अखंड

अपने मन का आंकलन, न किसी का रिफरेन्स और न ही व्यक्ति या वाद विशेष का अनुगामी. अपना पक्ष, अपना नजरिया और अपना ही अनुभव.

Saturday, 5 September 2026

नाट्यकलाकार रमेशचंद्र जीक जुबानी नाटकक रपटि - बड़ मुश्किल छै

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काल्हि (शुक्र दिन, 04 सितंबर, 2026) श्रीकृष्ण जन्माष्टमी छल आ ताहिपर भदवरिया अपन विकराल रूप सेहो देखा रहल छल। एहेन स्थितिमे लोककें प्रेक्षाग...
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Saturday, 1 August 2026

स्वयं को साबित करने की पीड़ा का अंत

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हमारे आपके जीवन की बहुत-सी पीड़ाएँ गूँगी होती हैं। वो चीख नहीं सकतीं। वो चुपचाप हमारे भीतर जन्म लेती है और कोई कोना पकड़ कर बैठी होती हैं। ऐ...
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प्रशांत किशोर, बांकीपुर और मिथिलावाद के लड़के

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मैं इस विषय पर लिखते बचता रहा हूँ. हालांकि मैं स्वयं को इतना बड़ा भी नहीं मानता कि लिखकर कोई क्रांति ला दूँ किन्तु भिन्न कारणों से यह मामला ...
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Tuesday, 2 June 2026

पुस्तक समीक्षा : The Leader Narendra D. Modi : चन्द्रमणि झा

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वर्तमान भारतीय राजनीति मेँ नरेंद्र मोदी एहन व्यक्तित्वक रूप मेँ स्थापित छथि जिनकर पक्ष आ विपक्ष दुनूमेँ तीव्र मतभेद देखबाक लेल भेटैत अछि। एह...

Book Review : The Leader Narendra D. Modi : Dr. Chandramani Jha

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In contemporary Indian politics, Narendra Modi has emerged as a personality who evokes strong and often sharply divided opinions, both among...
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प्रवीण कुमार झा

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आचार्य
यूँ तो भीड़ में से एक हूँ, बस एक बेचैनी को छोड़कर. लोग कहते हैं कि पागलपन का कीड़ा है मेरे अंदर, जो अनवरत काटता रहता है जो कभी सहज नहीं होने देता. वर्तमान का आनंद लेने के बजाय भविष्य की सोच में रहता है हरदम. अपने अलावा सबकी चिंता में रहता है. रोचक पढ़ने और लिखने का शौक रहा है. ह्रदय से मिश्रित रस का कवि भी हूँ, ये और बात है की बयां करने को शब्द नहीं होते. मजबूरन नौकरीपेशा हूँ. जब जो किया तहेदिल से किया और संभवतः इसी कारणवश देश-दुनिया के कार्यक्षेत्रीय दोस्त सफल भी मानते हैं. कंक्रीट की कंदराओं में अकेलापन और अपनों की याद समेटे कुछ लिख कर बैचैनी की दवा ढूंढता हूँ. खेतिहर ब्राम्हणवादी संयुक्त परिवार से हूँ, सो मिट्टी का सोंधापन भी बचा है अंदर कहीं-न-कहीं. दरभंगा, मिथिला के एक सुन्दर से गाँव में दबी हैं मेरी जड़ें जो बड़े शहरों की रंगीनियों से खुद को मुरझाने से बचाने को प्रयासरत है.
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