अखंड

अपने मन का आंकलन, न किसी का रिफरेन्स और न ही व्यक्ति या वाद विशेष का अनुगामी. अपना पक्ष, अपना नजरिया और अपना ही अनुभव.

Friday, 9 January 2026

विजया महिमा - अमरनाथ कक्का केर एक गोट संस्मरण

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अमरनाथ कक्का  ई  बड़ पुरान गप थिक,   जहिया बैठारिये रही। सरिसब-पाहीक सटले गाम छै हाटी। एक गो मित्रक घर ओतहि हुनक गाममे नाच-तमाशा होइ छलै। गुल...
Saturday, 27 December 2025

मिथिला मैथिली पर पाँच बातें

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परसों शाम किसी कार्य में लगा था जो लगभग मध्यरात्रि में जाकर समाप्त हुआ। संबंधित दो व्यक्ति को मैसेज किया की इसपर बात हो, स्वाभाविक रूप से वो...
Sunday, 21 December 2025

एलियट साहब - मद्रास और दरभंगा

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अभी पिछले दिनों जब मद्रास में था तो ड्राइवर ने कहा - “ये एलियट बीच है सार (सर)” - उस वक्त मानसिक व्यस्तता की वजह से मैंने ध्यान नहीं दिया। आ...
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राजकमल चौधरी : साहित्य परिचय और विद्यापति से तुलना

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मैथिली साहित्य का इतिहास केवल परंपरा-संरक्षण का इतिहास नहीं है, बल्कि वह परंपरा से टकराकर नई चेतना के निर्माण का भी इतिहास है। इस संदर्भ में...
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Wednesday, 26 November 2025

स्वयं को साबित करने की पीड़ा का अंत

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हमारे आपके जीवन की बहुत-सी पीड़ाएँ गूँगी होती हैं। वो चीख नहीं सकतीं। वो  चुपचाप हमारे भीतर जन्म लेती है और कोई कोना पकड़ कर बैठी होती हैं। ...
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प्रवीण कुमार झा

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आचार्य
यूँ तो भीड़ में से एक हूँ, बस एक बेचैनी को छोड़कर. लोग कहते हैं कि पागलपन का कीड़ा है मेरे अंदर, जो अनवरत काटता रहता है जो कभी सहज नहीं होने देता. वर्तमान का आनंद लेने के बजाय भविष्य की सोच में रहता है हरदम. अपने अलावा सबकी चिंता में रहता है. रोचक पढ़ने और लिखने का शौक रहा है. ह्रदय से मिश्रित रस का कवि भी हूँ, ये और बात है की बयां करने को शब्द नहीं होते. मजबूरन नौकरीपेशा हूँ. जब जो किया तहेदिल से किया और संभवतः इसी कारणवश देश-दुनिया के कार्यक्षेत्रीय दोस्त सफल भी मानते हैं. कंक्रीट की कंदराओं में अकेलापन और अपनों की याद समेटे कुछ लिख कर बैचैनी की दवा ढूंढता हूँ. खेतिहर ब्राम्हणवादी संयुक्त परिवार से हूँ, सो मिट्टी का सोंधापन भी बचा है अंदर कहीं-न-कहीं. दरभंगा, मिथिला के एक सुन्दर से गाँव में दबी हैं मेरी जड़ें जो बड़े शहरों की रंगीनियों से खुद को मुरझाने से बचाने को प्रयासरत है.
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