अखंड

अपने मन का आंकलन, न किसी का रिफरेन्स और न ही व्यक्ति या वाद विशेष का अनुगामी. अपना पक्ष, अपना नजरिया और अपना ही अनुभव.

Saturday, 4 October 2025

पुस्तक समीक्षा - भू-परिक्रमण (इ-समाद)

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जबकि मेरे जैसे आम मैथिल विद्यापति को मात्र जय जय भैरवि, प्रेम सह भक्ति रस में डूबे कवि, एक दरबारी और शिवभक्त के तौर पर जानते हैं, जबकि अधिसं...
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Sunday, 24 August 2025

साहित्य और राज्य से इतर मिथिला

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मिथिला के इतिहास के नाम पर अधिकांशतः साहित्य विवेचना ही देखी है। चूँकि मैंने कोई किताब नहीं लिखी, और न ही टीवी में आता हूँ, साहित्य से इतर म...
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Sunday, 17 August 2025

मित्र धैर्यकांतक नाम लिखल एकटा पाती

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२० अक्टूबर २०२२, पुणे प्रिय धैर्यकाँत,  काल्हि चारि मासक बाद अहां अपन मुखपृष्ठ पर लिखलहुं। अहां जखन लिखैत छी, हृदय सं लिखैत छी‌। अद्भुत लिखल...

अमृता - इमरोज़ की कहानी के बहाने

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भारत की लोकप्रिय कवयित्रियों में से एक अमृता प्रीतम ने एक बार लिखा था- "मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती और लिखती रही, वो सब देवताओं को जगा...
Saturday, 16 August 2025

चरित्र और सामाजिक विकास

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स्वामी विवेकानंद शिकागो शहर में गेरुआ वस्त्र पहने घूम रहे थे। कुछ लोगों का अत्याधिक कौतूहल देख बोले - "देखिये, आपके अमेरिका में एक दर्ज...
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प्रवीण कुमार झा

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आचार्य
यूँ तो भीड़ में से एक हूँ, बस एक बेचैनी को छोड़कर. लोग कहते हैं कि पागलपन का कीड़ा है मेरे अंदर, जो अनवरत काटता रहता है जो कभी सहज नहीं होने देता. वर्तमान का आनंद लेने के बजाय भविष्य की सोच में रहता है हरदम. अपने अलावा सबकी चिंता में रहता है. रोचक पढ़ने और लिखने का शौक रहा है. ह्रदय से मिश्रित रस का कवि भी हूँ, ये और बात है की बयां करने को शब्द नहीं होते. मजबूरन नौकरीपेशा हूँ. जब जो किया तहेदिल से किया और संभवतः इसी कारणवश देश-दुनिया के कार्यक्षेत्रीय दोस्त सफल भी मानते हैं. कंक्रीट की कंदराओं में अकेलापन और अपनों की याद समेटे कुछ लिख कर बैचैनी की दवा ढूंढता हूँ. खेतिहर ब्राम्हणवादी संयुक्त परिवार से हूँ, सो मिट्टी का सोंधापन भी बचा है अंदर कहीं-न-कहीं. दरभंगा, मिथिला के एक सुन्दर से गाँव में दबी हैं मेरी जड़ें जो बड़े शहरों की रंगीनियों से खुद को मुरझाने से बचाने को प्रयासरत है.
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