काल्हि (शुक्र दिन, 04 सितंबर, 2026) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी छल आ ताहिपर भदवरिया अपन विकराल रूप सेहो देखा रहल छल। एहेन स्थितिमे लोककें प्रेक्षागृह धरि घीचिकें आनब ठीके बड़ मोसकिल छल। मुदा, एहि मोसकिल सन काजकें आसान बनओलनि श्री रौशन झा जी। हम बात कऽ रहल छी नई दिल्लीक मंडी हाउस स्थित श्री राम सेंटरमे सायं साढ़े छओ बजेसँ मंचित होमय वला मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर। नाटकक प्रति (करबाक नहि, मात्र देखबाक आ कहिओ काल खेलयबाक रुचि नेनपनसँ रहल अछि, तैं, फेसबुकपर भेटल हकारकें स्वीकारैत हमहूँ ससमय श्री राम सेंटरक प्रेक्षागृहमे पहुँचि गेलहुँ। प्रेक्षागृहमे प्रवेशोपरांत देखल जे सामने वला सीट सभपर एक टा दुपनियाँ बुकलेट राखल अछि। भेल जे ई सीट सभ आरक्षित ने हो तैं, पाछू वला सीट दिस बढ़लहुँ तँ देखल जे हमरासँ पहिनहि ई बुकलेट ओतहु विराजमान अछि। पछाति बुझबामे आयल जे उक्त बुकलेट प्रत्येक सीटपर दर्शक सभक अवलोकन हेतु राखल गेल अछि। ई देखि नीक लागल। एकर लाभ ई भेल जे नाटक संबंधी जानकारी लेल किनको तंग नहि करय पड़ल। सभ टा जानकारी चारि पृष्ठक ई दुपनियाँ बुकलेटमे समेटल छल। बुकलेटक पहिल पृष्ठपर एक टा क्यूआर कोड सेहो अंकित छल आ लिखल छल जे एहि कोड केर माध्यमसँ आर्थिक सहयोग कएल जा सकैछ।
अखन पूर्वनिर्धारित समयानुसार नाटकक मंचन होयबामे किछु मिनट शेष छल। एहि बीच श्री रौशन जी उद्घोषना केलनि जे समयक विकटता देखैत नाटकक मंचन सायं सात बजेसँ होयत कारण, बहुत गोटे ट्रैफिक जाममे फँसल छथि। एहि समयक सदुपयोग किछु परिचित लोकसभसँ भेंट-घांटमे कएल। आब समय लगभग पौने सात बाजि रहल छल। एकबेर पुनः रौशन जी सभसँ मुखातिब होइत सूचना देलनि जे उक्त नाटकक अवधि जे पहिने एक घंटा दस मिनट छल, आब बढ़िकऽ दू घंटा बीस मिनट भऽ गेल अछि। हुनका द्वारा ई सूचित करब जे उक्त नाटक एहिसँ पहिने भारतक अन्यान्य शहर सभमे दर्जन भरिसँ बेसी बेर मंचित भऽ चुकल अछि, हमर उत्कंठाकें बढ़बय वला छल। हम मोने-मोन खूब प्रसन्न भेलहुँ जे भने हम विस्तृत नाटकक मंचनक साक्षी बनब।
आब नाटकक मंचन आरंभ होमय वला छल, मुदा, ताहिसँ पहिने हालहिमे दिवंगत स्व. पं. कौशल झा जीक स्मृतिमे एक मिनट केर मौन राखि हुनका श्रद्धांजलि देबाक आह्वान कएल गेल। तदुपरांत, प्रेक्षागृहमे उपस्थित सभ गोटे ठाढ़भऽ दिवंगत आत्माक प्रति एक मिनट केर मौन राखि हुनका प्रति अपन श्रद्धांजलि अर्पित केलनि। एकबेर फेर पं. कौशल जीक संग बितायल किछु अविस्मरणीय पल जीवंत भऽ उठल आ आँखि डबाडबा गेल। जगत जननी जानकी हुनका अपन शरणागति प्रदान करथि !
ठीक छओ बाजिकऽ पचास मिनटपर चिरप्रतीक्षित मैथिली नाटक ’’बड़ मुश्किल छै’’ केर मंचन आरंभ भेल। मंचपर बरियातीक दुआरि लगबाक दृश्य उपस्थित छल आ संगहि डीजे पर भोजपुरी गीतक बोलपर थिरकैत धिया-पुता, युवा आ कनियाँ-बहुरिया। कहबाक प्रयोजन नहि जे डीजे पर कोन तरहक गीत बाजि रहल छल। एतय नाटकक मूल विषय बूझब आवश्यक अछि। नाटक आधारित अछि मिथिला क्षेत्रमे व्याप्त पलायन आओर मिथिलासँ बाहर भेल मैथिलक विवाह केर बाद उत्पन्न नाना तरहक विसंगति सभपर। नाटकक नायक समुन जे मैथिल छथि आ गामसँ पलायनक पश्चात दिल्लीमे रहैत छथि, हुनक विवाह (जेकि प्रेम-विवाह थिक), मिथिला क्षेत्रसँ बाहर होइत अछि। कन्यागतक ओहिठाम विधि-व्यवहारक अंतर एहि विसंगति दिस पहिलुके दृश्यसँ दृष्टिगोचर होमय लगैत अछि। खैर जे से, जेना-तेना मान-मनौव्वलक बाद विवाह संपन्न होइछ आ पहिल दृश्यक पटाक्षेप होइत अछि।
तदुपरांत, नगहर भरबाक मनोहारी दृश्य आ दुरागमनक पश्चात नवकनियाँ द्वारा सासुरमे निमाहल जाय वला नाना तरहक विधि-व्यवहार आ ताहिमे होमयवला विसंगतिक जीवंत मंचन, दर्शक-दीर्घामे उपस्थित समस्त दर्शककें गुदगुदा रहल छल। नहुँ-नहुँ नाटक अपन गति पकड़ैत अछि। आगूक दृश्य सभमे देखाओल जाइत अछि जे कोना एक टा परदेसी परिस्थितिवश गाममे रहय वला अपन माय-बापसँ दूर होइत चलि जाइत अछि। परिस्थितिक भयावहता तखन आओर झकझोरि दैत अछि जखन देखबामे अबैत अछि जे कोना एक टा लायक बेटा चाहिओकऽ माय-बापकें मुइलाक पछाति मुखाग्नि धरि नहि दऽ पबैत अछि। नाटकक संपूर्ण व्याख्या करब तँ संभव नहि, मुदा, एतबा कहल जा सकैछ जे ई पलायनक बाद समाजमे आएल नाना तरहक विसंगति दिस जोरदार ढ़ंगसँ सभकें आकृष्ट अवश्य करैत अछि।
आब अबैत छी नाटकक कलाकार दिस। हमरा तँ सभ कलाकारक अभिनय उत्कृष्ट लागल। खाहे नाटकक नायक, सुमन केर भूमिकामे श्री विजय झा होथि वा नायिका, गायत्रीक भूमिकामे सुश्री रचना दास। को बड़-छोट कहत अपराधू सन स्थिति अछि। दुनू गोटे अपन अभिनय-कौशलसँ बेस प्रभावित केलनि। नायकक माय, काकी केर कथे कोन। काकी केर भूमिकामे आदरणीया नीरा झा जीक अभिनय-कुशलताक वर्णन करब हमर बूतासँ बाहरक बात अछि। बुकलेटसँ ई जनतब भेटल जे नीरा जी दिल्लीमे सक्रिय मैथिल महिला कलाकारमे सभसँ बेसी अनुभवी छथि आ अखनि धरि सयसँ बेसी मैथिली नाटक आ फिल्ममे अपन अभिनयक छाप छोड़ि चुकल छथि आ से देखबोमे आयल। हुनक अभिनय वर्णनातीत अछि, देखनहि बनय।
हँ, एतबा अवश्य कहब जे भरि नाटकमे हमर आँखि दू बेर नोरा गेल आ से ई दुनू माय-बेटा दुआरे। गामक बहिनपा सभक उतरा-चौल, उकटा-पैंची आ कनफुसकीकें मंचपर जीवंत केलनि तीन टा स्त्रीक भूमिका निमाहनारि मिथिलाक तीन टा धिया सुश्री नेहा झा, आकांक्षा झा आ कल्पना। हिनका सभक त्रयी, दर्शकसभकें नाटकमे परिस्थितिजन्य उत्पन्न भेल अवसादसँ नहि मात्र निकालबामे सफल भेल, अपितु, सभकें ठहक्का लगबै लेल विवश कऽ देलक। हिनका सभक अभिनय-कौशल देखि ई कहल जा सकैछ जे ई सभ आबय वला समयमे अभिनयक क्षेत्रमे अपन एक टा अलग आ महत्वपूर्ण प्रतिमान गढ़बामे अवश्य सफल हेतीह।
नायकक पिता, मनोज बाबूक भूमिकाकें जीवंत केलनि भाई हेमंत झा जी। साहित्यिक चौपाड़िसँ लऽकऽ मैथिली साहित्य महासभा (मैसाम) धरिक हिनक यात्राक साक्षी रहितहुँ ई कहाँ बूझल छल जे ई एतेक मांजल कलाकार छथि। हिनक ई रूप हमरा अचरजसँ भरि देलक ताहिमे कोनो संशय नहि। सहनायक, रोहितक भूमिकाकें जतेक सहजतासँ श्री सत्यम काश्यप जी मंचपर जीलथि ओ हुनक सात वर्षक रंगकर्म आ सत्तरिसँ अधिक स्टेज शोकें परिलक्षित कऽ रहल छल। नायिकासँ भैंसुरक रूपमे हिनक लजेनाई, दर्शक-दीर्घाकें लहालोट करैत रहल। भूमिका छोट होइतहुँ अपन अभिनय-कौशलसँ दर्शककें कोना अपना दिस आकृष्ट कएल जाय, ई श्री पंकज मिश्र जीसँ सीखल जा सकैछ। सेल्समैनक छोट सन मुदा प्रभावी पात्रकें अपन ग्रामीण रंगमंचक अनुभवसँ जीवंत कए दर्शक सभक थोपड़ीकें खूब हंसोथलनि श्री पंकज मिश्र जी। आदरणीय विद्यानंद ठाकुर जीकें नायिकाक पिताक रूपमे देखब एक टा सुखद अनुभूति छल। ओ रामलीलामे नाना तरहक भूमिकाकें निमाहि चुकल छथि से जनतब हुनकहि द्वारा नाटकक मध्यांतरमे भेटल। ई तँ भेल नाटकक मुख्य पात्रक संक्षिप्त परिचय जे हम अपन अनुभव आ अल्पज्ञानसँ आहाँ सभक समक्ष रखलहुँ।
ई समस्त परिचय देब ताधरि नहि पूर्ण होयत जाधरि एहि नाटकक सूत्रधारक भूमिका सहित संपूर्ण नाटकपर अपन अमिट छाप छोड़िनिहार हरफनमौला कलाकार श्री अजित झा जीक चर्च नहि होयत। अहा! की प्रतिभा छनि, अप्रतिम! ई दिल्लीक रंगमंचक खास चेहरा छथि जे अपन निर्देशनसँ भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालयक अधीन संस्था, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी) द्वारा आयोजित विश्वप्रसिद्ध नाट्यमहोत्सव, भारत रंग महोत्सव (भारंगम) मे अपन झंडा गाड़ि, कुशल नाट्य-निर्देशकक रूपमे स्थापित भऽ चुकल छथि। हिनक अभिनयकें प्रत्यक्षतः अनुभव करब कम रोमांचकारी नहि छल। असगरे कोना नाटककें आगू बढ़ाओल जा सकैछ, ई हिनक अभिनय-कौशल देखि बूझल जा सकैछ। कुल मिलाकऽ हम ई कहि सकैत छी जे काल्हुक समय हमरा लेल अत्यंत फलदायी रहल। एक टा नीक नाटकक संग कतोक हित-अपेक्षित सभसँ प्रत्यक्ष दर्शनक लाभ भेटल। किछु नव लोक सभसँ सेहो परिचिति भेल। नाटकक सफल मंचन हेतु रौशन जी समेत समस्त कलाकार, खाहे ओ मंचपर अपन अभिनयक जादू देखाबय वला होथि वा नेपथ्यमे रहि एहि आयोजनकें संपूर्णता प्रदान केनिहार/केनिहारि होथि - सभकें खूब रास बधाई आ अशेष शुभकामना !
नाटकक मार्फत किछु बात जे पहिने हम सोचलहुँ जे नहि रखबाक चाही, मुदा, अंततोगत्वा एहि निष्कर्ष पर पहुँचलहुँ जे अगबे मधुर परसब उचित नहि, किछु नोनगर आ चहटगर सेहो हेबाक चाही । एक टा आम दर्शकक रूपमे एहि नाटककें हम कोन रूपें देखल, तकर सबल पक्ष तँ अपने सभक समक्ष राखि चुकलहुँ। आब, एकर कमजोर पक्षकें, जाहि पर हमर नजरि पड़ल, ओ एहि उद्देश्य आ आशासँ राखि रहल छी जे जौं उचित बुझना जेतनि तँ भविष्यमे उक्त नाटकक मंचन काल निर्देशक महोदय एहि कमीकें दूर करबाक प्रयास करता। नाटकक आरंभसँ पहिने रौशन जी कहलनि जे ई नाटक पूर्वमे एक घंटा दस मिनट केर छल जकरा बढ़ाकए दू घंटा बीस मिनट कएल गेल अछि।
शुरूमे हम आशान्वित रही जे किछु नव विषयवस्तु जोड़ल गेल हेतैक, मुदा, नाटकक समापनक पश्चात ई कहबामे हमरा कोनो असौकर्य नहि अछि जे नाटककें अनावश्यक रूपें नमारल गेल अछि। कम अवधिमे कसगर कथानक राखि ओकर प्रभावी प्रस्तुति बेसी आवश्यक, नहि कि एकहि संदेशकें अलग-अलग ढ़ंगसँ कहब। एहिसँ हमरा सन अबूझ दर्शक खौंझा जायत । दोसर कमी छल सूत्रधारक सहीसँ उपयोग नहि करब। एहेन मांजल कलाकारकें नाटकक अव्यवस्थित तारतम्यता असहज करैत छै। सूत्रधार द्वारा घटनाक्रमक विवरण आगू-पाछू करब असहज करय वला छल। तेसर कमी संवादक असंगत (Contradictory) होयब रहल। जखन नायक, सुमन आ सहनायक रोहितकें पहिलबेर भेंट होइत छैक तँ रोहित द्वारा पहिने कहल जाइत छैक जे ओ असगरे रहैत अछि दिल्लीमे, मुदा, किछुए कालक बाद ओही दृश्यमे ओकर कथनसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ओकर कनियाँ सेहो दिल्लियेमे रहैत छै। एहि तरहक असंगतिसँ बचब जरूरी।
अंतमे, सभसँ पैघ असंगति नाटकक मूल विषय लऽकऽ अभरल हमरा। मूल विषयानुसार लोककें अपनहि क्षेत्रमे विवाह-दान करबाक चाही नहि तँ आन क्षेत्रक कनियाँ भेने नाना तरहक विसंगतिक सामना करय पड़ैत छै, यथा- ओ घर-दुआरि, सर-समाज आ माय-बापसँ दूर कए दैत छै। मुदा, जखन रोहित द्वारा सुमनक मार्फत गाममे अपन माय लेल कंबल पठयबाक आग्रह कएल जाइत अछि तँ ओ कहैत अछि जे ई बात हमर कनियाँ ने बूझय। एतय ई बात ध्यातव्य जे रोहितक विवाह अपनहि क्षेत्रमे भेल छै। जखन कि नाटकमे ई देखबामे सेहो आयल जे सुमन केर पत्नी द्वारा सुमनकें कहियो अपन माय-बापक सहायता लेल मना नहि कएल गेल छल। आब ई कहू जे रोहित द्वारा ई कहब जे कंबल पठयबाक बात ओकर पत्नी नहि बूझय, की नाटकक मूल विषयक विपरीत नहि जाइत अछि?
कहबाक तात्पर्य जे व्यवहार कुशलतामे तँ रोहितक कनियाँसँ बेसी नीक सुमन केर कनिया साबित भेलीह। तखन नाटकक मूल विषयमे सँ एक विषयकें उक्त नाटकक एकटा पात्र द्वारा कमजोर करब भेल की नहि? नाटकक तकनीकी पक्षक विषयमे हमरा कोनो ज्ञान नहि अछि, तैं ओहि मादे किछु नहि कहि सकब। मुदा, एक टा बात आओर अखरल ओ छल - एक टा दृश्यमे तीनू स्त्री द्वारा आपसी संवाद कालक आपसी दूरी... उक्त दूरी कोरोना कालकें मोन पाड़ि रहल छल।

आशा अछि हमर ई नीक-बेजाय अनुभव अपने लोकनिकें नीक लागत। - रमेश चंद्र झा

बहुत सुंदर वास्तविक समीक्षा ,
ReplyDeleteजीवंत समीक्षा
ReplyDeleteबहुत सुन्दर आ उचित लिखल अछि.
ReplyDeleteखूब नीक विश्लेषण।
ReplyDeleteअपन ब्लॉगपर नाटक "बड़े मुश्किल है" केर प्रति हमर लिपिबद्ध अनुभवकें स्थान देबा हेतु हार्दिक आभार!
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