Tuesday, 2 June 2026

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : डॉ. चन्द्रमणि झा


वर्तमान भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हैं जिनके पक्ष और विपक्ष दोनों में तीव्र मतभेद दिखाई देते हैं। ऐसे समय में The Leader Narendra D. Modi जैसी पुस्तक केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं रह जाती, बल्कि वह समकालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा का भी एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बन जाती है। पुस्तक में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, कार्यशैली और राष्ट्र-निर्माण संबंधी दृष्टिकोण को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

इस पुस्तक के लेखक आदरणीय डॉक्टर चंद्रमणि झा मैथिली साहित्य-जगत के प्रतिष्ठित गीतकार एवं सांस्कृतिक चेतना के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनकी साहित्यिक संवेदनशीलता पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में दिखाई देती है। लेखक ने तथ्यों और घटनाओं को न केवल सूचनात्मक ढंग से रखा है, बल्कि उन्हें एक भावात्मक और प्रेरणात्मक स्वर भी प्रदान किया है। यही कारण है कि पुस्तक राजनीतिक विश्लेषण के साथ-साथ साहित्यिक पठनीयता भी बनाए रखती है।

पुस्तक का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि लेखक ने नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके संघर्ष, अनुशासन, संगठनात्मक क्षमता और जनसंपर्क कौशल को भी रेखांकित किया है। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुँचने की यात्रा को लेखक ने प्रेरक आख्यान के रूप में प्रस्तुत किया है।

भाषा की दृष्टि से पुस्तक सरल और प्रवाहपूर्ण है। पुस्तक में घटनाओं का क्रमबद्ध विन्यास और सहज प्रस्तुति इसे सामान्य पाठकों से लेकर राजनीति एवं समाजशास्त्र के अध्येताओं तक के लिए उपयोगी बनाती है।हालाँकि, एक समीक्षक के रूप में यह भी कहा जा सकता है कि पुस्तक में मोदी के व्यक्तित्व और कार्यों के सकारात्मक पक्षों को अपेक्षाकृत अधिक स्थान मिला है। यदि आलोचनात्मक विमर्श और वैकल्पिक दृष्टिकोणों को भी कुछ अधिक विस्तार दिया जाता, तो पुस्तक का विश्लेषणात्मक पक्ष और अधिक सुदृढ़ हो सकता था। फिर भी लेखक का उद्देश्य स्पष्टतः नेतृत्व और प्रेरणा के आयामों को रेखांकित करना रहा है, और उस उद्देश्य में वे सफल दिखाई देते हैं।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi केवल एक राजनीतिक जीवनी नहीं, बल्कि नेतृत्व, संकल्प और राष्ट्र-सेवा के विचारों को समझने का एक गंभीर प्रयास है। आदरणीय चंद्रमणि झा जी ने अपनी साहित्यिक दृष्टि और संवेदनशील अभिव्यक्ति के माध्यम से इस पुस्तक को विशिष्ट बना दिया है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व,  उनके नेतृत्व-मॉडल और समकालीन भारत की राजनीतिक यात्रा को निकट से समझना चाहते हैं।

एक पाठक के तौर पर सर्वप्रथम तो मैं The Leader Narendra D. Modi के लिखे जाने की ही आलोचना करना चाहता हूँ। मेरी यह आलोचना पुस्तक की विषयवस्तु या उसके निष्कर्षों को लेकर नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व को लेकर है कि आखिर आदरणीय चंद्रमणि झा जी ने यह पुस्तक लिखी ही क्यों ? 

मेरी समझ में नरेंद्र मोदी पर लिखने के लिए आपमें कुछ न्यूनतम "अर्हताएँ" होनी चाहिए। जैसे - 

-  या तो लेखक स्वयं संघ-परिवार से जुड़ा हो, 
-  या फिर वो मोदी जी के गृहप्रदेश का हो,
-  या उनके साथ किसी संस्था में कार्यरत रहा हो, 
-  या फिर पेशे से पत्रकार हो जिसने वर्षों तक उनके राजनीतिक जीवन का अध्ययन किया हो। 

यहाँ कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि ऐसी पुस्तक लिखने के पीछे कोई राजनीतिक आकांक्षा या लाभ की संभावना होनी चाहिये, किंतु अफसोस कि चंद्रमणि झा जी इन अर्हताओं में से कोई भी नहीं रखते। वे न तो राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, न चुनावी विश्लेषक, न सत्ता के गलियारों के नियमित यात्री, न ही किसी प्रकार के राजनीतिक लाभ के आकांक्षी। वे मूलतः साहित्य के आदमी हैं - गीत के आदमी, संवेदना के आदमी, भाषा और संस्कृति के आदमी। ऐसे में उनका नरेंद्र मोदी पर पुस्तक लिखना उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय हो सकता है जो साहित्य और राजनीति के बीच कठोर दीवारें खड़ी करके देखते हैं।

लेकिन मेरी शिकायत यहीं समाप्त नहीं होती। एक मैथिल हृदय की शिकायत इससे भी बड़ी है। यदि चंद्रमणि झा जी को यह पुस्तक लिखनी ही थी, तो कम-से-कम इसे मैथिली में लिखते। जिस व्यक्ति ने अपना जीवन मैथिली भाषा, साहित्य और संस्कृति की सेवा में लगाया हो, उनसे यह स्वाभाविक अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपनी महत्वपूर्ण कृतियों के लिए अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता दे। The Leader Narendra D. Modi का अंग्रेज़ी में प्रकाशित होना एक व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचने की दृष्टि से उचित हो सकता है, किंतु एक मैथिली प्रेमी के मन में यह प्रश्न अनायास उठता है कि क्या यह पुस्तक मैथिली में नहीं आ सकती थी?

फिर भी, जब पुस्तक को पढ़ना शुरू करता हूँ तो धीरे-धीरे यह शिकायत कम होने लगती है। तब समझ में आता है कि लेखक की वास्तविक अर्हता न तो राजनीतिक निकटता है, न वैचारिक प्रतिबद्धता और न ही कोई व्यक्तिगत स्वार्थ। उनकी सबसे बड़ी अर्हता है - एक सजग साहित्यकार की दृष्टि, जो अपने समय के प्रभावशाली व्यक्तित्वों और घटनाओं को समझने तथा उन्हें शब्द देने का साहस रखती है। संभवतः इसी अर्हता ने उन्हें इस पुस्तक को लिखने के लिए प्रेरित किया।

अब आते हैं पुस्तक की विषय-वस्तु पर। Crown Publication, छत्तीसगढ़ से प्रकाशित यह पुस्तक 278 पृष्ठों का एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ है। यद्यपि पुस्तक की सामग्री और परिश्रम इसे संग्रहणीय बनाते हैं, फिर भी मेरा मानना है कि इतने महत्त्वपूर्ण कार्य को हार्डबाउंड संस्करण तथा अधिक आकर्षक आवरण के साथ प्रस्तुत किया जाता तो इसकी गरिमा और बढ़ जाती। पुस्तक का विषय और उसका संदर्भ ऐसी प्रस्तुति की अपेक्षा करता है। पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका व्यापक फलक है। कुल 77 आलेखों के माध्यम से लेखक ने नरेंद्र मोदी के जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष, नेतृत्व, प्रशासनिक दृष्टि, राष्ट्रवाद, वैश्विक छवि तथा सामाजिक सरोकारों सहित लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों को समेटने का प्रयास किया है। यह कार्य निश्चय ही श्रमसाध्य और सराहनीय है।

नरेंद्र मोदी पर असंख्य पुस्तकें उपलब्ध हैं, किंतु अधिकांश पुस्तकें या तो जीवनी तक सीमित रह जाती हैं अथवा किसी एक विशेष पक्ष पर केंद्रित होती हैं। चंद्रमणि झा जी की यह कृति इस अर्थ में अलग दिखाई देती है कि इसमें विविध स्रोतों, प्रसंगों और दृष्टिकोणों को एक ही स्थान पर संकलित करने का प्रयास हुआ है। पाठक को मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित अनेक ऐसी सूचनाएँ एक साथ प्राप्त होती हैं, जिन्हें अन्यत्र खोजने के लिए अनेक पुस्तकों और स्रोतों का सहारा लेना पड़ सकता है।

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण गुण इसकी संरचना है। 77 स्वतंत्र आलेख होने के बावजूद पुस्तक बिखरी हुई नहीं लगती। प्रत्येक आलेख एक बड़े व्यक्तित्व-चित्र का हिस्सा बनकर सामने आता है। पाठक चाहे किसी भी अध्याय से पढ़ना आरम्भ करे, वह अंततः नरेंद्र मोदी के जीवन और नेतृत्व की एक समग्र तस्वीर तक पहुँचता है।
लेखक का दृष्टिकोण स्पष्टतः सकारात्मक और प्रेरणात्मक है। वे मोदी को केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे नेता के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसने साधारण पृष्ठभूमि से उठकर असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं। इस कारण कई स्थानों पर पुस्तक जीवनी से अधिक प्रेरक साहित्य का रूप धारण करती दिखाई देती है। यद्यपि आलोचनात्मक विमर्श की अपेक्षा रखने वाले पाठकों को कुछ प्रश्न अनुत्तरित लग सकते हैं, फिर भी पुस्तक का घोषित उद्देश्य किसी राजनीतिक बहस को खड़ा करना नहीं, बल्कि एक नेतृत्व-यात्रा का दस्तावेज़ प्रस्तुत करना है।

सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि लेखक ने सूचनाओं को केवल संकलित नहीं किया है, बल्कि उन्हें साहित्यिक संवेदना और सहज भाषा के माध्यम से पाठक तक पहुँचाया है। यही कारण है कि पुस्तक तथ्य और भाव, दोनों के स्तर पर अपनी पठनीयता बनाए रखती है। नरेंद्र मोदी के संबंध में इतनी एकीकृत और व्यवस्थित सामग्री संभवतः अन्यत्र दुर्लभ है, और यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।

एक पाठक के रूप में पुस्तक को पढ़ते हुए यह अनुभव अवश्य होता है कि इसकी भाषा को और अधिक रोचक, संवादधर्मी तथा प्रवाहपूर्ण बनाया जा सकता था। लेखक का उद्देश्य स्पष्ट रूप से तथ्यों और सूचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना रहा है, किंतु इसी कारण कई स्थानों पर भाषा अत्यधिक अकादमिक और विवरणप्रधान हो जाती है। परिणामस्वरूप सामान्य पाठक, जो किसी जीवनी या संस्मरणात्मक शैली की अपेक्षा लेकर पुस्तक के पास आता है, उसे कुछ अध्याय अपेक्षाकृत बोझिल अथवा नीरस प्रतीत हो सकते हैं। हालाँकि, इस पक्ष को पुस्तक की सीमा कहने के साथ-साथ उसकी विशेषता भी माना जा सकता है। लेखक ने रोचकता की अपेक्षा प्रामाणिकता और सूचना-संपन्नता को अधिक महत्व दिया है। यही कारण है कि पुस्तक भावनात्मक आख्यान की बजाय एक संदर्भग्रंथ और दस्तावेज़ का स्वरूप ग्रहण करती है।

इसलिए यदि कोई पाठक केवल साहित्यिक आनंद या कथा-सुख की अपेक्षा से इस पुस्तक को पढ़ना चाहता है, तो संभव है कि उसे कुछ निराशा हो। लेकिन यदि उसकी रुचि भारतीय राजनीति, समकालीन भारत, नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और कृतित्व अथवा इन विषयों पर गंभीर अध्ययन और शोध में है, तो यह पुस्तक उसके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। वस्तुतः नरेंद्र मोदी से संबंधित विविध सूचनाओं, विचारों, भाषणों और संदर्भों को एक ही स्थान पर संकलित करने के कारण यह पुस्तक शोधार्थियों, राजनीतिक अध्येताओं और गंभीर पाठकों के लिए एक अनिवार्य संदर्भ-दस्तावेज़ के रूप में देखी जा सकती है।

दरअसल The Leader Narendra D. Modi केवल एक नेता की जीवनी नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने का प्रयास है जिसने इक्कीसवीं सदी के भारत की दिशा और विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है। चंद्रमणि झा की यह कृति अपने विषय की व्यापकता, सामग्री की समृद्धि और दस्तावेज़ी महत्व के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

इस पुस्तक की एक और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि इसकी सहज उपलब्धता है। आज के समय में किसी पुस्तक का अच्छा होना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक उसका पाठकों तक पहुँचना भी है। प्रसन्नता की बात है कि The Leader Narendra D. Modi अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल तथा गूगल बुक्स जैसे प्रमुख मंचों पर उपलब्ध है। दुर्भाग्यवश मैथिली के अधिकांश लेखक और प्रकाशक अपनी पुस्तकों के वितरण और विपणन को इस स्तर तक नहीं पहुँचा पाते हैं। इस दृष्टि से भी यह पुस्तक एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

एक मैथिल पाठक के रूप में, और विशेषकर लेखक के साहित्यिक अवदान से परिचित होने के कारण, इस पुस्तक को देखकर मुझे एक स्वाभाविक गर्व-बोध होता है। मैथिली गीत-साहित्य के शिखर पुरुषों में गिने जाने वाले आदरणीय चंद्रमणि झा जी का इस प्रकार राष्ट्रीय स्तर के विषय पर अंग्रेज़ी में एक सुव्यवस्थित और व्यापक पुस्तक प्रस्तुत करना न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि मैथिली समाज और साहित्य-जगत के लिए भी गौरव का विषय है।

पुस्तक के साथ एक अप्रत्याशित किंतु महत्त्वपूर्ण लाभ यह भी जुड़ा हुआ है कि इसके बहाने पाठक स्वयं लेखक से परिचित हो पाता है। पुस्तक में चंद्रमणि झा जी का परिचय विस्तार से दिया गया है, जिसे पढ़ते हुए उनके साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान की व्यापकता का अनुमान होता है।

समग्रतः The Leader Narendra D. Modi एक ऐसी कृति है जो अपने विषय, सामग्री और दस्तावेज़ी महत्त्व के कारण विशेष ध्यान आकर्षित करती है। इसमें कुछ सीमाएँ अवश्य हैं, किंतु इसकी उपलब्धियाँ उन सीमाओं से कहीं अधिक बड़ी हैं। यह पुस्तक नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व और विचारों को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए उपयोगी है ही, साथ ही यह इस बात का भी प्रमाण है कि एक संवेदनशील साहित्यकार अपने समय के ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति पर गंभीर और श्रमसाध्य कार्य कर सकता है जो साहित्य से ईतर है... राजनीति, खेल, सिनेमा आदि आदि.

अंत में आदरणीय चंद्रमणि झा जी को इस महत्त्वपूर्ण कृति के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ। मेरी कामना है कि यह पुस्तक देश-विदेश के अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचे, पढ़ी जाए, चर्चा में आए और अपने उद्देश्य की सार्थकता सिद्ध करे। साथ ही, यह कृति मैथिली समाज को भी प्रेरित करे कि उसकी साहित्यिक प्रतिभाएँ क्षेत्रीय सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान स्थापित करें।

Praveen Kumar
समीक्षक
पाठकों के लिए बोनस
695 रुपये मूल्य की यह पुस्तक फ़िलहाल अमेजन पर 521 रुपये में उपलब्ध है . 

Sunday, 24 May 2026

दादा जी और तीन पीढ़ियों का मल्लाह-ब्राह्मण संबंध


बात १९८०-८२ के आस पास की होगी। हमारा तीन दादा जी का संयुक्त परिवार था। फ़िल्मों में दिखने वाली हवेली सा आँगन था हमारा। तीन दिशाओं में बना घर, उत्तर दिशा में खुली सी बाड़ी और बीच में बड़ा सा आँगन। आँगन तक़रीबन ६०x८० फीट का जहाँ उसके पश्चिम में एक सार्वजनिक चूल्हा था और उत्तर दिशा में माछ बनाने का अलग चूल्हा। कुल ९ कमरे, एक लगभग स्टोर और एक पूजा का कमरा। आजकल हमारे सिमटते स्क्वायर फीट के घर में हम एक छोटे मंदिर को स्थान देते हैं, उस वक़्त पूर्व दिशा में एक बड़ा कमरा मंदिर-घर था जहाँ धर्मराज-बाबा विराजमान थे।

छोटी दादी जल्दी विधवा हो गई थी, उनका घर पश्चिम-दक्षिण कोने में था। मुझे याद है उनके कमरे में एक छोटा पलंग और एक बक्शा हुआ करता था। वो कभी कभार कुछ बोलती थीं लेकिन कभी उनके मुख से कोई दुःख या नकारात्मक बात नहीं सुनी मैंने। मेरी दादी सबसे बड़ी बहू थीं। उनका कमरा दक्षिण के दुहार पर था। कमरे के बाहर संदूक, उसमें कुछ किताबें, बर्तन और सुजनियाँ (कपड़ों के तह की सिलाई से बना बिस्तर)। मुझे याद है १९८८ के भूकम्प के समय मैं उसी संदूक पर सोया था। जो बीच वाली दादी थीं उनका कमरा पूर्वोत्तर कोने में था। वो सबों में सबसे अधिक मुखर थीं।

तीन दादा जी में सब कुछ बिना किसी अनुबंध, कागज़ी कारवाई और स्वार्थ के तय था। शायद किसी ने किसी से कुछ कहा भी ना हो कि उसे क्या करना है... छोटे दादा जी खेती बाड़ी देखते, मँझले कलकत्ता शहर से कमाई लाते और बड़े यानी मेरे दादा जी समाज संभालते। सबके अलग विभाग, किसी किसी के काम में कोई दखल नहीं, किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं। जो भी कमाई होती, सबके लिए एक समान और सबका सब पर बराबर हक।

यहाँ मैंने मेरे दादा के बारे में "समाज देखते थे" लिखा है जिसे थोड़ा स्पष्ट करना आवश्यक है। उस वक़्त घर से थोड़ी दूरी पर दलान हुआ करता था। जहाँ घर के पुरुष रहा करते, खेती बाड़ी समाज और आयोजन आदि के लिए दलान था। यदि आँगन से किसी महिला के लिए दलान पर किसी को कोई सूचना भेजनी होती तो घर के बच्चे संदेश वाहक का काम करते। अहले सुबह फुल तोड़ने और गांव के पोखर में नहाने जाते वक़्त के आलावा ऐसा कम ही होता जब स्त्रियाँ दलान पर दिखतीं। दलान पर मेरे दादा जी का अपना एक संदूक और एक चौकी थी। पहले एक दूध पेड़ने की मशीन भी उस दलान पर हुआ करती थी जिसके विभागाध्यक्ष मेरे दादा जी ही थे। दूर गांव के लोग दूध लेकर आते और क्रीम निकाला जाता। बदले में कोई अनाज तो कोई क्रीम का हिस्सा दे जाता। ऐसे में दादा जी के पहचान की चौहद्दी बड़ी थी। अपने गाँव से १८-२० कोस दूर तक के गाँव उनको "पंचायती" के लिए बुलाया जाता। एक एक गाँव के लोगों के नाम और खानदान का ब्योरा उनके पास होता। शादी-विवाह उनके रिकमेंडेशन से हुआ करता और किसी भी नैयायिक मामले में उनका कहा पत्थर की लकीर समान होती।

मेरे मंझले दादा जी कलकत्ता में रहते। कहते हैं उनका वहाँ एक कमरा भी था जिसे उन्होंने अपने संन्यास के समय किसी रिश्तेदार को दान कर दिया था। उनकी शादी गांव से तक़रीबन ६ कोस दूर के गाँव नन्द जी के यहाँ हुई थी। नंद जी आस पास के इलाके में यात्रियों को अपने यहां रखने को लेकर मशहूर थे। उस वक़्त मोटर तो क्या, सायकल तक नहीं थी इलाके में। ऐसे में लोग कटही गाड़ी या फिर हाथी से चलते, समय अधिक लगता तो बीच गाँव में रुक जाते। ऐसे ही रुकाव के स्थान के लिए नंद जी का घर प्रसिद्ध था। कभी इस बात पर विवाद नहीं हुआ कि मेहमान १० हैं या १५ और ना ही इस पर सवाल हुआ कि इस समय में इतने लोगों का भोजन कौन बनाएगा। नंद जी की भतीजी मेरे मंझले बाबा की पत्नी... इसी जबान देने के क्रम में मेरे पिता की पत्नी नंद जी की पोती और फिर नंद जी के पुत्र यानी मेरे नाना द्वारा एक ब्राह्मण को जबान दिए जाने के वजह से मैं भी उसी गाँव का जमाई !

वापस दादा जी पर आते हुए - दादा जी का संदूक भानुमति का पिटारा था। उसमें हर वक़्त खाने का कोई ना कोई सामान मौजूद होता। लड्डू, खाजा, चूड़ा, दही, गुड़, कोई सिजनल फल... कुछ ना कुछ होता ही उसमें। दादा जी का रूटीन था सुबह चार बजे उठकर चार कोस घूमने का। वापस आते, शरीर में सरसों तेल पचाते, नहाते और आँगन जाकर बैठ जाते। दादी का काम था कुछ मिनट के अंदर उनके पास खाना लाना। दादा जी, दो-चार मिनट से अधिक आँगन में इंतज़ार नहीं करते। उनके पास संदूक और उसमें पड़ा खाना तो था ही।

कहते हैं दादा जी छाल्ही-रोटी (क्रीम और रोटी) मात्र खाते। कई बार अहले सुबह कहीं कोई पंचायती को जाते और देर शाम वापस आते तो छाल्ही-रोटी कहीं उनका इंतज़ार कर रहा होता। संभवतः यही वजह हो, मेरी दादी मुझे भी यही खिलाने के प्रयास में रहती और अपने मधुर मुस्कान के साथ अपने हाथ से मुँह में खिलाने के की वजह से वो अपने प्रयास में सफल भी होतीं।

मेरे पिता की शादी जिस उमाकांतबाबू जी की पुत्री से हुई वो मिथिलांचल में पहले दौर के संघी थे। आज के सारे विधायक-सांसद-मंत्री उनसे आशीर्वाद पा चुके थे। उनका दहेज, गहना आदि से कोई वास्ता नहीं, उनके समय वो अपनी खेती की उपज को संघ में लगाते... अब माँ ससुराल गईं तो उन्होंने उस वक़्त (संभवतः १९७१-७२ में) उनके साथ अपने मज़दूर का एक परिवार उनके साथ भेज दिया ताकि माँ और परिवार की सेवा सुश्रुषा हो सके। इसी "मुखिया" परिवार का काम था नाना जी और दादा जी के परिवार के बीच का संबंध क़ायम रखना। वो संवाद पहुचाता, सामान, पथ-परहेज, मौसमी फल-फ़सल और कभी कभी मछली भी पहुँचाता।

आज उस सम्बन्ध की तीसरी पीढ़ी हैं हम लोग। 'मुखिया' परिवार गांव में अब भी मेरे खेत-खलिहान की देखभाल करता है और उनके दो बेटे मुंबई में हैं। जो तस्वीर आप देख रहे वो उनके ही छोटे बेटे की है जो मुंबई में अपनी टैक्सी चलाता है। मैंने उसे भैया कहने को कहा है लेकिन वो अक्सर मुझे 'गिरहत' कहता है और मेरे हर एक स्थानीय यात्रा में मेरा सारथी भी बना होता है।

ये पिछले सोमवार सुबह लगभग पाँच बजे की बात है जब "मिथिलेश मुखिया" मुझे कह रहा था - "दो बच्चा है, एक स्कूल जाता है, टैक्सी चलाता हूँ तो टीवी नहीं देख पाता हाँ, यूट्यूब पर वीडियो देखता हूँ कुछ जिसमें एक 'अजीत भारती' है जो उसे बहुत पसंद है, बहुत अच्छा बोलता है..." - मैंने उसे अजीत के साथ की अपनी तस्वीर दिखायी तो उसके सवाल थे - "कहाँ का है... अच्छा फिर तो मैथिली बोलता होगा.... मेरा बात करवा दीजिएगा कभी, मैं चार साल से सुनता हूँ इनको...." #क्रमशः



Friday, 9 January 2026

विजया महिमा - अमरनाथ कक्का केर एक गोट संस्मरण

अमरनाथ कक्का 

ई बड़ पुरान गप थिक, जहिया बैठारिये रही। सरिसब-पाहीक सटले गाम छै हाटी। एक गो मित्रक घर ओतहि हुनक गाममे नाच-तमाशा होइ छलै। गुलाबी ठंढक समय रहै। हुनकहि आमंत्रण पर ओतए जयबाक नेआर-भास भेलै। बेरूपहर जयबाक प्रोग्राम बनल। तीन मित्र, मुदा साइकिल दुइएटा। तेँ, एक मित्र कैरिअर पर असबार भेल बिदा भेलहुं। बाटमे सरिसबमे एक मित्र आओर सङ्ग भेलाह आब चारि पुरलहुं।

हाटी पहुंचला पर नेआर भेलै जे पहिने विजया सेवन हो, तखन किछु जलपान तखन नाच देखबाक बदान। पाँच मित्र एकसङ्ग एकत्रित भेल रही तेँ भरिपोख हँसी-मजाक आ गप्प-सड़ाकाक धार बहए लगलै। विजयाक प्रभावक जिज्ञासा कयल जाए लगलै आयोजक द्वारा। व्यवस्थाक साफल्य प्रभाव घरवारी केँ बड़ संतोख दै छै, असीम आनंदानूभूति होइ छै। तेँ, ई जिज्ञासा। 


- की रौ ? - घरबारीक प्रश्न

-- भनकीयो नञि - दोसरक उत्तर

- आ तोरा ?

-- रमकी बुझाइए

- उमकी नै ने ?

-- नञि, तते नञि 

- तखन आब चलै चलs। 

                 

भांग के प्रकाश आ ध्वनि बैरी। आयोजन स्थल पर लाउड स्पीकरक ध्वनि आ प्रकाश सँ जगमग, एनामे एक गोटाक पग डगमग होइत अ'ढ़-घात मे कात जा बैसल। आँखि मुनने। तौनी सँ मुंह झँपने, घार खसौने। अरौब्बा ! की भ' गेलै !


ओह, ई तS भनकी, रमकी सँ बढ़ि कए सनकी भ' गैल। अस्तु, साध्ये की ? के देखैए नाच तमेशा एहिठाँ त' तेसरे रङताल। हारि-दाड़ि मित्र के साइकिल पर लादि कोहुना सरिसब धरि आनल। ताबत एकटा बस अयलै। कंडक्टर के ऐ अनुरोधक सङ्ग जे हिनक मोन खराप भ' गेलनिएं, पैटघाट उतारि देबन्हि, ओइ मित्र केँ बसमे चढाय बिदा कयल, आ शेष दुनू मित्र साइकिल सँ घर घुमलहुं। अनठा-पनठा, बहन्ना बनबैत सुति रहलहुं।


परात भेलै। ओइ मित्रक माय खरोस मे अयली, अपन बेटाक मादें। हम दुनू गुम्म चिंतासँ जे कत' चल गेलै आ ड'र सँ जे की जबाब देबै। फूसि बजैक ताबत् ओतेक प्रैक्टिस नै रहय, अभ्यस्तो नञि रही, मुदा ओकर प्रारंभिक डेग बहन्ना, से बनबैक कोशिश मे कहलियै - "ओकर सार भेटल रहै नै मानने हेतै, अपना ज'रें ल' गेल हेतै। आबिए जाएत" - ई कहि कोनहुना हुनका टारि विजयबोधक अनुभव कयल। मुदा, हाय रे कपार ! घंटे-दू घंटाक फेर अयली। “कत' बौआ के छोड़ि देलियै अहाँ सभ। हम छोटका केँ पठौने रहियै ओकर सासुर। ओत' कहाँ गेलैए ?" 


आब त' शोनिते सुखा गेल। मित्रक चिंता फराके, आ हुनक आशंका, चिंता, भय लोकक निन्न हरण क' दैछै। आशंका नाना प्रकारक शंका उपजबैए। चिंता चित्त चंचल क' दैए। भयातुर लोक सदति चौंकले रहैए। एहेन परिस्थिति मे लोक सुतबाक उपक्रम मे आँखि मूनि त' लैए, मुदा निसभेर हएब असम्भव।

                             

ओइ मित्रक पछिला विजयापानानुभव आओरो विचलित क' देने रहय। अपना पर क्षोभ सेहो रहय, जे ओकरा एकसर किए आब' देलियै। एक गोटा अपन साइकिल कतहु गर लगाय सङ्ग भs' गेल रहितियै त' एना नै ने होइतइ। तखन की बूझल रहय ओकरा भांग नै पचै छै, ओकरा रोकलियै ने किए, मना किए ने केलियै... आदि आदि आशंका।

                       

आगां के खिस्सा सौं पहिने क्षेपक मे पछिला इतिवृत्ति कहि दी।पहिने सी एम कॉलेज, दरभंगा (ध्यान रहय, ताबत् तीन भागमे नञि बँटायल रहै, हँ ब्लॉक अलग अलग कहबै) मे उच्चाङ्क सँ द्वितीयश्रेणीमे उत्तीर्ण परीक्षार्थी के बाइलोजी मे नामाङ्कन भ' जाइ आ मारबाड़ी कॉलेज (सम्प्रति भारती-मण्डन कॉलेज) मे तृतीयो श्रेणी बलाकेँ। बेसी छात्र सएह पढ' चाहय। अभिभावकोक सएह अभिलाषा ।अस्तु, ई विषयांतर बात। हमर ओ मित्र मेधावी रहथि। मेडिकल कॉलेज मे प्रवेश लेल प्रतियोगिताक पहिल आयोजन भेल रहै, जै मे ओहो शामिल भेल रहथि।


एहिना एकदिन कोनो बहन्ने विजियायोजनक बाद टहलैले पैटघाट गेल रहथि। तहिया ओइ परिसरक लोकलेल पैटघाट एकमात्र जुटानी स्थल रहैक।ओतहि अकस्मात् अखबार पर नजरि पड़लनि, उनटा के नंबर देखलखिन। आनंदातिरेक मे उछलि गेलाह। सभके् खुशखबरि सुनाय, एक मटकूरी रसगुल्लाक सङ्ग श्रद्धेय मास्टर साहेब (हमरालोकनिक विद्यालयक पूर्व प्रधानाध्यापक) केँ गोड़लागि हुनक आशीष, बधाइ पौलनि। सौंसे परोपट्टा अनघोल भ' गेलैक। लोकक करमान लागि गेलनि हुनक दलान पर भोरे सँ। मुदा अपने ई निसभेर सूतल। जखन दिन चढ़लै, निन टुटलन्हि। हिनका किछु मोने ने रहनि। मुदा, लोकसभ जखन मोन पाड़य लगलनि तँ दौगल गेला पैटघाट। ओइ अखबार पर फेर ध्यान देलनि। मुदा आहिरेबा ! ई तँ लॉटरी रिजल्टक नंबर सभ रहै, जेकरा विजयाप्रभावात् मेडिकल रिजल्ट बूझि नेने रहथि। फल मे फल इएह जे किछुदिन कंछी काट' पड़लनि।

             

तेँ, विशेष चिंता, क्षोभ त' रहबे करय, काल्हि हिनक मायक सामना कोना करब, अभिभावक बुझताह त' फज्झैतासव, रेबाड़बटी आ कनैठीमायसिनक ड'र फराक।तेँ, परात लेल अपनाकेँ दृढ़ करबाक प्रयासक तानी-भरनी मे ओझरायल राति गमाओ।

                      

“होइहें सोइ जो राम रचि राखा" आ "जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो गई"। भेबो केलै सएह। पराते मातर हुनक माय जूमि गेलीह। फेर वएह जिज्ञासा मुदा उलहन उपरागक सङ्ग। काँट गड़ै छै त' काँटे सँ बहार कयलजाइ छै। एक फूसिके झँपै लेल दोसर फूसिक सहारा लेब' पड़ै छै। कहलिअनि "अन्हार रहै, रस्तो गड़बड़ छै। ओ अपनहि कहलनि अहाँ सभ साइकिल सँ जाउ, हम सरिसब मे बस ध' लैत छी। हमहु लोकनि एही छगुंता मे छी आखिर ओ कतय गेला"। आनो आनो लोक बाजय लगलै "कोनो नेना-बालक तS' छै नै। देखियौ कनीकाल। आबिए जेतै"।

                        

सएह भेलै। दसबजेक लगभग कोलाहल भेलै जे ओ आबि गेलै। भरिटोल अनघोल, दलान पर करमान लागल। लोक पूछै, मुदा ओ किछु बजबे नै करै। हमरा सभ केँ साधन्से नै जे ओकर दलान पर जाइ। सोचल, एकान्त मे सविस्तर बूझि लेब। ताबत् थम्ह्ह हे मोन...


उत्कंठा मनुखक चैन हरण क' लै छै। छटपटी मे कहुना दिन बितबैत रही, जे साँझमे एकान्त भेंट हएत त' सवित्सर जनतब लेब। से जतबा छटपटी हमरा दुनू केँ, ततबए हुनको जिनका विजयापानक दिव्यानुभव भेल रहनि। ओहो व्यग्र रहथि अपन अनुभूति कथा बिलहैले। हुनकर उत्कंठा किछु बेसिए तीव्र रहनि।

                     

गोधूलि बेर रहै, मुखांध नहिं भेल रहै। ताबत देखल ओ मुस्कियाइत, स्मित हासें झटकल आबि रहलाहे, हमरे सभक आवास दिशि। काल्हि सँ दाबल जिज्ञासा एकाएक मुखर भ' उठल। समवेते स्वरमे पुछलियनि " की भ' गेल रहय?"


आब हुनकहि मूंहें सूनल जाय - “अहाँ सभ सरिसब मे हमरा बस पर चढ़ाय देलहुं ।हमर हालति की रहय, से अपनहुं नञि बुझलियै। तौनी ओढ़ि घसमोरि जे बैसलहुं से लगैए सुतागेल। जखन अरड़िया संग्राम पहुंचलहुं, चाँकि भेल। कंडक्टर ओतहि उतारि देलक। अन्हरिया राति, अनचिन्हार जगह, केओ सरोसम्बंधी नहि, कत्त जाउ ? ताबत् एकटा छोटछिन असोरा पर नजरिगेल जै पर एकटा अखरा चौकी धयल रहै। तौनी रहबे करय, ओढ़ि, घसमोड़ि पड़ि रहलहुं। विजया सवारे रहथि तत्काल आँखि लागि गेल।

                      

कतू रातिमे, जखन जाड़ पछारलक, निन्न उचटि गेल। एक मोन हुअए घरवारी केँ उठबिअनि आ एकटा अतिरिक्त ओढ़ना माँगि लिअनि। मुदा अपरिचित जगह, अनचिन्हार लोक, निशाभाग राति, साधंस नहिं भेल। अस्तु, बैसले बैसल परात होइक प्रतीक्षा करबे समीचीन बुझायल। जतs चौकी पर बैसल रही, ठीक ऊपर एकटा जंगला (छोटसन खिड़की) रहै, दुपटिया। पट्टा भिरकाएल रहै। मुदा, तरका ऊपर आ उपरका त'र, तेँ गवाक्ष बनल रहय। अंदर सँ ढिबरीक मद्धिम प्रकाश मे, बुझना गेल जे दू व्यक्ति कम्बल मे लटपटाएल सूतल छै। कम्बलक त'रमे किछु उकस-पाकसक आ हलचलक भान भेल। एहना परिस्थिति मे निन्नक सभ सम्भावना समाप्त।


कोनहुना परात कयल आ पहिले घुड़ती बस सँ आपस अयलहुं।"...अपन आपबीती सुनबैत कहलनि "हे आब कान मोचरै छी। फेर नाढ़ो बेल त'र !"

                        

आइ उपरोक्त पाँचो मित्र अपन-अपन जीबन मे पोता-पोती, नाति-नातिन सङ्ग आनंदमय जीवन जीबि रहल छी। सभ "सर", "अर" भs यशस्वी जीवन बितौलन्हि, हमहींटा "टर"रहि गेलहुं। चारि मित्र हमरा सङ मुखपोथियो सँ जुड़ल छथि। मुदा, भुक्तभोगी मित्रक नाम नहि लेब, किन्नहु ने.... :) 

Saturday, 27 December 2025

मिथिला मैथिली पर पाँच बातें

परसों शाम किसी कार्य में लगा था जो लगभग मध्यरात्रि में जाकर समाप्त हुआ। संबंधित दो व्यक्ति को मैसेज किया की इसपर बात हो, स्वाभाविक रूप से वो सो चुके थे। मैंने सुबह तक़रीबन चार बजे उन्हें फिर से मैसेज किया, माय बैड लक की वो बेचारे मेरी तरह अनिद्रा के शिकार नहीं थे, सो रहे थे। फिर मैं भी रूटीन काम की तैयारी में लग गया। 

दरअसल मैंने एक आर्टिकल लिखा था जिसे किसी पुस्तक में छपना था। पुस्तक मैथिली और अंग्रेजी में थी सो मुझे मैथिली में लिखने को कहा गया था। तथ्यात्मक दृष्टिकोण से सहमति के लिए अपना हिंदी लिखा हुआ ही पहले भेज दिया मैंने। इस उम्मीद से की यदि ये ठीक कहा समझा गया तो इसका मैथिली अनुवाद कर दूँगा मैं। 

सुबह तक़रीबन ०९ बजे के क़रीब एक महोदय का फ़ोन आया। उन्होंने कहा - “अरे ये तो ग़ज़ब लिखा आपने, मस्त है ये। न मसाला कम ना ज़्यादा। बिल्कुल बैलेंस्ड किंतु असरदार। मैं आग्रह करूँगा कि आप इसे हिंदी में ही रहने दें। मैथिली करके इसकी मारक क्षमता कम हो जायेगी।” - मैंने पहले तो सवाल किया की क्या मैथिली भाषा को असरदार नहीं मानते आप ? … और फिर मजाक में उनसे ये भी कहा - “आप क्यों चाहेंगे कि मैथिली में लिखूँ और नाम हो मेरा…” 

इस पर भाई संजीदा हो गए। बोले - “कई वर्षों से वार्षिक पत्रिका का संपादन कर रहा हूँ। भरसक पढ़ता भी हूँ मैथिली किताबें, कवि गोष्ठी और विद्यापति नाइट्स वग़ैरा में भी जाता हूँ, मुझे पता है मैथिली भाषा की औक़ात। खासकर तब जबकि आप सोशल मीडिया से हट कर किसी पुस्तक में लिखो। आप अकादमीक भाषा लिखो।” 

मैं गंभीर होकर सुनने लगा उनको और भाई बोलते रहे - “आप जब हिंदी लिखते हो तो आप उसमें अंग्रेजी, उर्दू, फ़ारसी, मैथिली, भोजपुरी… सबका समावेश करते हो। इससे लोक भाषा बनती है, लोकप्रिय शब्दों से लोग कनेक्ट करते हैं, आप मैथिली में ऐसा करके देखो ना, झंडाबरदार आपको भाषा, व्याकरण से लेकर विद्यापति तक की मार से आपका थोबड़ा सूजा देंगे…” - मैंने दफ्तर की बात कहके भाई को कहा - “देखिए ब्रो, थोबड़ा तो वैसे भी सूजेगा मेरा जब मैथिली किताब में हिंदी आलेख होगा… आप देख लीजिए कैसे सुजाना है।” 

दूसरी घटना - जैसा की मैं यूँ ही #अलरबलर लिखता हूँ, एक पोस्ट लिख दिया जिसमें लोगों के द्वारा साल भर में पुस्तक पढ़ने की बात पूछी थी। जवाब देने वाले सभी मैथिल लोग थे और आप जाकर उस पोस्ट पर देख लीजिए की उनके द्वारा पढ़े किताबों की लिस्ट में से एक-दो किताब को छोड़कर बांकी सभी पचास के करीब किताबें या तो हिंदी की हैं या फिर अंग्रेजी की। अब आप देख समझ लीजिए की मैथिल मैथिली को कितना पढ़ रहा है। कुछ ऐसे लोग जो मैथिली भाषा साहित्य के झंडाबरदार बने हैं और खुद की बादशाहत क़ायम रखना चाहते हैं उनको यह सब नहीं दिखता है, वो आँख बंद करके सब कुछ हरा-हरा देखते हैं। यदि आपने नया प्रयोग किया तो वो अपनी झूठी शान क़ायम रखने के दवाब में आपका थोबड़ा सूजा देंगे… 

तीसरी बात - अभी पटना की मैथिली अकादमी बंद कर दी गई। मेरे जैसे कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कूथ-पाद कर अपनी जिम्मेवारी की इतिश्री कर ली। हालांकि इससे फैले बदबू पर कुछेक संस्थाओं ने जहाँ अब धरना करने का विचार किया है वहीं कुछ लोग सरकार द्वारा सभी भाषा के अकादमी का पुनर्गठन होने की बात कर रहे हैं। अब जबकि सरकार ने अकादमियों के पुनर्गठन की घोषणा कुछेक साल पहले ही की थी और अकादमी के बंदी पर सबसे कारगर कार्य हाई कोर्ट में सरकार के ख़िलाफ़ याचिका देने का या फिर किसी सरकारी आदमी को काला झंडा आदि दिखाने का होता…. मैथिलों के इन नौटंकियों को देखकर दया आती है मुझे। 

तक़रीबन पंद्रह-बीस साल पहले कार्यस्थल पर एक मित्र ने मुझे एक कविता सुनाई थी - “काम से डरो नहीं, काम को करो नहीं… काम का फ़िक्र करो या ना करो, फ़िक्र का ज़िक्र ज़रूर करो…” यही हाल पटना के मैथिल संस्थाओं की है। उन्हें समाज को विरोध करते भी दिखना है और सरकार अनुदानित संस्था के पद पर कायम भी रहना है…” बेचारे !

चौथी बात - जैसा की मैं पहले कह चुका हूँ, विद्यापति जी को जाड़ा नहीं लगता सो जाड़े के मौसम में जहाँ तहाँ विद्यापति नाइट्स का आयोजन होता है। हालाँकि अब लोग नाम बदल बदल आयोजन कर रहे हैं किंतु नौटंकी वही है। मंच, पाग-डोपटा, बेमतलब के विषयों पर संगोष्ठी, फोटो सेशन… बस। किसी भी ऐसे आयोजन में आपने देखा की सरकाआर के ख़िलाफ़ या अकादमी के समर्थन में कोई एक शब्द बोल दे, कोई सेशन / सत्र इसके ख़िलाफ़ योजना बनाने को ह रख दें… नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि उनका मुख्य अतिथि ही उस सरकार से संबद्ध होता है जिसने अकादमी बंद किया है। 

आपके लिट फेस्ट या फिर अन्यान्य महोत्सवों की चर्चाओं में अनेक एक्शन पॉइंट बनते हैं। कभी किस को उसपर दुबारा बात करते, फॉलो अप लेते देखा आपने ? क्या नफा हुआ है सिवाय लोगों के मिलने जुलने, ब्यूटी पार्लर और कुर्ता बंडी पर खर्च करने के ? 

पाँचवी बात - आज फिर से ललित झा अपने चैनल मिथिला मिरर को लेकर मैथिल भाइयों को इमोशनल करते हुए कह रहे हैं - “मुझे मत बचाइए… आप तय करिए कि मैथिली के लिए कम करते मिथिला मिहिर को बचाना है या नहीं…?” - मैंने उनके लाइव सत्र में कमेंट किया भी की मुझे मिथिला मिरर से कोई मतलब नहीं, हाँ, ललित झा से मतलब है सो आपको कोई मदद चाहिए तो कहें, हम करेंगे। दरअसल सच यही है, आपके मैथिली से कोई लेना देना नहीं है मिथिला को, और यह बात मैंने अनुज ललित को संभवत: पाँच-छह साल पहले कही थी। हिंदी में काम करने को कहा था… अपना कैरीअर संवारने को कहा था…मैथिल और मिथिला ना तो रोटी देता है और नहीं ही मैथिली भाषा साहित्य को इन लोगों ने समृद्ध होने दिया कि इसमें व्यावसायिकता आए… मान लो इस बात को ! 

तो भाइयों शुरू हो जायें… टोटके करें मुझ पर… बाण चलायें मुझ पर…ज्ञान वर्षा करें मुझे पर, वो ज्ञान जिसको लेकर आप कुछ उखाड़ नहीं पा रहे। मेरा क्या हैं, इतना झेल चुका हूँ, थोड़ा और झेल लूँगा…

#मिथिला #मैथिली


Sunday, 21 December 2025

एलियट साहब - मद्रास और दरभंगा

अभी पिछले दिनों जब मद्रास में था तो ड्राइवर ने कहा - “ये एलियट बीच है सार (सर)” - उस वक्त मानसिक व्यस्तता की वजह से मैंने ध्यान नहीं दिया। आजकल अनिंद्रा से पीड़ित हूँ सो सुबह तीन बजे इस Edward Francis Elliot जी की पड़ताल करने लगा। वो उन्नीसवीं सदी में पहले चीफ मजिस्ट्रेट और फिर बाद में सुपरिंटेंडेंट ऑफ़ पुलिस रह चुके थे मद्रास के। उनके पिता श्री ह्यू एलियट साहब १८१४ से १८२० के दौरान गवर्नर भी रह चुके थे मद्रास के।

अपने एलियट साहब अमीरज़ादे थे, पढ़े लिखे और बड़े आदमी भी। उनकी एक प्रेमिका हुई Isabella Napier जो संयोगवश Johnstone Napier की पत्नी भी थीं। करीब १९३० के वक्त यह हाई प्रोफाइल प्रेम प्रसंग बहुचर्चित रहा और अपने एलियट साहब ने इसाबेला के साथ विवाह करके इतिहास रच दिया। कहते हैं यह बीच उन्होंने इसाबेला के लिए बनवाया था।

जैसा की लोगों का आरोप है मैं हर बात में मिथिला और दरभंगा को खींच लाता हूँ, मेरा इलेक्ट्रॉनिक संजाल भी मुझ सा ही हो चुका है। इस पड़ताल के क्रम में मुझे एक दूसरे एलियट साहब का पता चला जो मिथिला अर्थात् दरभंगा से जुड़े हैं।

ये Elliot Macnotton साहब उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में भारतीय सिविल सेवा के ब्रिटिश अधिकारी हुए। इलियट साहब एक अच्छे प्रशासक, शिक्षाविद और मार्गदर्शक के रूप में जाने जाते थे, लाजिमी है ब्रिटिश साम्राज्य के करीबी भी रहे।

उसी काल खंड में दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह की आकस्मिक मृत्यु के उपरांत उनके उत्तराधिकारी बने श्रीमान लक्ष्मेश्वर सिंह। चूँकि लक्ष्मेश्वर सिंह जी उस वक्त अल्पवयस्क थे, उस वक्त के क़ानून के मुताबिक़ उनकी राजसत्ता कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स के अधीन कर दी गई। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत एक यूरोपीय संरक्षक और शिक्षक की नियुक्ति की जाती थी, संयोगवश इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिए एलियट मैकनॉटन को चुना गया।

संरक्षक और शिक्षक के रूप में एलियट मैकनॉटन का प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक रहा। वे युवराज के निकट रहते थे और उनकी शिक्षा, अनुशासन तथा नैतिक विकास की देखरेख भी करते थे। उनका दायित्व केवल औपचारिक शिक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि एक भावी शासक के व्यक्तित्व निर्माण तक विस्तृत था। लक्ष्मेश्वर सिंह को जहाँ अंग्रेज़ी शिक्षा, विधि, अर्थशास्त्र और आधुनिक प्रशासन की समझ दी गई वहीं उनके अंदर सार्वजनिक दायित्व और उत्तरदायी शासन की भावना भी विकसित की गई।

एलियट मैकनॉटन को अन्य औपनिवेशिक शिक्षकों से अलग करने वाली बात यह थी कि वे स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान रखते थे। एक अंग्रेजी प्रशासक के अधिकारी होने के बावजूद कभी भी उन्होंने मैथिली परंपराओं या संस्कृत अध्ययन को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया। उनके समय में पारंपरिक विद्वानों को युवराज को शिक्षा देने की अनुमति दी गई और पाश्चात्य शिक्षा के साथ-साथ देशज परंपराओं को भी संरक्षित रखा गया।

आधुनिक ज्ञान और सांस्कृतिक निरंतरता के इस संतुलन ने लक्ष्मेश्वर सिंह के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डाला। इस शिक्षण और मार्गदर्शन का प्रभाव तब स्पष्ट हुआ जब महाराजा ने दरभंगा राज का दायित्व संभाला। लक्ष्मेश्वर सिंह अपने समय के सबसे प्रगतिशील ज़मींदारों में गिने जाने लगे। वे अपनी उदार दानशीलता, शिक्षा के प्रति समर्थन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, अकाल राहत और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण के लिए व्यापक रूप से सम्मानित हुए। इतिहासकार मानते हैं कि उनकी सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण उनके निर्माणकाल में एलियट मैकनॉटन के सान्निध्य का ही परिणाम था।

सो ये थे एलियट साहब !

(तस्वीर एलियट इसाबेला बीच की है।)