हमारे आपके जीवन की बहुत-सी पीड़ाएँ गूँगी होती हैं। वो चीख नहीं सकतीं। वो चुपचाप हमारे भीतर जन्म लेती है और कोई कोना पकड़ कर बैठी होती हैं। ऐसी ही एक पीड़ा है हमारे अंदर मौजूद सम्मान, सराहना और लोगों द्वारा हमें समझ लेने की अपेक्षा ! हम अक्सर हमारे ही दिल में यह इच्छा लिए चलते हैं कि लोग हमें समझें, हमारी कद्र करें, हमारे प्रयासों को पहचानें… वो हमारे अस्तित्व को महत्व दें और फिर जब भी ऐसा नहीं होता तो हमारे मन को लगता है मानो कुछ छिन गया…खिन्न होकर अपने जीवन तक धिक्कारने लगते हैं। जबकि असल में हमसे कुछ भी नहीं छिनता, हाँ, बस हमारी अपेक्षाएँ ही टूटती हैं।
सच्चाई यह है कि दुनिया हमें हमारी नज़रों से नहीं देखती। हर इंसान हमें अपने अनुभवों, अपनी सीमाओं और अपनी कमियों की आँखों से देखता है। इसलिए दूसरों से पूर्ण समझ की अपेक्षा रखना खुद को दुःख देने जैसा है और फिर ऐसे में ही हमारे अंदर जन्म लेती है खुद को साबित करने की इच्छा। हम यह साबित करना चाहते हैं कि हम सही हैं, हम सक्षम हैं, हम योग्य हैं, हम महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में हम ऐसी लड़ाइयाँ लड़ने लगते हैं जिनकी कोई ज़रूरत ही नहीं होती। हम अपने काम को अपनी तरक्की के लिए नहीं बल्कि स्वयं को प्रमाणित करने के लिए करने लगते हैं… धीरे-धीरे हम स्वयं का जीवन जीना भूलकर दुनिया के सामने प्रदर्शन करने लगते हैं, करतब करने लगते हैं, हम दौड़ने भागने लगते हैं।
हाँ, जब हम ठहरते हैं, विलमकर थोड़ा सोचते हैं, लंबी साँस लेते हैं और अपने ही अंदर झाँकते हैं, तो एक गहरी सच्चाई जो हमारे सामने आती है वो है - जो वास्तविक है, उसे किसी प्रमाण की ज़रूरत नहीं। जो मूल्यवान है, वह अंधेरे में भी चमकता है, चुप रहकर भी सब कह जाता है वो और इन सबसे ऊपर ये की दुनियाँ की कोई भी ताक़त हमसे ईश्वर प्रदत्त सम्मान छीन नहीं सकती।
सम्मान जब बिना माँगे मिलता है तो वह सबसे मधुर होता है। स्नेह जब स्वाभाविक होता है तो वह सबसे पवित्र होता है और पहचान जब स्वयं चलकर आती है तो वह सबसे स्थायी होती है। जब हम बाह्य मान्यताओं की प्यास छोड़ देते हैं तब हम एक अपनी ही भूली हुई आवाज़ सुन पाते है। हमारी अपनी आवाज़। जो कहती है - “तुम पर्याप्त हो। तुम्हें किसी सबूत की ज़रूरत नहीं। तुम्हारी यात्रा पवित्र है, चाहे दुनिया इसे देखे या नहीं।”
जिस दिन हम दूसरों को साबित करना छोड़ देते हैं, उसी दिन हम खुद को पहचानना शुरू करते हैं और जब आत्मबोध आता है, तो दूसरों के विचारों की शक्ति हम पर से स्वयं ही समाप्त हो जाती है। इसी मौन, इसी स्वतंत्रता में हमारे आत्मा की असली गरिमा जन्म लेती है जो हमारे अंदर जन्म लिए पीड़ा को समाप्त करने की शक्ति रखती है।
शानदार
ReplyDeleteबहुत बहुत समीचीन सत्य आ सभक बात कहल भाइ👌
ReplyDeleteज्ञानवर्धक
ReplyDeleteउत्तम !जीवन सार
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