मैं इस विषय पर लिखते बचता रहा हूँ. हालांकि मैं स्वयं को इतना बड़ा भी नहीं मानता कि लिखकर कोई क्रांति ला दूँ किन्तु भिन्न कारणों से यह मामला बहुत सेंसिटिव रहा है मेरे लिए. विचारधारा, अपने लोग इधर, अपने लोग उधर, मिथिलावाद वाले इनके साथ, मिथिलावाद वाले कांग्रेस के साथ, बिहार का अभिशाप, बिहार भाजपा का नकारा नेतृत्व, प्रशांत से उम्मीद, प्रशांत का ट्रैक रिकॉर्ड आदि आदि वजहें रहीं जहाँ चुप रहना बेहतर समझा मैंने. अब चुकी चुनाव समाप्त हो गया है, संभवतः इसपर अपने विचार रखकर किसी टकराहट और दुराव को आमंत्रण ना मिले... और फिर अभी चुनाव परिणाम भी आना बाँकी है, सो लिखने का यही समय चुना मैंने.
पहले प्रशांत से आरम्भ करता हूँ. प्रशांत किशोर भाजपा और अमित शाह के साथ अपनी जोड़ी के रूप में जाने गए और फिर उसी अमित शाह से दुराव की वजह से उनसे अलग भी हुए. एक चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत ने साम-दाम-दंड भेद के उपयोग को उसके चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया. सफल भी हुए. समय के साथ पैतरे बदलते रहना, कहाँ जातीय कार्ड खेलना है, कहाँ धार्मिक, कहाँ विकास की बात नहीं करनी है, कहाँ किस व्यक्ति से क्या प्रभाव पड़ेगा, कहाँ किसको शांत करना है, कहाँ किसको मिलाना है, कहाँ किसे धमकाना है.... डेटा एनालिसिस और उसके ऊपर कार्य योजना - इन सबके उपयोग को प्रशांत ने प्रोफेशनल रूप दिया. हालांकि बदलते समय में उन्होंने इन सबसे ऊपर पैसे को पाया और फलस्वरूप दक्षिण के राज्य सह ममता बनर्जी के लिए पैसे के ट्रांजेक्शन को ''देखना'' मात्र उन्हें सफलता दे गया.
इतना सब होकर भी प्रशान्त पिछड़ क्यों गए ?
दरअसल एक एम्प्लोयी और एक मालिक के बीच का मौलिक अंतर नहीं जानते प्रशांत. एक एम्प्लोयी होकर आप बेहतर कार्ययोजना बना कर अपने मालिक को सफल बना सकते हैं, किंतु इस सफल होने में मालिक को मालिक सा बनना होता है. पब्लिक लाइफ में उसे ईर्ष्या, द्वेष और दम्भ से बचना होता है. उसे बर्दाश्त करना होता है, एप्रोच को बहुत होलिस्टिक (संपूर्णता वाला) बनाना होता है. आप ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि जो भी मालिक ऐसे नहीं हुए उनके लिए प्रशांत कुछ नहीं कर पाये.
इसे थोड़ा बेहतर रूप से समझते हैं. एक मालिक राहुल गांधी को देखें. उनके एप्रोच को देखें - "अमित शाह काँप रहा है, मोदी आँख नहीं मिला पा रहा.... मैं दुनियाँ हिला दूँगा" - आदि आदि जैसा दंभ उन्हें प्रशान्त जैसे दसियों एम्प्लोयी भी सफल नहीं कर सकते. अफ़सोस, प्रशांत स्वयं ऐसे मालिक नहीं बन पाये. हर जगह मीडिया के सामने आकर अपना दंभ दिखाना - "कौन बोलेगा सामने मेरे, किसकी इतनी हिम्मत है, तुम क्या उखाड़ लोगे मेरा, सब चोर और हत्यारे हैं"- आदि आदि कहना उन्हें ग़लत मालिक बनाता रहा. मीडिया के सामने आपकी यही बात आपका कोई एम्प्लोयी कह सकता था, अफ़सोस, आप मीडिया में आकर बाहें चढ़ाते रहे और कम से कम बिहार जैसे राज्य में जहाँ राजनैतिक समझ में लोग काफ़ी अनुभवी हैं वहाँ इन सब करतबों से आपकी स्वीकार्यता कभी नहीं होती. बिहार में मीडिया मैनेजमेंट और बड़बोलापन चुनाव में सफलता नहीं देता. आपने यही सब विधानसभा चुनाव में भी किया और अभी बांकीपुर में भी कर रहे... आपने जिसपर सबसे अधिक दोषारोपण किया वो अयोग्य होकर भी मुख्यमंत्री बना है.... ध्यान दें, मालिक बनें पहले !
बांकीपुर में क्या होगा ?
ना तो मैं चुनाव विशेषज्ञ रहा हूँ और ना ही बांकीपुर से अधिक कनेक्शन रहा है मेरा किंतु प्रशांत ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी है इसमें कोई दो मत नहीं. यहाँ और एक बात जो सत्य है वो ये कि भाजपा ने चुनाव जीतने को आज से 25-30 साल पहले के कांग्रेस की याद दिला दी. उन्होंने एक भी निम्न स्तरीय पैंतरा छोड़ा नहीं यहाँ. सत्ता में रहकर चुनाव जीतने के हर एक हथकंडे अपनाये उन्होंने. स्टार प्रचारकों को झोंकना, पैसे का उपयोग, प्रतिद्वंदी को धमकाना, बूथ पर कब्जा समेत प्रशासनिक मदद... सब आज़माया है भाजपा ने. हालांकि अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट को देखते हुए ये उनके नाक की लड़ाई भी थी. परिणाम के तौर पर मुझे लगता है कि पूर्व परिणामों की अपेक्षा काफ़ी कम अंतर से भाजपा जीत जाएगी....
हाँ, यहाँ प्रशांत कमाल भी कर सकते हैं किंतु इस कमाल करे की राह में राजद द्वारा भाजपा को किया अपरोक्ष मदद सबसे बड़ा माइलस्टोन होगा. जिसे यह लगता है कि बिहार में राजद भाजपा को मदद नहीं कर रही, बेहतर है वो लोग बिहार की राजनीति में अपना अपरिपक्व नाक ना घुसायें.
मिथिलावाद के लड़के !
MSU के संस्थापक सदस्य अनूप और MSU की स्वीकार्यता को मिथिला से बाहर वृहत आकार देने वाले आदित्य प्रशांत किशोर से ना केवल जुड़े हैं बल्कि बांकीपुर चुनाव में उन्होंने अकेले दम पर आरएसएस सह भाजपा के संगठन को बड़ी चुनौती भी दी है. इस विषय में संक्षेप में कहूँ तो इन दोनों ने अपने मालिक प्रशांत के लिए श्रेष्ठ एम्प्लोयी का रोल भलीभाँति निभाया है.
यहाँ इन दोनों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह है कि इन दोनों के ऊपर 'जय-मिथिला' छोड़कर 'जय-बिहार' करने का आरोप लगा है. और तो और यह आरोप भी उनके ही पुराने साथियों ने सबसे अधिक मुखरता से लगाया है. 'मौके की तलाश में रहना, समय आने पर काटना, संग-साथ को भुलाकर स्वयं का दामन साफ़ दिखा दूसरे का मलीन करना' - मिथिला के सांस्कृतिक परम्पराओं में से एक रहा है. ऐसे में मेरे लिए यह एक दु;खद अनुभव वाला पल रहा जब पुराने साथियों ने इनके ऊपर दोषारोपण किया.
कई ऐसे लड़के हैं जिनकी पहचान में अनूप का हाथ है. कई ऐसे लड़के हैं जो कांग्रेस, राजद, आप आदि दलों के दफ़्तर में जाते आते रहे हैं. कई ऐसे लड़के हैं जो पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा-जदयू संगठन से नगदी पाकर उनके समर्थन में लगे रहे, ठीकेदारी पाते रहे, MSU को इस्तेमाल कर अपना बिजनेस प्लान करते रहे... कुछ छुपा नहीं है.
सबको अपनी राजनीति करनी है. सब मौके की तलाश में हैं, सबको बेहतर अवसर चाहिए और इसमें कुछ ग़लत भी नहीं. सबको अपनी बेहतरी, तरक्की, कमाई का हक है. हाँ, ऐसा करने के क्रम में अपने ही साथियों का विरोध करना मुझे मिथिलावाद को कमजोर करने सा लगा. चुप रहा जा सकता था, सामने आने से बचा जा सकता था...
अंत में
बिहार की जय हो.
मिथिला को एकजुटता मिले.
सम्पूर्ण जानकारी 🥳 आपके लेख में। धन्यवाद ♥️
ReplyDeleteBahut sunder. Ek ek pout ke khoob nik se post kellou
ReplyDeleteसर शुरुआत उन्होंने किया, जब अविनाश भैया काँग्रेस से टिकट के लिए गए तो इन्होंने विरोध किया औऱ करवाया उसका भी जिक्र इस लेख में निष्पक्षता को बढ़ावा दे सकता था ।
ReplyDelete💯% Sahi likhe hain bhaiyya
ReplyDeleteगजब लेख !
ReplyDeletePrashant kishor or bjp dono ke liye naak ki hi baat hain
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