल" काटते खलिया पैर नाचे.
चूँकि अपनी उम्र के लगभग ७० वर्ष की उम्र में मैथिली सेवक बने, सो कॉल्ड एलीट मैथिली साहित्यकार सह गरिष्ठ मैथिलों के बीच स्वीकारोक्ति नहीं मिली. ऐसे उदाहरण आज भी हैं जब खुद को साहित्यकार कौम से और दूजे को "विदेह" धर्म का मानते हैं... इस पर आगे लिखकर आपका और मेरा जी कसैला नहीं करना चाहता...

एक सम्मान समारोह में मंजर सुलेमान जी ने गलत नहीं कहा था - "जैसे हरिमोहन झा अपने उपन्यास के लिए प्रसिद्ध हुए, केदार बाबु की कीर्ति भी वैसी ही है." श्रीमान कामेश्वर चौधरी ने श्री केदारनाथ चौधरी के बारे में कहा था "अंग्रेजी पढ़े ही मैथिली का सम्मान बचा सकते हैं" - मेरे हिसाब से मैथिली को वर्तमान सो कॉल्ड मैथिली पुत्रों से बचाए रखने की आवश्यकता भी है सर...
आजन्म उर्जावान और कर्मठ व्यक्ति के लिए असहाय बिस्तर बहुत कष्टकारी होता है... नमन ! श्रद्धांजलि ! #सर

