Saturday, 4 October 2025

पुस्तक समीक्षा - भू-परिक्रमण (इ-समाद)


जबकि मेरे जैसे आम मैथिल विद्यापति को मात्र जय जय भैरवि, प्रेम सह भक्ति रस में डूबे कवि, एक दरबारी और शिवभक्त के तौर पर जानते हैं, जबकि अधिसंख्य मैथिली प्रकाशन का फोकस मात्र सीता का दर्द, अबला नारी, मिथिला महान, चैट जीपीटी ज्ञान और दोयम दर्जे की हिन्दी कविताओं के घटिया नकल तक सीमित होता जा है, जबकि नवांकुर (उम्र से नहीं) कथित प्रगतिशील मैथिल साहित्यकार सड़क छाप प्रेम कहानियाँ लिखने में व्यस्त हैं.... ऐसे में मेरे लिए इस पुस्तक का जिक्र महत्वपूर्ण के साथ साथ एक दायित्वबोध भी है।

पुस्तक की समीक्षा से पूर्व इस पुस्तक को हमारे सामने लाने हेतु मैं आदरणीय भवनाथ झा, अनुज विजयदेव झा और इ-समाद का आभार प्रकट करना चाहता हूँ। इस कालजयी, शोधपरक और ऐतिहासिक पुस्तक के लिए मिथिला मैथिली संबंधित हर एक सम्मान और पुरस्कार इस तिकड़ी के कदमों में न्योछावर !

बात पुस्तक की।

भगवान कृष्ण के मित्र बलदेव ने "नैमिषारण्य से मिथिला की यात्रा" की और उनके यात्रा की चर्चा तब के मिथिला के महाराजा देव सिंह के सामने विद्यापति जी ने की। ऐसी मान्यता है कि स्वयं महाराजा देव सिंह ने न केवल इस यात्रा के स्थलों पर विद्यापति के साथ भ्रमण किया बल्कि यात्रा वृतांत लिखने को प्रेरित भी किया। 

परिणामस्वरूप विद्यापति ने इसे भूपरिक्रमण के नाम से लिखा और उनकी यह पांडुलिपि संस्कृत के कुल 84 श्लोक के तौर पर प्रस्तुत हुई। कोलकाता के संस्कृत कॉलेज में रखी इस पांडुलिपि का जिक्र उत्तरप्रदेश के श्री हर प्रसाद शास्त्री द्वारा पहली बार हुआ और फिर बाद में पहले पंडित श्री मुनीश्वर झा और फिर पंडित श्री बासुकीनाथ झा ने पांडुलिपि का अनुवाद किया।


दोनों ही विद्वान मिथिला से थे और योग्य थे किन्तु उन्होने पांडुलिपि के मर्म को समझने का अतिरिक्त प्रयास किये बगैर इसका अनुवाद मात्र किया। हालांकि दुनियाँ को इस पांडुलिपि से परिचय करवाने का श्रेय इन्हीं दो विद्वानों को जाता है किन्तु इस पांडुलिपि के संस्कृत श्लोकों के प्रामाणिक व्याख्या का सफल प्रयास किया है आज के लब्धप्रतिष्ठित इतिहासकार और पांडुलिपि विशेषज्ञ पंडित श्री भवनाथ झा जी और मिथिला पर अनवरत शोधरत श्रीमान विजयदेव झा ने। 

पांडुलिपि में उद्धृत भौगोलिक सूचना आधारित 135 संस्कृत श्लोक को Geographical, Historical और Spiritual कसौटी पर कसते हुए और इसके पाठ दोष का शुद्धिकरण करते हुए यह पुस्तक सर्वाधिक प्रामाणिक होने के साथ साथ रोचक भी बनाई गई है। तकरीबन बीस वर्ष की आयु में (1360 ईस्वी के आस पास) विद्यापति द्वारा लिखी इस पांडुलिपि को विस्तृत भाव देती इस पुस्तक की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस एक पुस्तक में संस्कृत के मूल पाठ के अलावा इसका विश्लेषणपूर्ण अंग्रेजी और हिन्दी अनुवाद भी इसमें समाहित है। 

पुस्तक खास क्यों है ?

आम तौर पर हम और आप नैमिषारण्य का जो अर्थ जान पाते हैं वो है - उत्तरप्रदेश के गोमती नदी का किनारा विद्यापति की यह पुस्तक उत्तरप्रदेश से मिथिला की कथा मात्र है। जबकि यहाँ अंतर यह है कि इ-समाद की यह पुस्तक प्रामाणिक तरीके से यह बताती है कि यह हरियाणा से मिथिला तक की कथा है। 

पुस्तक माता सीता के जन्मस्थली संबंधी हमारी सूचनाओं पर सवाल खड़े करती हुई उसे जनकपुर से 28 कोस दूर होने की बात करती है... जनक, विश्वामित्र और काशी का अछूता सच बयां करती है। यात्रा संस्मरण के तौर पर पुस्तक में देश के अलग अलग स्थानों,  नदियों, धार्मिक स्थलों और उनके इतिहास से जुड़े किस्से लिखे गए हैं। अधिक लिख कर पुस्तक के कौतूहल को समाप्त नहीं करते हुए मात्र इतना कहूँगा की यह पुस्तक अपने समय के भूगोल, संस्कृति और धार्मिक जीवन को समझने में एक प्रामाणिक स्रोत बन पड़ी है।

ई-समाद के माध्यम से मैंने इस पुस्तक के निर्माण की यात्रा देखी है। ब्रिटिश आर्काइव के श्रोत पर हफ्तों चल चलने वाली चर्चा, चार लाइन के श्लोक पर पंद्रह पंक्तियों का विश्लेषण, इस विश्लेषण पर दोनों विद्वानों का घमर्थन... देखा है मैंने। मथा अधिक गया है तो मक्खन भी उच्च कोटी का होगा...  पुस्तक आपको स्पष्ट कर देगी की हमारा मिथिला और हमारे विद्यापति उतने विपन्न नहीं जितना आज के विद्यापति नाइट स्पेशलिस्टों ने उन्हें बना दिया है। 

अंत में अच्छी छपाई, जिल्द और कागज की गुणवत्ता द्वारा पुस्तक को पठनीय बनाने हेतु इ-समाद को मेरी तरफ से विशेष शुभकामना। पुस्तक की रेटिंग मेरी तरफ से कुल 4.8/5 (आवरण - 5, छपाई - 4.5, पठनियता - 4.5, तथ्य - 5, सामाजिक सरोकार - 5) है। 

कुल जमा 228 पृष्ठ के इस संग्रहणीय पुस्तक की कीमत 599 रुपये रखी गई है जिसे आप इ-समाद की वेबसाईट पर लिंक पुस्तक प्राप्ति का लिंक पर प्राप्त कर सकते हैं। 



2 comments:

  1. Anonymous10/04/2025

    A great reader centric review of a great book. You have explained why this book is worth reading.

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  2. Anonymous10/04/2025

    उचित समीक्षा। साधुवाद।

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