Sunday, 24 May 2026

दादा जी और तीन पीढ़ियों का मल्लाह-ब्राह्मण संबंध


बात १९८०-८२ के आस पास की होगी। हमारा तीन दादा जी का संयुक्त परिवार था। फ़िल्मों में दिखने वाली हवेली सा आँगन था हमारा। तीन दिशाओं में बना घर, उत्तर दिशा में खुली सी बाड़ी और बीच में बड़ा सा आँगन। आँगन तक़रीबन ६०x८० फीट का जहाँ उसके पश्चिम में एक सार्वजनिक चूल्हा था और उत्तर दिशा में माछ बनाने का अलग चूल्हा। कुल ९ कमरे, एक लगभग स्टोर और एक पूजा का कमरा। आजकल हमारे सिमटते स्क्वायर फीट के घर में हम एक छोटे मंदिर को स्थान देते हैं, उस वक़्त पूर्व दिशा में एक बड़ा कमरा मंदिर-घर था जहाँ धर्मराज-बाबा विराजमान थे।

छोटी दादी जल्दी विधवा हो गई थी, उनका घर पश्चिम-दक्षिण कोने में था। मुझे याद है उनके कमरे में एक छोटा पलंग और एक बक्शा हुआ करता था। वो कभी कभार कुछ बोलती थीं लेकिन कभी उनके मुख से कोई दुःख या नकारात्मक बात नहीं सुनी मैंने। मेरी दादी सबसे बड़ी बहू थीं। उनका कमरा दक्षिण के दुहार पर था। कमरे के बाहर संदूक, उसमें कुछ किताबें, बर्तन और सुजनियाँ (कपड़ों के तह की सिलाई से बना बिस्तर)। मुझे याद है १९८८ के भूकम्प के समय मैं उसी संदूक पर सोया था। जो बीच वाली दादी थीं उनका कमरा पूर्वोत्तर कोने में था। वो सबों में सबसे अधिक मुखर थीं।

तीन दादा जी में सब कुछ बिना किसी अनुबंध, कागज़ी कारवाई और स्वार्थ के तय था। शायद किसी ने किसी से कुछ कहा भी ना हो कि उसे क्या करना है... छोटे दादा जी खेती बाड़ी देखते, मँझले कलकत्ता शहर से कमाई लाते और बड़े यानी मेरे दादा जी समाज संभालते। सबके अलग विभाग, किसी किसी के काम में कोई दखल नहीं, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं। जो भी कमाई होती, सबके लिए एक समान और सबका सब पर बराबर हक।

यहाँ मैंने मेरे दादा के बारे में "समाज देखते थे" लिखा है जिसे थोड़ा स्पष्ट करना आवश्यक है। उस वक़्त घर से थोड़ी दूरी पर दलान हुआ करता था। जहाँ घर के पुरुष रहा करते, खेती बाड़ी समाज और आयोजन आदि के लिए दलान था। यदि आँगन से किसी महिला के लिए दलान पर किसी को कोई सूचना भेजनी होती तो घर के बच्चे संदेश वाहक का काम करते। अहले सुबह फुल तोड़ने और गांव के पोखर में नहाने जाते वक़्त के आलावा ऐसा कम ही होता जब स्त्रियाँ दलान पर दिखतीं। दलान पर मेरे दादा जी का अपना एक संदूक और एक चौकी थी। पहले एक दूध पेड़ने की मशीन भी उस दलान पर हुआ करती थी जिसके विभागाध्यक्ष मेरे दादा जी ही थे। दूर गांव के लोग दूध लेकर आते और क्रीम निकाला जाता। बदले में कोई अनाज तो कोई क्रीम का हिस्सा दे जाता। ऐसे में दादा जी के पहचान की चौहद्दी बड़ी थी। अपने गाँव से १८-२० कोस दूर तक के गाँव उनको "पंचायती" के लिए बुलाया जाता। एक एक गाँव के लोगों के नाम और खानदान का ब्योरा उनके पास होता। शादी-विवाह उनके रिकमेंडेशन से हुआ करता और किसी भी नैयायिक मामले में उनका कहा पत्थर की लकीर समान होती।

मेरे मंझले दादा जी कलकत्ता में रहते। कहते हैं उनका वहाँ एक कमरा भी था जिसे उन्होंने अपने संन्यास के समय किसी रिश्तेदार को दान कर दिया था। उनकी शादी गांव से तक़रीबन ६ कोस दूर के गाँव नन्द जी के यहाँ हुई थी। नंद जी आस पास के इलाके में यात्रियों को अपने यहां रखने को लेकर मशहूर थे। उस वक़्त मोटर तो क्या, सायकल तक नहीं थी इलाके में। ऐसे में लोग कटही गाड़ी या फिर हाथी से चलते, समय अधिक लगता तो बीच गाँव में रुक जाते। ऐसे ही रुकाव के स्थान के लिए नंद जी का घर प्रसिद्ध था। कभी इस बात पर विवाद नहीं हुआ कि मेहमान १० हैं या १५ और ना ही इस पर सवाल हुआ कि इस समय में इतने लोगों का भोजन कौन बनाएगा। नंद जी की भतीजी मेरे मंझले बाबा की पत्नी... इसी जबान देने के क्रम में मेरे पिता की पत्नी नंद जी की पोती और फिर नंद जी के पुत्र यानी मेरे नाना द्वारा एक ब्राह्मण को जबान दिए जाने के वजह से मैं भी उसी गाँव का जमाई !

वापस दादा जी पर आते हुए - दादा जी का संदूक भानुमति का पिटारा था। उसमें हर वक़्त खाने का कोई ना कोई सामान मौजूद होता। लड्डू, खाजा, चूड़ा, दही, गुड़, कोई सिजनल फल... कुछ ना कुछ होता ही उसमें। दादा जी का रूटीन था सुबह चार बजे उठकर चार कोस घूमने का। वापस आते, शरीर में सरसों तेल पचाते, नहाते और आँगन जाकर बैठ जाते। दादी का काम था कुछ मिनट के अंदर उनके पास खाना लाना। दादा जी, दो-चार मिनट से अधिक आँगन में इंतज़ार नहीं करते। उनके पास संदूक और उसमें पड़ा खाना तो था ही।

कहते हैं दादा जी छाल्ही-रोटी (क्रीम और रोटी) मात्र खाते। कई बार अहले सुबह कहीं कोई पंचायती को जाते और देर शाम वापस आते तो छाल्ही-रोटी कहीं उनका इंतज़ार कर रहा होता। संभवतः यही वजह हो, मेरी दादी मुझे भी यही खिलाने के प्रयास में रहती और अपने मधुर मुस्कान के साथ अपने हाथ से मुँह में खिलाने के की वजह से वो अपने प्रयास में सफल भी होतीं।

मेरे पिता की शादी जिस उमाकांतबाबू जी की पुत्री से हुई वो मिथिलांचल में पहले दौर के संघी थे। आज के सारे विधायक-सांसद-मंत्री उनसे आशीर्वाद पा चुके थे। उनका दहेज, गहना आदि से कोई वास्ता नहीं, उनके समय वो अपनी खेती की उपज को संघ में लगाते... अब माँ ससुराल गईं तो उन्होंने उस वक़्त (संभवतः १९७१-७२ में) उनके साथ अपने मज़दूर का एक परिवार उनके साथ भेज दिया ताकि माँ और परिवार की सेवा सुश्रुषा हो सके। इसी "मुखिया" परिवार का काम था नाना जी और दादा जी के परिवार के बीच का संबंध क़ायम रखना। वो संवाद पहुचाता, सामान, पथ-परहेज, मौसमी फल-फ़सल और कभी कभी मछली भी पहुँचाता।

आज उस सम्बन्ध की तीसरी पीढ़ी हैं हम लोग। 'मुखिया' परिवार गांव में अब भी मेरे खेत-खलिहान की देखभाल करता है और उनके दो बेटे मुंबई में हैं। जो तस्वीर आप देख रहे वो उनके ही छोटे बेटे की है जो मुंबई में अपनी टैक्सी चलाता है। मैंने उसे भैया कहने को कहा है लेकिन वो अक्सर मुझे 'गिरहत' कहता है और मेरे हर एक स्थानीय यात्रा में मेरा सारथी भी बना होता है।

ये पिछले सोमवार सुबह लगभग पाँच बजे की बात है जब "मिथिलेश मुखिया" मुझे कह रहा था - "दो बच्चा है, एक स्कूल जाता है, टैक्सी चलाता हूँ तो टीवी नहीं देख पाता हाँ, यूट्यूब पर वीडियो देखता हूँ कुछ जिसमें एक 'अजीत भारती' है जो उसे बहुत पसंद है, बहुत अच्छा बोलता है..." - मैंने उसे अजीत के साथ की अपनी तस्वीर दिखायी तो उसके सवाल थे - "कहाँ का है... अच्छा फिर तो मैथिली बोलता होगा.... मेरा बात करवा दीजिएगा कभी, मैं चार साल से सुनता हूँ इनको...." #क्रमशः



10 comments:

  1. Anonymous5/24/2026

    बचपन की याद ताजा हो गई मेरी 🧿

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  2. बहुत बढ़िया संस्मरण!

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    1. Anonymous5/24/2026

      प्रणाम भाईजी 🙏 मैं आपको लगभग 4/5 साल से फ़ॉलो करता हूं आपका वीडियो सब देख कर हमें बहुत अच्छा knowledge मिलता है...

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  3. अहा! खूब नीक लागल पढ़ि क'।

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  4. Anonymous5/24/2026

    मजा आ गया पढ़कर ♥️ आगे क्या हुआ इंतजार रहेगा।

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  5. Anonymous5/24/2026

    वाह! अगले भाग के इंतजार में....

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  6. Anonymous5/24/2026

    सर प्रणाम 🙏🙏🙏

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  7. Anonymous5/24/2026

    सुंदर भाईजी।। 🙏🍁

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  8. Anonymous5/25/2026

    बड्ड नीक लागल। सुन्नर संस्मरण!👌💐

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  9. Anonymous8/18/2026

    Well penned

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